✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१०. सतिपट्ठान सुत्त मुख्य > सुत्तपिटक > मज्झिमनिकाय 2. मज्झिमनिकाय बुद्ध के द्वाराभिक्षु के लिएपटिपदा स्मृतिप्रस्थान गढ़ का द्वारपालमॉल का गार्डकुशल बढ़ईअनाज की बोरीकसाई

स्मृतिप्रस्थान

अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ७० मिनट

सूत्र परिचय

भगवान ने चार स्मृतिप्रस्थान (सतिपट्ठान) की साधना को “एक-तरफ़ा मार्ग” (एकायनो मग्गो) बताया है—सत्वों की विशुद्धि के लिए, शोक और विलाप को लाँघने के लिए, शारीरिक दर्द और मानसिक व्यथा को विलुप्त करने के लिए, सही मार्ग पर चलने के लिए, और अंततः निर्वाण के साक्षात्कार के लिए।

तो चलिए, सबसे पहले यह समझते हैं कि ध्यान का यह मूल आधार ‘सति’ या ‘स्मृति’ वास्तव में क्या है?

आजकल लोग ‘सति’ का अर्थ तरह-तरह से निकालते हैं। कुछ लोग इसे एक “निष्क्रिय जागरूकता” समझ लेते हैं—अर्थात जो कुछ भी हो रहा है, उसे बस होने दो, कोई प्रतिक्रिया मत दो, केवल एक मूक दर्शक बने रहो। लेकिन बुद्ध ने सति को निष्क्रियता से नहीं, बल्कि सक्रियता से जोड़ा है, और जागरूकता को स्मरणशीलता के साथ।

भगवान की दी गयी उपमा बड़ी सरल और लाजवाब है—

जैसे किसी राजसी गढ़ पर भीतरी प्रजा की रक्षा के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए एक चतुर, समर्थ और होशियार द्वारपाल होता है, जो संदेहास्पद लोगों को बाहर रखता है, और परिचित भले लोगों को भीतर प्रवेश देता है। उसी तरह, कोई स्मृतिमान होता है, याददाश्त में बहुत तेज़! पूर्वकाल में किया गया कर्म, पूर्वकाल में कहा गया वचन भी स्मरण रखता है, और अनुस्मरण कर पाता है।

और, तब वह लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर—

  • काया को काया देखते हुए रहता है
  • वेदना को वेदना देखते हुए रहता है
  • चित्त को चित्त देखते हुए रहता है
  • धम्म को धम्म देखते हुए रहता है

—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।

तब, ऐसी द्वारपाल-रूपी स्मृति स्थापित कर, कोई अकुशल का त्याग करता है, और कुशलता को बढ़ाता है, पाप का त्याग करता है, और निष्पापता को बढ़ाता है। और, स्वयं का परिशुद्धतापूर्वक ख्याल रखता है। इस तरह, कोई स्मृतिसंपन्न रहता है।

— अंगुत्तरनिकाय ७:६३

इस उपमा से स्पष्ट है कि सति किसी मॉल के उस गार्ड जैसी नहीं है, जो किसी पुतले की तरह चुपचाप खड़े रहकर लोगों को आते-जाते देखता है और बिना किसी उद्देश्य के मुस्कुराता है। इसके बजाय, यह सति उस चतुर और सक्षम सैनिक की तरह है, जो देश की सीमा-द्वार पर तैनात होता है। वह जानता है कि उसकी एक भी चूक देश को संकट में डाल सकती है। इसलिए वह अत्यधिक चौकस रहता है, आने-जाने वालों की गहरी तलाशी लेता है, और यह सुनिश्चित करता है कि केवल विश्वसनीय (कुशल) लोग ही भीतर प्रवेश करें, जबकि आतंकवादी (अकुशल प्रवृत्तियों) को वह बाहर ही रोक देता है।

सति के दो पंख: ‘सचेत’ और ‘आतापी’

ठीक उसी तरह, सति की साधना करता हुआ साधक बहुत ही सचेत, तत्पर और “याददाश्त में तेज़” बना रहता है। लेकिन सचेत (“सम्पजञ्ञ”) होने का वास्तविक अर्थ क्या है? भगवान एक अन्य सुत्त में निर्देश देते हैं—

कोई साधक ‘सचेत’ कैसे होता है?

  • उसे वेदनाओं (अनुभूतियों) का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।
  • उसे विचारों (“वितक्क”) का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।
  • उसे संज्ञाओं (नजरियों) का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।

—इस तरह, कोई साधक सचेत होता है।

— संयुत्तनिकाय ४७:३५

इस प्रकार, सचेत होने का अर्थ है—अपनी अनुभूतियों, विचारों और नजरियों को तीन चरणों में जानना: उनका उत्पन्न होना, कुछ समय तक टिके रहना, और फिर लुप्त हो जाना। इन ‘उदय-ठहराव-व्यय’ की निरंतर सजगता ही साधक को ‘अनित्य, दुःख और अनात्म’ के प्रत्यक्ष दर्शन तक ले जाती है।

साथ ही, सति का आतापी से जुड़ा रहना अनिवार्य है। “आतापी” का अर्थ, दरअसल, आर्य अष्टांगिक मार्ग के ‘सम्यक प्रयास’ से संबंधित है। यह वह भावना है जो बिना थके सद्गुणों के संरक्षण और अवगुणों की रोकथाम में लगी रहती है—

और, कोई आतापी (=तत्पर, चुस्त, मुस्तैद, वीर्यवान, परिश्रमी) कैसे होता है? कोई सोचता है—

  • ‘यदि अनुत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव उत्पन्न होंगे, तो अनर्थ होगा’
  • ‘यदि उत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव त्यागे न गए, तो अनर्थ होगा’
  • ‘यदि अनुत्पन्न कुशल स्वभाव उत्पन्न न हुए, तो अनर्थ होगा’
  • ‘यदि उत्पन्न कुशल स्वभाव खत्म हुए, तो अनर्थ होगा’

—और तब, वह तत्परता जगाता है। इस तरह कोई “आतापी” होता है।

— संयुत्तनिकाय १६:२

कल्पना करें कि भीतर कोई पाप या अकुशल विकार उत्पन्न हो रहा है। क्या उसे यूँ ही होने देना चाहिए? भगवान के अनुसार, बिलकुल नहीं! हमें स्मृति की साधना दिशाहीन रूप से नहीं करनी है। हमारा एक निर्धारित लक्ष्य है, जो हमें उस सीमा तक ले जाएगा जहाँ सभी दुःख हमेशा के लिए छूट जाते हैं।

उदय बनाम समुदय: कारण को पकड़ना

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें यह समझना होता है कि भीतर विकार पनप कैसे रहे हैं। पाली के शब्दों में “उदय” और “समुदय” में एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर है।

‘उदय’ का अर्थ है, किसी बात का केवल प्रकट होना। जबकि ‘समुदय’ का अर्थ है, किसी बात का “किसी अन्य के प्रभाव या कारण से” प्रकट होना। कोई भी स्वभाव अपने आप यूँ ही “उदय” नहीं होता; उसका किसी कारण से “समुदय” होता है।

मसलन, किसी नीवरण (रुकावट) के जागने से ठीक पहले क्या हुआ था? किस इंद्रिय पर क्या घटना घटी? अनुभूति क्या हुई? मन में क्या विचार आया? और अंततः, वह नीवरण कैसे उत्पन्न हुआ? यह सूक्ष्म समझ हमें धर्म के गहरे सिद्धान्त इदप्पच्चयता (कारण-कार्य भाव) और पटिच्च-समुप्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) की ओर ले जाती है:

  • जब यह है, तब वह है।
  • इसके उत्पन्न होने से, वह उत्पन्न होने लगता है।
  • जब यह नहीं है, तब वह भी नहीं है।
  • इसके अन्त होने से, उसका भी अन्त होने लगता है।

— अंगुत्तरनिकाय १०:९२ : वेर सुत्त

इसलिए, सतिपट्ठान की साधना में हमें अलग-अलग स्वभावों के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाने होते हैं। नीवरण (विकार) की पुनः उत्पत्ति को रोकना है, जबकि संसंबोध्यङ्गों (जागृति के तत्वों) को विकसित कर परिपक्व करना है। यह सब बहुत सक्रियता के साथ करना है।

सतिपट्ठान के तीन चरण

इस पूरी प्रक्रिया में सतिपट्ठान की साधना तीन स्पष्ट चरणों से होकर गुजरती है (जिनका उल्लेख आगे आने वाले प्रत्येक पर्व के अंत में किया गया है):

  • 1. अवलोकन: लोक के प्रति लालसा या नाराज़ी हटाते हुए, “भीतरी और बाहरी” बातों पर गौर करना।
  • 2. कारण-कार्य दर्शन: “समुदय और व्यय स्वभाव” देखकर, ‘इदप्पच्चयता’ का पता लगाना।
  • 3. अतम्मयता (अनाश्रित होना): जब पहले दो चरण पूरे हो जाते हैं और हम किसी स्वभाव की पूरी प्रकृति जान लेते हैं, तब एक अवस्था आती है जहाँ स्मृति पूरी उपेक्षा (तटस्थता) के साथ स्थापित हो जाती है—कि “यह मात्र एक स्वभाव है”। उसमें “मैं” या “मेरा” का कोई भाव नहीं होता। साधक दुनिया (पाँच स्कंधों) का आधार छोड़कर अनाश्रित हो जाता है। इसी अवस्था में टिके रहने पर अंततः चित्त विमुक्त हो जाता है।

मूल सतिपट्ठान

बुद्ध के उपदेशों के संरक्षणार्थ संकलित वर्तमान ‘सतिपट्ठान सुत्त’ (मज्झिमनिकाय १०) ऐतिहासिक रूप से अधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक है। ‘महासतिपट्ठान सुत्त’ (दीघनिकाय २२) इसी का परवर्ती विस्तार है, जिसमें ‘चार आर्य सत्य’ खंड को मज्झिमनिकाय १४१ के साहित्य से बढ़ाया गया है।

प्रस्तुत अनुवाद ‘छट्ठ संगायन’ की तुलना में मूल बुद्ध-वचनों के अधिक निकट माने जाने वाले ‘महासंगीति संस्करण’ पर आधारित है।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान कुरु देश में कम्मासधम्म नामक कुरु निगम में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”

“भदन्त!” भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया।

भगवान ने कहा, “भिक्षुओं, यह चार स्मृतिप्रस्थान एक-तरफ़ा 1 मार्ग है—सत्वों की विशुद्धि के लिए, शोक और विलाप को लाँघने के लिए, दर्द और व्यथा को विलुप्त करने के लिए, सही तरीक़ा पाने के लिए, निर्वाण के साक्षात्कार के लिए। कौन-से चार?

यहाँ, भिक्षुओं, कोई भिक्षु लोक के प्रति लालसा या नाराज़ी हटाकर, काया को काया देखते हुए रहता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। वह लोक के प्रति लालसा या नाराज़ी हटाकर, वेदना को वेदना देखते हुए रहता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। वह लोक के प्रति लालसा या नाराज़ी हटाकर, चित्त को चित्त देखते हुए रहता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। वह लोक के प्रति लालसा या नाराज़ी हटाकर, स्वभाव को स्वभाव देखते हुए रहता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।

१. काया को देखना


(“कायानुपस्सना आनापान”)

भिक्षुओं, कोई भिक्षू जंगल में, या पेड़ के तले, या निर्जन ध्यानस्थल में जाकर पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखते हुए बैठता है, और स्मृति को अपने सामने उपस्थित करता है। वह स्मृतिपूर्वक श्वास लेता है, और स्मृतिपूर्वक श्वास छोड़ता है।

  • लंबी श्वास लेते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास ले रहा हूँ।’ लंबी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास छोड़ रहा हूँ।’
  • छोटी श्वास लेते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास ले रहा हूँ।’ छोटी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास छोड़ रहा हूँ।’
  • पूरी काया महसूस करते हुए श्वास लेना सीखता है। पूरी काया महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
  • काया के संस्कार को शान्त करते हुए श्वास लेना सीखता है। काया के संस्कार को शान्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है। 2

जैसे, भिक्षुओं, निपुण बढ़ई को औजार लंबा घुमाते हुए पता चलता है कि ‘मैं लंबा घुमा रहा हूँ।’ और, उसे छोटा घुमाते हुए पता चलता है कि ‘मैं छोटा घुमा रहा हूँ।’ उसी तरह, भिक्षुओं, भिक्षु को लंबी-साँस लेते हुए पता चलता है कि ‘मैं लंबी-साँस ले रहा हूँ।’ और, उसे लंबी-साँस छोड़ते हुए पता चलता है कि ‘मैं लंबी-साँस छोड़ रहा हूँ।’ उसे छोटी-साँस लेते हुए पता चलता है कि ‘मैं छोटी-साँस ले रहा हूँ।’ और उसे छोटी-साँस छोड़ते हुए पता चलता है कि ‘मैं छोटी-साँस छोड़ रहा हूँ।’ वह संपूर्ण शरीर महसूस करते हुए साँस लेना सीखता है; वह संपूर्ण शरीर महसूस करते हुए साँस छोड़ना सीखता है। वह कायिक-संस्कार को शान्त करते हुए साँस लेना सीखता है; वह कायिक-संस्कार को शान्त करते हुए साँस छोड़ना सीखता है।

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को (मात्र) काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी (हर जगह) काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव (“समुदय-धम्म”) देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित (=स्वतंत्र) होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।


(“इरियापथ”)

आगे, भिक्षुओं, उस भिक्षु को—

  • चलते हुए पता चलता है कि ‘चल रहा हूँ।’
  • खड़े हुए पता चलता है कि ‘खड़ा हूँ।’
  • बैठे हुए पता चलता है कि ‘बैठा हूँ।’
  • लेटे हुए पता चलता है कि ‘लेटा हूँ।’
  • जिस-जिस तरह उसकी काया अवस्था लेती है, उस-उस तरह उसे पता चलता है।

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।


(“सम्पजानपब्बं”)

आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु—

  • आगे बढ़ते और लौट आते सचेत रहता है।
  • नज़र टिकाते और नज़र हटाते सचेत रहता है।
  • (अंग को) सिकोड़ते और पसारते हुए सचेत रहता है।
  • संघाटि, पात्र और चीवर धारण करते हुए सचेत रहता है।
  • खाते, पीते, चबाते, स्वाद लेते हुए सचेत रहता है।
  • पेशाब और शौच करते हुए सचेत रहता है।
  • चलते, खड़े रहते, बैठते, सोते, जागते, बोलते, मौन होते हुए सचेत रहता है।

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।


(“पटिकूलमनसिकार”)

आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु अपनी काया को पैर तल से ऊपर, माथे के केश से नीचे, त्वचा से ढ़की हुई, नाना प्रकार की गंदगियों से भरी हुई मनन करता है—‘मेरी इस काया में हैं—केश, लोम, नाखून, दाँत, त्वचा; माँस, नसें, हड्डी, हड्डीमज्जा, तिल्ली; हृदय, कलेजा, झिल्ली, गुर्दा, फेफड़ा; आँत, छोटी-आँत, उदर, टट्टी, मस्तिष्क; पित्त, कफ, पीब, रक्त, पसीना, चर्बी; आँसू, तेल, थूक, बलगम, जोड़ो में तरल, मूत्र।’

जैसे, किसी खुली बोरी में चावल, गेहूँ, मूँग, राजमा, तिल, कनकी आदि नाना-प्रकार का अनाज भरा हो। तब, कोई अच्छी आँखोंवाला पुरुष उसे नीचे उड़ेलकर पता करें—‘यह चावल है, यह गेहूँ है, यह मूँग है, यह राजमा है, यह तिल है, यह कनकी है।’ उसी तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु अपनी काया को पैर तल से ऊपर, माथे के केश से नीचे, त्वचा से ढ़की हुई, नाना प्रकार की गंदगियों से भरी हुई मनन करता है—‘मेरी इस काया में हैं—केश, लोम, नाखून, दाँत, त्वचा; माँस, नसें, हड्डी, हड्डीमज्जा, तिल्ली; हृदय, कलेजा, झिल्ली, गुर्दा, फेफड़ा; आँत, छोटी-आँत, उदर, टट्टी, मस्तिष्क; पित्त, कफ, पीब, रक्त, पसीना, चर्बी; आँसू, तेल, थूक, बलगम, जोड़ो में तरल, मूत्र।’

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।


(“धातुमनसिकार”)

आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु इस काया को, चाहे जिस अवस्था, जिस परिस्थिति में हो, धातु के अनुसार मनन करता है—‘इस काया में—

  • पृथ्वीधातु है;
  • जलधातु है;
  • अग्निधातु है;
  • वायुधातु है।’

जैसे, कोई कसाई गाय को काटकर उसे चौराहे पर अलग-अलग ढ़ेर बनाकर बैठता है। उसी तरह, वह भिक्षु इस काया को, चाहे जिस अवस्था, जिस परिस्थिति में हो, धातु के अनुसार मनन करता है—‘इस काया में पृथ्वीधातु है; जलधातु है; अग्निधातु है; वायुधातु है।’

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।


(“नवसिवथिक”)

  1. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—एक दिन पुरानी, दो दिन पुरानी, तीन दिन पुरानी—फूल चुकी, नीली पड़ चुकी, पीब रिसती हुई। तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।

  1. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—कौवों द्वारा नोची जाती, चीलों द्वारा नोची जाती, गिद्धों द्वारा नोची जाती, बगुलों द्वारा नोची जाती, कुत्तों द्वारा चबाई जाती, बाघ द्वारा चबाई जाती, तेंदुए द्वारा चबाई जाती, सियार द्वारा चबाई जाती, अथवा विविध जंतुओं द्वारा खायी जाती। तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।

  1. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस से युक्त, रक्त से सनी, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

  2. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त से सनी, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

  3. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त के बिना, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

  4. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त के बिना, नसों से बिना बँधी, हड्डियाँ जहाँ-वहाँ बिखरी हुई—कही हाथ की हड्डी; कही पैर की; कही टखने की हड्डी; कही जाँघ की; कही कुल्हे की हड्डी; कही कमर की; कही पसली; कही पीठ की हड्डी; कही कंधे की हड्डी; कही गर्दन की; कही ठोड़ी की हड्डी; कही दाँत; कही खोपड़ी। तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।

  1. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—हड्डियाँ शंख जैसे सफ़ेद हो चुकी…

  2. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—वर्षोंपश्चात, जब हड्डियों का ढ़ेर लगा हो…

  3. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—जब हड्डियाँ सड़कर चूर्ण बन चुकी हो। तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है। अथवा, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा काया का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु काया को काया देखते हुए रहता है।


२. वेदना देखना

और, आगे भिक्षुओं, कैसे कोई भिक्षु वेदना को वेदना देखते हुए रहता है? यहाँ भिक्षु को सुख महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं सुख महसूस कर रहा हूँ।’ दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं दर्द महसूस कर रहा हूँ।’ नसुख-नदर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं नसुख-नदर्द महसूस कर रहा हूँ।’

उसे भौतिक सुख (“सामिस सुख”) महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं भौतिक सुख महसूस कर रहा हूँ।’ उसे आध्यात्मिक सुख (“निरामिस सुख”) महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं आध्यात्मिक सुख महसूस कर रहा हूँ।’ उसे भौतिक दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं भौतिक दर्द महसूस कर रहा हूँ।’ उसे आध्यात्मिक दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं आध्यात्मिक दर्द महसूस कर रहा हूँ।’ उसे भौतिक नसुख-नदर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं भौतिक नसुख-नदर्द महसूस कर रहा हूँ।’ उसे आध्यात्मिक नसुख-नदर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं आध्यात्मिक नसुख-नदर्द महसूस कर रहा हूँ।’

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी वेदना को वेदना देखते हुए रहता है; अथवा, बाहरी वेदना को वेदना देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी वेदना को वेदना देखते हुए रहता है। अथवा, वह वेदना का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा वेदना का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा वेदना का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह वेदना है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु वेदना को वेदना देखते हुए रहता है।


३. चित्त देखना

और, आगे भिक्षुओं, कैसे भिक्षु चित्त को चित्त देखते हुए रहता है? यहाँ भिक्षु को—

  • रागपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘यह रागपूर्ण चित्त है’
  • वीतराग चित्त पता चलता है कि ‘यह वीतराग चित्त है’
  • द्वेषपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘यह द्वेषपूर्ण चित्त है’
  • द्वेषविहीन चित्त पता चलता है कि ‘यह द्वेषविहीन चित्त है’
  • मोहपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘यह मोहपूर्ण चित्त है’
  • मोहविहीन चित्त पता चलता है कि ‘यह मोहविहीन चित्त है’
  • संकुचित (“सङखित्त”) चित्त पता चलता है कि ‘संकुचित चित्त है’
  • बिखरा (“विक्खित्त”) चित्त पता चलता है कि ‘बिखरा चित्त है’

  • बढ़ा हुआ (“महग्गत”) चित्त पता चलता है कि ‘यह विस्तारित चित्त है’
  • न बढ़ा (“अमहग्गत”) चित्त पता चलता है कि ‘यह अविस्तारित चित्त है’
  • बेहतर (“उत्तर”) चित्त पता चलता है कि ‘यह बेहतर चित्त है’
  • सर्वोत्तर (“अनुत्तर”) चित्त पता चलता है कि ‘यह सर्वोत्तर चित्त है’
  • समाहित चित्त पता चलता है कि ‘यह समाहित चित्त है’
  • असमाहित चित्त पता चलता है कि ‘यह असमाहित चित्त है’
  • विमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘यह विमुक्त चित्त है’
  • अविमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘यह अविमुक्त चित्त है!’

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी चित्त को चित्त देखते हुए रहता है; अथवा बाहरी चित्त को चित्त देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी चित्त को चित्त देखते हुए रहता है। अथवा, वह चित्त का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा चित्त का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा चित्त का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह चित्त है।’ और जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु चित्त को चित्त देखते हुए रहता है।


४. धम्म देखना


(“नीवरण”)

और, भिक्षुओं, कैसे कोई भिक्षु स्वभाव (“धम्म” = मन में चल रही बात) को स्वभाव देखते हुए रहता है? यहाँ कोई भिक्षु पाँच व्यवधान (“पञ्च नीवरण”) स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। कैसे कोई भिक्षु पाँच व्यवधान स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है?

• यहाँ किसी भिक्षु को भीतर कामेच्छा होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर कामेच्छा है।” अथवा कामेच्छा न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर कामेच्छा नहीं है।” उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न कामेच्छा की उत्पत्ति होती है। उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न कामेच्छा खत्म होती है। और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई कामेच्छा की दुबारा उत्पत्ति न होगी।

• उसे भीतर दुर्भावना होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर दुर्भावना है।” अथवा दुर्भावना न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर दुर्भावना नहीं है।” उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न दुर्भावना की उत्पत्ति होती है। उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न दुर्भावना खत्म होती है। और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई दुर्भावना की दुबारा उत्पत्ति न होगी।

• उसे भीतर सुस्ती और तंद्रा होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर सुस्ती और तंद्रा है।” अथवा सुस्ती और तंद्रा न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर सुस्ती और तंद्रा नहीं है।” उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न सुस्ती और तंद्रा की उत्पत्ति होती है। उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न सुस्ती और तंद्रा खत्म होती है। और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई सुस्ती और तंद्रा की दुबारा उत्पत्ति न होगी।

• उसे भीतर बेचैनी और पश्चाताप होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर बेचैनी और पश्चाताप है”। अथवा बेचैनी और पश्चाताप न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर बेचैनी और पश्चाताप नहीं है।” उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न बेचैनी और पश्चाताप की उत्पत्ति होती है। उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न बेचैनी और पश्चाताप खत्म होती है। और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई बेचैनी और पश्चाताप की दुबारा उत्पत्ति न होगी।

• उसे भीतर अनिश्चितता (=संदेह) होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर अनिश्चितता है।” अथवा अनिश्चितता न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर अनिश्चितता नहीं है।” उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न अनिश्चितता की उत्पत्ति होती है। उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न अनिश्चितता खत्म होती है। और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई अनिश्चितता की दुबारा उत्पत्ति न होगी।

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, वह स्वभाव का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह स्वभाव है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु पाँच व्यवधान स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है।


(“खन्ध”)

और, आगे भिक्षुओं, कोई भिक्षु पाँच आधार-संग्रह (“पञ्च उपादानक्खन्ध”) स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। कैसे कोई भिक्षु पाँच आधार-संग्रह स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है?

कोई भिक्षु पता करता है—‘यह रूप है; यह रूप की उत्पत्ति है; यह रूप की विलुप्ती है। यह वेदना है; यह वेदना की उत्पत्ति है; यह वेदना की विलुप्ती है। यह संज्ञा है; यह संज्ञा की उत्पत्ति है; यह संज्ञा की विलुप्ती है। यह संस्कार है; यह संस्कार की उत्पत्ति है; यह संस्कार की विलुप्ती है। यह विज्ञान है; यह विज्ञान की उत्पत्ति है; यह विज्ञान की विलुप्ती है।’3

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, वह स्वभाव का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह स्वभाव है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु पाँच आधार-संग्रह स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है।


(“आयतन”)

आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु छह भीतरी-बाहरी आयाम स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। कैसे कोई भिक्षु छह भीतरी-बाहरी आयाम स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है?

• यहाँ कोई भिक्षु आँख पता करता है; रूप पता करता है; उन दोनों पर आधार पर जो बंधन (“संयोजन”) पैदा होता है, उसे पता करता है। अनुत्पन्न बंधन कैसे उत्पन्न होता है, वह पता करता है। उत्पन्न बंधन कैसे छोड़ा जाता है, वह पता करता है। और, छूटा बंधन कैसे दुबारा न उत्पन्न हो, वह पता करता है।

• वह कान पता करता है; आवाज़ पता करता है; उन दोनों पर आधार पर जो बंधन पैदा होता है, उसे पता करता है। अनुत्पन्न बंधन कैसे उत्पन्न होता है, वह पता करता है। उत्पन्न बंधन कैसे छोड़ा जाता है, वह पता करता है। और, छूटा बंधन कैसे दुबारा न उत्पन्न हो, वह पता करता है।

• वह नाक पता करता है; गंध पता करता है; उन दोनों पर आधार पर जो बंधन पैदा होता है, उसे पता करता है। अनुत्पन्न बंधन कैसे उत्पन्न होता है, वह पता करता है। उत्पन्न बंधन कैसे छोड़ा जाता है, वह पता करता है। और, छूटा बंधन कैसे दुबारा न उत्पन्न हो, वह पता करता है।

• वह जीभ पता करता है; स्वाद पता करता है; उन दोनों पर आधार पर जो बंधन पैदा होता है, उसे पता करता है। अनुत्पन्न बंधन कैसे उत्पन्न होता है, वह पता करता है। उत्पन्न बंधन कैसे छोड़ा जाता है, वह पता करता है। और, छूटा बंधन कैसे दुबारा न उत्पन्न हो, वह पता करता है।

• वह काया पता करता है; संस्पर्श पता करता है; उन दोनों पर आधार पर जो बंधन पैदा होता है, उसे पता करता है। अनुत्पन्न बंधन कैसे उत्पन्न होता है, वह पता करता है। उत्पन्न बंधन कैसे छोड़ा जाता है, वह पता करता है। और, छूटा बंधन कैसे दुबारा न उत्पन्न हो, वह पता करता है।

• वह मन पता करता है; स्वभाव पता करता है; उन दोनों पर आधार पर जो बंधन पैदा होता है, उसे पता करता है। अनुत्पन्न बंधन कैसे उत्पन्न होता है, वह पता करता है। उत्पन्न बंधन कैसे छोड़ा जाता है, वह पता करता है। और, छूटा बंधन कैसे दुबारा न उत्पन्न हो, वह पता करता है।

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, वह स्वभाव का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह स्वभाव है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु छह भीतरी-बाहरी आयाम स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है।


(“बोज्झङग”)

और, आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु सात संसंबोध्यङ्ग स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। कैसे कोई भिक्षु सात संसंबोध्यङ्ग स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है?

• यहाँ किसी भिक्षु में भीतर स्मृति संबोधिअंग हो, तो उसे पता चलता है कि ‘मेरे भीतर स्मृति संबोधिअंग है।’ अथवा भीतर स्मृति संबोधिअंग न हो, तो उसे पता चलता है कि ‘मेरे भीतर स्मृति संबोधिअंग नहीं है।’ उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न स्मृति संबोधिअंग कैसे उत्पन्न होता है। और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ स्मृति संबोधिअंग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।

• उसे भीतर धम्म-विचय संबोधिअंग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर धम्म-विचय संबोधिअंग है।” अथवा भीतर धम्म-विचय संबोधिअंग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर धम्म-विचय संबोधिअंग नहीं है।” उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न धम्म-विचय संबोधिअंग कैसे उत्पन्न होता है। और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ धम्म-विचय संबोधिअंग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।

• उसे भीतर वीर्य संबोधिअंग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर वीर्य संबोधिअंग है।” अथवा भीतर वीर्य संबोधिअंग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर वीर्य संबोधिअंग नहीं है।” उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न वीर्य संबोधिअंग कैसे उत्पन्न होता है। और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ वीर्य संबोधिअंग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।

• उसे भीतर प्रीति संबोधिअंग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर प्रीति संबोधिअंग है।” अथवा भीतर प्रीति संबोधिअंग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर प्रीति संबोधिअंग नहीं है।” उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न प्रीति संबोधिअंग कैसे उत्पन्न होता है। और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ प्रीति संबोधिअंग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।

• उसे भीतर प्रश्रब्धि संबोधिअंग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर प्रश्रब्धि संबोधिअंग है।” अथवा भीतर प्रश्रब्धि संबोधिअंग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर प्रश्रब्धि संबोधिअंग नहीं है।” उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न प्रश्रब्धि संबोधिअंग कैसे उत्पन्न होता है। और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ प्रश्रब्धि संबोधिअंग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।

• उसे भीतर समाधि संबोधिअंग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर समाधि संबोधिअंग है।” अथवा भीतर समाधि संबोधिअंग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर समाधि संबोधिअंग नहीं है।” उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न समाधि संबोधिअंग कैसे उत्पन्न होता है। और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ समाधि संबोधिअंग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।

• उसे भीतर उपेक्षा संबोधिअंग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर उपेक्षा संबोधिअंग है।” अथवा भीतर उपेक्षा संबोधिअंग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर उपेक्षा संबोधिअंग नहीं है।” उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न उपेक्षा संबोधिअंग कैसे उत्पन्न होता है। और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ उपेक्षा संबोधिअंग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, वह स्वभाव का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह स्वभाव है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु सात संबोधिअंग स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है।


(“सच्च पब्ब”)

आगे, भिक्षुओं, कोई भिक्षु चार आर्यसत्य स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। कैसे कोई भिक्षु चार आर्यसत्य स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है?

यहाँ कोई भिक्षु ‘यह दुःख है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘यह दुःख की उत्पत्ति है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘यह दुःख का निरोध है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘यह दुःख का निरोध-मार्ग है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है।

इस तरह, भिक्षुओं, वह भिक्षु भीतरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा भीतरी और बाहरी स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, वह स्वभाव का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; अथवा स्वभाव का उत्पत्ति और व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है। अथवा, उसकी स्मृति स्थापित हो जाती है—‘यह स्वभाव है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का आधार नहीं लेता। इस तरह, भिक्षुओं, कोई भिक्षु चार आर्यसत्य स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है।

अब, भिक्षुओं, जो इस तरह चार स्मृतिप्रस्थान की साधना ७ वर्षों तक करें, उसे दो में से एक फ़ल अपेक्षित है—अभी यही परमज्ञान, अथवा आधार शेष बचने पर अनागामिता।

छोड़ो, भिक्षुओं, ७ वर्ष ! जो इस तरह चार स्मृतिप्रस्थान की साधना ६ वर्षों तक… ५ वर्षों तक… ४ वर्षों तक… ३ वर्षों तक… २ वर्षों तक… १ वर्ष तक… ७ महीने तक करें, उसे दो में से एक फ़ल अपेक्षित है—अभी यही परमज्ञान, अथवा आधार शेष बचने पर अनागामिता।

छोड़ो, भिक्षुओं, ७ वर्ष ! जो इस तरह चार स्मृतिप्रस्थान की साधना ६ महीने तक… ५ महीने तक… ४ महीने तक… ३ महीने तक… २ महीने तक… १ महीने तक… आधे महीने तक… मात्र ७ दिनों तक अभ्यास करें, उसे दो में से एक फ़ल अपेक्षित है—अभी यही परमज्ञान, अथवा आधार शेष बचने पर अनागामिता।

भिक्षुओं, यह चार स्मृतिप्रस्थान एकतरफ़ा मार्ग है—सत्वों की विशुद्धि के लिए, शोक और विलाप लाँघने के लिए, दर्द और व्यथा को विलुप्त करने के लिए, सही तरीक़ा पाने के लिए, निर्वाण के साक्षात्कार के लिए। मैंने जो कहा था, इसलिए कहा था।”

भगवान ने ऐसा कहा। संतुष्ट हुए भिक्षुओं ने भगवान के कथन का अनुमोदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. दशकों तक एकायनो मग्गो का अनुवाद होता था, ‘इकलौता मार्ग’। किंतु, भन्ते ञाणमोली के पश्चात, अनुवादकों ने उसके पूर्व संदर्भ की ओर गौर किया, और पाया कि दरअसल उसका अर्थ वन वे होता है। अर्थात, ऐसा एक-तरफा रास्ता, जो एक ही दिशा में आगे बढ़े, और एक ही मंज़िल पर ले जाए, दुसरे रास्तें न खुले। ↩︎

  2. मज्झिमनिकाय ४४ के अनुसार आश्वास-प्रश्वास, अर्थात, आती-जाती साँस ही कायिक-संस्कार है। हम भिन्न-भिन्न तरह से साँस लेकर भिन्न-भिन्न तरह से काया महसूस करते है, और उसे बनाते है। ↩︎

  3. रूप की उत्पत्ति क्या है?

    कोई व्यक्ति (भौतिक) रूप से आनंदित होता है, स्वीकार करता है, जुड़ जाता है। जब वह रूप से आनंदित होता है, स्वीकार करता है, जुड़ जाता है, तब उसे मज़ा आता है। रूप का किसी भी तरह मज़ा लेना आधार बनाता है। आधार के कारण अस्तित्व पनपता है। अस्तित्व के कारण जन्म होता है। जन्म के कारण बुढ़ापा मौत शोक विलाप दर्द व्यथा निराशा का सिलसिला चल पड़ता है। इस तरह समस्त दुःख संग्रह की उत्पत्ति होती है।

    वेदना…नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता की उत्पत्ति क्या है?

    कोई व्यक्ति वेदना… नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता से आनंदित होता है, स्वीकार करता है, जुड़ जाता है। जब वह वेदना… नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता से आनंदित होता है, स्वीकार करता है, जुड़ जाता है, तब उसे मज़ा आता है। वेदना… नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता का किसी भी तरह मज़ा लेना आधार बनाता है। आधार के कारण अस्तित्व पनपता है। अस्तित्व के कारण जन्म होता है। जन्म के कारण बुढ़ापा मौत शोक विलाप दर्द व्यथा निराशा का सिलसिला चल पड़ता है। इस तरह समस्त दुःख संग्रह की उत्पत्ति होती है।

    और रूप का विलुप्त होना क्या है?

    कोई व्यक्ति रूप से आनंदित नहीं होता, स्वीकार नहीं करता, जुड़ नहीं जाता। जब वह रूप से आनंदित नहीं होता, स्वीकार नहीं करता, जुड़ नहीं जाता, तब उसे मज़ा नहीं आता। रूप का किसी भी तरह मज़ा न लेना आधार ख़त्म करता है। आधार ख़त्म होने के कारण अस्तित्व नहीं पनपता। अस्तित्व न होने के कारण जन्म नहीं होता। जन्म न होने के कारण बुढ़ापा मौत शोक विलाप दर्द व्यथा निराशा का सिलसिला रुक जाता है। इस तरह समस्त दुःख संग्रह विलुप्त हो जाता है।

    वेदना…नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता का विलुप्त होना क्या है?

    कोई व्यक्ति वेदना…नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता से आनंदित नहीं होता, स्वीकार नहीं करता, जुड़ नहीं जाता। जब वह वेदना…नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता से आनंदित नहीं होता, स्वीकार नहीं करता, जुड़ नहीं जाता, तब उसे मज़ा नहीं आता। वेदना…नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता का किसी भी तरह मज़ा न लेना आधार ख़त्म करता है। आधार ख़त्म होने के कारण अस्तित्व नहीं पनपता। अस्तित्व न होने के कारण जन्म नहीं होता। जन्म न होने के कारण बुढ़ापा मौत शोक विलाप दर्द व्यथा निराशा का सिलसिला रुक जाता है। इस तरह समस्त दुःख संग्रह विलुप्त हो जाता है।

    इस तरह भिक्षुओं, रूप की उत्पत्ति व विलुप्ति होती है। वेदना… नज़रिए… संस्कार… विज्ञानता की उत्पत्ति व विलुप्ति होती है, जिसे समाधि में लीन भिक्षु जैसे हो, वैसे सही पता करता है। इसलिए समाधि विकसित करो, भिक्षुओं। समाधि में लीन भिक्षु जैसे हो, वैसे सही पता करता है।

    ("सं.नि.२२:५")  ↩︎

पालि

एवं मे सुतं—एकं समयं भगवा कुरूसु विहरति कम्मासधम्मं नाम कुरूनं निगमो। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि: “भिक्खवो”ति।

“भदन्ते”ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच:

“एकायनो अयं, भिक्खवे, मग्गो सत्तानं विसुद्धिया, सोकपरिदेवानं समतिक्कमाय, दुक्खदोमनस्सानं अत्थङ्गमाय, ञायस्स अधिगमाय, निब्बानस्स सच्छिकिरियाय, यदिदं चत्तारो सतिपट्ठाना।

कतमे चत्तारो? इध, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं; वेदनासु वेदनानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं; चित्ते चित्तानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं; धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति आतापी सम्पजानो सतिमा, विनेय्य लोके अभिज्झादोमनस्सं।

उद्देसो निट्ठितो।

१। कायानुपस्सना १।१। कायानुपस्सनाआनापानपब्ब कथञ्च, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति?

इध, भिक्खवे, भिक्खु अरञ्ञगतो वा रुक्खमूलगतो वा सुञ्ञागारगतो वा निसीदति, पल्लङ्कं आभुजित्वा, उजुं कायं पणिधाय, परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा। सो सतोव अस्ससति, सतोव पस्ससति।

दीघं वा अस्ससन्तो ‘दीघं अस्ससामी’ति पजानाति, दीघं वा पस्ससन्तो ‘दीघं पस्ससामी’ति पजानाति,

रस्सं वा अस्ससन्तो ‘रस्सं अस्ससामी’ति पजानाति, रस्सं वा पस्ससन्तो ‘रस्सं पस्ससामी’ति पजानाति।

‘सब्बकायपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘सब्बकायपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।

‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।

सेय्यथापि, भिक्खवे, दक्खो भमकारो वा भमकारन्तेवासी वा दीघं वा अञ्छन्तो ‘दीघं अञ्छामी’ति पजानाति, रस्सं वा अञ्छन्तो ‘रस्सं अञ्छामी’ति पजानाति; एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु दीघं वा अस्ससन्तो ‘दीघं अस्ससामी’ति पजानाति, दीघं वा पस्ससन्तो ‘दीघं पस्ससामी’ति पजानाति, रस्सं वा अस्ससन्तो ‘रस्सं अस्ससामी’ति पजानाति, रस्सं वा पस्ससन्तो ‘रस्सं पस्ससामी’ति पजानाति; ‘सब्बकायपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘सब्बकायपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति, ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।

इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा काये कायानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा काये कायानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति। ‘अत्थि कायो’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

आनापानपब्बं निट्ठितं।

१।२। कायानुपस्सनाइरियापथपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु गच्छन्तो वा ‘गच्छामी’ति पजानाति, ठितो वा ‘ठितोम्ही’ति पजानाति, निसिन्नो वा ‘निसिन्नोम्ही’ति पजानाति, सयानो वा ‘सयानोम्ही’ति पजानाति। यथा यथा वा पनस्स कायो पणिहितो होति तथा तथा नं पजानाति।

इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा काये कायानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा काये कायानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति। ‘अत्थि कायो’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

इरियापथपब्बं निट्ठितं।

१।३। कायानुपस्सनासम्पजानपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु अभिक्कन्ते पटिक्कन्ते सम्पजानकारी होति, आलोकिते विलोकिते सम्पजानकारी होति, समिञ्जिते पसारिते सम्पजानकारी होति, सङ्घाटिपत्तचीवरधारणे सम्पजानकारी होति, असिते पीते खायिते सायिते सम्पजानकारी होति, उच्चारपस्सावकम्मे सम्पजानकारी होति, गते ठिते निसिन्ने सुत्ते जागरिते भासिते तुण्हीभावे सम्पजानकारी होति।

इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति …पे…

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

सम्पजानपब्बं निट्ठितं।

१।४। कायानुपस्सनापटिकूलमनसिकारपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं उद्धं पादतला, अधो केसमत्थका, तचपरियन्तं पूरं नानप्पकारस्स असुचिनो पच्चवेक्खति: ‘अत्थि इमस्मिं काये केसा लोमा नखा दन्ता तचो मंसं न्हारु अट्ठि अट्ठिमिञ्जं वक्कं हदयं यकनं किलोमकं पिहकं पप्फासं अन्तं अन्तगुणं उदरियं करीसं पित्तं सेम्हं पुब्बो लोहितं सेदो मेदो अस्सु वसा खेळो सिङ्घाणिका लसिका मुत्तन्’ति।

सेय्यथापि, भिक्खवे, उभतोमुखा पुतोळि पूरा नानाविहितस्स धञ्ञस्स, सेय्यथिदं—सालीनं वीहीनं मुग्गानं मासानं तिलानं तण्डुलानं। तमेनं चक्खुमा पुरिसो मुञ्चित्वा पच्चवेक्खेय्य: ‘इमे साली इमे वीही इमे मुग्गा इमे मासा इमे तिला इमे तण्डुला’ति।

एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं उद्धं पादतला, अधो केसमत्थका, तचपरियन्तं पूरं नानप्पकारस्स असुचिनो पच्चवेक्खति: ‘अत्थि इमस्मिं काये केसा लोमा …पे… मुत्तन्’ति।

इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति …पे…

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

पटिकूलमनसिकारपब्बं निट्ठितं।

१।५। कायानुपस्सनाधातुमनसिकारपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं यथाठितं यथापणिहितं धातुसो पच्चवेक्खति: ‘अत्थि इमस्मिं काये पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति।

सेय्यथापि, भिक्खवे, दक्खो गोघातको वा गोघातकन्तेवासी वा गाविं वधित्वा चतुमहापथे बिलसो विभजित्वा निसिन्नो अस्स।

एवमेव खो, भिक्खवे, भिक्खु इममेव कायं यथाठितं यथापणिहितं धातुसो पच्चवेक्खति: ‘अत्थि इमस्मिं काये पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति।

इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति …पे…

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

धातुमनसिकारपब्बं निट्ठितं।

१।६। कायानुपस्सनानवसिवथिकपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सेय्यथापि पस्सेय्य सरीरं सिवथिकाय छड्डितं एकाहमतं वा द्वीहमतं वा तीहमतं वा उद्धुमातकं विनीलकं विपुब्बकजातं। सो इममेव कायं उपसंहरति: ‘अयम्पि खो कायो एवंधम्मो एवंभावी एवंअनतीतो’ति। इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति …पे…

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सेय्यथापि पस्सेय्य सरीरं सिवथिकाय छड्डितं काकेहि वा खज्जमानं कुललेहि वा खज्जमानं गिज्झेहि वा खज्जमानं कङ्केहि वा खज्जमानं सुनखेहि वा खज्जमानं ब्यग्घेहि वा खज्जमानं दीपीहि वा खज्जमानं सिङ्गालेहि वा खज्जमानं विविधेहि वा पाणकजातेहि खज्जमानं। सो इममेव कायं उपसंहरति: ‘अयम्पि खो कायो एवंधम्मो एवंभावी एवंअनतीतो’ति। इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति …पे…

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सेय्यथापि पस्सेय्य सरीरं सिवथिकाय छड्डितं अट्ठिकसङ्खलिकं समंसलोहितं न्हारुसम्बन्धं …पे…

अट्ठिकसङ्खलिकं निमंसलोहितमक्खितं न्हारुसम्बन्धं …पे…

अट्ठिकसङ्खलिकं अपगतमंसलोहितं न्हारुसम्बन्धं …पे…

अट्ठिकानि अपगतसम्बन्धानि दिसा विदिसा विक्खित्तानि, अञ्ञेन हत्थट्ठिकं अञ्ञेन पादट्ठिकं अञ्ञेन गोप्फकट्ठिकं अञ्ञेन जङ्घट्ठिकं अञ्ञेन ऊरुट्ठिकं अञ्ञेन कटिट्ठिकं अञ्ञेन फासुकट्ठिकं अञ्ञेन पिट्ठिट्ठिकं अञ्ञेन खन्धट्ठिकं अञ्ञेन गीवट्ठिकं अञ्ञेन हनुकट्ठिकं अञ्ञेन दन्तट्ठिकं अञ्ञेन सीसकटाहं। सो इममेव कायं उपसंहरति: ‘अयम्पि खो कायो एवंधम्मो एवंभावी एवंअनतीतो’ति। इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति …पे… एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु सेय्यथापि पस्सेय्य सरीरं सिवथिकाय छड्डितं, अट्ठिकानि सेतानि सङ्खवण्णपटिभागानि …पे…

अट्ठिकानि पुञ्जकितानि तेरोवस्सिकानि …पे…

अट्ठिकानि पूतीनि चुण्णकजातानि। सो इममेव कायं उपसंहरति: ‘अयम्पि खो कायो एवंधम्मो एवंभावी एवंअनतीतो’ति।

इति अज्झत्तं वा काये कायानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा काये कायानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा काये कायानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा कायस्मिं विहरति। ‘अत्थि कायो’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु काये कायानुपस्सी विहरति।

नवसिवथिकपब्बं निट्ठितं।

चुद्दसकायानुपस्सना निट्ठिता।

२। वेदनानुपस्सना कथञ्च, भिक्खवे, भिक्खु वेदनासु वेदनानुपस्सी विहरति?

इध, भिक्खवे, भिक्खु सुखं वा वेदनं वेदयमानो ‘सुखं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

दुक्खं वा वेदनं वेदयमानो ‘दुक्खं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

अदुक्खमसुखं वा वेदनं वेदयमानो ‘अदुक्खमसुखं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

सामिसं वा सुखं वेदनं वेदयमानो ‘सामिसं सुखं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

निरामिसं वा सुखं वेदनं वेदयमानो ‘निरामिसं सुखं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

सामिसं वा दुक्खं वेदनं वेदयमानो ‘सामिसं दुक्खं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

निरामिसं वा दुक्खं वेदनं वेदयमानो ‘निरामिसं दुक्खं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

सामिसं वा अदुक्खमसुखं वेदनं वेदयमानो ‘सामिसं अदुक्खमसुखं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

निरामिसं वा अदुक्खमसुखं वेदनं वेदयमानो ‘निरामिसं अदुक्खमसुखं वेदनं वेदयामी’ति पजानाति।

इति अज्झत्तं वा वेदनासु वेदनानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा वेदनासु वेदनानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा वेदनासु वेदनानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा वेदनासु विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा वेदनासु विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा वेदनासु विहरति। ‘अत्थि वेदना’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु वेदनासु वेदनानुपस्सी विहरति।

वेदनानुपस्सना निट्ठिता।

३। चित्तानुपस्सना कथञ्च, भिक्खवे, भिक्खु चित्ते चित्तानुपस्सी विहरति?

इध, भिक्खवे, भिक्खु सरागं वा चित्तं ‘सरागं चित्तन्’ति पजानाति। वीतरागं वा चित्तं ‘वीतरागं चित्तन्’ति पजानाति। सदोसं वा चित्तं ‘सदोसं चित्तन्’ति पजानाति। वीतदोसं वा चित्तं ‘वीतदोसं चित्तन्’ति पजानाति। समोहं वा चित्तं ‘समोहं चित्तन्’ति पजानाति। वीतमोहं वा चित्तं ‘वीतमोहं चित्तन्’ति पजानाति। सङ्खित्तं वा चित्तं ‘सङ्खित्तं चित्तन्’ति पजानाति। विक्खित्तं वा चित्तं ‘विक्खित्तं चित्तन्’ति पजानाति। महग्गतं वा चित्तं ‘महग्गतं चित्तन्’ति पजानाति। अमहग्गतं वा चित्तं ‘अमहग्गतं चित्तन्’ति पजानाति। सौत्तरं वा चित्तं ‘सौत्तरं चित्तन्’ति पजानाति। अनुत्तरं वा चित्तं ‘अनुत्तरं चित्तन्’ति पजानाति। समाहितं वा चित्तं ‘समाहितं चित्तन्’ति पजानाति। असमाहितं वा चित्तं ‘असमाहितं चित्तन्’ति पजानाति। विमुत्तं वा चित्तं ‘विमुत्तं चित्तन्’ति पजानाति। अविमुत्तं वा चित्तं ‘अविमुत्तं चित्तन्’ति पजानाति।

इति अज्झत्तं वा चित्ते चित्तानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा चित्ते चित्तानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा चित्ते चित्तानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा चित्तस्मिं विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा चित्तस्मिं विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा चित्तस्मिं विहरति। ‘अत्थि चित्तन्’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु चित्ते चित्तानुपस्सी विहरति।

चित्तानुपस्सना निट्ठिता।

४। धम्मानुपस्सना ४।१। धम्मानुपस्सनानीवरणपब्ब कथञ्च, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति?

इध, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति पञ्चसु नीवरणेसु। कथञ्च पन, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति पञ्चसु नीवरणेसु?

इध, भिक्खवे, भिक्खु सन्तं वा अज्झत्तं कामच्छन्दं ‘अत्थि मे अज्झत्तं कामच्छन्दो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं कामच्छन्दं ‘नत्थि मे अज्झत्तं कामच्छन्दो’ति पजानाति; यथा च अनुप्पन्नस्स कामच्छन्दस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स कामच्छन्दस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स कामच्छन्दस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

सन्तं वा अज्झत्तं ब्यापादं ‘अत्थि मे अज्झत्तं ब्यापादो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं ब्यापादं ‘नत्थि मे अज्झत्तं ब्यापादो’ति पजानाति; यथा च अनुप्पन्नस्स ब्यापादस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स ब्यापादस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स ब्यापादस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

सन्तं वा अज्झत्तं थिनमिद्धं ‘अत्थि मे अज्झत्तं थिनमिद्धन्’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं थिनमिद्धं ‘नत्थि मे अज्झत्तं थिनमिद्धन्’ति पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स थिनमिद्धस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स थिनमिद्धस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स थिनमिद्धस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

सन्तं वा अज्झत्तं उद्धच्चकुक्कुच्चं ‘अत्थि मे अज्झत्तं उद्धच्चकुक्कुच्चन्’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं उद्धच्चकुक्कुच्चं ‘नत्थि मे अज्झत्तं उद्धच्चकुक्कुच्चन्’ति पजानाति; यथा च अनुप्पन्नस्स उद्धच्चकुक्कुच्चस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स उद्धच्चकुक्कुच्चस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स उद्धच्चकुक्कुच्चस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

सन्तं वा अज्झत्तं विचिकिच्छं ‘अत्थि मे अज्झत्तं विचिकिच्छा’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं विचिकिच्छं ‘नत्थि मे अज्झत्तं विचिकिच्छा’ति पजानाति; यथा च अनुप्पन्नाय विचिकिच्छाय उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नाय विचिकिच्छाय पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनाय विचिकिच्छाय आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

इति अज्झत्तं वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति। ‘अत्थि धम्मा’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति पञ्चसु नीवरणेसु।

नीवरणपब्बं निट्ठितं।

४।२। धम्मानुपस्सनाखन्धपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति पञ्चसु उपादानक्खन्धेसु। कथञ्च पन, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति पञ्चसु उपादानक्खन्धेसु? इध, भिक्खवे, भिक्खु: ‘इति रूपं, इति रूपस्स समुदयो, इति रूपस्स अत्थङ्गमो; इति वेदना, इति वेदनाय समुदयो, इति वेदनाय अत्थङ्गमो; इति सञ्ञा, इति सञ्ञाय समुदयो, इति सञ्ञाय अत्थङ्गमो; इति सङ्खारा, इति सङ्खारानं समुदयो, इति सङ्खारानं अत्थङ्गमो; इति विञ्ञाणं, इति विञ्ञाणस्स समुदयो, इति विञ्ञाणस्स अत्थङ्गमो’ति;

इति अज्झत्तं वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति। ‘अत्थि धम्मा’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति पञ्चसु उपादानक्खन्धेसु।

खन्धपब्बं निट्ठितं।

४।३। धम्मानुपस्सनाआयतनपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति छसु अज्झत्तिकबाहिरेसु आयतनेसु। कथञ्च पन, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति छसु अज्झत्तिकबाहिरेसु आयतनेसु?

इध, भिक्खवे, भिक्खु चक्खुञ्च पजानाति, रूपे च पजानाति, यञ्च तदुभयं पटिच्च उप्पज्जति संयोजनं तञ्च पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स संयोजनस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स संयोजनस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स संयोजनस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

सोतञ्च पजानाति, सद्दे च पजानाति, यञ्च तदुभयं पटिच्च उप्पज्जति संयोजनं तञ्च पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स संयोजनस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स संयोजनस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स संयोजनस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

घानञ्च पजानाति, गन्धे च पजानाति, यञ्च तदुभयं पटिच्च उप्पज्जति संयोजनं तञ्च पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स संयोजनस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स संयोजनस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स संयोजनस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

जिव्हञ्च पजानाति, रसे च पजानाति, यञ्च तदुभयं पटिच्च उप्पज्जति संयोजनं तञ्च पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स संयोजनस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स संयोजनस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स संयोजनस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

कायञ्च पजानाति, फोट्ठब्बे च पजानाति, यञ्च तदुभयं पटिच्च उप्पज्जति संयोजनं तञ्च पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स संयोजनस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स संयोजनस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स संयोजनस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

मनञ्च पजानाति, धम्मे च पजानाति, यञ्च तदुभयं पटिच्च उप्पज्जति संयोजनं तञ्च पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स संयोजनस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स संयोजनस्स पहानं होति तञ्च पजानाति, यथा च पहीनस्स संयोजनस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति।

इति अज्झत्तं वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति। ‘अत्थि धम्मा’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति छसु अज्झत्तिकबाहिरेसु आयतनेसु।

आयतनपब्बं निट्ठितं।

४।४। धम्मानुपस्सनाबोज्झङ्गपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति सत्तसु बोज्झङ्गेसु। कथञ्च पन, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति सत्तसु बोज्झङ्गेसु?

इध, भिक्खवे, भिक्खु सन्तं वा अज्झत्तं सतिसम्बोज्झङ्गं ‘अत्थि मे अज्झत्तं सतिसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं सतिसम्बोज्झङ्गं ‘नत्थि मे अज्झत्तं सतिसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स सतिसम्बोज्झङ्गस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स सतिसम्बोज्झङ्गस्स भावनाय पारिपूरी होति तञ्च पजानाति।

सन्तं वा अज्झत्तं धम्मविचयसम्बोज्झङ्गं ‘अत्थि मे अज्झत्तं धम्मविचयसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं धम्मविचयसम्बोज्झङ्गं ‘नत्थि मे अज्झत्तं धम्मविचयसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स धम्मविचयसम्बोज्झङ्गस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स धम्मविचयसम्बोज्झङ्गस्स भावनाय पारिपूरी होति तञ्च पजानाति। सन्तं वा अज्झत्तं वीरियसम्बोज्झङ्गं ‘अत्थि मे अज्झत्तं वीरियसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं वीरियसम्बोज्झङ्गं ‘नत्थि मे अज्झत्तं वीरियसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स वीरियसम्बोज्झङ्गस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स वीरियसम्बोज्झङ्गस्स भावनाय पारिपूरी होति तञ्च पजानाति। सन्तं वा अज्झत्तं पीतिसम्बोज्झङ्गं ‘अत्थि मे अज्झत्तं पीतिसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं पीतिसम्बोज्झङ्गं ‘नत्थि मे अज्झत्तं पीतिसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स पीतिसम्बोज्झङ्गस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स पीतिसम्बोज्झङ्गस्स भावनाय पारिपूरी होति तञ्च पजानाति। सन्तं वा अज्झत्तं पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गं ‘अत्थि मे अज्झत्तं पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गं ‘नत्थि मे अज्झत्तं पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स पस्सद्धिसम्बोज्झङ्गस्स भावनाय पारिपूरी होति तञ्च पजानाति। सन्तं वा अज्झत्तं समाधिसम्बोज्झङ्गं ‘अत्थि मे अज्झत्तं समाधिसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं समाधिसम्बोज्झङ्गं ‘नत्थि मे अज्झत्तं समाधिसम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स समाधिसम्बोज्झङ्गस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स समाधिसम्बोज्झङ्गस्स भावनाय पारिपूरी होति तञ्च पजानाति। सन्तं वा अज्झत्तं उपेक्खासम्बोज्झङ्गं ‘अत्थि मे अज्झत्तं उपेक्खासम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, असन्तं वा अज्झत्तं उपेक्खासम्बोज्झङ्गं ‘नत्थि मे अज्झत्तं उपेक्खासम्बोज्झङ्गो’ति पजानाति, यथा च अनुप्पन्नस्स उपेक्खासम्बोज्झङ्गस्स उप्पादो होति तञ्च पजानाति, यथा च उप्पन्नस्स उपेक्खासम्बोज्झङ्गस्स भावनाय पारिपूरी होति तञ्च पजानाति।

इति अज्झत्तं वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति। ‘अत्थि धम्मा’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति सत्तसु बोज्झङ्गेसु।

बोज्झङ्गपब्बं निट्ठितं।

४।५। धम्मानुपस्सनासच्चपब्ब पुन चपरं, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति चतूसु अरियसच्चेसु।

कथञ्च पन, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति चतूसु अरियसच्चेसु? इध, भिक्खवे, भिक्खु ‘इदं दुक्खन्’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खसमुदयो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खनिरोधो’ति यथाभूतं पजानाति, ‘अयं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदा’ति यथाभूतं पजानाति।

इति अज्झत्तं वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, बहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति, अज्झत्तबहिद्धा वा धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति; समुदयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, वयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति, समुदयवयधम्मानुपस्सी वा धम्मेसु विहरति। ‘अत्थि धम्मा’ति वा पनस्स सति पच्चुपट्ठिता होति। यावदेव ञाणमत्ताय पटिस्सतिमत्ताय अनिस्सितो च विहरति, न च किञ्चि लोके उपादियति।

एवम्पि खो, भिक्खवे, भिक्खु धम्मेसु धम्मानुपस्सी विहरति चतूसु अरियसच्चेसु।

सच्चपब्बं निट्ठितं।

धम्मानुपस्सना निट्ठिता।

यो हि कोचि, भिक्खवे, इमे चत्तारो सतिपट्ठाने एवं भावेय्य सत्त वस्सानि, तस्स द्विन्नं फलानं अञ्ञतरं फलं पाटिकङ्खं दिट्ठेव धम्मे अञ्ञा; सति वा उपादिसेसे अनागामिता।

तिट्ठन्तु, भिक्खवे, सत्त वस्सानि। यो हि कोचि, भिक्खवे, इमे चत्तारो सतिपट्ठाने एवं भावेय्य छ वस्सानि …पे… पञ्च वस्सानि … चत्तारि वस्सानि … तीणि वस्सानि … द्वे वस्सानि … एकं वस्सं … तिट्ठतु, भिक्खवे, एकं वस्सं। यो हि कोचि, भिक्खवे, इमे चत्तारो सतिपट्ठाने एवं भावेय्य सत्त मासानि, तस्स द्विन्नं फलानं अञ्ञतरं फलं पाटिकङ्खं दिट्ठेव धम्मे अञ्ञा; सति वा उपादिसेसे अनागामिता। तिट्ठन्तु, भिक्खवे, सत्त मासानि। यो हि कोचि, भिक्खवे, इमे चत्तारो सतिपट्ठाने एवं भावेय्य छ मासानि …पे… पञ्च मासानि … चत्तारि मासानि … तीणि मासानि … द्वे मासानि … एकं मासं … अड्ढमासं … तिट्ठतु, भिक्खवे, अड्ढमासो। यो हि कोचि, भिक्खवे, इमे चत्तारो सतिपट्ठाने एवं भावेय्य सत्ताहं, तस्स द्विन्नं फलानं अञ्ञतरं फलं पाटिकङ्खं दिट्ठेव धम्मे अञ्ञा सति वा उपादिसेसे अनागामिताति।

‘एकायनो अयं, भिक्खवे, मग्गो सत्तानं विसुद्धिया सोकपरिदेवानं समतिक्कमाय दुक्खदोमनस्सानं अत्थङ्गमाय ञायस्स अधिगमाय निब्बानस्स सच्छिकिरियाय यदिदं चत्तारो सतिपट्ठाना’ति। इति यं तं वुत्तं, इदमेतं पटिच्च वुत्तन्”ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।

सतिपट्ठानसुत्तं निट्ठितं दसमं।

मूलपरियायवग्गो निट्ठितो पठमो।

तस्सुद्दानं

मूलसुसंवरधम्मदायादा, भेरवानङ्गणाकङ्खेय्यवत्थं; सल्लेखसम्मादिट्ठिसतिपट्ठं, वग्गवरो असमो सुसमत्तो।