✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-४१. सिरिवड्ढ मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

सिरिवड्ढ

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

राजगृह के एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में जन्मे सिरिवड्ढ प्रवर्जित होकर राजगृह की पहाड़ियों के बीच एक गुफा में एकांत साधना करने लगे। एक दिन जब वे ध्यानमग्न थे, तब बाहर मूसलाधार वर्षा होने लगी और पहाड़ियों के बीच भीषण बिजली गिरी। उस भयंकर शोर और प्राकृतिक हलचल के बीच भी सिरिवड्ढ का चित्त तनिक न डोला; बल्कि उसी क्षण वे समाधि की गहनता में उतरकर अर्हत्व (शान्तपद) को प्राप्त हुए।

अपनी उस अचल अवस्था को उन्होंने इस उदान में व्यक्त किया:

हिन्दी

“वैभार और पाण्डव गिरि पर,
बिजली सदा गिरती रहती है,
पर अप्रतिम ज्ञानी शिष्य बुद्ध का,
द्वार से होकर जाता है,
गुफाओं में बैठ सजग हो,
गहरा ध्यान लगाता है।”


पालि

“विचरमनुपतन्ति विज्जुता,
वेभारस्स च पण्डवस्स च।
नगविवरगतो च झायति,
पुत्तो अप्पटिमस्स तादिनो” ति।