✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-६२. वज्जिपुत्त मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

वज्जिपुत्त

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

वञ्जिपुत्त वैशाली के एक मंत्री के पुत्र थे। प्रव्रजित होकर किसी अरण्य में ध्यान करते थे। एक दिन वैशाली के लोग उत्सव मना रहे थे। लोगों की हँसी-खुशी को देखकर भिक्षु का मन उदास हुआ। उनके मन में हुआ कि ‘हम फेंकी हुई लकड़ी की तरह अकेले पड़े हैं। इस प्रकार वे भिक्षु अरण्य-वास छोड़ना चाहते थे। एक दिन वन-देवता ने भिक्षु के विचार को जानकर संवेग उत्पन्न करने के लिए एक गाथा सुनायी। संवेग पाकर भिक्षु उद्योगी हो अर्हत पद को प्राप्त हुए।

उसके बाद उन्होंने देवता की गाथा को ही उदान के रूप में प्रकट किया :

हिन्दी

“जंगल में फेंकी हुई लकड़ी की तरह,
हम अकेले अरण्य में वास करते हैं।
बहुत से लोग मेरी स्पृहा (जलन)
उसी प्रकार करते हैं
जिस प्रकार नारकीय लोग
स्वर्गगामी की निंदा करते हैं।”


पालि

“एकका मयं अरुजे विहराम,
अपविद्धं व वनस्मिं दारुकं ।
तस्स मे बहुका पिहयन्ति,
नेरयिका विय सग्गगामिनं” ति।