✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-५३. वल्लिय मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

वल्लिय

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

गोधिक, सुबाहु, वल्लिय और उत्तिय – ये चारों पावा के मल्ल राजकुमार थे। एक दिन चारों कुमार राज-काज के निमित्त कपिलवस्तु गए। उस समय भगवान निग्रोधाराम में विहरते थे। वहाँ भगवान से उपदेश सुनकर चारों कुमार प्रव्रजित हुए और राजगृह जाकर राजा बिम्बिसार की बनवायी हुई कुटियों में ध्यान करने लगे।

एक दिन ध्यान से उठने पर जोरों की वर्षा होने लगी, तब चारों ब्रह्मचारियों ने एक-एक करके ये उदान कहे। तीसरे वल्लिय ने कहा:

हिन्दी

“हो रही वर्षा है ऐसी, हे देव!
मानो संगीत बजता हो,
मेरी कुटी सुखदायी-सुरक्षित।
मैं अप्रमादी, हो उसमे विहरता।
अतः हे देव! चाहो तो खूब बरसो।”


पालि

“वस्सति देवो यथा सुगीतं,
छन्ना मे कुटिका सुखा निवाता ।
तस्स विहरामि अप्पमत्तो,
अथ चे पत्ययसि पवस्स देवा” ति।