
एरका
श्रावस्ती के एक सम्पन्न परिवार में उत्पन्न हुए। वे बहुत ही सुन्दर थे। उचित समय पर एक योग्य कन्या से उनका विवाह हो गया। एक दिन भगवान से उपदेश सुनने पर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। वे भगवान के पास प्रव्रजित हो ध्यान-भावना करने लगे। लेकिन उनके पूर्व कुसंस्कार इतने प्रबल हो गये कि वे भिक्षु जीवन से उदास हो गये। भगवान ने उनकी चित्त-प्रवृत्ति को देखकर एक दिन उन्हें सचेत करते हुए उपदेश दिया। उससे प्रेरणा पाकर उद्योगी हो वे शीघ्र ही अर्हत पद को प्राप्त हुए।
उसके बाद एरक स्थविर ने भगवान के शब्दों में यह उदान कहा:
हिन्दी
सुखमय नहीं हैं,
जो इनकी कामना करता,
दुःख प्राप्ति इच्छा करता है।
एरक! जो काम भोगों की,
इच्छा नहीं करता,
वह मानो दुःखों की,
कामना से मुक्त रहता है।”
पालि
न सुखा कामा एरक,
यो कामे कामयति,
दुक्खं सो कामयति एरक,
यो कामे न कामयति,
दुक्खं सो न कामयति एरका"ति।”