“सौ पलभार काँसे का,और सोने के बने,बहुमूल्य सुन्दर पात्रों को त्यागकर।मिट्टी के पात्र को,स्वीकार लिया है,मेरा दूसरा अभिषेक है यह।”
“हित्वा सतपलं कंसं,सोवण्णं सतराजिकं ।अग्गर्हि मत्तिकापत्तं,इदं दुनियाभिसेचनं” ति।