✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-३०. उत्तिय मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

उत्तिय

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

श्रावस्ती के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे उत्तिय, सत्य की तीव्र खोज में परिव्राजक बन गए थे। भगवान के उपदेशों से प्रभावित होकर उन्होंने भिक्षु संघ में दीक्षा ली। साधना में अत्यधिक परिश्रम करने के कारण उनका शरीर अस्वस्थ हो गया, किंतु उन्होंने अपनी बीमारी को बाधा नहीं बनने दिया। अस्वस्थता की स्थिति में भी उन्होंने अपनी साधना जारी रखी और परम ज्ञान प्राप्त किया।

अपनी उसी जिजीविषा और सजगता को उत्तिय स्थविर ने इस उदान में व्यक्त किया:

हिन्दी

“रोग देह में आ गया,
मुझमें सजगता होनी चाहिए।
मैं रोगग्रस्त हूँ जानकर,
अब मुझे प्रमादरहित होना चाहिए।”


पालि

“आबाधे मे समुप्पन्ने,
सति मे उपपज्जय।
आबाधो मे समुप्पन्नो,
काले मे नप्पमज्जितुं” ति।