
सिंह की गर्जना
हिन्दी
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया, “भिक्षुओं!”
“भदन्त”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा—
“यहीं, भिक्षुओं, (प्रथम) श्रमण हैं। यहीं द्वितीय श्रमण हैं। यहीं तृतीय श्रमण हैं। और यहीं चतुर्थ श्रमण हैं। 1 दूसरों के धम्म समुदाय श्रमणों से खाली हैं। इस तरह, भिक्षुओं, तुम उचित रूप में सिंह जैसे गरज सकते हो।
संभव है, भिक्षुओं, तुम्हें दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहे, “किन्तु आयुष्मान को क्या विश्वास है, क्या बल है, जो आप कहते हो कि ‘यहीं श्रमण हैं। यहीं द्वितीय श्रमण हैं। यहीं तृतीय श्रमण हैं। और यहीं चतुर्थ श्रमण हैं। दूसरों के धम्म समुदाय श्रमणों से खाली हैं’?”
ऐसा कहे जाने पर, भिक्षुओं, उन दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक से कहों, “ऐसा है, मित्र, कि भगवान—जो जानते हैं, जो देखते हैं, जो अरहंत सम्यक सम्बुद्ध हैं—चार धम्म बताते हैं, जिन्हें स्वयं में देखकर हम कहते हैं कि ‘यहीं श्रमण हैं। यहीं द्वितीय श्रमण हैं। यहीं तृतीय श्रमण हैं। और यहीं चतुर्थ श्रमण हैं। दूसरों के धम्म समुदाय श्रमणों से खाली हैं!’ कौन से चार?
- हमें शास्ता (=भगवान) पर आस्था है,
- हमें धम्म पर आस्था है,
- हम शील को परिपूर्ण करते हैं,
- हमारे लिए सहधार्मिक, चाहे गृहस्थ हो या प्रव्रज्यित, प्रिय और पसंदीदा है।
मित्र, यही चार धम्म भगवान—जो जानते हैं, जो देखते हैं, जो अरहंत सम्यक सम्बुद्ध हैं—बताते हैं, जिन्हें स्वयं में देखकर हम कहते हैं कि ‘यहीं श्रमण हैं। यहीं द्वितीय श्रमण हैं। यहीं तृतीय श्रमण हैं। और यहीं चतुर्थ श्रमण हैं। दूसरों के धम्म समुदाय श्रमणों से खाली हैं!’”
संभव है, भिक्षुओं, तुम्हें दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहे, “हमें भी, मित्र, अपने शास्ता पर आस्था है, हमें भी अपने धम्म पर आस्था है, हम भी अपने शील को परिपूर्ण करते हैं, और हमारे लिए भी हमारे सहधार्मिक, चाहे गृहस्थ हो या प्रव्रज्यित, प्रिय और पसंदीदा है। तब, मित्र, तुम में हम से क्या विशेषता है, क्या अंतरभेद है, क्या भिन्नता है?”
ध्येय
ऐसा कहे जाने पर, भिक्षुओं, उन दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक से कहों, “किन्तु, मित्र, क्या ध्येय एक ही है, या अनेक ध्येय है?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “ध्येय तो एक ही है, मित्र। अनेक ध्येय नहीं है।”
“क्या वह ध्येय रागपूर्ण (व्यक्ति) के लिए है, अथवा वीतरागी के लिए?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “वह ध्येय वीतरागी के लिए है, मित्र। रागपूर्ण के लिए नहीं।”
“क्या वह ध्येय द्वेषपूर्ण (व्यक्ति) के लिए है, अथवा वीतद्वेषी के लिए?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “वह ध्येय वीतद्वेषी के लिए है, मित्र। द्वेषपूर्ण के लिए नहीं।”
“क्या वह ध्येय मोहपूर्ण (व्यक्ति) के लिए है, अथवा वीतमोही के लिए?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “वह ध्येय वीतमोही के लिए है, मित्र। मोहपूर्ण के लिए नहीं।”
“क्या वह ध्येय तृष्णापूर्ण (व्यक्ति) के लिए है, अथवा वीततृष्णि के लिए?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “वह ध्येय वीततृष्णि के लिए है, मित्र। तृष्णापूर्ण के लिए नहीं।”
“क्या वह ध्येय आसक्त (व्यक्ति) के लिए है, अथवा अनासक्त के लिए?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “वह ध्येय अनासक्त के लिए है, मित्र। आसक्त के लिए नहीं।”
“क्या वह ध्येय ज्ञानी (व्यक्ति) के लिए है, अथवा अज्ञानी के लिए?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “वह ध्येय ज्ञानी के लिए है, मित्र। अज्ञानी के लिए नहीं।”
“क्या वह ध्येय पक्षपाती और विरोधी (व्यक्ति) के लिए है, अथवा अपक्षपाती और अविरोधी के लिए?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “वह ध्येय अपक्षपाती और अविरोधी के लिए है, मित्र। पक्षपाती और विरोधी के लिए नहीं।”
“क्या वह ध्येय उलझन (“पपञ्च”, झमेला) चाहने वाले, उलझन में रमने वाले (व्यक्ति) के लिए है, अथवा सुलझन चाहने वाले व सुलझन में रमने वाले के लिए?”
भिक्षुओं, इस पर सही उत्तर देते हुए दूसरे धम्म समुदाय के परिव्राजक कहेंगे, “वह ध्येय सुलझन चाहने वाले व सुलझन में रमने वाले के लिए है, मित्र। उलझन चाहने वाले, उलझन में रमने वाले के लिए नहीं।”
दृष्टियाँ
भिक्षुओं, दो प्रकार की दृष्टियाँ होती हैं—
- भव दृष्टि (=अस्तित्व को बनाने या बनाए रखने की धारणा),
- विभव दृष्टि (=अस्तित्व को खत्म कर देने की धारणा)।
जो श्रमण या ब्राह्मण भव-दृष्टि का आधार लेते हैं, भव-दृष्टि को पकड़ते हैं, भव-दृष्टि से आसक्त होते हैं, वे विभव-दृष्टि का विरोध करते हैं। और जो श्रमण या ब्राह्मण विभव-दृष्टि का आधार लेते हैं, विभव-दृष्टि को पकड़ते हैं, विभव-दृष्टि से आसक्त होते हैं, वे भव-दृष्टि का विरोध करते हैं।
जो श्रमण या ब्राह्मण इन दो प्रकार की दृष्टियों की उत्पत्ति, विलुप्ति, आकर्षण, खामी, और निकास मार्ग को यथास्वरूप नहीं समझते हैं, मैं कहता हूँ कि—‘वे रागपूर्ण, द्वेषपूर्ण, मोहपूर्ण, तृष्णापूर्ण, आसक्त, अज्ञानी, पक्षपाती और विरोधी, उलझन चाहने वाले, उलझन में रमने वाले हैं। वे जन्म, बुढ़ापा, मौत, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, और निराशा से मुक्त नहीं होते हैं। वे दुःखों से मुक्त नहीं होते हैं।’
किन्तु, जो श्रमण या ब्राह्मण इन दो प्रकार की दृष्टियों की उत्पत्ति, विलुप्ति, आकर्षण, खामी, और निकास मार्ग को यथास्वरूप समझते हैं, मैं कहता हूँ कि—‘वे वीतरागी, वीतद्वेषी, वीतमोही, वीततृष्णि, अनासक्त, ज्ञानी, अपक्षपाती और अविरोधी, सुलझन चाहने वाले, सुलझन में रमने वाले हैं। वे जन्म, बुढ़ापा, मौत, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, और निराशा से मुक्त होते हैं। वे दुःखों से मुक्त होते हैं।’
उपादान
भिक्षुओं, चार तरह के उपादान होते हैं—
- काम उपादान (=इन्द्रिय कामभोग की चाह),
- दृष्टि उपादान (=दृष्टियों, मान्यताओं में जकड़ाव),
- शील व्रत उपादान (=आचार-व्यवहार को आत्म-मुक्ति का साधन मानना),
- आत्मवाद उपादान (स्व-अहं की अवधारणाओं में टिकाव) ।
भिक्षुओं, कुछ श्रमण और ब्राह्मण हैं, जो सभी प्रकार की उपादान को पूरी तरह से समझने का दावा करते हैं, किन्तु वे सभी प्रकार की उपादान का सही तरह से वर्णन नहीं करते हैं—काम उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, किन्तु न दृष्टि उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, न शील व्रत उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, और न ही आत्मवाद उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं। ऐसा क्यों?
क्योंकि वे श्रमण और ब्राह्मण सज्जन इन तीन बातों को यथास्वरूप नहीं समझते हैं। इसलिए वे सभी प्रकार की उपादान को पूरी तरह से समझने का दावा करते हैं, किन्तु वे सभी प्रकार की उपादान का सही तरह से वर्णन नहीं करते हैं…
आगे, भिक्षुओं, कुछ श्रमण और ब्राह्मण हैं, जो सभी प्रकार की उपादान को पूरी तरह से समझने का दावा करते हैं, किन्तु वे सभी प्रकार की उपादान का सही तरह से वर्णन नहीं करते हैं—काम उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, दृष्टि उपादान का भी पूरी तरह वर्णन करते हैं, किन्तु न शील व्रत उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, और न ही आत्मवाद उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं। ऐसा क्यों?
क्योंकि वे श्रमण और ब्राह्मण सज्जन इन दो बातों को यथास्वरूप नहीं समझते हैं। इसलिए वे सभी प्रकार की उपादान को पूरी तरह से समझने का दावा करते हैं, किन्तु वे सभी प्रकार की उपादान का सही तरह से वर्णन नहीं करते हैं…
आगे, भिक्षुओं, कुछ श्रमण और ब्राह्मण हैं, जो सभी प्रकार की उपादान को पूरी तरह से समझने का दावा करते हैं, किन्तु वे सभी प्रकार की उपादान का सही तरह से वर्णन नहीं करते हैं—काम उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, दृष्टि उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, शील व्रत उपादान का भी पूरी तरह वर्णन करते हैं, किन्तु आत्मवाद उपादान का पूरी तरह वर्णन नहीं करते हैं। ऐसा क्यों?
क्योंकि वे श्रमण और ब्राह्मण सज्जन इस एक बात को यथास्वरूप नहीं समझते हैं। इसलिए वे सभी प्रकार की उपादान को पूरी तरह से समझने का दावा करते हैं, किन्तु वे सभी प्रकार की उपादान का सही तरह से वर्णन नहीं करते हैं…
इस तरह के धम्म-विनय में, भिक्षुओं, कहा जाएगा कि—
- शास्ता के प्रति आस्था सही रूप में नहीं बैठी है,
- धम्म के प्रति आस्था सही रूप में नहीं बैठी है,
- शील की परिपूर्णता सही रूप में नहीं बैठी है,
- सहधार्मिक को प्रिय और पसंदीदा मानना सही रूप में नहीं बैठी है।
ऐसा क्यों? क्योंकि वह बताया धम्म-विनय—अस्पष्ट, दुर्घोषित, न तारने वाला, न परमशान्ति प्रदानकर्ता, अ-सम्यक-सम्बुद्ध द्वारा विदित है।
(दूसरी ओर) भिक्षुओं, तथागत, अरहंत, सम्यक-सम्बुद्ध हैं, जो सभी प्रकार की उपादान को पूरी तरह से समझने का दावा करते हैं, और वे सभी प्रकार की उपादान का सही तरह से वर्णन करते हैं—काम उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, दृष्टि उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, शील व्रत उपादान का पूरी तरह वर्णन करते हैं, और आत्मवाद उपादान का भी पूरी तरह वर्णन करते हैं।
इस तरह के धम्म-विनय में, भिक्षुओं, कहा जाएगा कि—
- शास्ता के प्रति आस्था सही रूप में बैठी है,
- धम्म के प्रति आस्था सही रूप में बैठी है,
- शील की परिपूर्णता सही रूप में बैठी है,
- सहधार्मिक को प्रिय और पसंदीदा मानना सही रूप में बैठी है।
ऐसा क्यों? क्योंकि वह बताया धम्म-विनय—स्पष्ट, सुघोषित, तारने वाला, परमशान्ति प्रदानकर्ता, सम्यक-सम्बुद्ध द्वारा विदित है।
प्रतीत्य समुत्पाद
भिक्षुओं, चारों उपादान का उद्गम क्या है? उत्पत्ति क्या है? जन्म कैसे होता है? अस्तित्व कैसे पाते हैं?
- चारों उपादान का उद्गम तृष्णा है। तृष्णा से उत्पत्ति होती है। तृष्णा से जन्म होता है। तृष्णा से ही अस्तित्व पाते हैं।
और, भिक्षुओं, तृष्णा का उद्गम क्या है? उत्पत्ति क्या है? जन्म कैसे होता है? अस्तित्व कैसे पाते हैं?
- तृष्णा का उद्गम वेदना है। वेदना से उत्पत्ति होती है। वेदना से जन्म होता है। वेदना से ही अस्तित्व पाते हैं।
और, भिक्षुओं, वेदना का उद्गम क्या है? उत्पत्ति क्या है? जन्म कैसे होता है? अस्तित्व कैसे पाते हैं?
- वेदना का उद्गम संपर्क है। संपर्क से उत्पत्ति होती है। संपर्क से जन्म होता है। संपर्क से ही अस्तित्व पाते हैं।
और, भिक्षुओं, संपर्क का उद्गम क्या है? उत्पत्ति क्या है? जन्म कैसे होता है? अस्तित्व कैसे पाते हैं?
- संपर्क का उद्गम छह आयाम है। छह आयाम से उत्पत्ति होती है। छह आयाम से जन्म होता है। छह आयाम से ही अस्तित्व पाते हैं।
और, भिक्षुओं, छह आयाम का उद्गम क्या है? उत्पत्ति क्या है? जन्म कैसे होता है? अस्तित्व कैसे पाते हैं?
- छह आयाम का उद्गम नाम और रूप है। नाम और रूप से उत्पत्ति होती है। नाम और रूप से जन्म होता है। नाम और रूप से ही अस्तित्व पाते हैं।
और, भिक्षुओं, नाम और रूप का उद्गम क्या है? उत्पत्ति क्या है? जन्म कैसे होता है? अस्तित्व कैसे पाते हैं?
- नाम और रूप का उद्गम विज्ञान है। विज्ञान से उत्पत्ति होती है। विज्ञान से जन्म होता है। विज्ञान से ही अस्तित्व पाते हैं।
और, भिक्षुओं, विज्ञान का उद्गम क्या है? उत्पत्ति क्या है? जन्म कैसे होता है? अस्तित्व कैसे पाते हैं?
- विज्ञान का उद्गम संस्कार है। संस्कार से उत्पत्ति होती है। संस्कार से जन्म होता है। संस्कार से ही अस्तित्व पाते हैं।
और, भिक्षुओं, संस्कार का उद्गम क्या है? उत्पत्ति क्या है? जन्म कैसे होता है? अस्तित्व कैसे पाते हैं?
- संस्कार का उद्गम अविद्या है। अविद्या से उत्पत्ति होती है। अविद्या से जन्म होता है। अविद्या से ही अस्तित्व पाते हैं।
और, भिक्षुओं, जब कोई भिक्षु अविद्या को त्याग कर विद्या उत्पन्न करता है, वह न काम उपादान के प्रति आसक्त होता है, न दृष्टि उपादान के प्रति आसक्त होता है, न शील व्रत उपादान के प्रति आसक्त होता है, न ही आत्मवाद उपादान के प्रति आसक्त होता है। अनासक्त हो वह व्याकुल नहीं होता। अव्याकुल रह भीतर से परिनिवृत्त होता है। उसे पता चलता है, ‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान के कथन का अभिनंदन किया।
सुत्र समाप्त।
अंगुत्तरनिकाय ४:२४ के अनुसार, चार तरह के श्रमण—श्रोतापन्न, सकृदगामी, अनागामी, और अरहंत होते हैं। ↩︎
पालि
१३९. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –
‘‘इधेव, भिक्खवे, समणो, इध दुतियो समणो, इध ततियो समणो, इध चतुत्थो समणो; सुञ्ञा परप्पवादा समणेभि अञ्ञेहीति समणेहि अञ्ञेति (सी॰ पी॰ क॰) एत्थ अञ्ञेहीति सकाय पटिञ्ञाय सच्चाभिञ्ञेहीति अत्थो वेदितब्बो। एवमेतं एवमेव (स्या॰ क॰), भिक्खवे, सम्मा सीहनादं नदथ।
१४०. ‘‘ठानं खो पनेतं, भिक्खवे, विज्जति यं अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं वदेय्युं – ‘को पनायस्मन्तानं अस्सासो, किं बलं, येन तुम्हे आयस्मन्तो एवं वदेथ – इधेव समणो, इध दुतियो समणो, इध ततियो समणो, इध चतुत्थो समणो; सुञ्ञा परप्पवादा समणेभि अञ्ञेही’ति? एवंवादिनो, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवमस्सु वचनीया – ‘अत्थि खो नो, आवुसो, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन चत्तारो धम्मा अक्खाता ये मयं अत्तनि सम्पस्समाना एवं वदेम – इधेव समणो, इध दुतियो समणो, इध ततियो समणो, इध चतुत्थो समणो; सुञ्ञा परप्पवादा समणेभि अञ्ञेहीति। कतमे चत्तारो? अत्थि खो नो, आवुसो, सत्थरि पसादो, अत्थि धम्मे पसादो, अत्थि सीलेसु परिपूरकारिता; सहधम्मिका खो पन पिया मनापा – गहट्ठा चेव पब्बजिता च। इमे खो नो, आवुसो, तेन भगवता जानता पस्सता अरहता सम्मासम्बुद्धेन चत्तारो धम्मा अक्खाता ये मयं अत्तनि सम्पस्समाना एवं वदेम – इधेव समणो, इध दुतियो समणो, इध ततियो समणो, इध चतुत्थो समणो; सुञ्ञा परप्पवादा समणेभि अञ्ञेही’ति।
१४१. ‘‘ठानं खो पनेतं, भिक्खवे, विज्जति यं अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं वदेय्युं – ‘अम्हाकम्पि खो, आवुसो, अत्थि सत्थरि पसादो यो अम्हाकं सत्था, अम्हाकम्पि अत्थि धम्मे पसादो यो अम्हाकं धम्मो, मयम्पि सीलेसु परिपूरकारिनो यानि अम्हाकं सीलानि, अम्हाकम्पि सहधम्मिका पिया मनापा – गहट्ठा चेव पब्बजिता च। इध नो, आवुसो, को विसेसो को अधिप्पयासो अधिप्पायो (क॰ सी॰ स्या॰ पी॰), अधिप्पयोगो (क॰) किं नानाकरणं यदिदं तुम्हाकञ्चेव अम्हाकञ्चा’ति?
‘‘एवंवादिनो, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवमस्सु वचनीया – ‘किं पनावुसो, एका निट्ठा, उदाहु पुथु निट्ठा’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘एकावुसो, निट्ठा, न पुथु निट्ठा’ति।
‘‘‘सा पनावुसो, निट्ठा सरागस्स उदाहु वीतरागस्सा’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘वीतरागस्सावुसो, सा निट्ठा, न सा निट्ठा सरागस्सा’ति।
‘‘‘सा पनावुसो, निट्ठा सदोसस्स उदाहु वीतदोसस्सा’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘वीतदोसस्सावुसो, सा निट्ठा, न सा निट्ठा सदोसस्सा’ति।
‘‘‘सा पनावुसो, निट्ठा समोहस्स उदाहु वीतमोहस्सा’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘वीतमोहस्सावुसो, सा निट्ठा, न सा निट्ठा समोहस्सा’ति।
‘‘‘सा पनावुसो, निट्ठा सतण्हस्स उदाहु वीततण्हस्सा’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘वीततण्हस्सावुसो, सा निट्ठा, न सा निट्ठा सतण्हस्सा’ति।
‘‘‘सा पनावुसो, निट्ठा सउपादानस्स उदाहु अनुपादानस्सा’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे , अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘अनुपादानस्सावुसो, सा निट्ठा, न सा निट्ठा सउपादानस्सा’ति।
‘‘‘सा पनावुसो, निट्ठा विद्दसुनो उदाहु अविद्दसुनो’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘विद्दसुनो, आवुसो, सा निट्ठा, न सा निट्ठा अविद्दसुनो’ति।
‘‘‘सा पनावुसो, निट्ठा अनुरुद्धप्पटिविरुद्धस्स उदाहु अननुरुद्धअप्पटिविरुद्धस्सा’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘अननुरुद्धअप्पटिविरुद्धस्सावुसो, सा निट्ठा, न सा निट्ठा अनुरुद्धप्पटिविरुद्धस्सा’ति।
‘‘‘सा पनावुसो, निट्ठा पपञ्चारामस्स पपञ्चरतिनो उदाहु निप्पपञ्चारामस्स निप्पपञ्चरतिनो’ति? सम्मा ब्याकरमाना, भिक्खवे, अञ्ञतित्थिया परिब्बाजका एवं ब्याकरेय्युं – ‘निप्पपञ्चारामस्सावुसो, सा निट्ठा निप्पपञ्चरतिनो, न सा निट्ठा पपञ्चारामस्स पपञ्चरतिनो’ति।
१४२. ‘‘द्वेमा, भिक्खवे, दिट्ठियो – भवदिट्ठि च विभवदिट्ठि च। ये हि केचि, भिक्खवे, समणा वा ब्राह्मणा वा भवदिट्ठिं अल्लीना भवदिट्ठिं उपगता भवदिट्ठिं अज्झोसिता, विभवदिट्ठिया ते पटिविरुद्धा। ये हि केचि, भिक्खवे, समणा वा ब्राह्मणा वा विभवदिट्ठिं अल्लीना विभवदिट्ठिं उपगता विभवदिट्ठिं अज्झोसिता, भवदिट्ठिया ते पटिविरुद्धा। ये हि केचि, भिक्खवे, समणा वा ब्राह्मणा वा इमासं द्विन्नं दिट्ठीनं समुदयञ्च अत्थङ्गमञ्च अस्सादञ्च आदीनवञ्च निस्सरणञ्च यथाभूतं नप्पजानन्ति, ‘ते सरागा ते सदोसा ते समोहा ते सतण्हा ते सउपादाना ते अविद्दसुनो ते अनुरुद्धप्पटिविरुद्धा ते पपञ्चारामा पपञ्चरतिनो; ते न परिमुच्चन्ति जातिया जराय मरणेन सोकेहि परिदेवेहि दुक्खेहि दोमनस्सेहि उपायासेहि; न परिमुच्चन्ति दुक्खस्मा’ति वदामि। ये च खो केचि, भिक्खवे, समणा वा ब्राह्मणा वा इमासं द्विन्नं दिट्ठीनं समुदयञ्च अत्थङ्गमञ्च अस्सादञ्च आदीनवञ्च निस्सरणञ्च यथाभूतं पजानन्ति, ‘ते वीतरागा ते वीतदोसा ते वीतमोहा ते वीततण्हा ते अनुपादाना ते विद्दसुनो ते अननुरुद्धअप्पटिविरुद्धा ते निप्पपञ्चारामा निप्पपञ्चरतिनो; ते परिमुच्चन्ति जातिया जराय मरणेन सोकेहि परिदेवेहि दुक्खेहि दोमनस्सेहि उपायासेहि; परिमुच्चन्ति दुक्खस्मा’ति वदामि।
१४३. ‘‘चत्तारिमानि , भिक्खवे, उपादानानि। कतमानि चत्तारि? कामुपादानं, दिट्ठुपादानं, सीलब्बतुपादानं, अत्तवादुपादानं। सन्ति, भिक्खवे, एके समणब्राह्मणा सब्बुपादानपरिञ्ञावादा पटिजानमाना। ते न सम्मा सब्बुपादानपरिञ्ञं पञ्ञपेन्ति – कामुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न दिट्ठुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न सीलब्बतुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न अत्तवादुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति। तं किस्स हेतु? इमानि हि ते भोन्तो समणब्राह्मणा तीणि ठानानि यथाभूतं नप्पजानन्ति। तस्मा ते भोन्तो समणब्राह्मणा सब्बुपादानपरिञ्ञावादा पटिजानमाना; ते न सम्मा सब्बुपादानपरिञ्ञं पञ्ञपेन्ति – कामुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न दिट्ठुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न सीलब्बतुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न अत्तवादुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति।
‘‘सन्ति, भिक्खवे, एके समणब्राह्मणा सब्बुपादानपरिञ्ञावादा पटिजानमाना। ते न सम्मा सब्बुपादानपरिञ्ञं पञ्ञपेन्ति – कामुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, दिट्ठुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न सीलब्बतुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न अत्तवादुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति। तं किस्स हेतु? इमानि हि ते भोन्तो समणब्राह्मणा द्वे ठानानि यथाभूतं नप्पजानन्ति। तस्मा ते भोन्तो समणब्राह्मणा सब्बुपादानपरिञ्ञावादा पटिजानमाना; ते न सम्मा पटिजानमाना न सम्मा (?) सब्बुपादानपरिञ्ञं पञ्ञपेन्ति – कामुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, दिट्ठुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न सीलब्बतुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न अत्तवादुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति।
‘‘सन्ति, भिक्खवे, एके समणब्राह्मणा सब्बुपादानपरिञ्ञावादा पटिजानमाना। ते न सम्मा सब्बुपादानपरिञ्ञं पञ्ञपेन्ति – कामुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, दिट्ठुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, सीलब्बतुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न अत्तवादुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति। तं किस्स हेतु? इमञ्हि ते भोन्तो समणब्राह्मणा एकं ठानं यथाभूतं नप्पजानन्ति। तस्मा ते भोन्तो समणब्राह्मणा सब्बुपादानपरिञ्ञावादा पटिजानमाना; ते न सम्मा पटिजानमाना न सम्मा (?) सब्बुपादानपरिञ्ञं पञ्ञपेन्ति – कामुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, दिट्ठुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, सीलब्बतुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति, न अत्तवादुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेन्ति।
‘‘एवरूपे खो, भिक्खवे, धम्मविनये यो सत्थरि पसादो सो न सम्मग्गतो अक्खायति; यो धम्मे पसादो सो न सम्मग्गतो अक्खायति; या सीलेसु परिपूरकारिता सा न सम्मग्गता अक्खायति; या सहधम्मिकेसु पियमनापता सा न सम्मग्गता अक्खायति। तं किस्स हेतु? एवञ्हेतं, भिक्खवे, होति यथा तं दुरक्खाते धम्मविनये दुप्पवेदिते अनिय्यानिके अनुपसमसंवत्तनिके असम्मासम्बुद्धप्पवेदिते।
१४४. ‘‘तथागतो च खो, भिक्खवे, अरहं सम्मासम्बुद्धो सब्बुपादानपरिञ्ञावादो पटिजानमानो सम्मा सब्बुपादानपरिञ्ञं पञ्ञपेति – कामुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेति, दिट्ठुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेति, सीलब्बतुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेति, अत्तवादुपादानस्स परिञ्ञं पञ्ञपेति। एवरूपे खो, भिक्खवे, धम्मविनये यो सत्थरि पसादो सो सम्मग्गतो अक्खायति; यो धम्मे पसादो सो सम्मग्गतो अक्खायति; या सीलेसु परिपूरकारिता सा सम्मग्गता अक्खायति; या सहधम्मिकेसु पियमनापता सा सम्मग्गता अक्खायति। तं किस्स हेतु? एवञ्हेतं, भिक्खवे, होति यथा तं स्वाक्खाते धम्मविनये सुप्पवेदिते निय्यानिके उपसमसंवत्तनिके सम्मासम्बुद्धप्पवेदिते।
१४५. ‘‘इमे च, भिक्खवे, चत्तारो उपादाना। किंनिदाना किंसमुदया किंजातिका किंपभवा? इमे चत्तारो उपादाना तण्हानिदाना तण्हासमुदया तण्हाजातिका तण्हापभवा। तण्हा चायं, भिक्खवे, किंनिदाना किंसमुदया किंजातिका किंपभवा? तण्हा वेदनानिदाना वेदनासमुदया वेदनाजातिका वेदनापभवा। वेदना चायं, भिक्खवे, किंनिदाना किंसमुदया किंजातिका किंपभवा? वेदना फस्सनिदाना फस्ससमुदया फस्सजातिका फस्सपभवा। फस्सो चायं, भिक्खवे, किंनिदानो किंसमुदयो किंजातिको किंपभवो? फस्सो सळायतननिदानो सळायतनसमुदयो सळायतनजातिको सळायतनपभवो। सळायतनञ्चिदं, भिक्खवे, किंनिदानं किंसमुदयं किंजातिकं किंपभवं? सळायतनं नामरूपनिदानं नामरूपसमुदयं नामरूपजातिकं नामरूपपभवं। नामरूपञ्चिदं, भिक्खवे, किंनिदानं किंसमुदयं किंजातिकं किंपभवं? नामरूपं विञ्ञाणनिदानं विञ्ञाणसमुदयं विञ्ञाणजातिकं विञ्ञाणपभवं। विञ्ञाणञ्चिदं, भिक्खवे , किंनिदानं किंसमुदयं किंजातिकं किंपभवं? विञ्ञाणं सङ्खारनिदानं सङ्खारसमुदयं सङ्खारजातिकं सङ्खारपभवं। सङ्खारा चिमे, भिक्खवे, किंनिदाना किंसमुदया किंजातिका किंपभवा? सङ्खारा अविज्जानिदाना अविज्जासमुदया अविज्जाजातिका अविज्जापभवा।
‘‘यतो च खो, भिक्खवे, भिक्खुनो अविज्जा पहीना होति विज्जा उप्पन्ना, सो अविज्जाविरागा विज्जुप्पादा नेव कामुपादानं उपादियति, न दिट्ठुपादानं उपादियति, न सीलब्बतुपादानं उपादियति, न अत्तवादुपादानं उपादियति। अनुपादियं न परितस्सति, अपरितस्सं पच्चत्तञ्ञेव परिनिब्बायति। ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति पजानाती’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
चूळसीहनादसुत्तं निट्ठितं पठमं।