
सुमङ्गल
श्रावस्ती के समीप एक निर्धन किसान परिवार में जन्मे सुमङ्गल भगवान् के पास प्रवर्जित हुए| प्रारंभ में वे एकांत में साधना करने लगे, किंतु पूर्व जीवन की स्मृतियों और उदासी के कारण उनका मन विचलित होने लगा। एक दिन वे हार मानकर वापस अपने गाँव लौटने लगे। मार्ग में उन्होंने किसानों को कड़ी धूप में हल चलाते और भारी श्रम करते देखा। उन्हें तुरंत अपने पूर्व जीवन के कष्ट याद आ गए और उन्होंने सोचा कि भिक्षु जीवन तो इन सांसारिक बंधनों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
उसी क्षण उन्होंने स्वयं को संबोधित करते हुए यह उदान गाया और पुनः साधना में लौट गए:
हिन्दी
अच्छी तरह मुक्त हुआ!
आध्यात्मिक खेती के लिए,
हाँ, मैं अब मुक्त हुआ।
जोताई, बोवाई, कटाई और
हँसुओं-हलों से नाता टूटा,
कुदालों के उन कष्टों से भी,
अब मेरा पीछा छूटा।
यद्यपि वे सब यहाँ पर हैं
तथापि मुझे (उनसे) पर्याप्त (अनुभव) मिला!
पर्याप्त (अनुभव) मिला।
सुमङ्गल ध्यान करो!
सुमङ्गल ध्यान करो!
सुमङ्गल अप्रमादी हो विहरो।”
पालि
सुमुत्तिकोम्हि तीहि खुज्जकेहि।
असितासु मया नङ्गलासु मया,
खुद्दकुद्दालासु मया ॥
यदीपि इधमेव इधमेव,
अथ वा पि अलमेव अलमेव।
झाय सुमङ्गल झाय सुमङ्गल,
अप्पमत्तो विहर सुमङ्गला” ति।