✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-६१. वप्प मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

वप्प

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट
कपिलवस्तु के ब्राह्मण कुल में जन्मे वप्प, पंचवर्गीय भिक्षुओं में से एक थे। ऋषिपत्तन में भगवान का प्रथम उपदेश सुनकर अर्हत पद प्राप्त किया। सत्य के साक्षात्कार के पश्चात, अपनी अंतर्दृष्टि को स्पष्ट करते हुए एक दिन वप्प स्थविर ने यह उदान कहा।

हिन्दी

“द्रष्टा भाव से यथार्थ को,
मैं अन्त तक जानता हूँ,
अयथार्थ को भी अनुभव पहचानता हूँ।
नहीं देखा जिसे उसे,
नहीं देखा करके जानता हूँ,
देखकर भी न देखा जो,
उसे भी देखकर ना देखा जानता हूँ।”


पालि

“पस्सति पस्सो पस्सन्तं,
अपस्सन्तं च पस्सति।
अपस्सन्तो अपस्सन्तं,
पस्सन्तं च न पस्सती” ति।