
कुटिविहारि (दुतिय)
यह कथा पूर्व कथा के समान ही है। ये भिक्षु अंजन वन की एक पुरानी कुटी में ध्यान साधना कर रहे थे। साधना के दौरान इनके मन में एक नई कुटी बनाने की इच्छा जाग्रत हुई। एक वन-देवता ने भिक्षु के इस विचार को ताड़ लिया और एक गाथा के माध्यम से उनके मन में संवेग (वैराग्यपूर्ण प्रेरणा) उत्पन्न किया। उस संवेग को पाकर भिक्षु उद्योगी हुए और परमपद को प्राप्त किया।
अर्हत्व के पश्चात कुटिविहारि स्थविर ने देवता द्वारा कही गई उसी गाथा को उदान के रूप में प्रकट किया:
हिन्दी
नई कुटी बनाना चाहते हो?
इच्छा छोड़ दो कुटी की,
क्यों नया दुःख चाहते हो?
भिक्षु! त्याग दो इच्छा को,
क्योंकि दुःख ही फिर होगा।”
पालि
अञ्ञं पत्थयसे नवं कुटि।
आसं कुटिया विराजय,
दुक्खा भिक्खु पुन नवा कुटी” ति।