✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१२३. अच्छरियब्भुत सुत्त मुख्य > सुत्तपिटक > मज्झिमनिकाय 2. मज्झिमनिकाय आनन्द के द्वाराभिक्षु के लिएकथा श्रद्धाबोधिसत्वबुद्धदेवता

आश्चर्य अद्भुत धर्म

अनुवादक: भिक्खु कश्यप | १० मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे।

उस समय, बहुत से भिक्षु भिक्षाटन से लौटकर भोजन करने के पश्चात सभागृह (उपस्थान-शाला) में एकत्र होकर साथ-साथ बैठे थे, जब उनके बीच यह चर्चा चल पड़ी—

“मित्र, आश्चर्यजनक है तथागत की महाऋद्धियाँ! अद्भुत है तथागत की महाशक्तियाँ! अतीत के वे बुद्ध जो परिनिर्वृत हुए, जिन्होंने प्रपञ्च छिन्न किया, मार्ग समाप्त किया, चक्र घूमना रोक दिया, सभी दुःखों से परे चले गए—उन्हें भी तथागत जानते हैं और उनका अनुस्मरण करते हैं—(कहते हुए) ‘उन भगवानों का जन्म ऐसा था, नाम ऐसा था, गोत्र ऐसा था, शील ऐसा था, धम्म ऐसा था, प्रज्ञा ऐसी थी, (चित्त-समाधि) विहार ऐसा था, और, उन भगवानों की विमुक्ति ऐसी थी!’” 1

जब ऐसा कहा गया, तब आयुष्मान आनन्द ने भिक्षुओं से कहा—

“मित्रों, (वाकई) तथागत आश्चर्यजनक हैं और वे आश्चर्यजनक धर्मों से युक्त हैं। तथागत अद्भुत हैं और वे अद्भुत धर्मों से युक्त हैं।”

किन्तु, भिक्षुओं की यह धर्मचर्चा अधूरी रह गयी।

भगवान का आगमन

तब भगवान सायंकाल के समय एकांतवास से निकल कर सभागृह गए, और जाकर बिछे आसन पर बैठ गए। भगवान ने बैठकर उन भिक्षुओं से कहा, “भिक्षुओं, अभी आप बैठकर क्या बातें कर रहे थे? क्या बात अधूरी रह गयी?”

ऐसा कहे जाने पर उन भिक्षुओं ने भगवान से (सब कुछ दोहराते हुए) कहा, “भन्ते, बहुत से भिक्षु भिक्षाटन से लौटकर… ‘मित्र, आश्चर्यजनक है तथागत की महाऋद्धियाँ… तब आयुष्मान आनन्द ने भिक्षुओं से कहा—‘मित्रों, (वाकई) तथागत आश्चर्यजनक हैं और वे आश्चर्यजनक धर्मों से युक्त हैं। तथागत अद्भुत हैं और वे अद्भुत धर्मों से युक्त हैं।’ किन्तु, हमारी यह धर्मचर्चा अधूरी रह गयी। और, अब भगवान आ गए।”

(भगवान ने कहा—) “तब, ठीक है, आनन्द, उन्हें आगे भी बताओं, तथागत के जो आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण हो।”

(आनन्द ने कहा—)

  1. (तुषित लोक में उत्पत्ति:) “भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह सुना है, यह ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, बोधिसत्व स्मृतिमान और सचेत रहते हुए ‘तुषित देवलोक’ में उत्पन्न हुए।’ भंते, बोधिसत्व का स्मृतिमान और सचेत रहते हुए ‘तुषित देवलोक’ में उत्पन्न होना—इसे, भंते, मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ।

  2. (तुषित लोक में स्थिति:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, यह ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, बोधिसत्व स्मृतिमान और सचेत रहते हुए ‘तुषित देवलोक’ में स्थित हुए।’ भंते, बोधिसत्व का स्मृतिमान और सचेत रहते हुए ‘तुषित देवलोक’ में स्थित होना—इसे (भी), भंते, मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ।

  3. (आयु पर्यंत:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, बोधिसत्व स्मृतिमान और सचेत रहते हुए ‘तुषित देवलोक’ में पूर्ण जीवनकाल तक रहे।’… इसे (भी), भंते, मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ।

  4. (गर्भ प्रवेश:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, बोधिसत्व स्मृतिमान और सचेत रहते हुए ‘तुषित देवलोक’ से च्युत होकर अपनी माँ के गर्भ में अवतरित हुए।’… इसे (भी) मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  5. (अपार प्रकाश:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व स्मृतिमान और सचेत रहते हुए ‘तुषित देवलोक’ से च्युत होकर अपनी माँ के गर्भ में अवतरित हुए, तब देवताओं की दिव्य तेज से भी परे एक महा तेज, असीम तेज उत्पन्न हुआ, जो देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा, और प्रजा से भरे इस लोक में फैल गया।

    यहाँ तक कि असीम अंधकार, घोर अंधकार में पड़े अन्तर ब्रह्मांडिय स्थलों पर भी, जहाँ सर्वशक्तिशाली सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश तक नहीं पहुँच पाता, 2 वहाँ भी देवताओं की दिव्य तेज से परे एक महा तेज, असीम तेज फैल गया। और वहाँ जन्म लिए सत्वों ने उस तेज में एक-दूसरे को पहली बार देखा, तो उन्हें लगा, ‘अरे! यहाँ अन्य सत्वों ने भी जन्म लिया हैं!’ और उस महा तेज, असीम तेज में ये दस हज़ार ब्रह्मांड कंपित हुए, प्रकंपित हुए, थरथराएँ।’… इसे (भी) मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  1. (चार देवों का पहरा:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व अपनी माँ के गर्भ में अवतरित हुए, तब चार दिशाओं से चार देवपुत्र उसकी रक्षा करने के लिए आए—(सोचते हुए:) ‘कही कोई मानवीय अथवा अमानवीय सत्व बोधिसत्व या उनकी माँ को हानि न पहुंचाएँ।’… इसे (भी) मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  2. (माता का शील:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व अपनी माँ के गर्भ में अवतरित हुए, तब बोधिसत्व की माँ स्वाभाविक रूप से सदाचारी बनी। वह जीवहत्या से विरत हुई, चुराने से विरत हुई, यौन दुराचार से विरत हुई, झूठ बोलने से विरत हुई, और शराब मद्य आदि मदहोश करने वाले नशे-पते से विरत हुई।’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  3. (काम-वासना का अभाव:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व अपनी माँ के गर्भ में अवतरित हुए, तब बोधिसत्व की माँ के मन में पुरुषों के प्रति कोई काम-वासना उत्पन्न नहीं हुई। तथा कोई भी पुरुष रक्ति-चित्त (कामुक आसक्ति) से उनका अतिक्रमण नहीं कर सकता।’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  4. (इन्द्रिय सुख:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व अपनी माँ के गर्भ में अवतरित हुए, तब बोधिसत्व की माँ को पाँचों काम-गुणों (इन्द्रिय सुखों) का लाभ हुआ। और वह पाँचों काम-गुणों में पूरी तरह लिप्त और समर्पित होकर रहती।’ इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  5. (रत्न की तरह दृश्य:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व अपनी माँ के गर्भ में अवतरित हुए, तब बोधिसत्व की माँ तो माता को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं हुआ। बोधिसत्व की माँ सुखी और थकान रहित ही रहती। और, बोधिसत्व की माँ अपनी गर्भ में स्थित बोधिसत्व को उसके समस्त अंगों और परिपूर्ण इंद्रियों के साथ देखा।

    जैसे, आनन्द, कोई ऊँची जाति का शुभ मणि हो — अष्टपहलु, सुपरिष्कृत, स्वच्छ, पारदर्शी, निर्मल, सभी गुणों से समृद्ध! और उसमें एक नीला, पीला, लाल, सफेद या पीला धागा पिरोया गया हो। उसे हाथ में लेकर एक आँख वाला व्यक्ति देखता है (सोचते हुए)—‘यह ऊँची जाति का एक वैदुर्य मणि है—अष्टपहलु, सुपरिष्कृत, स्वच्छ, पारदर्शी, निर्मल, सभी गुणों से समृद्ध! और उसमें एक नीला, पीला, लाल, सफेद या पीला धागा पिरोया गया है।’

    उसी तरह, आनन्द, जब बोधिसत्व अपनी माँ के गर्भ में अवतरित हुए, तब बोधिसत्व की माँ तो माता को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं हुआ। बोधिसत्व की माँ सुखी और थकान रहित ही रहती। और, बोधिसत्व की माँ अपनी गर्भ में स्थित बोधिसत्व को उसके समस्त अंगों और परिपूर्ण इंद्रियों के साथ देखा।’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  6. (सात दिन बाद मृत्यु:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, बोधिसत्व के जन्म के सात दिन बाद बोधिसत्व की माँ का देहांत हुआ, और वे तुषित लोक में उत्पन्न हुई।’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ। 3

  1. (दस माह:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जहाँ अन्य गर्भवती स्त्रियाँ नौ महीनों में संतान को जन्म देती हैं, किन्तु बोधिसत्व की माँ के बारे में यह नहीं देखा गया। बोधिसत्व की माँ ने बोधिसत्व को ठीक दस महीनों के बाद जन्म दिया।’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  2. (खड़े होकर जन्म:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जहाँ अन्य महिलाएँ बैठकर या लेटकर बच्चे को जन्म देती हैं, किन्तु बोधिसत्व की माँ के बारे में यह नहीं देखा गया। बोधिसत्व की माँ ने बोधिसत्व को खड़े होकर जन्म दिया।’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  3. (देवताओं का स्वागत:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व ने अपनी माँ का गर्भ छोड़ा, तो सर्वप्रथम देवताओं ने उन्हें ग्रहण किया, और फिर मानवों ने।’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  4. (पृथ्वी से अछूते:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व ने अपनी माँ का गर्भ छोड़ा, तो उन्होंने पृथ्वी को नहीं छूआ, बल्कि चार देवपुत्र उन्हें ग्रहण किया और माँ के सामने खड़ा किया, (कहते हुए) ‘हे रानी, प्रसन्न हो। आप को एक महातेजस्वी महाप्रभावशाली पुत्र जन्मा है!’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  5. (निर्मल जन्म:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व ने अपनी माँ का गर्भ छोड़ा, तो उन्होंने उसे बेदाग, तरल पदार्थ से रहित, बलगम से रहित, रक्त से रहित, लसीका से रहित छोड़ा — शुद्ध, अत्यंत शुद्ध!

    जैसे, काशी वस्त्र पर रत्न रखा जाए, तो न रत्न वस्त्र को मैला करेगा, न ही वस्त्र रत्न को। ऐसा क्यों? दोनों की शुद्धता के कारण! उसी तरह, आनन्द, जब बोधिसत्व ने अपनी माँ का गर्भ छोड़ा, तो उन्होंने उसे बेदाग, तरल पदार्थ से रहित, बलगम से रहित, रक्त से रहित, लसीका से रहित छोड़ा — शुद्ध, अत्यंत शुद्ध!’… इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  6. (दो जल धाराएँ:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व ने अपनी माँ का गर्भ छोड़ा, तो आकाश से पानी की दो धाराएं प्रकट हुईं—एक ठंडी, और दूसरी गर्म—बोधिसत्व और उनकी माँ को नहलाने-धुलाने के लिए!’ … इसे भी मैं… अद्भुत गुण मानता हूँ।

  7. (सात कदम और सिंहनाद:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘जैसे ही बोधिसत्व का जन्म हुआ, वे पृथ्वी पर अपने समतल पैरों के बल स्थिर खड़े हुए, और उत्तर-दिशा की ओर मुख कर के सात कदम चले। उनके ऊपर एक सफ़ेद छत्र नज़र आता था। और तब, उन्होंने सभी दिशाओं को निहारने के बाद एक ऋषभ-वाणी (भव्य घोषणा) की:

'मैं लोक में अग्र हूँ!
मैं लोक में ज्येष्ठ हूँ!
मैं लोक में श्रेष्ठ हूँ!
यह मेरा अंतिम जन्म है,
अब कोई पुनर्जन्म नहीं होगा!'

… इसे भी मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ। 4

  1. (जन्म के समय प्रकाश:) भन्ते, मैंने भगवान के सम्मुख यह (भी) सुना है, और ग्रहण किया है कि—‘आनन्द, जब बोधिसत्व स्मृतिमान और सचेत रहते हुए ‘तुषित देवलोक’ से च्युत होकर अपनी माँ के गर्भ छोड़ा, तब (भी) देवताओं की दिव्य तेज से भी परे एक महा तेज, असीम तेज उत्पन्न हुआ, जो देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा, और प्रजा से भरे इस लोक में फैल गया।

    यहाँ तक कि असीम अंधकार, घोर अंधकार में पड़े अन्तर ब्रह्मांडिय स्थलों पर भी, जहाँ सर्वशक्तिशाली सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश तक नहीं पहुँच पाता, 2 वहाँ भी देवताओं की दिव्य तेज से परे एक महा तेज, असीम तेज फैल गया। और वहाँ जन्म लिए सत्वों ने उस तेज में एक-दूसरे को पहली बार देखा, तो उन्हें लगा, ‘अरे! यहाँ अन्य सत्वों ने भी जन्म लिया हैं!’ और उस महा तेज, असीम तेज में ये दस हज़ार ब्रह्मांड कंपित हुए, प्रकंपित हुए, थरथराएँ।’… —इसे (भी), भंते, मैं भगवान का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण मानता हूँ।

भगवान का एक और आदर्श गुण

“(भगवान ने कहा—) “तब, ठीक है, आनन्द, तुम तथागत के इस आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण को भी धारण करो।

  • आनन्द, तथागत को वेदनाएँ पता चलते हुए उत्पन्न होती हैं, पता चलते हुए रुकती हैं, और पता चलते हुए विलुप्त होती हैं।
  • तथागत को संज्ञाएँ पता चलते हुए उत्पन्न होती हैं, पता चलते हुए रुकती हैं, और पता चलते हुए विलुप्त होती हैं।
  • तथागत को वितर्क पता चलते हुए उत्पन्न होते हैं, पता चलते हुए रुकते हैं, और पता चलते हुए विलुप्त होते हैं।

आनन्द, इसे भी तुम तथागत का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण समझो।”

(आनन्द ने कहा—)

  1. “भन्ते, तथागत को वेदनाएँसंज्ञाएँवितर्क पता चलते हुए उत्पन्न होते हैं, पता चलते हुए रुकते हैं, और पता चलते हुए विलुप्त होते हैं। भन्ते, इसे भी मैं तथागत का एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण धारण करता हूँ।”

आयुष्मान आनन्द ने ऐसा कहा। शास्ता ने अनुमोदन किया। प्रसन्न होकर भिक्षुओं ने आयुष्मान आनन्द के कथन का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. यह बात ‘महापदानसुत्त’ के संदर्भ में है। यह वही सूत्र है जहाँ हमें सबसे पहले यह पता चलता है कि बुद्ध की माता का नाम माया था। लेकिन महापदानसुत्त और इस सूत्र में एक अंतर है। महापदानसुत्त इस बात पर जोर देता है कि ‘बुद्धत्व’ एक सामान्य प्राकृतिक नियम (धम्मता) है, जो युगों-युगों से एक तय चक्र की तरह बार-बार दोहराया जाता है। इसके विपरीत, यह वर्तमान सूत्र पूरी तरह से श्रद्धा और भक्तिभाव से भरा हुआ प्रतीत होता है। यह किसी बड़े ब्रह्मांडीय चक्र की बात नहीं करता, बल्कि सीधे तौर पर हमारे गौतम बुद्ध के व्यक्तिगत गुणों और उनकी अनोखी खूबियों को सामने रखता है। ↩︎

  2. अट्ठकथा के अनुसार, यह लोक अन्धकारतिमिसा है, जो एक ठंडी नर्क है। पुराणों में भी इसी के समानान्तर अन्धतामिस्र का उल्लेख आता है। ↩︎ ↩︎

  3. इस घटना का उल्लेख उदान ५.२ में भी मिलता है। एक शिशु के लिए माँ का जाना सबसे बड़ी हानि होती है। लेकिन यहाँ एक दूसरी माँ खड़ी थी। रानी महामाया की बहन, महापजापति गोतमी, आगे आईं। उन्होंने अपने सगे पुत्र नन्द को दासियों को सौंपकर, बोधिसत्व को स्वयं अपना दूध पिलाया। यह वह स्नेह था जिसने सिद्धार्थ को कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी। ↩︎

  4. यह पूरा प्रसंग यह इशारा करता है कि बुद्ध बनना उनके जन्म के समय से ही पहले से तय था। लेकिन यह बात बाकी के अन्य सूत्रों से बिल्कुल उलट है। बाकी सूत्रों में यह बताया गया है कि बुद्ध ने यह पद बहुत कठिन साधना, संघर्ष और अपने खुद के प्रयासों से हासिल किया था।

    खैर, यहाँ जो बातें लिखी हैं, उनके छिपे हुए अर्थ ये हैं:

    • ‘अपने पैरों पर मजबूती से खड़े होना’ इस बात का प्रतीक है कि वे किसी बाहरी शक्ति के बिना, अपने खुद के प्रयासों से बुद्धत्व (सम्यक-संबोधि) प्राप्त करेंगे।
    • ‘उत्तर दिशा’ की ओर देखने का मतलब केवल एक दिशा नहीं है। ‘उत्तर’ का एक अर्थ ‘पार’ या ‘परे’ भी होता है; यह भविष्यवाणी करता है कि वे निर्वाण को प्राप्त करेंगे।
    • ‘सात कदम चलना’ इस बात का प्रतीक है कि वे जन्म और मृत्यु के इस विशाल चक्र (संसार) को पार कर जाएंगे। विशेष रूप से बौद्ध धर्म के ‘सात बोध्यंग’ (स्मृति, धर्म-विचय, वीर्य, प्रीति, प्रश्रब्धि, समाधि, उपेक्षा) को विकसित करके वे इसे पार करेंगे।
    • ‘सफ़ेद छत्र’ पवित्रता और राजशाही का प्रतीक है (जैसा कि दीघनिकाय १४, सुत्तनिपात ३.११ और यहाँ तक कि विष्णु पुराण में भी मिलता है)। इसके अलावा, संयुत्तनिकाय ४१.५ के अनुसार सफेद छत्र ‘विमुक्ति’ का प्रतीक है।
    • ‘सभी दिशाओं को देखना’ इस बात का प्रतीक है कि उनके पास ‘संपूर्ण ज्ञान’ होगा।
     ↩︎

पालि

१९७. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। अथ खो सम्बहुलानं भिक्खूनं पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्‍कन्तानं उपट्ठानसालायं सन्‍निसिन्‍नानं सन्‍निपतितानं अयमन्तराकथा उदपादि – ‘‘अच्छरियं, मित्रों, अब्भुतं, मित्रों, तथागतस्स महिद्धिकता महानुभावता, यत्र हि नाम तथागतो अतीते बुद्धे परिनिब्बुते छिन्‍नपपञ्‍चे छिन्‍नवटुमे परियादिन्‍नवट्टे सब्बदुक्खवीतिवत्ते जानिस्सति अनुस्सरिस्सति जानिस्सति (क॰) – ‘एवंजच्‍चा ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंनामा ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंगोत्ता ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंसीला ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंधम्मा ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंपञ्‍ञा ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंविहारी ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपि, ‘एवंविमुत्ता ते भगवन्तो अहेसुं’ इतिपी’’ति! एवं वुत्ते, आयस्मा आनन्दो ते भिक्खू एतदवोच – ‘‘अच्छरिया चेव, मित्रों, तथागता अच्छरियधम्मसमन्‍नागता च; अब्भुता चेव, मित्रों, तथागता अब्भुतधम्मसमन्‍नागता चा’’ति। अयञ्‍च हिदं तेसं भिक्खूनं अन्तराकथा विप्पकता होति।

१९८. अथ खो भगवा सायन्हसमयं पटिसल्‍लाना वुट्ठितो येनुपट्ठानसाला तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा पञ्‍ञत्ते आसने निसीदि । निसज्‍ज खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘काय नुत्थ, भिक्खवे, एतरहि कथाय सन्‍निसिन्‍ना, का च पन वो अन्तराकथा विप्पकता’’ति? ‘‘इध, भन्ते, अम्हाकं पच्छाभत्तं पिण्डपातपटिक्‍कन्तानं उपट्ठानसालायं सन्‍निसिन्‍नानं सन्‍निपतितानं अयमन्तराकथा उदपादि – ‘अच्छरियं, मित्रों, अब्भुतं, मित्रों, तथागतस्स महिद्धिकता महानुभावता, यत्र हि नाम तथागतो अतीते बुद्धे परिनिब्बुते छिन्‍नपपञ्‍चे छिन्‍नवटुमे परियादिन्‍नवट्टे सब्बदुक्खवीतिवत्ते जानिस्सति – एवंजच्‍चा ते भगवन्तो अहेसुं इतिपि, एवंनामा… एवंगोत्ता… एवंसीला… एवंधम्मा.. एवंपञ्‍ञा… एवंविहारी… एवंविमुत्ता ते भगवन्तो अहेसुं इतिपी’ति! एवं वुत्ते, भन्ते, आयस्मा आनन्दो अम्हे एतदवोच – ‘अच्छरिया चेव, मित्रों, तथागता अच्छरियधम्मसमन्‍नागता च, अब्भुता चेव, मित्रों, तथागता अब्भुतधम्मसमन्‍नागता चा’ति। अयं खो नो, भन्ते, अन्तराकथा विप्पकता; अथ भगवा अनुप्पत्तो’’ति।

१९९. अथ खो भगवा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि – ‘‘तस्मातिह तं, आनन्द, भिय्योसोमत्ताय पटिभन्तु तथागतस्स अच्छरिया अब्भुतधम्मा’’ति अब्भुता धम्माति (?)।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सतो सम्पजानो, आनन्द, बोधिसत्तो तुसितं कायं उपपज्‍जी’ति। यम्पि, भन्ते, सतो सम्पजानो बोधिसत्तो तुसितं कायं उपपज्‍जि इदंपाहं , भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सतो सम्पजानो, आनन्द, बोधिसत्तो तुसिते काये अट्ठासी’ति। यम्पि, भन्ते, सतो सम्पजानो बोधिसत्तो तुसिते काये अट्ठासि इदंपाहं इदंपहं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰), भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

२००. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यावतायुकं, आनन्द, बोधिसत्तो तुसिते काये अट्ठासी’ति। यम्पि, भन्ते, यावतायुकं बोधिसत्तो तुसिते काये अट्ठासि इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सतो सम्पजानो, आनन्द, बोधिसत्तो तुसिता, काया चवित्वा मातुकुच्छिं ओक्‍कमी’ति। यम्पि, भन्ते , सतो सम्पजानो बोधिसत्तो तुसिता काया चवित्वा मातुकुच्छिं ओक्‍कमि इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

२०१. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो तुसिता काया चवित्वा मातुकुच्छिं ओक्‍कमति, अथ सदेवके लोके समारके सब्रह्मके सस्समणब्राह्मणिया पजाय सदेवमनुस्साय अप्पमाणो उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्‍कम्मेव देवानं देवानुभावं। यापि ता लोकन्तरिका अघा असंवुता अन्धकारा अन्धकारतिमिसा, यत्थपिमे चन्दिमसूरिया एवंमहिद्धिका एवंमहानुभावा आभाय नानुभोन्ति तत्थपि अप्पमाणो उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्‍कम्मेव देवानं देवानुभावं। येपि तत्थ सत्ता उपपन्‍ना तेपि तेनोभासेन अञ्‍ञमञ्‍ञं सञ्‍जानन्ति – अञ्‍ञेपि किर, भो, सन्ति सत्ता इधूपपन्‍नाति। अयञ्‍च दससहस्सी लोकधातु सङ्कम्पति सम्पकम्पति सम्पवेधति अप्पमाणो च उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्‍कम्मेव देवानं देवानुभाव’न्ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

२०२. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्‍कन्तो होति, चत्तारो देवपुत्ता चतुद्दिसं आरक्खाय उपगच्छन्ति – मा नं बोधिसत्तं वा बोधिसत्तमातरं वा मनुस्सो वा अमनुस्सो वा कोचि वा विहेठेसी’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

२०३. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्‍कन्तो होति, पकतिया सीलवती बोधिसत्तमाता होति विरता पाणातिपाता विरता अदिन्‍नादाना विरता कामेसुमिच्छाचारा विरता मुसावादा विरता सुरामेरयमज्‍जपमादट्ठाना’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा , आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्‍कन्तो होति, न बोधिसत्तमातु पुरिसेसु मानसं उप्पज्‍जति कामगुणूपसंहितं, अनतिक्‍कमनीया च बोधिसत्तमाता होति केनचि पुरिसेन रत्तचित्तेना’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्‍कन्तो होति, लाभिनी बोधिसत्तमाता होति पञ्‍चन्‍नं कामगुणानं। सा पञ्‍चहि कामगुणेहि समप्पिता समङ्गीभूता परिचारेती’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

२०४. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्‍कन्तो होति, न बोधिसत्तमातु कोचिदेव आबाधो उप्पज्‍जति; सुखिनी बोधिसत्तमाता होति अकिलन्तकाया; बोधिसत्तञ्‍च बोधिसत्तमाता तिरोकुच्छिगतं पस्सति सब्बङ्गपच्‍चङ्गं अहीनिन्द्रियं। सेय्यथापि, आनन्द, मणि वेळुरियो सुभो जातिमा अट्ठंसो सुपरिकम्मकतो। तत्रास्स सुत्तं आवुतं नीलं वा पीतं वा लोहितं वा ओदातं वा पण्डुसुत्तं वा। तमेनं चक्खुमा पुरिसो हत्थे करित्वा पच्‍चवेक्खेय्य – अयं खो मणि वेळुरियो सुभो जातिमा अट्ठंसो सुपरिकम्मकतो, तत्रिदं सुत्तं आवुतं नीलं वा पीतं वा लोहितं वा ओदातं वा पण्डुसुत्तं वाति। एवमेव खो, आनन्द, यदा बोधिसत्तो मातुकुच्छिं ओक्‍कन्तो होति , न बोधिसत्तमातु कोचिदेव आबाधो उप्पज्‍जति; सुखिनी बोधिसत्तमाता होति अकिलन्तकाया; बोधिसत्तञ्‍च बोधिसत्तमाता तिरोकुच्छिगतं पस्सति सब्बङ्गपच्‍चङ्गं अहीनिन्द्रिय’न्ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

२०५. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सत्ताहजाते, आनन्द, बोधिसत्ते बोधिसत्तमाता कालं करोति, तुसितं कायं उपपज्‍जती’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यथा खो पनानन्द, अञ्‍ञा इत्थिका नव वा दस वा मासे गब्भं कुच्छिना परिहरित्वा विजायन्ति, न हेवं बोधिसत्तं बोधिसत्तमाता विजायति। दसेव मासानि बोधिसत्तं बोधिसत्तमाता कुच्छिना परिहरित्वा विजायती’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यथा खो पनानन्द, अञ्‍ञा इत्थिका निसिन्‍ना वा निपन्‍ना वा विजायन्ति, न हेवं बोधिसत्तं बोधिसत्तमाता विजायति। ठिताव बोधिसत्तं बोधिसत्तमाता विजायती’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा , आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, देवा नं पठमं पटिग्गण्हन्ति पच्छा मनुस्सा’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

२०६. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, अप्पत्तोव बोधिसत्तो पथविं होति, चत्तारो नं देवपुत्ता पटिग्गहेत्वा मातु पुरतो ठपेन्ति – अत्तमना, देवि, होहि; महेसक्खो ते पुत्तो उप्पन्‍नो’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, विसदोव निक्खमति अमक्खितो उदेन उद्देन (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) अमक्खितो सेम्हेन अमक्खितो रुहिरेन अमक्खितो केनचि असुचिना सुद्धो विसदो विसुद्धो (स्या॰)। सेय्यथापि, आनन्द, मणिरतनं कासिके वत्थे निक्खित्तं नेव मणिरतनं कासिकं वत्थं मक्खेति नापि कासिकं वत्थं मणिरतनं मक्खेति। तं किस्स हेतु? उभिन्‍नं सुद्धत्ता। एवमेव खो, आनन्द, यदा बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, विसदोव निक्खमति अमक्खितो उदेन अमक्खितो सेम्हेन अमक्खितो रुहिरेन अमक्खितो केनचि असुचिना सुद्धो विसदो’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, द्वे उदकस्स धारा अन्तलिक्खा पातुभवन्ति – एका सीतस्स, एका उण्हस्स; येन बोधिसत्तस्स उदककिच्‍चं करोन्ति मातु चा’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

२०७. ‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘सम्पतिजातो, आनन्द, बोधिसत्तो समेहि पादेहि पथवियं पतिट्ठहित्वा उत्तराभिमुखो सत्तपदवीतिहारेन गच्छति, सेतम्हि छत्ते अनुधारियमाने, सब्बा च दिसा विलोकेति, आसभिञ्‍च वाचं भासति – अग्गोहमस्मि लोकस्स, जेट्ठोहमस्मि लोकस्स, सेट्ठोहमस्मि लोकस्स। अयमन्तिमा जाति , नत्थि दानि पुनब्भवो’ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमि।

‘‘सम्मुखा मेतं, भन्ते, भगवतो सुतं, सम्मुखा पटिग्गहितं – ‘यदा, आनन्द, बोधिसत्तो मातुकुच्छिम्हा निक्खमति, अथ सदेवके लोके समारके सब्रह्मके सस्समणब्राह्मणिया पजाय सदेवमनुस्साय अप्पमाणो उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्‍कम्मेव देवानं देवानुभावं। यापि ता लोकन्तरिका अघा असंवुता अन्धकारा अन्धकारतिमिसा यत्थपिमे चन्दिमसूरिया एवंमहिद्धिका एवंमहानुभावा आभाय नानुभोन्ति तत्थपि अप्पमाणो उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्‍कम्मेव देवानं देवानुभावं। येपि तत्थ सत्ता उपपन्‍ना तेपि तेनोभासेन अञ्‍ञमञ्‍ञं सञ्‍जानन्ति – अञ्‍ञेपि किर, भो, सन्ति सत्ता इधूपपन्‍नाति। अयञ्‍च दससहस्सी लोकधातु सङ्कम्पति सम्पकम्पति सम्पवेधति, अप्पमाणो च उळारो ओभासो लोके पातुभवति अतिक्‍कम्मेव देवानं देवानुभाव’न्ति। यम्पि, भन्ते…पे॰… इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमी’’ति।

२०८. ‘‘तस्मातिह त्वं, आनन्द, इदम्पि तथागतस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेहि। इधानन्द, तथागतस्स विदिता वेदना उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति; विदिता सञ्‍ञा उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति; विदिता वितक्‍का उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। इदम्पि खो, त्वं, आनन्द, तथागतस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेही’’ति। ‘‘यम्पि, भन्ते, भगवतो विदिता वेदना उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति; विदिता सञ्‍ञा… विदिता वितक्‍का उप्पज्‍जन्ति, विदिता उपट्ठहन्ति, विदिता अब्भत्थं गच्छन्ति। इदंपाहं, भन्ते, भगवतो अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमी’’ति।

इदमवोच आयस्मा आनन्दो। समनुञ्‍ञो सत्था अहोसि; अत्तमना च ते भिक्खू आयस्मतो आनन्दस्स भासितं अभिनन्दुन्ति।

अच्छरियअब्भुतसुत्तं निट्ठितं ततियं।