
उत्तिय (दुतिय)
कपिलवस्तु के एक शाक्य राजकुमार, जो भगवान का उपदेश सुनकर प्रव्रजित हुए। एक दिन भिक्षाटन के समय किसी स्त्री का गीत सुनकर उनके मन में विकार उत्पन्न हुआ। विहार लौटकर उन्होंने उस घटना पर मनन किया और अधिक उद्योगी हो, शीघ्र ही अर्हत पद प्राप्त किया। उक्त घटना को लक्ष्य कर उत्तिय स्थविर ने यह उदान कहा:
हिन्दी
प्रिय निमित्त मन में लाने पर,
स्मृति हो गयी नष्ट।
आसक्त-चित्त से जो लेता आनन्द,
मन उसमें पैठ,
समा जाता है वही।
इस प्रकार संसार की ओर
ले जाने वाले आश्रव उसके,
बढ़ते जाते है यही।”
पालि
पियं निमित्तं मनसिकरोतो।
सारस्त्तचित्तो वेदेति,
तं च अज्झोस तिट्ठति ।
तस्स वहुन्ति आसवा,
संसारं उपगामिनो” ति।