
सानु
श्रावस्ती के एक श्रद्धालु उपासक के पुत्र सानु अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए प्रवर्जित हुए| किंतु साधना के मार्ग में उनका मन विचलित होने लगा और वे पुनः गृहस्थ जीवन की ओर लौटने का विचार करने लगे। जब उनकी माता को इस बात का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुईं। अपनी माँ को निरंतर शोक संतप्त देखकर एक दिन सानु ने उनसे उनकी उदासी का कारण पूछा। तब उनकी माता ने ऐसे मर्मस्पर्शी वचन कहे कि सानु के भीतर तीव्र संवेग जागृत हो गया। उन्होंने दृढ़ निश्चय के साथ साधना की और अर्हत्व प्राप्त किया।
उस परिवर्तन के क्षण में अपनी माता से पूछे गए प्रश्न को ही उन्होंने इस उदान में पिरोया:
हिन्दी
या ओझल हो जाए जीवित आदमी,
तभी माँ! रोती हैं आँखें।
पर माँ! मुझे तो सब यहाँ,
अपनी आँखों से जीवित देखते हैं,
फिर किसलिए रोती हो माँ?”
पालि
यो वा जीवं न दिस्सति।
जीवन्तं मं अम्म पस्सन्ती,
कस्मा मं अम्म रोदसी” ति।