
कुटिविहारि (पठम)
वैशाली के ही एक लिच्छवी राजकुमार। प्रव्रजित होकर वे अंजन वन में रहते थे। एक दिन खेत में टहलते समय एकाएक वर्षा होने लगी, तो भिक्षु किसी किसान की खाली झोंपड़ी में प्रवेश कर गए और वहाँ ध्यान करते हुए अर्हत्व प्राप्त किया। किसान ने जब अपनी झोंपड़ी में भिक्षु को देखा तो उनसे प्रश्न किया। कुटिविहारि स्थविर ने ऐसा उत्तर दिया कि किसान अत्यंत प्रसन्न हुआ। इस उदान में उन दोनों के बीच हुई बातचीत का उल्लेख है:
हिन्दी
“बताओ इस कुटी में कौन है?"
(कुटिविहारि):
“कुटी में वीतरागी,
सुसमाहित-चित्त भिक्षु विद्यमान है।”
(किसान):
“आयुष्मान! जान लो!
तुम्हारी बनाई यह कुटी,
बिलकुल गई नहीं बेकार।”
पालि
कुटिकायं वीतरागो सुसमाहितचित्तो।
एवं जानाहि आवुसो,
अमोघा ते कुटिका कता” ति।