
माणव
श्रावस्ती के एक अत्यंत धनी ब्राह्मण कुल में माणव का जन्म हुआ। उनका पालन-पोषण छः वर्षों तक घर की चारदीवारी के भीतर ही हुआ, जिससे वे बाहरी संसार के दुःखों से पूरी तरह अनभिज्ञ रहे। मात्र सात वर्ष की आयु में, सिद्धार्थ कुमार की भाँति ‘चार निमित्तों’ (वृद्ध, रोगी, मृत आदि) को देखकर उनके भीतर वैराग्य जागा। वे घर से निकलकर प्रव्रजित हुए और कठोर साधना द्वारा अर्हत पद को प्राप्त किया।
माणव स्थविर ने अपना अनुभव इस उदान में व्यक्त किया:
हिन्दी
दुःखी और मृत,
देखकर ही गृहत्याग किया,
लौकिक काम वासनाओं का,
इससे पूर्व ही प्रहाण (त्याग) किया।
मन में रमण करने वाली इच्छाओं को,
मैंने त्याग दिया।”
पालि
मतं च दिस्वा गतमायुसङ्ख्यं ।
ततो अहं निक्खमितून पब्बजिं,
पहाय कामानि मनोरमानी” ति।