
अजिन
श्रावस्ती के एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मे अजिन, प्रव्रजित होकर अर्हत् पद को प्राप्त हुए। तथापि, किसी पूर्व कर्म के प्रभाव से वे अप्रसिद्ध ही रहे। एक दिन कुछ अबोध श्रामणेरों ने उनका उपहास किया। इस घटना के माध्यम से उनमें संवेग उत्पन्न करने के लिए अजिन स्थविर ने यह उदान गाया:
हिन्दी
मृत्यु को हरा चुका अनास्रव भी,
किन्तु यदि वह विख्यात न हो
तो मूर्ख करते अवहेलना उनकी।
यद्यपि हो कोई अन्न-पान लाभी,
भले ही हो पापी स्वभाव भी,
किन्तु यदि वह विख्यात हो,
तो सत्कार करते वे (मूर्ख) उनका।”
पालि
मच्चुहायी अनासवो।
अप्पञ्ञातोति नं बाला,
अवजानन्ति अजानता॥
यो च खो अन्नपानस्स,
लाभी होतीध पुग्गलो।
पापधम्मोपि चे होति,
सो नेसं होति सक्कतो” ति।