
कुमापुत्तसहाय
अवन्ती के वेलुकण्ड नगर के एक धनी परिवार में जन्मे सुदत्त, अपने मित्र कुमापुत्र स्थविर के साथ प्रव्रजित होने और सदैव उनके साथ रहने के कारण ‘कुमापुत्र सहायक’ के नाम से विख्यात हुए। जिस स्थान पर वे साधना करते थे, वहाँ आगंतुक भिक्षुओं की निरंतर आवाजाही और कोलाहल के कारण उनके ध्यान में बाधा आती थी।
अपने चित्त को एकाग्र करने और स्वयं को अनुशासन सिखाने के लिए उन्होंने यह उदान गाया:
हिन्दी
नाना जनपदों में विचरता है,
उसका विचरना राष्ट्र के
किस काम आएगा;
चूँकि वह चित्त की एकाग्रता से
वंचित हो जाएगा।
अतः उसे अनुशासित अब होना होगा,
दृढ़ता से ध्यान में
स्वयं को लगाना होगा।”
पालि
विचरन्ता असञ्ञता।
समाधिं च विराधेन्ति,
किन्त्वं रट्ठचरिया करिस्सति।
तस्मा विनेय्य सारम्भं,
झायेय्य अपुरक्खतो” ति।