✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-५८. रमणीयकुटिविहारि मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

रमणीयकुटिविहारि

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट
वैशाली के ही एक लिच्छवी कुमार। प्रव्रजित होकर अर्हत्व को प्राप्त किया और एक सुंदर कुटी में वास करने लगे। एक दिन कुछ स्त्रियों ने तरुण भिक्षु को सुंदर कुटी में देखकर उन्हें प्रलोभन देने का प्रयत्न किया। उस समय भिक्षु ने अपने विरागी भाव प्रकट करते हुए यह उदान कहा:

हिन्दी

“रमणीय मेरी कुटिया है,
श्रद्धा से दी गई मनोरम है,
मुझे कुमारियों से मतलब नहीं,
चित्त मेरा संयम है।
जिन्हें मतलब हो स्त्रियों से,
वे ही वहाँ जाएँ।”


पालि

“रमणीया मे कुटिका,
सद्धादेव्या मनोरमा।
न मे अत्यो कुमारीहि,
येसं अत्यो तहिं गच्छथ नारियो” ति।