✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
२-१. उत्तर मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

उत्तर

राजगृह के एक विख्यात ब्राह्मण कुल में जन्मे उत्तर, शास्त्रों के प्रकांड विद्वान थे। मगध के महामात्य वत्सकार ने अपनी कन्या का विवाह उनसे करना चाहा, किन्तु उन्होंने प्रस्ताव ठुकराकर सारिपुत्र के पास प्रव्रज्या ले ली। एक दिन, अस्वस्थ सारिपुत्र के लिए वैद्य बुलाने जाते समय, उत्तर एक तालाब किनारे रुके। तभी, सिपाहियों से बचकर भागते हुए एक चोर ने उनके पात्र में चुराए रत्न डाल दिए।

सिपाहियों ने रत्नों को देख उत्तर को ही चोर समझा और महामात्य वत्सकार के पास ले गए, जिसने उन्हें सूली पर चढ़ाने का दंड दिया। यह जानकर भगवान स्वयं वधस्थल पर पधारे। उन्होंने उत्तर के सिर पर हाथ रखकर पूर्व कर्मों का मर्म समझाया। वहीं सूली पर ध्यान-भावना कर उत्तर ने अर्हत् पद प्राप्त किया और मुक्त होकर खड़े हो गए। संसार की अनित्यता और इस चमत्कारिक मुक्ति को लक्ष्य कर उन्होंने यह उदान गाया:

हिन्दी

“कोई भी भव नित्य नहीं,
संस्कार भी शाश्वत नहीं,
वे पाँच स्कन्ध, एक के बाद एक,
उत्पन्न हो विनष्ट हो ‘जाते’।

इस दुष्परिणाम को ‘जान’,
मैं संसार की इच्छा नहीं करता,
विषय-वासना से निर्लिप्त हो
साधना-बल पर आश्रव क्षीण कर लिया।”


पालि

“नत्यि कोचि भवा निच्चो,
सङ्घारा वापि सस्सता।
उप्पज्ञ्जन्ति च ते खन्धा,
ववन्ति अपरापरं॥

एतमादीनं ञत्वा,
भवेनम्हि अनत्थिको।
निस्सटो सब्बकामेहि,
पत्तो मे आसवक्खयो” ति।