✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-४०. वड्ढमान मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

वड्ढमान

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

वैशाली के प्रतिष्ठित लिच्छवि राजकुमार वड्ढमान भगवान के पास प्रवर्जित हुए। किंतु प्रारंभ में वे साधना के प्रति अनुद्योगी (प्रमादी) रहे। तत्पश्चात भगवान के उपदेश से उनमे तीव्र वैराग्य जागा। उसी संवेग के बल पर उन्होंने कठोर पुरुषार्थ किया और अर्हत्व (परमपद) प्राप्त किया।

स्थविर ने भगवान के उन्हीं मर्मस्पर्शी शब्दों को उदान के रूप में गाया:

हिन्दी

“देह में घुसे भाले को,
जैसे निकालने का कोई प्रयास करे,
या लगी अग्नि को शरीर की,
दृढ़ता से वह शान्त करे।
उसी तरह स्मृतिमान भिक्षु,
भव-तृष्णा के प्रहाण हेतु,
सजग होकर विचरण करे।”


पालि

“सत्तिया विय ओमट्ठो,
डय्हमानोव मत्थके।
भवरागप्पहानाय,
सतो भिक्खु परिव्वजे” ति।