✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-३. कङ्खारेवत मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

कङ्खारेवत

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

कङ्खारेवत, श्रावस्ती के एक प्रतिष्ठित और समृद्ध परिवार के कुलपुत्र थे। प्रव्रज्या ग्रहण करने के पश्चात उन्होंने अपना संपूर्ण चित्त ‘ध्यानाभ्यास’ में लगा दिया और समाधि की सूक्ष्म गहराइयों में विशेष निपुणता प्राप्त की। इसी कारण, भगवान ने उन्हें ध्यान-लीन रहने वाले भिक्षुओं में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया।

अपनी समस्त शंकाओं के निर्मूल होने से उत्पन्न प्रसन्नता को व्यक्त करते हुए उन्होंने इस गाथा की रचना की:

हिन्दी

“घोर अँधेरी रात में,
तथागत की प्रज्ञा देखो,
जैसे प्रज्वलित अग्नि।

आलोक और ज्ञान-चक्षु,
वे बाँटते सदा,
जो आए पास,
मिटाते शंका सबकी।”


पालि

“पञ इमं पस्स तथागतानं,
अग्गि यथा पञ्जलितो निसीये ।
आलोकदा चक्खुददा भवन्ति,
ये आगतानं विनयन्ति कहूं” ति॥