
मध्यम निकाय
मध्यम निकाय पालि साहित्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह है, जिसमें मध्यम लंबाई के कुल १५२ सूत्र संकलित हैं। इसकी भाषा स्पष्ट, संक्षिप्त और विषय पर केंद्रित है, इसी कारण यह साधकों के बीच सबसे लोकप्रिय और व्यवहारिक निकाय माना जाता है। पाँच निकायों में इसे सबसे रोचक और ज्ञानवर्धक कहना अनुचित नहीं होगा।
इस निकाय में भगवान बुद्ध की विविध साधना-संबंधी शिक्षाएँ सरल और सीधे रूप में प्रस्तुत हैं। कुछ सूत्रों की देशना अग्र भिक्षुओं द्वारा दी गई है, जबकि कई सूत्रों में उनके बीच हुई गहन चर्चाएँ और संवाद सुरक्षित हैं। कहीं-कहीं जातक कथाओं का समावेश भी मिलता है, जो सूत्र को जीवन्त और स्मरणीय बना देता है।
मध्यम निकाय तीन भागों में विभाजित है—मूलपण्णास | मज्झिमपण्णास | उपरिपण्णास
मूलपण्णास
मूलपण्णास, जिसका अर्थ है “मूल पचास”, मज्झिम निकाय का आधारस्तंभ है। यह खंड साधक के लिए ‘रूट मैप’ जैसा है, जो अभ्यास की दिशा तय करता है। इसमें बुद्ध के गंभीर और बुनियादी उपदेशों का संग्रह है, जो धम्म की जड़ें स्थापित करता है। यहाँ बुद्ध प्रायः भिक्षुओं को संबोधित करते हैं और मुक्ति के लिए आवश्यक दार्शनिक दृष्टि और अभ्यास का ढांचा तैयार करते हैं।
इस निकाय के पहले ही धमाकेदार सूत्र को सुनकर कोई खुश नहीं हुआ! “क्या ब्रह्मांड का कोई मूल या जड़ है?” भगवान का उत्तर!
सभी आस्रवों को खत्म करने के कुल सात उपाय!
भगवान बुद्ध के सच्चे वारिस कौन हैं? भगवान के द्वारा बताने पर सारिपुत्त भन्ते भी उसे और उजागर करते हैं।
बोधिसत्व ने जंगल में अकेले रहकर डर और आतंक का सामना करते हुए संबोधि कैसे पायी?
सारिपुत्त भन्ते यादगार उपमाओं के साथ चित्त के दाग-धब्बों का रहस्य खोलते हैं।
भिक्षु की आकांक्षा लौकिक हो या अलौकिक, भगवान उन्हें पूरा करने का मार्ग बताते हैं।
मैले चित्त को धोना किसी मैले वस्त्र को धोने के समान ही है। बस जान लें कि “मैल” क्या हैं।
भगवान बताते हैं कि साधक को, सुख और शान्ति में रमने के बजाय, अपने क्लेशों को ‘घिस-घिसकर मिटाने’ की तपश्चर्या करनी चाहिए।
सारिपुत्त भन्ते सम्यक-दृष्टि को अनोखे अंदाज में, गहरे प्रतीत्य समुत्पाद के आधार पर परिभाषित करते हैं।
इस लोकप्रिय सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है। किन्तु, सति का अर्थ और ध्येय समझना अनिवार्य है।
भगवान प्रेरित करते हैं कि उनके शिष्य जाकर दूसरे संन्यासियों के सामने दहाड़े।
एक पूर्व शिष्य द्वारा निंदा होने पर, भगवान ऐसा उत्तर देते हैं कि सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाए।
परधम्मी परिव्राजकों को लगता हैं कि उनका और बुद्ध का धम्म एक जैसा ही है। तब, भगवान ऐसा धम्म बताते हैं, जो उनके लिए ‘आउट ऑफ सिलेबस’ हो।
भगवान अपने चचेरे भाई को कामुकता के बारे में बताते हैं। साथ ही, जैन साधकों से हुए वार्तालाप का उल्लेख भी करते हैं।
महामोग्गल्लान भन्ते अपने भिक्षु साथियों को दुर्वचो और सुवचो पर व्यावहारिक मार्गदर्शन देते हैं।
यहाँ भगवान चित्त की बंजरता और उसके जंजीरों के बारे में अवगत कराते हैं।
यहाँ भगवान एक अत्यंत व्यावहारिक बात बताते हैं—भिक्षुओं को कहाँ रहना चाहिए, और कहाँ नहीं।
भगवान के मुख से निकला प्रपंच पर एक अत्यंत सारगर्भित और संक्षिप्त धम्म। लेकिन उसका अर्थ कौन बताए?
अपने विचारों से कैसे निपटें? और उन्हें लाँघकर संबोधि कैसे पाएँ? प्रस्तुत हैं, बोधिसत्व का व्यावहारिक तरीका।
अपने बुरे विचारों को अच्छाई की तरफ कैसे मोड़ें? यादगार उपमाओं के साथ पाँच तरीके सुनें।
आलोचना कैसे झेलें? भगवान जीवंत और यादगार उपमाओं के साथ बताते हैं।
एक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताते हैं।
एक देवता आकर भिक्षु को रहस्यमयी पहेलियाँ देता है, जिसका समाधान भगवान करते हैं।
दो प्रतिभाशाली अरहंत भिक्षु, आपस में धम्मचर्चा करते हुए, विशुद्धिमार्ग के चरणों को उजागर करते हैं।
मार के चारे से कौन-से साधक बच सकते हैं? हिरणों की उपमा से भगवान समझाते हैं।
दुनिया के सभी लोग, दरअसल, दो तरह की खोज में जुटे हैं। भगवान विस्तार से स्वयं की खोज भी बताते हैं।
क्या हमें श्रद्धा से तुरंत मान लेना चाहिए? भगवान यहाँ उपमा देकर हमें सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।
सारिपुत्त भन्ते धम्म के तमाम प्रमुख सिद्धान्तों को चार आर्य सत्यों में पिरो देते हैं।
भगवान ब्रह्मचर्य का सार बताते हैं, साथ ही उसके बाहरी छिलकों को भी उजागर करते हैं।
यह पिछले सूत्र की तरह ही ब्रह्मचर्य का सार बताता है, लेकिन अंतिम भाग में मिलावट नजर आती है।
कलह के समय, भगवान उन तीन भिक्षुओं से मिलते हैं जो स्नेहपूर्वक वन में साधनारत हैं।
‘किस तरह का भिक्षु शानदार गोसिङ्ग वन की शोभा होगा?’ प्रसिद्ध भिक्षुओं का अलग-अलग उत्तर।
यहाँ भगवान एक चरवाहे के गुणों की उपमा देकर भिक्षुओं को सारगर्भित धम्म बताते हैं।
यहाँ भगवान एक यादगार उपमा के साथ हमें पार आने के लिए पुकारते हैं।
एक प्रसिद्ध अहंकारी बहसबाज, भगवान से सरेआम वाद-विवाद में भिड़ता है।
वही प्रसिद्ध अहंकारी बहसबाज, इस बार अकेले में भगवान से वाद-विवाद करता है।
भगवान से धम्म सुनने पर भी देवराज इन्द्र मदहोश रहता है। तब महामोग्गल्लान भन्ते उसके रोंगटे खड़े कर उसे होश दिलाते हैं।
एक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।
भगवान श्रमण को श्रमण बनाने वाले धम्म, और ब्राह्मण को ब्राह्मण बनाने वाले धम्म को उजागर करते हैं।
श्रमण्यता के अनेक अनुचित व्रत और मार्ग हैं। भगवान उनकी निरर्थकता का खुलासा कर उचित मार्ग दिखाते हैं।
भगवान साल गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।
यह सूत्र पिछले सूत्र के समान ही है। यहाँ भी भगवान गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।
यहाँ दो भिक्षुओं के सवाल-जवाब से धम्म के गहरे पहलू एक खिलते हुए फूल की तरह खुलते हैं।
यहाँ उपासक के गहरे सवालों का उत्तर एक प्रसिद्ध भिक्षुणी देती हैं। और क्या ही लाजवाब उत्तर देती हैं!
भगवान चार प्रकार के धम्ममार्ग बताते हैं, जिनसे वर्तमान का अनुभव और भविष्य के फल भिन्न होते हैं।
भगवान चार धम्ममार्गों का वर्णन करते हैं, प्रत्येक के लिए यादगार उपमाओं का प्रयोग करते हुए।
साधक को गुरु की कड़ी छानबीन करनी चाहिए और श्रद्धा रखने से पहले आँख और कान खुले रखने चाहिए। भगवान बताते हैं कि यह कैसे करना है।
कौशाम्बी के झगड़ालू भिक्षुओं को भगवान स्नेहभाव और एकता का महत्व समझाते हैं।
एक हैरतअंगेज सूत्र, जिसमें भगवान जाकर ब्रह्मा की दृष्टि सुधारने का प्रयास करते हैं।
मार महामोग्गल्लान भन्ते को परेशान करता है। तब वे उसे अपनी पूर्वजन्म कथा सुनाते हैं, जिसमें वे स्वयं मार थे।
मज्झिमपण्णास
मज्झिमपण्णास, या “मध्य पचास”, बुद्ध के जीवन के सामाजिक पक्ष को उजागर करता है। यह खंड बुद्ध की करुणा और उनकी अद्भुत संवाद शैली का जीवंत दस्तावेज है। जहाँ पहला खंड दार्शनिक था, वहीं यह खंड ‘संवादात्मक’ है। इस खंड में भगवान बुद्ध का समाज के विभिन्न वर्गों—राजाओं (जैसे राजा पसेनदि), जैन तपस्वियों, ब्राह्मणों और परिब्राजकों—के साथ सबसे अधिक संपर्क दिखाई देता है। अंगुलिमाल जैसे प्रसिद्ध आख्यान इसी खंड का हिस्सा हैं। यह खंड दिखाता है कि बुद्ध ने अपने समय की सामाजिक और धार्मिक चुनौतियों का सामना कैसे किया।
‘पशुओं का स्वभाव सीधा होता है, जबकि मानव स्वभाव का कोई भरोसा नहीं!’ इस बात पर भगवान चार प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन करते हैं।
एक गृहस्थ भगवान के परिनिर्वाण के पश्चात अमृतद्वार ढूँढ रहा था। आनन्द भन्ते ने उसे एक नहीं, ग्यारह अमृतद्वार दिखाते हैं।
जब भगवान को पीठ दर्द हुआ, तब भन्ते आनन्द ने उपदेश की जिम्मेदारी संभाली और शाक्यों को साधना मार्ग का वर्णन किया।
एक गृहस्थ जब स्वयं को दुनियादारी से अलग समझता है, तब भगवान उसे सच्चे अर्थ में दुनियादारी से कटने का मार्ग बताते हैं।
क्या बुद्ध अपने लिए मारे गए प्राणी का मांस खाते हैं? भगवान का स्पष्ट उत्तर!
एक निगण्ठ उपासक वादविवाद के लिए भगवान के पास जाता है, और भगवान के जादू से दीवाना होकर लौटता है।
प्राचीन भारत के अनोखे संन्यासी, जो कुत्ते और गाय का व्रत रखते हैं, भगवान से उसका फल पूछते हैं।
अभय राजकुमार को भगवान को दुविधा में डालकर उनका खण्डन करने भेजा जाता है।
दो लोग वेदना की गिनती में उलझे रहते हैं, वहीं भगवान उनसे आगे बढ़कर सुखों के विविध प्रकार गिनाते हैं।
यदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।
📜 ६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त
भगवान उपमाओं के माध्यम से अपने बालक पुत्र को कर्म सुधारने का पहला पाठ पढ़ाते हैं।
भगवान अपने युवा पुत्र राहुल को विविध प्रकार की साधना करने के लिए प्रेरित करते हैं।
एक भिक्षु भगवान को धमकी देता है—दार्शनिक उत्तर न मिले तो संन्यास छोड़ देगा।
भगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?
भगवान भिक्षुओं को एक नया नियम पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन एक भिक्षु साफ मना कर देता है।
भगवान का उपकार अनुभव करने वाले भिक्षु को भगवान बंधन तोड़ने और उपाधियों से परे जाने का धम्म सिखाते हैं।
विहार में शोर मचाने वाले भिक्षुओं को भगवान निष्कासित कर देते हैं, लेकिन उन्हें वापस स्वीकारने पर वे चार संभावित खतरों से सावधान करते हैं।
भगवान प्रसिद्ध नवभिक्षुओं को उनके आध्यात्मिक कर्तव्यों की स्पष्टता देते हुए अपनी घोषणाओं का कारण बताते हैं।
जब एक असभ्य अरण्यवासी भिक्षु संघ में आया, तो सारिपुत्त भन्ते ने आचार और साधना का वास्तविक अर्थ समझाया।
एक गाँव के दो हठी भिक्षु—जिन्हें भगवान पहले सहमत करते हैं, फिर करुणा में लिपटी फटकार देते हैं।
इस छोटे सूत्र में एक संन्यासी भगवान से उनके “सर्वज्ञ और सर्वदर्शी” होने के दावे के बारे में पूछता है।
वह संन्यासी अब भगवान से दुनिया की दस प्रमुख दार्शनिक मान्यताओं के बारे में प्रश्न करता है।
वह संन्यासी अब अपनी शंका का अंतिम समाधान पूछता है और भिक्षुत्व स्वीकार करता है।
इस प्रसिद्ध सूत्र में सारिपुत्त भन्ते को अरहंत फल प्राप्त हुआ, जबकि उनके परिव्राजक भांजे में धम्मचक्षु उत्पन्न हुआ।
भगवान को ‘भ्रूण हत्यारा’ कहने वाला परिव्राजक, भगवान से मिलकर भिक्षुत्व स्वीकार कर अरहंत बनता है।
आनन्द भन्ते परिव्राजक गुरु से चर्चा करते हैं, तो वह अपने सभी शिष्यों को भिक्षु बनने भेज देते हैं।
विभिन्न पंथों के बीच आपसी संवाद में सभी गुरुओं और उनके शिष्यों के असली चेहरे उजागर होते हैं। भगवान बुद्ध के भी।
एक परिव्राजक भगवान के उपासक को “अजेय श्रमण” के चार गुण बताता है, पर भगवान उसका खंडन कर दस गुण बताते हैं।
इस रोचक और मजेदार चर्चा से परिव्राजकों का गुरु भिक्षु बनने का मन बनाता है, लेकिन उसके शिष्य उसे रोक देते हैं।
पिछले सूत्र के परिव्राजक सकुलुदायी के आचार्य इस बार अपनी बात की रक्षा करने आते हैं, लेकिन भगवान का शिष्य बन जाते हैं।
भगवान अपने पुराने मित्र घटिकार कुम्हार की प्रेरणादायी और भावनात्मक जातक कथा सुनाते हैं।
एक नवयुवक, प्रव्रज्या की अनुमति पाने के लिए माता-पिता से संघर्ष करता है, और अरहंत बनकर लौटकर धूम मचाता है।
भगवान की जातक कथा, जिसमें वे ऐसी कल्याणकारी प्रथा स्थापित करते हैं, जो इसके अनुसरणकर्ताओं को ब्रह्मलोक में सद्गति प्रदान करती है।
मथुरा का राजा ब्राह्मणों की स्व-घोषित श्रेष्ठता पर भन्ते की राय पूछते हैं, और भन्ते बेझिझक उत्तर देते हैं।
राजकुमार मानता है कि परमसुख कठिन तप से मिलता है, सुखद मार्ग से नहीं! इसी पर भगवान का उत्तर।
बौद्ध परम्परा की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक—कुख्यात हत्यारे अँगुलिमाल की रोचक कथा।
प्रियजनों से आखिर क्या मिलता है? भगवान के शब्द सहज बुद्धि के विपरीत जाते हैं, और समाज में हंगामा मचाते हैं।
राजा प्रसेनजित आयुष्मान आनंद से भगवान के कर्मों पर प्रश्न पूछता है, और प्रसन्न होकर अपना विदेशी वस्त्र दान करता है।
भगवान की याद आने पर, राजा प्रसेनजित जाकर भगवान के चरणों को चूमता है और इसका कारण बताता है।
राजा प्रसेनजित, भगवान की ‘सर्वज्ञ-सर्वदर्शी’ बात की अफवाह सुनकर, सत्य जानने के लिए स्वयं भगवान के पास पहुँचता है।
१२० वर्ष का वृद्ध ब्राह्मण अपने शिष्य को भगवान के लक्षण देखने भेजता है, और गहन रिपोर्ट पाकर परम-समर्पण करता है।
एक जटाधारी, जो ब्राह्मण गुरु के प्रति समर्पित है, उसके यहाँ भोजन निमंत्रण पर भगवान उसी गुरु और उसके शिष्यों को भिक्षु बनाकर वहाँ जाते हैं।
ब्राह्मणों के प्रोत्साहन पर एक प्रतिभाशाली युवा ब्राह्मण जातिवाद पर भगवान से उलझने की भूल करता है।
टहलते हुए आया एक अनजान ब्राह्मण भिक्षु से कह उठता है, “प्रव्रज्या अधार्मिक है!” तब भन्ते उसे धम्म बताते हैं।
जम्बुद्वीप के प्रमुख ब्राह्मणों में गिने जाने वाले चङ्की के समक्ष भगवान ब्राह्मणों के सभी दावों को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।
एक ब्राह्मण भगवान से ब्राह्मण-व्यवस्था पर राय माँगता है, और भगवान खुलकर जवाब देते हैं।
सारिपुत्त भन्ते एक मदहोश ब्राह्मण को पापकर्म से धम्म में लाते हैं और मृत्यु-क्षण में उसकी सद्गति सुनिश्चित करते हैं।
“ब्राह्मण जन्म से होता है या कर्म से?”—इस प्रश्न पर उलझे दो युवा ब्राह्मण अपना मतभेद सुलझाने के लिए भगवान के पास पहुँचते हैं।
एक विख्यात ब्राह्मण-पुत्र भगवान से मिलने आता है, और गाली-गलौच तक करने के बाद अंततः शरण ग्रहण करता है।
एक ब्राह्मण स्त्री के भगवान को याद करते ही चिढ़ा युवा ब्राह्मण, भगवान से मिलकर स्वयं उपासक बन जाता है।
उपरिपण्णास
उपरिपण्णास, अर्थात “अंतिम पचास”, मज्झिम निकाय का समापन खंड है। यह खंड उच्च साधना और धम्म के सूक्ष्म तकनीकी विश्लेषण के लिए जाना जाता है। शैली की दृष्टि से यह पिछले दो खंडों से भिन्न है। इस खंड के सुत्त, विशेषकर ‘विभंग’ (विश्लेषण) वाले सुत्त, बाद के ‘अभिधम्म’ साहित्य के लिए आधार बने। इसमें ‘धातुओं’ और ‘आयतन’ का सूक्ष्म तकनीकी विश्लेषण है। यहाँ बुद्ध धर्म के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को अत्यंत गहराई से वर्गीकृत करते हैं।
इस सूत्र में भगवान बुद्ध उन निगण्ठ (जैन) सिद्धांतों का खण्डन करते हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से आज कई लोग बौद्ध मत समझ बैठे हैं।
यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।
इस सूत्र में भगवान भिक्षुओं को आपसी असहमति होने पर उससे निपटने के सही तरीक़े बताते हैं।
निगण्ठ नाटपुत्त (महावीर जैन) के निधन पर जैन समुदाय में भारी कलह हुआ। इसी पर भगवान ने आनन्द को संघ में विवाद निपटाने के तरीके बताए।
जो भिक्षु स्वयं को ऊँचा आँक कर, अरहंत मानकर, साधना छोड़ देता है, उस पर भगवान का धम्मोपदेश।
यहाँ भगवान कामुकता से परे जाने के ठोस साधना-मार्ग बताते हैं, और अंततः उन्हें भी लाँघने की प्रेरणा देते हैं।
“जब निर्वाण, निर्वाण-मार्ग और मार्गदर्शक तथागत विद्यमान हैं, तो सभी शिष्य अरहंत क्यों नहीं होते?”—इस प्रश्न पर भगवान का प्रसिद्ध उत्तर!
“भगवान के परिनिर्वाण के बाद भिक्षुसंघ कैसे चलता है और उसका नेतृत्व कौन करता है?"—इस पर आनन्द भन्ते के उत्तर।
पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे भगवान भिक्षुओं से घिरे होते हैं। ऐसे रोमहर्षक अवसर को भाँपकर एक भिक्षु भगवान से प्रश्नोत्तर करता है।
पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे, भगवान स्वयं रोमहर्षक अवसर को भाँपकर, सत्पुरुष और असत्पुरुष की व्याख्या करते हैं।
भगवान सारिपुत्त भन्ते की धम्म-विपश्यना की कथा बताते हैं, जो समाधि की सभी अवस्थाओं से गुजरते हुए निरोध अवस्था तक पहुँचती है।
यदि कोई भिक्षु अरहंत होने का दावा करें, तो न तो जश्न मनाएँ और न ही उसे नकार दें। बल्कि उससे ये पाँच प्रश्न पूछें।
भगवान यहाँ विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से असत्पुरुष भिक्षु और सत्पुरुष भिक्षु के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं।
📜 ११४. सेवितब्बासेवितब्ब सुत्त
भगवान यहाँ धम्म की जटिलता को हटाकर एक सीधा मापदंड सामने रखते हैं—कि कौन-सी बात अपनाने योग्य है और कौन-सी नहीं।
इस दुनिया को ख़तरा मूर्ख से है, ज्ञानी से नहीं—और विवेकशील ज्ञानी वही है जो धातुओं, आयामों, प्रतित्य-समुत्पाद और संभव–असंभव में कुशल हो।
ऋषियों को निगलने वाले “इसिगिलि” पर्वत पर निवास करते हुए, भगवान भिक्षुओं को पाँच सौ प्रत्येक-बुद्धों की नाम-कीर्ति बताते हैं।
इस सूत्र में भगवान आर्य अष्टांगिक मार्ग के सात अंगों की “लौकिक” और “आर्य” परिभाषाएँ देते हैं और उनके आपसी संबंध को स्पष्ट करते हैं।
इस सूत्र में भगवान सबकी पसंदीदा आनापान-स्मृति सिखाते हैं, दिखाते हुए कि वह कैसे चारों स्मृतिप्रस्थान, सातों संबोध्यंग, तथा विद्या-विमुक्ति को पूर्ण करती है।
भगवान कायागत-स्मृति को अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली ढंग से, अनेक सटीक उपमाओं के सहारे प्रस्तुत करते हैं।
भगवान यहाँ भिक्षुओं को पुनर्जन्म चुनने की आजादी देते प्रतीत होते हैं—‘जिसे जहाँ जाना हो, यह उसका रास्ता है! जाओ!’
भगवान यहाँ आयुष्मान आनन्द को शून्यता की सुखद ध्यान-अवस्था में प्रवेश करने का एक अत्यंत सरल मार्ग बताते हैं।
📜 १३३. महाकच्चानभद्देकरत्त सुत्त
📜 १३४. लोमसकङ्गियभद्देकरत्त सुत्त