
चक्खुपल
श्रावस्ती के एक धनी परिवार में उत्पन्न। महापाल और चूलपाल दो भाई थे। महापाल भगवान से उपदेश सुनकर प्रव्रजित हुए। वे अन्य साठ भिक्षुओं के साथ श्रावस्ती से बहुत दूर एक अरण्य में जाकर ध्यान-भावना करने लगे। महापाल बिना सोये दिन-रात परिश्रम करते थे। उनकी दोनों आँखें खराब हो गयीं और वे अन्धे हो गये। इससे उनका नाम पड़ा चक्खुपाल। कुछ दिन के बाद अन्य सब्रह्मचारियों के साथ ही चक्खुपाल भी अर्हत पद को प्राप्त हुए। दूसरे भिक्षु श्रावस्ती लौट गये और चक्खुपाल वहीं रह गये।
जब चूलपाल ने अपने भाई के विषय में सुना तो उसने अपने लड़के को उन्हें लिवा लाने के लिए भेज दिया। क्योंकि रास्ता संकटपूर्ण था इसलिए उस लड़के को चीवर पहनाकर श्रामणेर के वेश में भेज दिया। जब श्रामणेर चक्खुपाल स्थविर को लेकर आ रहा था तो जंगल में उसे एक स्त्री का गीत सुनाई दिया। वह चक्खुपाल भिक्षु को वहीं बैठाकर जंगल में जा उस स्त्री से मिलकर आया। जब भिक्षु ने देर करने का कारण पूछा तो उसने सारी बात बतायी। तब चक्खुपाल ने उसके साथ जाने से इनकार किया। कहते हैं इन्द्र ने मनुष्य के वेश में आकर भिक्षु को श्रावस्ती तक पहुँचा दिया।
जो शब्द चक्खुपाल स्थविर ने उस श्रामणेर से कहे थे उन्हीं को यहाँ पर उदान के रूप में दिया गया है:
हिन्दी
नेत्र हुए हैं नष्ट,
जंगल की राह पर,
मुझे आगे जाना है।
यहाँ पड़े रहना भी,
है मुझे ठीक,
पर दुष्ट साथी संग,
नहीं मुझे जाना है।”
पालि
कन्तारद्वानपक्खन्दो।
सयमानोपि गच्छिस्सं,
न सहायेन पापेना” ति।