
अभय
श्रावस्ती के ब्राह्मण कुल में उत्पन्न, भगवान से उपदेश सुनकर वे प्रव्रजित हुए। एक दिन भिक्षाटन हेतु गाँव में गए और वहां एक सुन्दर स्त्री को देखकर उनके मन में विकार उत्पन्न हुआ। इस घटना पर मनन करते हुए वे और अधिक उद्योगी हुए और शीघ्र ही अर्हत पद को प्राप्त किया। उक्त घटना को लक्ष्य कर, अभय स्थविर ने यह उदान कहा:
हिन्दी
मन में लाने पर स्मृति नष्ट हो गयी।
आसक्त चित्त से लेता जो आनन्द,
मन उसमें पैठ, समा जाता है वही॥
इस प्रकार जन्म के मूल कारण,
दुःख की ओर ले जानेवाले होते है,
आश्रव उसके बढ़ जाते हैं।”
पालि
पियं निमित्तं मनसिकरोतो ।
सारत्तचित्तो वेदेति,
तं च अज्झोस तिद्वति ।
तस्स वहन्ति आसवा,
भवमूलोपगामिनो” ति।