
वसभ
वैशाली के लिच्छवी राजकुमार वसभ, प्रव्रज्यित होकर अर्हत् बने और एक विहार में रहने लगे। उनकी साधना के प्रभाव से लोग उनका बहुत सत्कार करते थे। यह सत्कार इतना बढ़ा कि कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि वे विलासी हो गए हैं। दूसरी ओर, वे लोग एक अन्य भिक्षु पर मोहित थे जो बाहरी रूप से तो बड़ा त्यागी दिखता था, किन्तु वास्तव में पापचारी था। सत्य को उजागर करने हेतु देवराज इन्द्र (सुजम्पति) ने वसभ के पास आकर उस पापी भिक्षु की चर्चा की।
इस अवसर पर वसभ स्थविर ने उस ढोंगी भिक्षु को लक्ष्य कर यह उदान कहा:
हिन्दी
फिर करता आहत दूसरों को,
स्वयं अच्छे से आहत होता
मानो पिंजरे में फँसा पक्षी हो।
बाहरी वर्ण से न कोई ब्राह्मण हो,
ब्राह्मण वर्ण हो भीतरी से।
जो भी पापी कर्म करे
हे सुजम्पति, वह काला हो!”
पालि
पच्छा हनति सो परे।
सुहतं हन्ति अत्तानं,
वीतंसेनेव पक्खिमा॥
न ब्राह्मणो बहिवण्णो,
अन्तोवण्णो हि ब्राह्मणो।
यस्मिं पापानि कम्पानि,
स वे कण्हो सुजम्पती” ति।