
बाकुल भंते का राज
सूत्र परिचय
भन्ते बक्कुल (या बाकुल) बौद्ध धर्म के एक असाधारण भिक्षु थे, जिन्हें उनकी कठिन तपस्या और 160 वर्ष की लंबी आयु के लिए जाना जाता है। वे बौद्ध संघ में ‘आरोग्यता’ (उत्तम स्वास्थ्य) के प्रतीक थे, क्योंकि वे अपने पूरे जीवन में कभी बीमार नहीं पड़े। उन्होंने अपने जीवन के 80 वर्ष गृहस्थ के रूप में और अंतिम 80 वर्ष एक अरहंत भिक्षु के रूप में बिताए।
शुरुआती बौद्ध सूत्रों (EBT) और बाद की परंपराओं के बीच उनके चरित्र को लेकर एक बड़ा अंतर दिखता है। ‘थेरगाथा ३.३’ जैसे शुरुआती गाथाओं में भन्ते बक्कुल की गाथा बेहद सरल, सौम्य और इस प्रकार की किसी भी कठोरता से पूरी तरह मुक्त हैं। वे वहाँ एक सहज और सादगी पसंद भिक्षु के रूप में नजर आते हैं।
इसके विपरीत, बाद की अट्टकथाओं में उन्हें अत्यंत कठिन नियमों और चरम तपस्या के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है। इस सुत्त में बुद्ध के निवास स्थल का जिक्र न होना और बक्कुल की अत्यधिक वृद्धावस्था का वर्णन यह साबित करता है कि यह सुत्त बुद्ध के समय का नहीं है। परंपरा के अनुसार, इसे बुद्ध के महापरिनिर्वाण के 100 साल बाद ‘द्वितीय बौद्ध संगीति’ में वरिष्ठ भिक्षुओं द्वारा जोड़ा गया था।
यह अंतर दर्शाता है कि बुद्ध के जाने के एक सदी बाद बौद्ध संघ में कठोर तपस्या का समर्थक एक खास धड़ा उभर चुका था। इस समूह ने भन्ते बक्कुल की लंबी उम्र और प्रतिष्ठा को देखते हुए उन्हें अपनी विचारधारा का आदर्श बना लिया और बाद के ग्रंथों में उनकी तपस्या को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।
हिन्दी
ऐसा मैंने सुना — एक समय आयुष्मान बाकुल राजगृह के वेणुवन गिलहरियों के परिसर में विहार कर रहे थे।
तब, निर्वस्त्र (तपस्वी) कश्यप, जो आयुष्मान बाकुल का गृहस्थी जीवन का मित्र था, आयुष्मान बाकुल के पास गया। और जाकर आयुष्मान बाकुल से हालचाल पूछा, और मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर, निर्वस्त्र कश्यप ने आयुष्मान बाकुल से कहा:
“मित्र बाकुल, तुम्हें प्रव्रज्यित हुए कितना समय हुआ?”
“प्रव्रज्यित हुए अस्सी वर्ष हो चुके हैं, मित्र कश्यप।”
“किन्तु, मित्र बाकुल, इन अस्सी वर्षों में तुमने कितनी बार मैथुन-धर्म का सेवन (=संभोग) किया?”
“मित्र कश्यप, तुम्हें ऐसा नहीं पूछना चाहिए कि ‘इन अस्सी वर्षों में तुमने कितनी बार संभोग किया?’ बल्कि तुम्हें ऐसा पूछना चाहिए कि ‘मित्र बाकुल, इन अस्सी वर्षों में तुम्हें कितनी बार कामुक-संज्ञा (कामुक नजरिया) उत्पन्न हुई?’” 1
“तब, मित्र बाकुल, इन अस्सी वर्षों में तुम्हें कितनी बार कामुक-संज्ञा उत्पन्न हुई?”
अकुशल संज्ञा
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी कामुक-संज्ञा का उत्पन्न होना याद नहीं आता।”
‘आयुष्मान बाकुल को अपने अस्सी वर्षों में एक बार भी कामुक-संज्ञा का उत्पन्न होना याद न आना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं। 2
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी दुर्भावनापूर्ण-संज्ञा का उत्पन्न होना भी याद नहीं आता।”
‘आयुष्मान बाकुल को अपने अस्सी वर्षों में एक बार भी दुर्भावनापूर्ण-संज्ञा का उत्पन्न होना याद न आना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी हिंसात्मक-संज्ञा का उत्पन्न होना भी याद नहीं आता।”
‘आयुष्मान बाकुल को अपने अस्सी वर्षों में एक बार भी हिंसात्मक-संज्ञा का उत्पन्न होना याद न आना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
अकुशल विचार
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी कामुक-विचार (“वितक्क”) का उत्पन्न होना भी याद नहीं आता।”
‘आयुष्मान बाकुल को अपने अस्सी वर्षों में एक बार भी कामुक विचार का उत्पन्न होना याद न आना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी दुर्भावनापूर्ण-विचार का उत्पन्न होना भी याद नहीं आता।”
‘आयुष्मान बाकुल को अपने अस्सी वर्षों में एक बार भी दुर्भावनापूर्ण विचार का उत्पन्न होना याद न आना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी हिंसात्मक-विचार का उत्पन्न होना भी याद नहीं आता।” 3
‘आयुष्मान बाकुल को अपने अस्सी वर्षों में एक बार भी हिंसात्मक विचार का उत्पन्न होना याद न आना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
कठोर नियम
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी गृहस्थ से चीवर स्वीकारना भी याद नहीं आता।” 4
‘आयुष्मान बाकुल को अपने अस्सी वर्षों में एक बार भी गृहस्थ से चीवर स्वीकारना याद न आना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी चाकू से चीवर को फाड़ना/काटना भी याद नहीं आता।” 5
‘आयुष्मान बाकुल को अपने अस्सी वर्षों में एक बार भी चाकू से चीवर को काटना याद न आना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी चीवर को सुई से सिलना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी चीवर को रंगना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी कठिन चीवर को सिलना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी सहब्रह्मचारी के लिए चीवर सिलने के समय घूमना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी (भोज इत्यादि का) निमंत्रण स्वीकारना भी याद नहीं आता।”
चित्त उत्पन्न होना
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी इस प्रकार का चित्त उत्पन्न (मन में) होना भी याद नहीं आता — ‘अरे! काश मुझे कोई निमंत्रित करे!’”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी किसी के घर में बैठना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी किसी के घर में भोजन करना भी याद नहीं आता।”
महिलाओं से दूरी
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी महिला के विशेष विवरण की छाप (“निमित्त”) ग्रहण होना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी महिला को धर्म बताना, भले ही चार वाक्य गाथा ही हो, भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी भिक्षुणियों के परिसर में जाना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी भिक्षुणियों को धर्म बताना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी शिक्षमाणाओं को धर्म बताना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी श्रामणेरियों को धर्म बताना भी याद नहीं आता।”
सबसे दूरी
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी (किसी को) प्रव्रज्या देना भी याद नहीं आता।” 6
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी (किसी को) उपसंपदा देना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी (किसी भिक्षु को) निश्रय देना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी श्रामणेर से सेवा लेना भी याद नहीं आता।”
आराम के जीवन का त्याग
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी जन्ताघर (सॉना) में नहाना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी स्नान-चूर्ण से नहाना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी सहब्रह्मचारियों से मालिश चाहना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी बीमार होना, भले ही एक गाय से दूध दोहे जाने के समय के लिए ही हो, याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी औषधि दी गयी हो, भले ही एक टुकड़ा हल्दी ही हो, याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी (पीठ टिकाने के लिए) मंच पर पीठ टिकाना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी पलंग पर सोना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, इन अस्सी वर्षों की प्रव्रज्या में मुझे एक बार भी वर्षा के लिए किसी गाँव के निवास में वर्षावास लेना भी याद नहीं आता।”
“मित्र, मैंने एक सप्ताह तक इस देश की भिक्षा ऋणी के तौर पर खायी; और आठवे दिन मुझे प्रत्यक्ष-ज्ञान (“अञ्ञा”) उत्पन्न हुआ ।”
‘आयुष्मान बाकुल ने एक सप्ताह तक इस देश की भिक्षा ऋणी के तौर पर खाना; और आठवे दिन उन्हें प्रत्यक्ष-ज्ञान उत्पन्न होना’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
निर्वस्त्र कश्यप की दीक्षा और अरहंतपद
“मित्र बाकुल, मुझे इस धम्म-विनय में प्रव्रज्या प्राप्त हो, उपसंपदा मिले।”
तब उस निर्वस्त्र कश्यप को इस धम्म-विनय में प्रव्रज्या प्राप्त हुई और उपसंपदा मिली।
तब उपसंपदा पाकर अधिक समय नहीं बीता था, जब आयुष्मान कश्यप अकेले एकांतवास लेकर अप्रमत्त, तत्पर और समर्पित होकर विहार करने लगे। तब उन्होंने जल्द ही इसी जीवन में स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर, ब्रह्मचर्य की उस सर्वोच्च मंजिल पर पहुँचकर स्थित हुए, जिस ध्येय से कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होते हैं। उन्हें पता चला—‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’
इस तरह, आयुष्मान कश्यप (अनेक) अर्हन्तों में एक हुए।
आयुष्मान बक्कुल का परिनिर्वाण
तब अधिक समय नहीं बीता था, जब आयुष्मान बाकुल चाबी लेकर एक के बाद एक कई विहारों में गए, कहते हुए, “आओ, आयुष्मानों, आओ, आयुष्मानों! आज मेरा परिनिर्वाण होगा।”
‘आयुष्मान बाकुल के द्वारा चाबी लेकर एक के बाद एक कई विहारों में जाना, कहते हुए, “आओ, आयुष्मानों, आओ, आयुष्मानों! आज मेरा परिनिर्वाण होगा।”’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
और, आयुष्मान बाकुल भिक्षुसंघ के मध्य बैठकर परिनिर्वृत हुए।
‘आयुष्मान बाकुल का भिक्षुसंघ के मध्य बैठकर परिनिर्वृत होना।"’ — इसे हम आयुष्मान बाकुल के एक आश्चर्यजनक और अद्भुत गुण के रूप में धारण करते हैं।
सुत्र समाप्त।
दूसरे शब्दों में, आयुष्मान बक्कुल प्रश्न के मापदंड को और अधिक कठोर बनाते हुए उसे एक अरहंत के पूर्णतः मुक्त चित्त के सूक्ष्म स्तर पर ले आते हैं। वे प्रेरित करते हैं कि शारीरिक संभोग की बात तो छोड़ ही दी जाए, बल्कि यह पूछा जाना चाहिए कि क्या कभी चित्त में कोई कामुक नजरिया या कामुक दृष्टिकोण या झुकाव भी उत्पन्न हुआ है। ↩︎
अट्टकथा के अनुसार, ये उत्तर ‘द्वितीय बौद्ध संगीति’ में कठोर नियमों के समर्थक विजयी धड़े द्वारा जोड़े गए थे, जो भन्ते बक्कुल की कठिन तपस्या की प्रशंसा करते हैं। यह बात कई ठोस तर्कों से साबित होती है:
- परंपरा की सत्यता: आमतौर पर टीकाकार किसी भी हिस्से को बुद्ध के समय का ही बताना चाहते हैं। ऐसे में अगर वे खुद कह रहे हैं कि यह हिस्सा बाद में जोड़ा गया, तो इसका मतलब है कि यह एक सच्ची और प्रामाणिक परंपरा पर आधारित है।
- बहुवचन का प्रयोग: सुत्त के इन उत्तरों में बहुवचन ‘हम’ का इस्तेमाल किया गया है, जो किसी एक व्यक्ति के बजाय भिक्षुओं के समूह की ओर इशारा करता है।
- प्रत्यक्ष कथन का अभाव: इन उत्तरों और बक्कुल के बयानों के अंत में पालि व्याकरण का ‘ति’ शब्द नहीं लगा है, जो यह दर्शाता है कि ये सीधे तौर पर कहे गए मूल वाक्य नहीं हैं।
- बातचीत के बाद भी जारी रहना: निर्वस्त्र तपस्वी कश्यप के साथ बातचीत पूरी तरह खत्म हो जाने के बाद भी ये उत्तर सूत्र में आगे जारी रहते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि ये उत्तर चीनी भाषा के समानांतर ग्रंथों में भी मिलते हैं। इससे यह पता चलता है कि जब हम किसी सुत्त के अलग-अलग संस्करणों की तुलना करते हैं, तो हम केवल उसी बिंदु तक पीछे जा सकते हैं जहाँ से ये ग्रंथ आपस में अलग हुए थे—और यह विभाजन ‘द्वितीय बौद्ध संगीति’ के कुछ समय बाद हुआ था। इसलिए, अलग-अलग संस्करणों में दिखने वाली एक जैसी बात भी वास्तव में बुद्ध के महापरिनिर्वाण के एक सदी या उससे बाद जोड़ी गई हो सकती है। ↩︎
कामुकता, दुर्भावना और हिंसा — ये तीन मिथ्या-संकल्प माने जाते हैं। उसके विपरीत सम्यक-संकल्प भी तीन होते हैं — निष्कामता (संन्यास), दुर्भावना-विहीनता, और अहिंसा। ↩︎
विमुक्त चित्त की पवित्रता बताने के बाद, आयुष्मान बक्कुल अपने भिक्षु जीवन के रहन-सहन और आचरण से जुड़ी कुछ और बातें बताते हैं। याद रखें कि ये बातें भिक्षुओं के लिए कोई नैतिक रूप से गलत या हीन कर्म नहीं हैं, बल्कि बस यह दिखाती हैं कि वे कुछ धुतांग नियमों और अपने बनाए कठोर नियमों का कितनी सख्ती से पालन करते थे।
उदाहरण के लिए, किसी गृहस्थ व्यक्ति से दान में चीवर लेने का मतलब यह माना जाता था कि आप अमीर दाताओं के पैसों का सुख भोग रहे हैं। यही वजह थी कि कड़े धुतांग नियमों का पालन करने वाले भिक्षु केवल लोगों द्वारा फेंके गए फटे-पुराने चिथड़ों से बने कपड़े ही पहनते थे। इसकी तुलना हम आयुष्मान आनंद भंते (मज्झिमनिकाय ५२, अंगुत्तरनिकाय ११ इत्यादि) से कर सकते हैं, जहाँ उन्होंने समझाया था कि जब वे अच्छे कपड़े स्वीकार करते थे, तो उन्हें भिक्षुओं के बीच आपस में बांटकर और बार-बार इस्तेमाल करके काम में लाया जाता था।
यह पूरी बात बौद्ध धर्म की दूसरी संगीति के समय की बहस को दर्शाती है। उस समय भिक्षुओं का संघ दो गुटों में बंट गया था। पहला गुट “कड़े नियम वालों” का था जो भिक्षुओं के लिए बहुत सख्त और अल्पेच्छुक जीवन चाहते थे, और दूसरा गुट “नरम नियम वालों” का था जो अनुशासन में थोड़ी ढील या छूट चाहते थे। इस बैठक में दस जरूरी नियमों पर फैसला हुआ जो कड़े नियम वालों के पक्ष में गया, और इनमें सबसे महत्वपूर्ण फैसला यह था कि भिक्षु पैसों का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
इस पूरी स्थिति में बक्कुल का रवैया इतना ज्यादा सख्त था कि अगर सभी भिक्षु उसका पालन करने लगते, तो संघ का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता। बक्कुल की यह सख्ती आयुष्मान महाकश्यप भंते (जो धुतांगधारी भिक्षुओं में सबसे अग्र थे) से भी कहीं ज्यादा थी, और उनके इस बेहद कड़े स्वभाव की तुलना परोक्ष रूप से आयुष्मान आनंद भंते के करुणावान, मिलनसार और दूसरों की सुविधा का ध्यान रखने वाले स्वभाव से की गई है। ↩︎
ध्यान दें कि इससे आगे अधिकांश बातें इस सूत्र के समानान्तर सूत्र (मध्यमआगम ३४) में नहीं मिलती। शायद यह सूची समय और थेरवादी कठोरता के साथ बढ़ती गयी होगी। हम भी आगे बार-बार के अतिरिक्त दोहराव को यहीं स्थगित करते हैं। ↩︎
ऐसा प्रतीत होता है कि आयुष्मान बक्कुल कड़े नियमों का पालन करने के कारण शिष्य बनाने और उनके प्रति कोई भी ज़िम्मेदारी उठाने से बचते थे; यही वजह रही होगी कि उन्होंने कभी किसी को श्रामणेर प्रव्रज्या या भिक्षु उपसंपदा की दीक्षा नहीं दी। हालांकि, यदि उनके इस तरीके को एक आदर्श मानकर सभी भिक्षु अपना लेते, तो भिक्षु-संघ उसी पीढ़ी के साथ समाप्त हो जाता। परिणाम यह होता कि आज न तो हमें कोई भिक्षु दिखाई देता, न ही भगवान बुद्ध के धम्म का ज्ञान होता और न ही हम आज इस इतिहास को पढ़ पा रहे होते। ↩︎
पालि
२०९. एवं मे सुतं – एकं समयं आयस्मा बाकुलो बक्कुलो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) राजगहे विहरति वेळुवने कलन्दकनिवापे। अथ खो अचेलकस्सपो आयस्मतो बाकुलस्स पुराणगिहिसहायो येनायस्मा बाकुलो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा आयस्मता बाकुलेन सद्धिं सम्मोदि। सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो अचेलकस्सपो आयस्मन्तं बाकुलं एतदवोच –
‘‘कीवचिरं पब्बजितोसि, आवुसो बाकुला’’ति? ‘‘असीति मे, आवुसो, वस्सानि पब्बजितस्सा’’ति। ‘‘इमेहि पन ते, आवुसो बाकुल, असीतिया वस्सेहि कतिक्खत्तुं मेथुनो धम्मो पटिसेवितो’’ति? ‘‘न खो मं, आवुसो कस्सप, एवं पुच्छितब्बं – ‘इमेहि पन ते, आवुसो बाकुल, असीतिया वस्सेहि कतिक्खत्तुं मेथुनो धम्मो पटिसेवितो’ति। एवञ्च खो मं, आवुसो कस्सप, पुच्छितब्बं – ‘इमेहि पन ते, आवुसो बाकुल, असीतिया वस्सेहि कतिक्खत्तुं कामसञ्ञा उप्पन्नपुब्बा’’’ति? ( ) (इमेहि पन ते आवुसो बक्कुल असीतियो वस्सेहि कतिक्खत्तुं कामसञ्ञा उप्पन्नपुब्बाति।) (सी॰ पी॰)
२१०. ‘‘असीति मे, आवुसो , वस्सानि पब्बजितस्स नाभिजानामि कामसञ्ञं उप्पन्नपुब्बं। यंपायस्मा बाकुलो असीतिया वस्सेहि नाभिजानाति कामसञ्ञं उप्पन्नपुब्बं इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेम।
‘‘असीति मे, आवुसो, वस्सानि पब्बजितस्स नाभिजानामि ब्यापादसञ्ञं…पे॰… विहिंसासञ्ञं उप्पन्नपुब्बं। यंपायस्मा बाकुलो असीतिया वस्सेहि नाभिजानाति विहिंसासञ्ञं उप्पन्नपुब्बं, इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेम।
‘‘असीति मे, आवुसो, वस्सानि पब्बजितस्स नाभिजानामि कामवितक्कं उप्पन्नपुब्बं। यंपायस्मा बाकुलो असीतिया वस्सेहि नाभिजानाति कामवितक्कं उप्पन्नपुब्बं, इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेम।
‘‘असीति मे, आवुसो, वस्सानि पब्बजितस्स नाभिजानामि ब्यापादवितक्कं…पे॰… विहिंसावितक्कं उप्पन्नपुब्बं। यंपायस्मा बाकुलो असीतिया वस्सेहि नाभिजानाति विहिंसावितक्कं उप्पन्नपुब्बं, इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेम।
२११. ‘‘असीति मे, आवुसो, वस्सानि पब्बजितस्स नाभिजानामि गहपतिचीवरं सादिता। यंपायस्मा बाकुलो असीतिया वस्सेहि नाभिजानाति गहपतिचीवरं सादिता, इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेम।
‘‘असीति मे, आवुसो, वस्सानि पब्बजितस्स नाभिजानामि सत्थेन चीवरं छिन्दिता। यंपायस्मा बाकुलो असीतिया वस्सेहि नाभिजानाति सत्थेन चीवरं छिन्दिता…पे॰… धारेम।
‘‘असीति मे, आवुसो, वस्सानि पब्बजितस्स नाभिजानामि सूचिया चीवरं सिब्बिता…पे॰… नाभिजानामि रजनेन चीवरं रजिता… नाभिजानामि कथिने कठिने (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) चीवरं सिब्बिता… नाभिजानामि सब्रह्मचारीनं चीवरकम्मे विचारिता सब्रह्मचारी चीवरकम्मे ब्यापारिता (सी॰ पी॰) … नाभिजानामि निमन्तनं सादिता… नाभिजानामि एवरूपं चित्तं उप्पन्नपुब्बं – ‘अहो वत मं कोचि निमन्तेय्या’ति… नाभिजानामि अन्तरघरे निसीदिता… नाभिजानामि अन्तरघरे भुञ्जिता… नाभिजानामि मातुगामस्स अनुब्यञ्जनसो निमित्तं गहेता… नाभिजानामि मातुगामस्स धम्मं देसिता अन्तमसो चतुप्पदम्पि गाथं… नाभिजानामि भिक्खुनुपस्सयं उपसङ्कमिता… नाभिजानामि भिक्खुनिया धम्मं देसिता… नाभिजानामि सिक्खमानाय धम्मं देसिता… नाभिजानामि सामणेरिया धम्मं देसिता… नाभिजानामि पब्बाजेता… नाभिजानामि उपसम्पादेता… नाभिजानामि निस्सयं दाता… नाभिजानामि सामणेरं उपट्ठापेता… नाभिजानामि जन्ताघरे न्हायिता… नाभिजानामि चुण्णेन न्हायिता… नाभिजानामि सब्रह्मचारीगत्तपरिकम्मे विचारिता ब्यापारिता (सी॰ पी॰) … नाभिजानामि आबाधं उप्पन्नपुब्बं, अन्तमसो गद्दूहनमत्तम्पि… नाभिजानामि भेसज्जं उपहरिता, अन्तमसो हरितकिखण्डम्पि… नाभिजानामि अपस्सेनकं अपस्सयिता… नाभिजानामि सेय्यं कप्पेता। यंपायस्मा…पे॰… धारेम।
‘‘असीति मे, आवुसो, वस्सानि पब्बजितस्स नाभिजानामि गामन्तसेनासने वस्सं उपगन्ता । यंपायस्मा बाकुलो असीतिया वस्सेहि नाभिजानाति गामन्तसेनासने वस्सं उपगन्ता, इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेम।
‘‘सत्ताहमेव खो अहं, आवुसो, सरणो रट्ठपिण्डं भुञ्जिं; अथ अट्ठमियं अञ्ञा उदपादि। यंपायस्मा बाकुलो सत्ताहमेव सरणो रट्ठपिण्डं भुञ्जि; अथ अट्ठमियं अञ्ञा उदपादि इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेम।
२१२. ‘‘लभेय्याहं, आवुसो बाकुल, इमस्मिं धम्मविनये पब्बज्जं, लभेय्यं उपसम्पद’’न्ति। अलत्थ खो अचेलकस्सपो इमस्मिं धम्मविनये पब्बज्जं, अलत्थ उपसम्पदं। अचिरूपसम्पन्नो पनायस्मा कस्सपो एको वूपकट्ठो अप्पमत्तो आतापी पहितत्तो विहरन्तो नचिरस्सेव – यस्सत्थाय कुलपुत्ता सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पब्बजन्ति तदनुत्तरं – ब्रह्मचरियपरियोसानं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहासि। ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति अब्भञ्ञासि। अञ्ञतरो खो पनायस्मा कस्सपो अरहतं अहोसि।
अथ खो आयस्मा बाकुलो अपरेन समयेन अवापुरणं अपापुरणं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) आदाय विहारेन विहारं उपसङ्कमित्वा एवमाह – ‘‘अभिक्कमथायस्मन्तो, अभिक्कमथायस्मन्तो। अज्ज मे परिनिब्बानं भविस्सती’’ति। ‘‘यंपायस्मा बाकुलो अवापुरणं आदाय विहारेन विहारं उपसङ्कमित्वा एवमाह – ‘अभिक्कमथायस्मन्तो, अभिक्कमथायस्मन्तो; अज्ज मे परिनिब्बानं भविस्सती’ति, इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेम’’।
आयस्मा बाकुलो मज्झे भिक्खुसङ्घस्स निसिन्नकोव परिनिब्बायि। ‘‘यंपायस्मा बाकुलो मज्झे भिक्खुसङ्घस्स निसिन्नकोव परिनिब्बायि, इदम्पि मयं आयस्मतो बाकुलस्स अच्छरियं अब्भुतधम्मं धारेमा’’ति।
बाकुलसुत्तं निट्ठितं चतुत्थं।