✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१२९. बालपण्डित सुत्त मुख्य > सुत्तपिटक > मज्झिमनिकाय 2. मज्झिमनिकाय बुद्ध के द्वाराभिक्षु के लिएसंवेगजन्य उपदेश नर्क

मूर्ख और ज्ञानी

अनुवादक: भिक्खु कश्यप | १५ मिनट
यह सूत्र अभी अपूर्ण है। जल्द ही पूर्ण किया जाएगा। कृपया धैर्य रखें।

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना—एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं से कहा, “भिक्षुओं!"

“भदंत”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा —

“भिक्षुओं! मूर्ख के तीन लक्षण होते हैं, चिन्ह होते हैं, गुण होते हैं। कौन से तीन?

  • मूर्ख बुरा विचारी होता है,
  • बुरा बोलता है, और
  • बुरा कृत्य करता है।

यदि मूर्ख ऐसा न होता, तो विद्वान उसे कैसे जान पातें कि “यह मूर्ख असत्पुरुष (बेईमान) है”? चूंकि मूर्ख बुरा विचारी होता है, बुरा बोलता है, और बुरा कृत्य करता है, इसलिए विद्वान उसे जान पाते हैं कि “यह मूर्ख असत्पुरुष है!”

मूर्ख इसी जीवन में तीन तरह से ‘दुःख एवं पीड़ा’ का अनुभव करता है। जब लोग सभा में बैठकर, रास्ते के किनारे बैठकर, या चौराहे पर बैठकर (दुराचार से) जुड़ी प्रासंगिक बात पर चर्चा करने लगे—तब जो मूर्ख जीवहत्या, चोरी, व्यभिचार, झूठ बोलता एवं शराब मद्य आदि मदहोश करने वाला नशापता करता हो, वह सोचता है, “लोग जिस प्रासंगिक बात पर चर्चा कर रहे हैं, वह (हरकतें) मुझमें भी पायी जाती हैं! और मैं उनमें लिप्त होते भी देखा जाता हूँ!” मूर्ख इसी जीवन में इस पहले दुःख-पीड़ा का अनुभव करता है।

फिर, मूर्ख, किसी चोर या अपराधी के पकड़े जाने पर दंडस्वरूप तरह-तरह से यातनाएँ झेलते हुए देखता है, जैसे—

  • चाबुक़ से पिटते हुए, कोड़े लगते हुए, मुग्दर, बेंत या डंडों से पिटते हुए,
  • हाथ कटते, पैर कटते, हाथ-पैर दोनों कटते हुए,
  • कान कटते, नाक कटते, कान-नाक दोनों कटते हुए,
  • या खोपड़ी निकालकर गर्म लोहा डलते हुए,
  • सिर की चमड़ी उतार खोपड़ी को कंकड़ों से रगड़ते हुए,
  • चिमटे से मुँह खुलवा भीतर अँगारें या दीपक जलते हुए,
  • शरीर पर तेलबत्ती लपेट आग लगते हुए, हाथ पर तेलबत्ती लपेट आग लगते हुए,
  • गले से कलाई तक की चमड़ी खींचकर उतरते हुए, गले से कुल्हे तक की चमड़ी भी खींचकर उतरते हुए,
  • कोहनियों और घुटनों में खूँटा ठोककर ज़मीन पर लेटते हुए,
  • दोनों-ओर से नुक़िले काँटे घुसेड़ चमड़ी,
  • माँस और नसें नचोटते हुए,
  • सारे शरीर की चमड़ी को सिक्के-सिक्के भर छिलते हुए,
  • शरीर को पीट-पीटकर कंघी फेरते हुए,
  • एक-करवट लिटाकर कानों में खूँटा गड़ते हुए,
  • बिना चमड़ी को हानि पहुँचाये भीतर हड्डी पीसते हुए,
  • उबलता तेल डलते हुए,
  • कुत्तों द्वारा नोच-नोचकर भोजन बनते हुए,
  • खूँटी घुसाकर सूली पर लटकते हुए,
  • तलवार से सिर कटते हुए।

—तब वह सोचता है, “चोर या अपराधी जिन पापकर्मों के चलते पकड़ा गया और उसे शासनकर्ता (पुलिस या लोगों) ने तरह-तरह से यातनाएँ दी, वह (हरकतें) मुझमें भी पायी जाती हैं! और मैं उनमें लिप्त होते भी देखा जाता हूँ!”

मूर्ख इसी जीवन में इस दूसरे दुःख-पीड़ा का अनुभव करता है।


फिर, जब मूर्ख (अकेला) कुर्सी पर बैठा हो, पलंग पर बैठा हो, या जमीन पर बैठा हो, तब उसके पूर्व पापकर्म—

  • काया से दुराचार,
  • वाणी से दुराचार एवं
  • मन से दुराचार—

उस पर घिर आते हैं, बिछ जाते हैं, उसे ढक देते हैं।

जैसे संध्या होते जमीन पर महापर्वत चोटी की छाया घिर आती है, बिछ जाती है, उसे ढक देती है। उसी तरह जब मूर्ख कुर्सी, पलंग या जमीन पर बैठा हो, तब उसके पूर्व पापकर्म—काया से दुराचार, वाणी से दुराचार एवं मन से दुराचार—उसपर घिर आते हैं, बिछ जाते हैं, उसे ढक देते हैं।

तब मूर्ख को लगता है, “अरे! मैने न कल्याणकर्म किए, न कुशलकर्म किए, न ही भयभीत को आसरा दिया। बल्कि मैने पाप किए, क्रूरता की, गलतियां की! जो लोग कल्याण नहीं करते, कुशल नहीं करते, भयभीत को आसरा नहीं देते; बल्कि पाप, क्रूरता एवं गलतियां करते हैं—जो गति उनकी होती हैं, वही गति मेरी भी होगी!” तब ऐसा लगने पर उसे अफ़सोस होता है, वह ढ़ीला पड़ता है, विलाप करता है, छाती पीटता है, बावला हो जाता है। मूर्ख इसी जीवन में इस तीसरे दुःख-पीड़ा का अनुभव करता है।

तब मूर्ख काया से दुराचार करते हुए, वाणी से दुराचार करते हुए, एवं मन से दुराचार करते हुए मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजता है। यदि कोई उचित तरह से बोल पड़े, “बिलकुल अनिच्छित! बिलकुल अप्रिय! बिलकुल अनचाहा!”, तब ऐसा कहना नर्क के बारे में उचित होगा। यहाँ तक कि भिक्षुओं, नर्क के दुःख की उपमा देना भी सरल नहीं है।”

तब एक भिक्षु ने कहा, “किंतु, भन्ते! क्या तब भी कोई उपमा दी जा सकती है?”

“दी जा सकती है, भिक्षु! कल्पना करो कि कोई चोर पकड़ा जाए और राजा के आगे पेश किया जाए। (सैनिक कहें:) “महाराज! यह अपराधी चोर है। आपको जो उचित लगे, सो दंड दें।”

राजा कहता है, “सैनिकों, इसे ले जाओ और सुबह में सौ-भाले भोंको!”

तब उसे सुबह में सौ-भाले भोंक दिया जाता है। तब राजा दोपहर में पूछता है, “सैनिकों, क्या हाल है उसका?”

“अब भी जीवित है, महाराज!”

“जाओ, उसे दोपहर में (पुनः) सौ-भाले भोंको!”

तब उसे दोपहर में सौ-भाले भोंक दिया जाता है। तब राजा संध्या में पूछता है, “सैनिकों, क्या हाल है उसका?”

“अब भी जीवित है, महाराज!”

“जाओ, उसे संध्या में (पुनः) सौ-भाले भोंको!”

तब उसे संध्या में सौ-भाले भोंक दिया जाता है। तो क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या उसे तीन सौ भाले भोंक दिए जाने के कारण दुःख-पीड़ा होगी?”

“भन्ते! मात्र एक-भाला भोंका जाए, तब भी भयंकर दुःख-पीड़ा होगी। तो तीन सौ-भालों का कहना ही क्या!”

तब भगवान ने एक पत्थर उठाया और भिक्षुओं से कहा, “तो क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या बड़ा है—मेरे हाथ का यह पत्थर अथवा पर्वतराज हिमालय?”

“भन्ते! भगवान ने जो पत्थर उठाया, वह पर्वतराज हिमालय के आगे गिना भी नहीं जाएगा! वह एक अंश भी नहीं है! दोनों में कोई तुलना ही नहीं है!”

“उसी तरह, भिक्षुओं! पुरुष को तीन-सौ भाले भोंके जाने पर जो दुःख-पीड़ा होगी, वह नर्क के दुःख के आगे गिने भी नहीं जाएँगे! वे एक अंश भी नहीं हैं! दोनों में कोई तुलना ही नहीं हैं!

भिक्षुओं, मैं तुम्हें नर्क के बारे में तरह-तरह से बता सकता हूँ। किंतु तब भी नर्क के दुःख का पूर्ण वर्णन करना सरल नहीं है। जैसे दो घर हो, द्वारों के साथ। कोई अच्छी आँखों वाला पुरुष दोनों के मध्य खड़ा होकर लोगों को एक घर से दूसरे में प्रवेश करते हुए, निकलते हुए एवं घूमते-भटकते हुए देखे। उसी तरह मैं अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से सत्वों को गुजरते-उपजते हुए देखता हूँ, और मुझे पता चलता है कि वे कर्मानुसार ही कैसे हीन या उच्च, सुंदर या कुरूप, भाग्यशाली या अभाग़े हैं: ‘अरे, कैसे ये सत्व—काया सदाचार में संपन्न, वाणी सदाचार में संपन्न, एवं मन सदाचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर नहीं किया, सम्यकदृष्टि धारण की एवं सम्यकदृष्टि के प्रभाव में सुकृत्य किए—वे मरणोपरांत सद्गति होकर देवताओं के साथ स्वर्ग में उपजे… अथवा मानवलोक में जन्म लिए।

और कैसे ये सत्व—काया दुराचार में संपन्न, वाणी दुराचार में संपन्न, एवं मन दुराचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर किया, मिथ्यादृष्टि धारण की एवं मिथ्यादृष्टि के प्रभाव में दुष्कृत्य किए—वे मरणोपरांत काया छूटने पर प्रेतलोक में उत्पन्न हुए… अथवा पशुयोनी में उत्पन्न हुए… अथवा यातनालोक नर्क में उपजे।’

तब उन्हें नर्कपाल बाहें पकड़ कर यमराज के आगे तरह-तरह से उपस्थित करते हैं, “देव! यह पुरुष न मां का सम्मानकर्ता है, न पिता का! न श्रमण (साधु संन्यासी) का सम्मानकर्ता है, न ब्राह्मण का! न ही कुलपरिवार के ज्येष्ठ (उम्र में बड़े) लोगों का ही सम्मानकर्ता है! देव, इसे दण्ड का आदेश दें!”

तब यमराज उस पुरुष से प्रथम देवदूत के बारे में पूछताछ करता है, “अरे भले पुरुष! क्या तुमने प्रथम देवदूत को मानवों में प्रकट होते नहीं देखा?”

“नहीं देखा, देव!”

“अरे भले पुरुष! क्या तुमने मानवों में किसी नवजात शिशु को स्वयं के मलमूत्र में पड़े, सोते नहीं देखा?”

“देखा, देव!”

“तब, भले पुरुष! क्या तुम्हें होश जागकर, प्रौढ़ता आकर ऐसा नहीं लगा, “मैं भी जन्म-धर्म से घिरा हूँ! जन्म-धर्म नहीं लांघा हूँ! अच्छा होगा जो अब मैं काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म में लग जाऊँ!”

“ऐसा नहीं लगा, देव! मैं मदहोश था, देव!”

“अरे भले पुरुष! तुमने मदहोश रहकर काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म नहीं किए। और तुम जितना मदहोश रहे, उतना ज़रूर निपटा जाएगा! क्योंकि तुम्हारे वे पापकर्म—न तुम्हारी मां से हुए, न पिता से, न भाई से हुए, न बहन से, न मित्र-सहचारियों से हुए, न तुम्हारे परिवारजन-रिश्तेदारों से, और न ही (आरक्षक) देवताओं से हुए! तुम्हारे वे पापकर्म स्वयं तुमसे हुए, और अब तुम ही उसका परिणाम भोगोगे!”

प्रथम देवदूत के बारे में पूछताछ करने, स्पष्टीकरण मांगने एवं फटकारने पश्चात, यमराज उस पुरुष से द्वितीय देवदूत के बारे में पूछताछ करता है, “अच्छा भले पुरुष! क्या तुमने द्वितीय देवदूत को मानवों में प्रकट होते नहीं देखा?”

“नहीं देखा, देव!”

“अरे भले पुरुष! क्या तुमने मानवों में किसी अस्सी, नब्बे या सौ वर्ष के बूढ़े या बूढ़ी को नहीं देखा, जिसका ऊपरी शरीर टेढ़ा-मेढ़ा, झुका हुआ हो, लट्ठ के सहारे चलता या खड़ा हो, लकवा मारे, दर्द पीड़ा में त्रस्त हो चुके, दांत टूट चुके, केश भूरे पड़ चुके, अर्ध गंजा या पूर्ण गंजा हो चुके, काया पूर्णतः झुर्रीदार एवं धब्बेदार हो चुकी हो?”

“देखा, देव!”

“तब, भले पुरुष! क्या तुम्हें होश जागकर, प्रौढ़ता आकर ऐसा नहीं लगा, “मैं भी जीर्ण-धर्म से घिरा हूँ! जीर्ण-धर्म नहीं लांघा हूँ! अच्छा होगा जो अब मैं काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म में लग जाऊँ!”

“ऐसा नहीं लगा, देव! मैं मदहोश था, देव!”

“अरे भले पुरुष! तुमने मदहोश रहकर काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म नहीं किए। और तुम जितना मदहोश रहे, उतना ज़रूर निपटा जाएगा! क्योंकि तुम्हारे वे पापकर्म—न तुम्हारी मां से हुए, न पिता से, न भाई से हुए, न बहन से, न मित्र-सहचारियों से हुए, न तुम्हारे परिवारजन-रिश्तेदारों से, और न ही देवताओं से हुए! तुम्हारे वे पापकर्म स्वयं तुमसे हुए, और अब तुम ही उसका परिणाम भोगोगे!”

द्वितीय देवदूत के बारे में पूछताछ करने, स्पष्टीकरण मांगने एवं फटकारने पश्चात, यमराज उस पुरुष से तृतीय देवदूत के बारे में पूछताछ करता है, “अच्छा भले पुरुष! क्या तुमने तृतीय देवदूत को मानवों में प्रकट होते नहीं देखा?”

“नहीं देखा, देव!”

“अरे भले पुरुष! क्या तुमने मानवों में किसी बीमार, गंभीर रोग से ग्रस्त, दर्द पीड़ा में कराहते, स्वयं के मलमूत्र में सने, दूसरों द्वारा उठाए, लिटाए जाते को नहीं देखा?”

“देखा, देव!”

“तब, भले पुरुष! क्या तुम्हें होश जागकर, प्रौढ़ता आकर ऐसा नहीं लगा, “मैं भी रोग-धर्म से घिरा हूँ! रोग-धर्म नहीं लांघा हूँ! अच्छा होगा जो अब मैं काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म में लग जाऊँ!”

“ऐसा नहीं लगा, देव! मैं मदहोश था, देव!”

“अरे भले पुरुष! तुमने मदहोश रहकर काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म नहीं किए। और तुम जितना मदहोश रहे, उतना ज़रूर निपटा जाएगा! क्योंकि तुम्हारे वे पापकर्म—न तुम्हारी मां से हुए, न पिता से, न भाई से हुए, न बहन से, न मित्र-सहचारियों से हुए, न तुम्हारे परिवारजन-रिश्तेदारों से, और न ही देवताओं से हुए! तुम्हारे वे पापकर्म स्वयं तुमसे हुए, और अब तुम ही उसका परिणाम भोगोगे!”

तृतीय देवदूत के बारे में पूछताछ करने, स्पष्टीकरण मांगने एवं फटकारने पश्चात, यमराज उस पुरुष से चतुर्थ देवदूत के बारे में पूछताछ करता है, “अच्छा भले पुरुष! क्या तुमने चतुर्थ देवदूत को मानवों में प्रकट होते नहीं देखा?”

“नहीं देखा, देव!”

“अरे भले पुरुष! क्या तुमने मानवों में किसी चोर या अपराधी के पकड़े जाने पर दंडस्वरूप तरह-तरह से यातनाएँ झेलते हुए नहीं देखा—जैसे चाबुक़ से पिटते हुए, कोड़े लगते हुए, मुग्दर, बेंत या डंडों से पिटते हुए… (तरह-तरह से उत्पीड़न) नहीं देखा?”

“देखा, देव!”

“तब, भले पुरुष! क्या तुम्हें होश जागकर, प्रौढ़ता आकर ऐसा नहीं लगा, “जो पापकर्म करता है, इसी जीवन में तरह-तरह से यातनाएँ झेलता है, तब मरणोपरांत परलोक में क्या होता होगा? अच्छा होगा जो अब मैं काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म में लग जाऊँ!”

“ऐसा नहीं लगा, देव! मैं मदहोश था, देव!”

“अरे भले पुरुष! तुमने मदहोश रहकर काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म नहीं किए। और तुम जितना मदहोश रहे, उतना ज़रूर निपटा जाएगा! क्योंकि तुम्हारे वे पापकर्म—न तुम्हारी मां से हुए, न पिता से, न भाई से हुए, न बहन से, न मित्र-सहचारियों से हुए, न तुम्हारे परिवारजन-रिश्तेदारों से, और न ही देवताओं से हुए! तुम्हारे वे पापकर्म स्वयं तुमसे हुए, और अब तुम ही उसका परिणाम भोगोगे!”

चतुर्थ देवदूत के बारे में पूछताछ करने, स्पष्टीकरण मांगने एवं फटकारने पश्चात, यमराज उस पुरुष से पंचम देवदूत के बारे में पूछताछ करता है, “अच्छा भले पुरुष! क्या तुमने पंचम देवदूत को मानवों में प्रकट होते नहीं देखा?”

“नहीं देखा, देव!”

“अरे भले पुरुष! क्या तुमने मानवों में कोई लाश नहीं देखी—एक दिन पुरानी, दो दिन पुरानी, या तीन दिन पुरानी—फूल चुकी, नीली पड़ चुकी, पीब रिसती हुई?”

“देखी, देव!”

“तब, भले पुरुष! क्या तुम्हें होश जागकर, प्रौढ़ता आकर ऐसा नहीं लगा, “मैं भी मरण-धर्म से घिरा हूँ! मरण-धर्म नहीं लांघा हूँ! अच्छा होगा जो अब मैं काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म में लग जाऊँ!”

“ऐसा नहीं लगा, देव! मैं मदहोश था, देव!”

“अरे भले पुरुष! तुमने मदहोश रहकर काया, वाणी एवं मन से कल्याणकर्म नहीं किए। और तुम जितना मदहोश रहे, उतना ज़रूर निपटा जाएगा! क्योंकि तुम्हारे वे पापकर्म—न तुम्हारी मां से हुए, न पिता से, न भाई से हुए, न बहन से, न मित्र-सहचारियों से हुए, न तुम्हारे परिवारजन-रिश्तेदारों से, और न ही देवताओं से हुए! तुम्हारे वे पापकर्म स्वयं तुमसे हुए, और अब तुम ही उसका परिणाम भोगोगे!”

पंचम देवदूत के बारे में पूछताछ करने, स्पष्टीकरण मांगने एवं फटकारने पश्चात, यमराज मौन हो जाता है।

तब नर्कपाल उसे ले जाकर पञ्चविध बन्धन नामक यातना देते हैं—एक तप्त-लाल कील उसके एक हाथ में ठोंकते हैं, दूसरी तप्त-लाल कील उसके दूसरे हाथ में ठोंकते हैं, तीसरी तप्त-लाल कील उसके एक पैर में ठोंकते हैं, चौथी तप्त-लाल कील उसके दूसरे पैर में ठोंकते हैं, और पाँचवी तप्त-लाल कील उसके सीने में ठोंकते हैं। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तब नर्कपाल उसे लिटाकर आरी से काटते हैं। तब उसका सिर नीचे, पैर ऊपर पकड़कर कुल्हाड़ी से काटते हैं। तब उसे रथ से बांधकर, ‘जलती दहकती धधकती’ भूमि पर घसीट ले जाते हैं एवं वापस ले आते हैं। तब उसे ‘जलते दहकते धधकते’ विशालकाय पर्वत पर चढ़ने लगाते हैं एवं उतरने लगाते हैं। तब उसका सिर नीचे, पैर ऊपर पकड़कर, ‘जलते दहकते धधकते’ तप्त-लाल तांबे की कढ़ाई में डुबोते हैं। वह बुलबुले, झाग छोड़ते हुए उबलता है। तब उसे बुलबुले, झाग छोड़ते, उबालते हुए सीधा डुबोते हैं, फिर उल्टा डुबोते हैं, फिर आड़ा-तिरछा डुबोते हैं। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तब नर्कपाल उसे उठाकर, महानर्क में फेंक देते हैं। और, महानर्क, भिक्षुओं —

चतुर्कोणीय चतुर्द्वारीय,
प्रत्येक विभाग मापा हुआ,
घिरा ऊँची लोह-दीवार से,
लोह-छत से ढका हुआ।
तप्त-लाल लोह-भूमि,
जलती धधकती हुई,
रहती है सदैव खड़ी,
सौ योजन फैली हुई।

भीतर पूर्वी-दीवार से उठती लौ पश्चिमी-दीवार पर टकराती है। पश्चिमी-दीवार से उठती लौ पूर्वी-दीवार पर टकराती है। उत्तरी-दीवार से उठती लौ दक्षिणी-दीवार पर टकराती है। दक्षिणी-दीवार से उठती लौ उत्तरी-दीवार पर टकराती है। भूमि से उठती लौ छत पर टकराती है। छत से उठती लौ भूमि पर टकराती है। वहाँ उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तब दीर्घकाल बीतने पर एक समय आता है, जब महानर्क का पूर्वी-द्वार खुलता है। तुरंत वह तेज दौड़ पड़ता है। और जब वह तुरंत तेज दौड़ता है, तब उसकी छवि (ऊपरी त्वचा) जलती है, चर्म (भीतरी त्वचा) जलता है, मांस जलता है, नसें जलती हैं, हड्डियां भी जलते हुए धुआं देने लगती हैं। वह पकड़े जाने पर पूर्ववत हो जाता है, अथवा पहुँचने पर द्वार लग जाता है। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तब दीर्घकाल बीतने पर एक समय आता है, जब महानर्क का पश्चिमी-द्वार खुलता है। तुरंत वह तेज दौड़ पड़ता है… उत्तरी-द्वार खुलता है। तुरंत वह तेज दौड़ पड़ता है… दक्षिणी-द्वार खुलता है। तुरंत वह तेज दौड़ पड़ता है। और जब वह तुरंत तेज दौड़ता है, तब उसकी छवि जलती है, चर्म जलता है, मांस जलता है, नसें जलती हैं, हड्डियां भी जलते हुए धुआं देने लगती हैं। वह पकड़े जाने पर पूर्ववत हो जाता है, अथवा पहुँचने पर द्वार लग जाता है। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तब दीर्घकाल बीतने पर एक समय आता है, जब महानर्क का पूर्वी-द्वार (पुनः) खुलता है। तुरंत वह तेज दौड़ पड़ता है। और जब वह तुरंत तेज दौड़ता है, तब उसकी छवि जलती है, चर्म जलता है, मांस जलता है, नसें जलती हैं, हड्डियां भी जलते हुए धुआं देने लगती हैं। वह पकड़े जाने पर पूर्ववत हो जाता है, अथवा द्वार से बाहर निकलता है। किंतु महानर्क के समानांतर, बगल में विशाल गूहनर्क (विष्ठा) है। वह उसमें गिरता है। और उस गूहनर्क में अनेक सुईमुख वाले जीव उसकी छवि में छेद करते हैं। छवि बिंधकर चर्म में छेद करते हैं। चर्म बिंधकर मांस में छेद कर करते हैं। मांस बिंधकर नसों में छेद करते हैं। नसें बिंधकर हड्डियों में छेद करते हैं। और हड्डियां बिंधकर अस्थिमज्ज चूसने लगते हैं। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

गूहनर्क के समानांतर, बगल में विशाल तप्त कोयलानर्क है। वह उसमें गिरता है। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तप्त कोयलानर्क के समानांतर, बगल में विशाल सिंबलिवन है—एक योजन (१ योजन ≈ १६ किलोमीटर) ऊँचा, सोलह-ऊंगली लंबे कांटों से बिछा हुआ, ‘जलता दहकता धधकता’। वह उसमें प्रवेश करता है। तब उसे ऊपर चढ़ाते हैं एवं उतारते हैं। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

सिंबलिवन के समानांतर, बगल में विशाल तलवार-पत्तीवन है। वह उसमें प्रवेश करता है। वहाँ पवन से हिलती पत्तियां उसके हाथ काटती हैं, पैर काटती हैं, हाथ-पैर दोनों काटती हैं, कान काटती हैं, नाक काटती हैं, कान-नाक दोनों काटती हैं। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तलवार-पत्तीवन के समानांतर, बगल में विशाल खाराजल नदी है। वह उसमें गिरता है। वह उसे नीचे बहा ले जाती है, ऊपर बहा ले जाती है, नीचे-ऊपर दोनों ओर बहा ले जाती है। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तब नर्कपाल हुक डालकर उसे बाहर निकालते हैं, और जमीन पर रखते हुए पूछते हैं, “अरे, भले पुरुष! क्या इच्छा है तुम्हारी?”

“मैं भूखा हूँ, मान्यवर!” वह उत्तर देता है।

तब नर्कपाल ‘जलते दहकते धधकते’ तप्त-लाल चिमटे से उसका मूंह खोलते हैं, और भीतर एक ‘जलता दहकता धधकता’ तांबे का गोला डालते हैं—जो उसके होठ जलाता है, मूंह जलाता है, गला जलाता है, पेट जलाता है, और उसकी आँतें-अँतड़ियाँ लेकर पिछवाड़े से बाहर निकलता है। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तब नर्कपाल उसे पूछते हैं, “अरे भले पुरुष! अब क्या इच्छा है तुम्हारी?”

“मैं प्यासा हूँ, मान्यवर!” वह उत्तर देता है।

तब नर्कपाल ‘जलते दहकते धधकते’ तप्त-लाल चिमटे से उसका मूंह खोलते हैं, और भीतर ‘जलता दहकता धधकता’ पिघला तांबा उड़ेलते हैं—जो उसके होठ जलाता है, मूंह जलाता है, गला जलाता है, पेट जलाता है, और उसकी आँतें-अँतड़ियाँ लेकर पिछवाड़े से बाहर निकलता है। तब उसे तीव्र, तेज एवं कटु दुःख-पीड़ा महसूस होती है। तब भी वह मरता नहीं है, जब तक उसके पापकर्म खत्म नहीं हो जाते।

तब नर्कपाल उसे उठाकर, पुनः महानर्क में फेंक देते हैं।

भिक्षुओं, मैं तुम्हें नर्क के बारे में तरह-तरह से बता सकता हूँ। किंतु तब भी नर्क के दुःख का पूर्ण वर्णन करना सरल नहीं है। [^12]

भिक्षुओं! पशुओं में तृणभक्षी प्राणी होते हैं, जो ताज़ी या सूखी घास चाटकर, दातों से खाते हैं—जैसे हाथी, अश्व, गाय, गधे, बकरियां, मृग इत्यादि। जो मूर्ख पूर्व पेटू (भुक्कड़) था और पापकर्म किया था, वह मरणोपरांत काया छूटने पर तृणभक्षी पशुयोनि में उत्पन्न होता है।

पशुओं में गूहभक्षी प्राणी होते हैं, जो दूर से विष्ठा सूँघकर दौड़ पड़ते हैं, “यहाँ खाएँगे! यहाँ खाएँगे!”—जैसे मुर्गे, सूअर, कुत्ते, सियार इत्यादि। जो मूर्ख पूर्व पेटू था और पापकर्म किया था, वह मरणोपरांत गूहभक्षी पशुयोनि में उत्पन्न होता है।

पशुओं में ऐसे प्राणी होते हैं, जो अंधकार में पैदा होते, अंधकार में जीते, और अंधकार में ही मरते हैं—जैसे कीट, कृमि, केंचुए इत्यादि। जो मूर्ख पूर्व पेटू था और पापकर्म किया था, वह मरणोपरांत अंधकार में ही पैदा होने, जीने और मरने वाले पशुयोनि में उत्पन्न होता है।

पशुओं में ऐसे प्राणी होते हैं, जो जल में पैदा होते, जल में जीते, और जल में ही मरते हैं—जैसे मछलियां, कछुएँ, मगरमच्छ इत्यादि। जो मूर्ख पूर्व पेटू था और पापकर्म किया था, वह मरणोपरांत जल में ही पैदा होने, जीने और मरने वाले पशुयोनि में उत्पन्न होता है।

पशुओं में ऐसे प्राणी होते हैं, जो गंदगी में पैदा होते, गंदगी में जीते, और गंदगी में ही मरते हैं—जैसे सड़ती मछली में, सड़ती लाश में, सड़ते भोजन में, पाखाने में, या गडर नाली में इत्यादि। जो मूर्ख पूर्व पेटू था और पापकर्म किया था, वह मरणोपरांत गंदगी में ही पैदा होने, जीने और मरने वाले पशुयोनि में उत्पन्न होता है।

भिक्षुओं, मैं तुम्हें पशुयोनी के बारे में तरह-तरह से बता सकता हूँ। किंतु तब भी पशुयोनी के दुःख का पूर्ण वर्णन करना सरल नहीं है।

कल्पना करों कि कोई पुरुष महासमुद्र में एक जुआ (बैल का योगबन्ध) फेंके, जिसमे एक छेद हो। तब पूर्वी-पवन उसे पश्चिम में बहाएँ, पश्चिमी-पवन उसे पूर्व में बहाएँ, उत्तरी-पवन उसे दक्षिण में बहाएँ, तथा दक्षिणी-पवन उसे उत्तर में बहाएँ। तब कल्पना करों कि उस महासमुद्र में एक अंधा कछुआ रहता हो, जो प्रत्येक सौ वर्ष बीतने पर केवल एक-बार सतह पर आता हो। तो क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या वह महासमुद्र में तैरता, सौ वर्षों में एक-बार ऊपर आने वाला अंधा कछुआ, कभी उस जुए में गर्दन डाल पाएगा?”

“भन्ते, दीर्घकाल बीतने पर कदाचित एक अवसर ऐसा आ सकता है।”

“भिक्षुओं! मैं कहता हूँ कि शीघ्र ही वह अंधा कछुआ उस जुए में गर्दन डाल देगा, बजाए कि नर्क गए मूर्ख को पुनः मनुष्यता प्राप्त हो। ऐसा क्यों? क्योंकि वहाँ न धर्मचर्या, न समचर्या, न कुशलक्रिया, न ही पुण्यक्रिया होती है। वहाँ आपसी भक्षण होता है, भिक्षुओं, दुर्बल का भक्षण होता है।

जब दीर्घकाल बीतने पर कदाचित एक समय आए भी कि मूर्ख को पुनः मनुष्यता प्राप्त हो—तब वह नीचकुलीन परिवार में जन्म लेता है, जैसे चण्डालकुल (बहिष्कृत), निषादकुल (शिकारी), वेनकुल (बांस-काम करने वाले), रथकारकुल (बढई), वा पुक्कुसकुल (मैला उठाने वाले) जैसे अत्यंत दरिद्र, अल्प अन्नपान एवं भोजन वाले, कठिनाई से गुज़ारा होने वाले, कठिनाई से खाद्य एवं वस्त्र प्राप्त होने वाले कुलपरिवार। साथ ही वह कुरूप होता है, भद्दा दिखता है, विकृत होता है, रोगी होता है, अंधा होता है, लूला होता है, लंगड़ा होता है, लक़वाग्रस्त होता है। तथा उसे न अन्न मिलता है न पान, न वस्त्र मिलता है न गाड़ी, न माला न गन्ध न लेप मिलते हैं, न पलंग न आवास मिलते हैं, न ही दीपक। वह (उस कठिन जीवन में) काया से दुराचार, वाणी से दुराचार एवं मन से दुराचार करता है। और मरणोपरांत पुनः पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजता है।

जैसे भिक्षुओं! कोई जुआरी हो जो प्रथम-दांव में ही अपनी पत्नी, बच्चे, घर, जमीन, संपत्ति सब-कुछ गँवा दे और स्वयं गुलाम बनकर रह जाए। तब भी ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण दांव—जिसमे कोई अपनी पत्नी, संतान, घर, जमीन, संपत्ति सब-कुछ गँवा दे और स्वयं गुलाम बनकर रह जाए—अल्पमात्र ही होगा! किंतु कोई मूर्ख उससे भी अधिक अनर्थकारी, महादुर्भाग्यपूर्ण दांव खेलता है, जब वह काया से दुराचार, वाणी से दुराचार एवं मन से दुराचार करता है, और मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजता है। यह मूर्खता की पराकाष्ठा है।

एक बार, भिक्षुओं! यमराज को विचार आया, “जो लोक में पाप, अकुशल कर्म करते हैं, उन्हें ऐसे तरह-तरह से यातनाएँ दी जाती हैं। अरे! काश, मैं मनुष्यता प्राप्त करूँ! और लोक में तथागत अर्हंत सम्यकसम्बुद्ध उत्पन्न हो! और मुझे उस भगवान का साक्षात्कार हो! और भगवान मुझे धर्म सिखाएँ! और मैं धर्म समझ पाऊँ!”

यह भिक्षुओं, मैं किसी श्रमण या ब्राह्मण से सुनकर नहीं कह रहा हूँ। बल्कि जो मैने स्वयं देखा, स्वयं पता किया, स्वयं समझा, वह तुम्हें बता रहा हूँ!” ऐसा भगवान ने कहा। ऐसा कहकर सुगत ने, शास्ता ने आगे कहा:

“चेताया देवदूतों से,
तरुण जो मदहोश रहे
दीर्घकाल वो शोक करे,
आकर हीनकाया में।

किंतु भला सत्पुरुष यहाँ,
चेताया देवदूतों से,
न रहे मदहोश वो,
आर्यधर्म के प्रति कभी।

भय देखे वो आसक्ति में,
जन्म-मरण संभावना में,
अनासक्त विमुक्त हो,
जन्म-मरण के अन्त से।

सुरक्षा पाकर सुखी हो,
इसी जीवन में निर्वृत्त हो,
शत्रुता खतरे लांघ सभी,
सारे दुःख से बच निकले।”

“भिक्षुओं! बुद्धिमान के तीन लक्षण होते हैं, चिन्ह होते हैं, गुण होते हैं। कौन से तीन? बुद्धिमान भला विचारी होता है, भला बोलता है, और भला कृत्य करता है।

यदि बुद्धिमान ऐसा न होता, तो विद्वान उसे कैसे जान पाते कि “यह बुद्धिमान सत्पुरुष है”? चूंकि बुद्धिमान भला विचारी होता है, भला बोलता है, और भला कृत्य करता है, इसलिए विद्वान उसे जान पाते हैं कि “यह बुद्धिमान सत्पुरुष है!”

बुद्धिमान इसी जीवन में तीन तरह से ‘राहत एवं संतुष्टि’ का अनुभव करता है। जब लोग सभा में बैठकर, रास्ते के किनारे बैठकर, या चौराहे पर बैठकर (दुराचार से) जुड़ी प्रासंगिक बात पर चर्चा करने लगे — तब जो बुद्धिमान जीवहत्या से विरत, चोरी से विरत, व्यभिचार से विरत, झूठ बोलने से विरत और शराब मद्य आदि मदहोश करने वाले नशेपते से विरत रहता हो, वह सोचता है, “लोग जिस प्रासंगिक बात पर चर्चा कर रहे हैं, वह (हरकतें) मुझमें नहीं पायी जाती हैं! और मैं उनमें लिप्त होते नहीं देखा जाता हूँ!” बुद्धिमान इसी जीवन में इस पहले राहत-संतुष्टि का अनुभव करता है।

फिर, बुद्धिमान, किसी चोर या अपराधी के पकड़े जाने पर दंडस्वरूप तरह-तरह से यातनाएँ झेलते हुए देखता है — जैसे चाबुक़ से पिटते हुए, कोड़े लगते हुए, मुग्दर, बेंत या डंडों से पिटते हुए, हाथ कटते, पैर कटते… (इत्यादि तरह-तरह के उत्पीड़न) — तब वह सोचता है, “चोर या अपराधी जिन पापकर्मों के चलते पकड़ा गया और उसे शासनकर्ता (पुलिस या लोगों) ने तरह-तरह से यातनाएँ दी, वह (हरकतें) मुझमें नहीं पायी जाती हैं! और मैं उनमें लिप्त होते नहीं देखा जाता हूँ!” बुद्धिमान इसी जीवन में इस दूसरे राहत-संतुष्टि का अनुभव करता है।

फिर, जब बुद्धिमान (अकेला) कुर्सी पर बैठा हो, पलंग पर बैठा हो, या जमीन पर बैठा हो, तब पूर्व कल्याणकर्म — काया से सदाचार, वाणी से सदाचार एवं मन से सदाचार — उसपर घिर आते हैं, बिछ जाते हैं, उसे ढक देते हैं। जैसे संध्या होते जमीन पर महापर्वत चोटी की छाया घिर आती है, बिछ जाती है, उसे ढक देती है। उसी तरह जब बुद्धिमान कुर्सी, पलंग या जमीन पर बैठा हो, तब पूर्व कल्याणकर्म — काया से सदाचार, वाणी से सदाचार एवं मन से सदाचार — उसपर घिर आते हैं, बिछ जाते हैं, उसे ढक देते हैं। तब बुद्धिमान को लगता है, “मैने पाप नहीं किए, क्रूरता नहीं की, गलतियां नहीं की। बल्कि मैने कल्याणकर्म किए है, कुशल कर्म किए है, भयभीत को आसरा दिया है। जो लोग पाप, क्रूरता एवं गलतियां नहीं करते, बल्कि कल्याण करते हैं, कुशल करते हैं, भयभीत को आसरा देते हैं — जो गति उनकी होती हैं, वही गति मेरी भी होगी!” तब ऐसा लगने पर उसे अफ़सोस नहीं होता, वह ढ़ीला नहीं पड़ता, विलाप नहीं करता, छाती नहीं पीटता, बावला नहीं हो जाता। बुद्धिमान इसी जीवन में इस तीसरे राहत-संतुष्टि का अनुभव करता है।


तब वह बुद्धिमान काया से सदाचार करते हुए, वाणी से सदाचार करते हुए, एवं मन से सदाचार करते हुए मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजता है। अब यदि कोई उचित तरह से बोल पड़े, “अत्यंत इच्छित! अत्यंत प्रिय! अत्यंत मनचाहा!”, तब ऐसा कहना स्वर्ग के बारे में उचित होगा। यहाँ तक कि भिक्षुओं, स्वर्ग के सुख की उपमा भी देना सरल नहीं है।”

तब एक भिक्षु ने कहा, “किंतु, भन्ते! क्या तब भी कोई उपमा दी जा सकती है?”

“दी जा सकती है, भिक्षु! कल्पना करो कि कोई चक्रवर्ती सम्राट हो, सात रत्नों एवं चार शक्तियों से संपन्न, और वह सुख एवं खुशी अनुभव करता हो।

सात रत्न क्या होते हैं, भिक्षुओं? जब कोई क्षत्रिय राजा, राजतिलक हुआ नरेश, पूर्णिमा उपोसथ के दिन सिर धोकर महल के ऊपरी उपोसथकक्ष में जाए। और वहाँ दिव्य चक्ररत्न प्रादुर्भुत हो — हजार तीली के साथ, नेमी के साथ, नाभी के साथ, अपने सम्पूर्ण आकार की परिपूर्णता के साथ! उसे देखकर क्षत्रिय राजा, राजतिलक हुए नरेश को लगता है, “अब मैने यह सुना है कि जब कोई क्षत्रिय राजा, राजतिलक हुआ नरेश, पूर्णिमा उपोसथ के दिन सिर धोकर महल के ऊपरी उपोसथकक्ष में जाए, और यदि वहाँ दिव्य चक्ररत्न प्रादुर्भुत हो — हजार तीली के साथ, नेमी के साथ, नाभी के साथ, अपने सम्पूर्ण आकार की परिपूर्णता के साथ — तब वह राजा ‘चक्रवर्ती सम्राट’ बनता है। क्या तब मैं चक्रवर्ती सम्राट बनूंगा?”

तब वह क्षत्रिय राजा, राजतिलक हुआ नरेश, अपने आसन से उठ कर बाए हाथ में जलपात्र ले, दाएँ हाथ से उस चक्ररत्न पर जल छिड़कते हुए कहता है, “प्रवर्तन करो, श्री चक्ररत्न! सर्वविजयी हो, श्री चक्ररत्न!”

तब वह चक्ररत्न प्रवर्तित होते (घूमते) पूर्व-दिशा में आगे बढ़ने लगता है। और चक्रवर्ती सम्राट अपनी चार अंगोवाली सेना के साथ उसका पीछा करता है। वह चक्ररत्न जिस प्रदेश में थम जाएँ, वहाँ चक्रवर्ती सम्राट अपनी चार अंगोवाली सेना के साथ आवास लेता है। तब पूर्व-दिशा के विरोधी राजा आकर चक्रवर्ती सम्राट को कहते हैं, “आईयें, महाराज! स्वागत है, महाराज! आज्ञा करें, महाराज! आदेश दें, महाराज!”

चक्रवर्ती सम्राट कहता है, “जीवहत्या ना करें! चोरी ना करें! व्यभिचार ना करें! झूठ ना बोलें! मद्य ना पिएँ! (इसके अलावा) जो खाते हैं, खाएँ!” तब पूर्व-दिशा के विरोधी राजा चक्रवर्ती सम्राट के आगे समर्पण करते हैं।

इस तरह चक्ररत्न आगे बढ़ते हुए पूर्वी महासमुद्र में डुबकी लगाकर पुनः उबरता है, और प्रवर्तित होते दक्षिण-दिशा में आगे बढ़ने लगता है। और चक्रवर्ती सम्राट अपनी चार अंगोवाली सेना के साथ उसका पीछा करता है।… तब दक्षिण-दिशा के विरोधी राजा चक्रवर्ती सम्राट के आगे समर्पण करते हैं। तब चक्ररत्न आगे बढ़ते हुए दक्षिण महासमुद्र में डुबकी लगाकर पुनः उबरता है, और प्रवर्तित होते पश्चिम-दिशा में आगे बढ़ने लगता है। और चक्रवर्ती सम्राट अपनी चार अंगोवाली सेना के साथ उसका पीछा करता है।… तब पश्चिम-दिशा के विरोधी राजा चक्रवर्ती सम्राट के आगे समर्पण करते हैं। तब चक्ररत्न आगे बढ़ते हुए पश्चिम महासमुद्र में डुबकी लगाकर पुनः उबरता है, और प्रवर्तित होते उत्तर-दिशा में आगे बढ़ने लगता है। और चक्रवर्ती सम्राट अपनी चार अंगोवाली सेना के साथ उसका पीछा करता है।… तब उत्तर-दिशा के विरोधी राजा चक्रवर्ती सम्राट के आगे समर्पण करते हैं।

इस तरह चक्ररत्न पृथ्वी पर महासमुद्रों तक सर्वविजयी होकर राजधानी लौटता है, और चक्रवर्ती सम्राट के राजमहल अंतःपुर द्वार के ऊपर अक्ष लगाकर थम जाता है, जैसे अंतःपुर द्वार की शोभा बढ़ा रहा हो। ऐसा होता है चक्ररत्न, जो चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रादुर्भूत होता है।

फिर, चक्रवर्ती सम्राट के लिए हाथीरत्न प्रादुर्भुत होता है — संपूर्ण सफ़ेद, सात तरह से प्रतिस्थापित, ऋद्धिमानी, आकाश से भ्रमण करने वाला, ‘उपोसथ’ नामक हाथीराज! उसे देखते ही चक्रवर्ती सम्राट के चित्त में विश्वास प्रकट होता है, “बहुत शुभ होगी इस हाथी की सवारी, जो यह काबू में आए!” तब हाथीरत्न काबू में आ जाता है, जैसे कोई उत्कृष्ट जाति का राजसी हाथी दीर्घकाल तक भलीभांति काबू में रहा हो। और चक्रवर्ती सम्राट हाथीरत्न को परखने के लिए उस पर सुबह में सवार हो जाता है, और संपूर्ण पृथ्वी का महासमुद्र तक भ्रमण कर प्रातः आहार (नाश्ते) के समय तक राजधानी लौट आता है। ऐसा होता है हाथीरत्न, जो चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रादुर्भूत होता है।

फिर, चक्रवर्ती सम्राट के लिए अश्वरत्न प्रादुर्भुत होता है — संपूर्ण सफ़ेद, चमकता काला सिर, मूंजघास जैसे अयाल (गर्दन के बाल), ऋद्धिमानी, आकाश से भ्रमण करने वाला, ‘वलाहक’ (=गर्जनमेघ) नामक अश्वराज! उसे देखते ही चक्रवर्ती सम्राट के चित्त में विश्वास प्रकट होता है, “बहुत शुभ होगी इस घोड़े की सवारी, जो यह काबू में आए!” तब अश्वरत्न काबू में आ जाता है, जैसे कोई उत्कृष्ट जाति का राजसी घोड़ा दीर्घकाल तक भलीभांति काबू में रहा हो। और चक्रवर्ती सम्राट अश्वरत्न को परखने के लिए उस पर सुबह में सवार हो जाता है, और संपूर्ण पृथ्वी का महासमुद्र तक भ्रमण कर प्रातः आहार (नाश्ते) के समय तक राजधानी में लौट आता है। ऐसा होता है अश्वरत्न, जो चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रादुर्भूत होता है।

फिर, चक्रवर्ती सम्राट के लिए मणिरत्न प्रादुर्भुत होता है — वैदुर्य मणि, शुभ जाति का, अष्टपहलु, सुपरिष्कृत! उस मणिरत्न की आभा एक योजन (लगभग १६ किलोमीटर) तक फैलती है। और चक्रवर्ती सम्राट मणिरत्न को परखने के लिए उसे राजध्वज के शीर्ष पर नियुक्त कर, रात के घोर अंधकार में अपनी चार अंगोवाली सेना की व्यूहरचना में आगे बढ़ता है। तब उसकी आभा को दिन समझते हुए आसपास के सभी गांवों की जनता दिवसकार्य शुरू कर देते हैं। ऐसा होता है मणिरत्न, जो चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रादुर्भूत होता है।

फिर, चक्रवर्ती सम्राट के लिए स्त्रीरत्न प्रादुर्भुत होता है — अत्यंत रुपमती, सुहावनी, सजीली, परमवर्ण एवं परमसौंदर्य से संपन्न! न बहुत लंबी, न बहुत नाटी, न बहुत पतली, न बहुत मोटी, न बहुत साँवली, न बहुत गोरी! मानव-सौंदर्यता लांघ चुकी, किंतु दिव्य-सौंदर्यता न प्राप्त की! उस स्त्रीरत्न का काया स्पर्श ऐसा लगता है, जैसे रूई या रेशम का गुच्छा हो! उस स्त्रीरत्न के अंग शीतकाल में उष्ण रहते हैं एवं उष्णकाल में शीतल! उस स्त्रीरत्न की काया से चंदन-सी गन्ध आती है, तथा मुख से कमलपुष्प-सी गन्ध। वह स्त्रीरत्न चक्रवर्ती सम्राट के पूर्व उठती, पश्चात सोती, सेवा के लिए लालायित रहती, मनचाहा आचरण करती, तथा प्रिय बातें करती है। वह स्त्रीरत्न मन से भी चक्रवर्ती सम्राट के प्रति निष्ठा (वफ़ा) का उल्लंघन नहीं करती, तो काया से कैसे करेगी? ऐसा होता है स्त्रीरत्न, जो चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रादुर्भूत होता है।

फिर, चक्रवर्ती सम्राट के लिए गृहस्थरत्न प्रादुर्भुत होता है — जिसे पूर्वकर्म के फ़लस्वरूप दिव्यचक्षु प्राप्त होता है, जिससे वह छिपे हुए खज़ाने, मालकियत अथवा बिना मालकियत वाले, देख पाता है। वह गृहस्थरत्न चक्रवर्ती सम्राट के पास जाकर कहता है, “महाराज, आप निश्चिंत रहें! मैं आपके धनदौलत की देखभाल करूँगा!” और चक्रवर्ती सम्राट गृहस्थरत्न को परखने के लिए उसे नांव में साथ लेकर गंगा नदी की सैर पर निकलता है, और बीच नदी में कहता है, “गृहस्थ, मुझे स्वर्णचांदी का ढेर चाहिए!”

“महाराज! तब नांव को एक किनारे लगने दें!”

“दरअसल गृहस्थ, मुझे स्वर्णचांदी का ढेर ‘अभी इसी जगह’ चाहिए!”

तब गृहस्थरत्न अपने दोनों हाथों को जल में डुबोता है, स्वर्णचांदी से भरी हाँडी निकालता है, और चक्रवर्ती सम्राट को कहता है, “महाराज, इतना पर्याप्त है? क्या इतना करना पर्याप्त है? क्या इतनी अर्पित मात्रा पर्याप्त है?”

“इतना पर्याप्त है, गृहस्थ! इतना करना पर्याप्त है! इतनी अर्पित मात्रा पर्याप्त है!” ऐसा होता है गृहस्थरत्न, जो चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रादुर्भूत होता है।

फिर, चक्रवर्ती सम्राट के लिए सलाहकाररत्न प्रादुर्भुत होता है — विद्वान, ज्ञानी, मेधावी, सक्षम! जो चक्रवर्ती सम्राट को आगे बढ़ने-योग्य अवसर में आगे बढ़ाता, छोड़ने-योग्य अवसर में छुड़वाता, स्थापित-योग्य अवसर में स्थापित कराता! वह सलाहकाररत्न चक्रवर्ती सम्राट के पास जाकर कहता है, “महाराज, आप निश्चिंत रहें! मैं निर्देशित करूँगा!” ऐसा होता है सलाहकाररत्न, जो चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रादुर्भूत होता है। चक्रवर्ती सम्राट ऐसे सप्तरत्नों से संपन्न होता है।

चार शक्तियां क्या होती हैं, भिक्षुओं? चक्रवर्ती सम्राट अत्यंत रूपवान, आकर्षक, सजीला, परमवर्ण से संपन्न होता है, अन्य किसी भी मनुष्य से परे! यह चक्रवर्ती सम्राट की प्रथम शक्ति होती है।

चक्रवर्ती सम्राट दीर्घायु होता है, दीर्घकाल तक बने रहता है, अन्य किसी भी मनुष्य से परे! यह चक्रवर्ती सम्राट की द्वितीय शक्ति होती है।

चक्रवर्ती सम्राट निरोगी बने रहता है, रोगमुक्त और पाचनक्रिया सम बने रहती है, न बहुत शीतल, न बहुत उष्ण, अन्य किसी भी मनुष्य से परे! यह चक्रवर्ती सम्राट की तृतीय शक्ति होती है।

चक्रवर्ती सम्राट ब्राह्मणों एवं (वैश्य) गृहस्थों का प्रिय एवं पसंदीदा होता है। जैसे संतान के लिए पिता प्रिय एवं पसंदीदा होता है, उसी तरह चक्रवर्ती सम्राट ब्राह्मणों एवं गृहस्थों के लिए प्रिय एवं पसंदीदा होता है। ब्राह्मण एवं गृहस्थ भी चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रिय एवं पसंदीदा होते हैं। जैसे पिता के लिए संतान प्रिय एवं पसंदीदा होते हैं, उसी तरह ब्राह्मण एवं गृहस्थ भी चक्रवर्ती सम्राट के लिए प्रिय एवं पसंदीदा होते हैं। जब चक्रवर्ती सम्राट अपनी चार अंगोवाली सेना के साथ उद्यानभूमि से गुज़रता है, तब ब्राह्मण एवं गृहस्थ पास जाकर कहते हैं, “महाराज, मंद गति से गुज़रे! ताकि हम आपको देर तक देख सकें!” तब चक्रवर्ती सम्राट अपने रथसारथी को आदेश देता है, “सारथी, मंद गति से चलो! ताकि हमें ब्राह्मण एवं गृहस्थ देर तक देख सकें!” यह चक्रवर्ती सम्राट की चतुर्थ शक्ति होती है।


तो क्या लगता हैं, भिक्षुओं? क्या चक्रवर्ती सम्राट सप्तरत्नों एवं चार शक्तियों से संपन्न होकर सुख एवं खुशी का अनुभव करेगा?”

“भन्ते, चक्रवर्ती सम्राट किसी एक रत्न से भी अत्यंत सुख एवं खुशी का अनुभव करेगा! सप्तरत्नों एवं चार शक्तियों से संपन्न होने की बात ही क्या!”

तब भगवान ने एक पत्थर उठाया और भिक्षुओं से कहा, “तो क्या लगता है, भिक्षुओं? क्या बड़ा है? मेरे हाथ का यह पत्थर अथवा पर्वतराज हिमालय?”

“भन्ते! भगवान ने जो पत्थर उठाया, वह पर्वतराज हिमालय के आगे गिना भी नहीं जाएगा! वह एक अंश भी नहीं है! दोनों में कोई तुलना ही नहीं है!”

“उसी तरह, भिक्षुओं! जो चक्रवर्ती सम्राट सप्तरत्नों एवं चार शक्तियों से संपन्न होकर सुख एवं खुशी का अनुभव करेगा, वह स्वर्गिक सुख के आगे गिने भी न जाएंगे! वह एक अंश भी नहीं है! दोनों में कोई तुलना ही नहीं है!

और जब दीर्घकाल बीतने पर कदाचित एक समय आए कि उस बुद्धिमान को पुनः मनुष्यता प्राप्त हो — तब वह उच्चकुलीन परिवार में जन्म लेता है, जैसे महासंपत्तिशाली क्षत्रियकुल में, या महासंपत्तिशाली ब्राह्मणकुल में, या महासंपत्तिशाली (वैश्य) गृहस्थकुल में! तथा वह महाधनी, महाभोगशाली होता है! अनेकानेक संपदाओं का स्वामी! विशाल मुद्राकोष का धारक! अनेकानेक वस्तुसामग्री का मालिक! अनेकानेक उत्पाद-भंडारों का स्वामी! साथ ही वह रूपवान, आकर्षक, सजीला, परमवर्ण से संपन्न होता है। तथा उसे अन्नपान मिलता है, वस्त्र एवं गाड़ी मिलती है, माला, गन्ध एवं लेप मिलते हैं, शयन, आवास एवं दीपक मिलते हैं। और वह (उस राहतभरे जीवन में) काया से सदाचार, वाणी से सदाचार एवं मन से सदाचार करता है, और मरणोपरांत पुनः सद्गति होकर स्वर्ग में उपजता है।

जैसे भिक्षुओं! कोई जुआरी हो, जो प्रथम दांव में ही महाभोगसंपत्ति का भंडार जीत जाए। तब भी ऐसा सौभाग्यशाली दांव, जिसमे कोई महाभोगसंपत्ति का भंडार जीत जाए — अल्पमात्र ही होगा! किंतु कोई बुद्धिमान उससे भी अधिक लाभदायक, महासौभाग्यशाली दांव खेलता है, जब वह काया से सदाचार, वाणी से सदाचार एवं मन से सदाचार करता है और मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजता है। यह बुद्धिमत्ता की पराकाष्ठा है!”

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।

पालि

२४६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्‍चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –

‘‘तीणिमानि, भिक्खवे, बालस्स बाललक्खणानि बालनिमित्तानि बालापदानानि। कतमानि तीणि? इध, भिक्खवे, बालो दुच्‍चिन्तितचिन्ती च होति दुब्भासितभासी च दुक्‍कटकम्मकारी च। नो चेतं नो चेदं (सं॰ नि॰ ३.२७-२८), भिक्खवे, बालो दुच्‍चिन्तितचिन्ती च अभविस्स दुब्भासितभासी च दुक्‍कटकम्मकारी च केन नं न तेन नं (क॰), न नं (?) पण्डिता जानेय्युं – ‘बालो अयं भवं असप्पुरिसो’ति? यस्मा च खो, भिक्खवे, बालो दुच्‍चिन्तितचिन्ती च होति दुब्भासितभासी च दुक्‍कटकम्मकारी च तस्मा नं पण्डिता जानन्ति – ‘बालो अयं भवं असप्पुरिसो’ति। स खो सो, भिक्खवे, बालो तिविधं दिट्ठेव धम्मे दुक्खं दोमनस्सं पटिसंवेदेति। सचे, भिक्खवे, बालो सभायं वा निसिन्‍नो होति, रथिकाय रथियाय (बहूसु) वा निसिन्‍नो होति, सिङ्घाटके वा निसिन्‍नो होति; तत्र चे जनो तज्‍जं तस्सारुप्पं कथं मन्तेति। सचे, भिक्खवे, बालो पाणातिपाती होति, अदिन्‍नादायी होति, कामेसुमिच्छाचारी होति, मुसावादी होति, सुरामेरयमज्‍जपमादट्ठायी होति, तत्र, भिक्खवे, बालस्स एवं होति – ‘यं खो जनो तज्‍जं तस्सारुप्पं कथं मन्तेति, संविज्‍जन्तेव ते संविज्‍जन्ते ते च (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) धम्मा मयि, अहञ्‍च तेसु धम्मेसु सन्दिस्सामी’ति। इदं, भिक्खवे, बालो पठमं दिट्ठेव धम्मे दुक्खं दोमनस्सं पटिसंवेदेति।

२४७. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, बालो पस्सति राजानो चोरं आगुचारिं गहेत्वा विविधा कम्मकारणा कारेन्ते – कसाहिपि ताळेन्ते वेत्तेहिपि ताळेन्ते अद्धदण्डकेहिपि ताळेन्ते हत्थम्पि छिन्दन्ते पादम्पि छिन्दन्ते हत्थपादम्पि छिन्दन्ते कण्णम्पि छिन्दन्ते नासम्पि छिन्दन्ते कण्णनासम्पि छिन्दन्ते बिलङ्गथालिकम्पि करोन्ते सङ्खमुण्डिकम्पि करोन्ते राहुमुखम्पि करोन्ते जोतिमालिकम्पि करोन्ते हत्थपज्‍जोतिकम्पि करोन्ते एरकवत्तिकम्पि करोन्ते चीरकवासिकम्पि करोन्ते एणेय्यकम्पि करोन्ते बळिसमंसिकम्पि करोन्ते कहापणिकम्पि करोन्ते खारापतच्छिकम्पि खारापटिच्छकम्पि (क॰) करोन्ते पलिघपरिवत्तिकम्पि करोन्ते पलालपीठकम्पि पलालपिट्ठकम्पि (पी॰) करोन्ते तत्तेनपि तेलेन ओसिञ्‍चन्ते सुनखेहिपि खादापेन्ते जीवन्तम्पि सूले उत्तासेन्ते असिनापि सीसं छिन्दन्ते। तत्र, भिक्खवे, बालस्स एवं होति – ‘यथारूपानं खो पापकानं कम्मानं हेतु राजानो चोरं आगुचारिं गहेत्वा विविधा कम्मकारणा कारेन्ति – कसाहिपि ताळेन्ति…पे॰… असिनापि सीसं छिन्दन्ति; संविज्‍जन्तेव ते धम्मा मयि, अहञ्‍च तेसु धम्मेसु सन्दिस्सामि। मं चेपि राजानो सचे मम्पि (क॰) जानेय्युं, मम्पि राजानो गहेत्वा विविधा कम्मकारणा कारेय्युं – कसाहिपि ताळेय्युं…पे॰… जीवन्तम्पि सूले उत्तासेय्युं, असिनापि सीसं छिन्देय्यु’न्ति। इदम्पि, भिक्खवे, बालो दुतियं दिट्ठेव धम्मे दुक्खं दोमनस्सं पटिसंवेदेति।

२४८. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, बालं पीठसमारूळ्हं वा मञ्‍चसमारूळ्हं वा छमायं छमाय (सी॰ पी॰) वा सेमानं, यानिस्स पुब्बे पापकानि कम्मानि कतानि कायेन दुच्‍चरितानि वाचाय दुच्‍चरितानि मनसा दुच्‍चरितानि तानिस्स तम्हि समये ओलम्बन्ति अज्झोलम्बन्ति अभिप्पलम्बन्ति। सेय्यथापि, भिक्खवे, महतं पब्बतकूटानं छाया सायन्हसमयं पथविया ओलम्बन्ति अज्झोलम्बन्ति अभिप्पलम्बन्ति; एवमेव खो, भिक्खवे, बालं पीठसमारूळ्हं वा मञ्‍चसमारूळ्हं वा छमायं वा सेमानं, यानिस्स पुब्बे पापकानि कम्मानि कतानि कायेन दुच्‍चरितानि वाचाय दुच्‍चरितानि मनसा दुच्‍चरितानि तानिस्स तम्हि समये ओलम्बन्ति अज्झोलम्बन्ति अभिप्पलम्बन्ति। तत्र, भिक्खवे, बालस्स एवं होति – ‘अकतं वत मे कल्याणं, अकतं कुसलं, अकतं भीरुत्ताणं; कतं पापं, कतं लुद्दं, कतं किब्बिसं। यावता, भो, अकतकल्याणानं अकतकुसलानं अकतभीरुत्ताणानं कतपापानं कतलुद्दानं कतकिब्बिसानं गति तं गतिं पेच्‍च गच्छामी’ति। सो सोचति किलमति परिदेवति उरत्ताळिं कन्दति सम्मोहं आपज्‍जति। इदम्पि, भिक्खवे, बालो ततियं दिट्ठेव धम्मे दुक्खं दोमनस्सं पटिसंवेदेति।

‘‘स खो सो, भिक्खवे, बालो कायेन दुच्‍चरितं चरित्वा वाचाय दुच्‍चरितं चरित्वा मनसा दुच्‍चरितं चरित्वा कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्‍जति। यं खो तं, भिक्खवे, सम्मा वदमानो वदेय्य – ‘एकन्तं अनिट्ठं एकन्तं अकन्तं एकन्तं अमनाप’न्ति, निरयमेव तं सम्मा वदमानो वदेय्य – ‘एकन्तं अनिट्ठं एकन्तं अकन्तं एकन्तं अमनाप’न्ति। यावञ्‍चिदं, भिक्खवे, उपमापि उपमाहिपि (सी॰) न सुकरा याव दुक्खा निरया’’ति।

२४९. एवं वुत्ते, अञ्‍ञतरो भिक्खु भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सक्‍का पन, भन्ते, उपमं कातु’’न्ति? ‘‘सक्‍का भिक्खू’’ति भगवा अवोच। सेय्यथापि, भिक्खु, चोरं आगुचारिं गहेत्वा रञ्‍ञो दस्सेय्युं – ‘अयं खो, देव, चोरो आगुचारी, इमस्स यं इच्छसि तं दण्डं पणेही’ति। तमेनं राजा एवं वदेय्य – ‘गच्छथ, भो, इमं पुरिसं पुब्बण्हसमयं सत्तिसतेन हनथा’ति । तमेनं पुब्बण्हसमयं सत्तिसतेन हनेय्युं। अथ राजा मज्झन्हिकसमयं मज्झन्तिकसमयं (सी॰ स्या॰ कं॰ क॰), मज्झन्तिकं समयं (पी॰) एवं वदेय्य – ‘अम्भो, कथं सो पुरिसो’ति? ‘‘‘तथेव, देव, जीवती’ति। तमेनं राजा एवं वदेय्य – ‘गच्छथ, भो, तं पुरिसं मज्झन्हिकसमयं सत्तिसतेन हनथा’ति। तमेनं मज्झन्हिकसमयं सत्तिसतेन हनेय्युं। अथ राजा सायन्हसमयं एवं वदेय्य – ‘अम्भो, कथं सो पुरिसो’ति? ‘तथेव, देव, जीवती’ति। तमेनं राजा एवं वदेय्य – ‘गच्छथ, भो, तं पुरिसं सायन्हसमयं सत्तिसतेन हनथा’ति। तमेनं सायन्हसमयं सत्तिसतेन हनेय्युं। तं किं मञ्‍ञथ , भिक्खवे, अपि नु सो पुरिसो तीहि सत्तिसतेहि हञ्‍ञमानो ततोनिदानं दुक्खं दोमनस्सं पटिसंवेदियेथा’’ति? ‘‘एकिस्सापि, भन्ते, सत्तिया हञ्‍ञमानो सो पुरिसो ततोनिदानं दुक्खं दोमनस्सं पटिसंवेदियेथ, को पन वादो तीहि सत्तिसतेही’’ति?

२५०. अथ खो भगवा परित्तं पाणिमत्तं पासाणं गहेत्वा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, कतमो नु खो महन्ततरो – यो चायं मया परित्तो पाणिमत्तो पासाणो गहितो, यो च हिमवा पब्बतराजा’’ति? ‘‘अप्पमत्तको अयं, भन्ते, भगवता परित्तो पाणिमत्तो पासाणो गहितो, हिमवन्तं पब्बतराजानं उपनिधाय सङ्खम्पि न उपेति, कलभागम्पि न उपेति, उपनिधम्पि उपनिधिम्पि (सी॰ पी॰) न उपेति’’। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, यं सो पुरिसो तीहि सत्तिसतेहि हञ्‍ञमानो ततोनिदानं दुक्खं दोमनस्सं पटिसंवेदेति तं निरयकस्स दुक्खस्स उपनिधाय सङ्खम्पि न उपेति, कलभागम्पि न उपेति, उपनिधम्पि न उपेति’’।

‘‘तमेनं, भिक्खवे, निरयपाला पञ्‍चविधबन्धनं नाम कम्मकारणं करोन्ति – तत्तं अयोखिलं अयोखीलं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) हत्थे गमेन्ति, तत्तं अयोखिलं दुतिये हत्थे गमेन्ति, तत्तं अयोखिलं पादे गमेन्ति, तत्तं अयोखिलं दुतिये पादे गमेन्ति, तत्तं अयोखिलं मज्झे उरस्मिं गमेन्ति। सो तत्थ दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदेति, न च ताव कालं करोति याव न तं पापकम्मं ब्यन्तीहोति ब्यन्तिहोति (पी॰ क॰)। तमेनं, भिक्खवे, निरयपाला संवेसेत्वा कुठारीहि कुधारीहि (क॰) तच्छन्ति। सो तत्थ दुक्खा तिब्बा…पे॰… ब्यन्तीहोति। तमेनं, भिक्खवे, निरयपाला उद्धंपादं अधोसिरं गहेत्वा वासीहि तच्छन्ति। सो तत्थ दुक्खा तिब्बा…पे॰… ब्यन्तीहोति। तमेनं, भिक्खवे, निरयपाला रथे योजेत्वा आदित्ताय पथविया सम्पज्‍जलिताय सजोतिभूताय सञ्‍जोतिभूताय (स्या॰ कं॰ पी॰) सारेन्तिपि पच्‍चासारेन्तिपि । सो तत्थ दुक्खा तिब्बा…पे॰… ब्यन्तीहोति। तमेनं, भिक्खवे, निरयपाला महन्तं अङ्गारपब्बतं आदित्तं सम्पज्‍जलितं सजोतिभूतं आरोपेन्तिपि ओरोपेन्तिपि। सो तत्थ दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदेति, न च ताव कालं करोति याव न तं पापकम्मं ब्यन्तीहोति। तमेनं, भिक्खवे, निरयपाला उद्धंपादं अधोसिरं गहेत्वा तत्ताय लोहकुम्भिया पक्खिपन्ति आदित्ताय सम्पज्‍जलिताय सजोतिभूताय। सो तत्थ फेणुद्देहकं पच्‍चति। सो तत्थ फेणुद्देहकं पच्‍चमानो सकिम्पि उद्धं गच्छति, सकिम्पि अधो गच्छति, सकिम्पि तिरियं गच्छति। सो तत्थ दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदेति, न च ताव कालङ्करोति याव न तं पापकम्मं ब्यन्तीहोति। तमेनं, भिक्खवे, निरयपाला निरयपाला पुनप्पुनं (क॰) महानिरये पक्खिपन्ति। सो खो पन, भिक्खवे, महानिरयो –

‘‘चतुक्‍कण्णो चतुद्वारो, विभत्तो भागसो मितो।

अयोपाकारपरियन्तो, अयसा पटिकुज्‍जितो॥

‘‘तस्स अयोमया भूमि, जलिता तेजसा युता।

समन्ता योजनसतं, फरित्वा तिट्ठति सब्बदा’’॥

‘‘अनेकपरियायेनपि खो अहं, भिक्खवे, निरयकथं कथेय्यं; यावञ्‍चिदं, भिक्खवे, न सुकरा अक्खानेन पापुणितुं याव दुक्खा निरया।

२५१. ‘‘सन्ति, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा तिणभक्खा। ते अल्‍लानिपि तिणानि सुक्खानिपि तिणानि दन्तुल्‍लेहकं खादन्ति। कतमे च, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा तिणभक्खा? हत्थी अस्सा गोणा गद्रभा अजा मिगा, ये वा पनञ्‍ञेपि केचि तिरच्छानगता पाणा तिणभक्खा। स खो सो, भिक्खवे, बालो इध पुब्बे रसादो इध पापानि कम्मानि करित्वा कायस्स भेदा परं मरणा तेसं सत्तानं सहब्यतं उपपज्‍जति ये ते सत्ता तिणभक्खा।

‘‘सन्ति, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा गूथभक्खा। ते दूरतोव गूथगन्धं घायित्वा धावन्ति – ‘एत्थ भुञ्‍जिस्साम, एत्थ भुञ्‍जिस्सामा’ति। सेय्यथापि नाम ब्राह्मणा आहुतिगन्धेन धावन्ति – ‘एत्थ भुञ्‍जिस्साम, एत्थ भुञ्‍जिस्सामा’ति; एवमेव खो, भिक्खवे, सन्ति तिरच्छानगता पाणा गूथभक्खा, ते दूरतोव गूथगन्धं घायित्वा धावन्ति – ‘एत्थ भुञ्‍जिस्साम, एत्थ भुञ्‍जिस्सामा’ति। कतमे च, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा गूथभक्खा? कुक्‍कुटा सूकरा सोणा सिङ्गाला, ये वा पनञ्‍ञेपि केचि तिरच्छानगता पाणा गूथभक्खा। स खो सो, भिक्खवे, बालो इध पुब्बे रसादो इध पापानि कम्मानि करित्वा कायस्स भेदा परं मरणा तेसं सत्तानं सहब्यतं उपपज्‍जति ये ते सत्ता गूथभक्खा।

‘‘सन्ति, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा अन्धकारे जायन्ति अन्धकारे जीयन्ति जिय्यन्ति (क॰) अन्धकारे मीयन्ति मिय्यन्ति (क॰)। कतमे च, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा अन्धकारे जायन्ति अन्धकारे जीयन्ति अन्धकारे मीयन्ति? कीटा पुळवा पटङ्गा (स्या॰ कं॰ क॰) गण्डुप्पादा, ये वा पनञ्‍ञेपि केचि तिरच्छानगता पाणा अन्धकारे जायन्ति अन्धकारे जीयन्ति अन्धकारे मीयन्ति। स खो सो, भिक्खवे, बालो इध पुब्बे रसादो, इध पापानि कम्मानि करित्वा कायस्स भेदा परं मरणा तेसं सत्तानं सहब्यतं उपपज्‍जति ये ते सत्ता अन्धकारे जायन्ति अन्धकारे जीयन्ति अन्धकारे मीयन्ति।

‘‘सन्ति, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा उदकस्मिं जायन्ति उदकस्मिं जीयन्ति उदकस्मिं मीयन्ति। कतमे च, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा उदकस्मिं जायन्ति उदकस्मिं जीयन्ति उदकस्मिं मीयन्ति? मच्छा कच्छपा सुसुमारा, ये वा पनञ्‍ञेपि केचि तिरच्छानगता पाणा उदकस्मिं जायन्ति उदकस्मिं जीयन्ति उदकस्मिं मीयन्ति। स खो सो, भिक्खवे, बालो इध पुब्बे रसादो इध पापानि कम्मानि करित्वा कायस्स भेदा परं मरणा तेसं सत्तानं सहब्यतं उपपज्‍जति ये ते सत्ता उदकस्मिं जायन्ति उदकस्मिं जीयन्ति उदकस्मिं मीयन्ति।

‘‘सन्ति , भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा असुचिस्मिं जायन्ति असुचिस्मिं जीयन्ति असुचिस्मिं मीयन्ति। कतमे च, भिक्खवे, तिरच्छानगता पाणा असुचिस्मिं जायन्ति असुचिस्मिं जीयन्ति असुचिस्मिं मीयन्ति? ये ते, भिक्खवे, सत्ता पूतिमच्छे वा जायन्ति पूतिमच्छे वा जीयन्ति पूतिमच्छे वा मीयन्ति पूतिकुणपे वा…पे॰… पूतिकुम्मासे वा… चन्दनिकाय वा… ओलिगल्‍ले वा जायन्ति, (ये वा पनञ्‍ञेपि केचि तिरच्छानगता पाणा असुचिस्मिं जायन्ति असुचिस्मिं जीयन्ति असुचिस्मिं मीयन्ति।) ( ) नत्थि सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰ पोत्थकेसु स खो सो, भिक्खवे, बालो इध पुब्बे रसादो इध पापानि कम्मानि करित्वा कायस्स भेदा परं मरणा तेसं सत्तानं सहब्यतं उपपज्‍जति ये ते सत्ता असुचिस्मिं जायन्ति असुचिस्मिं जीयन्ति असुचिस्मिं मीयन्ति।

‘‘अनेकपरियायेनपि खो अहं, भिक्खवे, तिरच्छानयोनिकथं कथेय्यं; यावञ्‍चिदं, भिक्खवे, न सुकरं अक्खानेन पापुणितुं याव दुक्खा तिरच्छानयोनि।

२५२. ‘‘सेय्यथापि, भिक्खवे, पुरिसो एकच्छिग्गलं युगं महासमुद्दे पक्खिपेय्य। तमेनं पुरत्थिमो वातो पच्छिमेन संहरेय्य, पच्छिमो वातो पुरत्थिमेन संहरेय्य, उत्तरो वातो दक्खिणेन संहरेय्य, दक्खिणो वातो उत्तरेन संहरेय्य। तत्रास्स काणो कच्छपो, सो वस्ससतस्स वस्ससतस्स वस्ससतस्स वस्ससहस्सस्स वस्ससतसहस्सस्स (सी॰), वस्ससतस्स (स्या॰ कं॰ पी॰) अच्‍चयेन सकिं उम्मुज्‍जेय्य। तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, अपि नु सो काणो कच्छपो अमुस्मिं एकच्छिग्गले युगे गीवं पवेसेय्या’’ति? (‘‘नो हेतं, भन्ते’’।) ( ) नत्थि सी॰ पी॰ पोत्थकेसु ‘‘यदि पन यदि नून (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰), भन्ते, कदाचि करहचि दीघस्स अद्धुनो अच्‍चयेना’’ति। ‘‘खिप्पतरं खो सो, भिक्खवे, काणो कच्छपो अमुस्मिं एकच्छिग्गले युगे गीवं पवेसेय्य, अतो दुल्‍लभतराहं, भिक्खवे, मनुस्सत्तं वदामि सकिं विनिपातगतेन बालेन। तं किस्स हेतु? न हेत्थ, भिक्खवे, अत्थि धम्मचरिया समचरिया कुसलकिरिया पुञ्‍ञकिरिया। अञ्‍ञमञ्‍ञखादिका एत्थ, भिक्खवे, वत्तति दुब्बलखादिका’’।

‘‘स खो सो, भिक्खवे, बालो सचे कदाचि करहचि दीघस्स अद्धुनो अच्‍चयेन मनुस्सत्तं आगच्छति, यानि तानि नीचकुलानि – चण्डालकुलं वा नेसादकुलं वा वेनकुलं वेणकुलं (सी॰ पी॰) वा रथकारकुलं वा पुक्‍कुसकुलं वा। तथारूपे कुले पच्‍चाजायति दलिद्दे अप्पन्‍नपानभोजने कसिरवुत्तिके, यत्थ कसिरेन घासच्छादो लब्भति। सो च होति दुब्बण्णो दुद्दसिको ओकोटिमको बव्हाबाधो बह्वाबाधो (क॰) काणो वा कुणी वा खुज्‍जो वा पक्खहतो वा न लाभी अन्‍नस्स पानस्स वत्थस्स यानस्स मालागन्धविलेपनस्स सेय्यावसथपदीपेय्यस्स। सो कायेन दुच्‍चरितं चरति वाचाय दुच्‍चरितं चरति मनसा दुच्‍चरितं चरति। सो कायेन दुच्‍चरितं चरित्वा वाचाय दुच्‍चरितं चरित्वा मनसा दुच्‍चरितं चरित्वा कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्‍जति।

‘‘सेय्यथापि, भिक्खवे, अक्खधुत्तो पठमेनेव कलिग्गहेन पुत्तम्पि जीयेथ, दारम्पि जीयेथ, सब्बं सापतेय्यम्पि जीयेथ, उत्तरिपि अधिबन्धं अनुबन्धं (सी॰ पी॰), अद्धुबन्धं (स्या॰ कं॰) निगच्छेय्य। अप्पमत्तको सो, भिक्खवे, कलिग्गहो यं सो अक्खधुत्तो पठमेनेव कलिग्गहेन पुत्तम्पि जीयेथ, दारम्पि जीयेथ, सब्बं सापतेय्यम्पि जीयेथ, उत्तरिपि अधिबन्धं निगच्छेय्य। अथ खो अयमेव ततो महन्ततरो कलिग्गहो यं सो बालो कायेन दुच्‍चरितं चरित्वा वाचाय दुच्‍चरितं चरित्वा मनसा दुच्‍चरितं चरित्वा कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्‍जति। अयं, भिक्खवे, केवला परिपूरा केवलपरिपूरा (सी॰ पी॰) म॰ नि॰ १.२४४ पाळिया संसन्देतब्बा बालभूमी’’ति।

२५३. ‘‘तीणिमानि, भिक्खवे, पण्डितस्स पण्डितलक्खणानि पण्डितनिमित्तानि पण्डितापदानानि। कतमानि तीणि? इध, भिक्खवे, पण्डितो सुचिन्तितचिन्ती च होति सुभासितभासी च सुकतकम्मकारी च। नो चेतं, भिक्खवे, पण्डितो सुचिन्तितचिन्ती च अभविस्स सुभासितभासी च सुकतकम्मकारी च, केन नं न तेन नं (क॰), न नं (?) पण्डिता जानेय्युं – ‘पण्डितो अयं भवं सप्पुरिसो’ति? यस्मा च खो, भिक्खवे, पण्डितो सुचिन्तितचिन्ती च होति सुभासितभासी च सुकतकम्मकारी च तस्मा नं पण्डिता जानन्ति – ‘पण्डितो अयं भवं सप्पुरिसो’ति। स खो सो, भिक्खवे, पण्डितो तिविधं दिट्ठेव धम्मे सुखं सोमनस्सं पटिसंवेदेति। सचे, भिक्खवे, पण्डितो सभायं वा निसिन्‍नो होति, रथिकाय वा निसिन्‍नो होति, सिङ्घाटके वा निसिन्‍नो होति; तत्र चे जनो तज्‍जं तस्सारुप्पं कथं मन्तेति । सचे, भिक्खवे, पण्डितो पाणातिपाता पटिविरतो होति, अदिन्‍नादाना पटिविरतो होति, कामेसुमिच्छाचारा पटिविरतो होति, मुसावादा पटिविरतो होति, सुरामेरयमज्‍जप्पमादट्ठाना पटिविरतो होति; तत्र, भिक्खवे, पण्डितस्स एवं होति – ‘यं खो जनो तज्‍जं तस्सारुप्पं कथं मन्तेति; संविज्‍जन्तेव ते धम्मा मयि, अहञ्‍च तेसु धम्मेसु सन्दिस्सामी’ति। इदं, भिक्खवे, पण्डितो पठमं दिट्ठेव धम्मे सुखं सोमनस्सं पटिसंवेदेति।

२५४. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, पण्डितो पस्सति राजानो चोरं आगुचारिं गहेत्वा विविधा कम्मकारणा कारेन्ते – कसाहिपि ताळेन्ते वेत्तेहिपि ताळेन्ते अद्धदण्डकेहिपि ताळेन्ते हत्थम्पि छिन्दन्ते पादम्पि छिन्दन्ते हत्थपादम्पि छिन्दन्ते कण्णम्पि छिन्दन्ते नासम्पि छिन्दन्ते कण्णनासम्पि छिन्दन्ते बिलङ्गथालिकम्पि करोन्ते सङ्खमुण्डिकम्पि करोन्ते राहुमुखम्पि करोन्ते जोतिमालिकम्पि करोन्ते हत्थपज्‍जोतिकम्पि करोन्ते एरकवत्तिकम्पि करोन्ते चीरकवासिकम्पि करोन्ते एणेय्यकम्पि करोन्ते बलिसमंसिकम्पि करोन्ते कहापणिकम्पि करोन्ते खारापतच्छिकम्पि करोन्ते पलिघपरिवत्तिकम्पि करोन्ते पलालपीठकम्पि करोन्ते तत्तेनपि तेलेन ओसिञ्‍चन्ते सुनखेहिपि खादापेन्ते जीवन्तम्पि सूले उत्तासेन्ते असिनापि सीसं छिन्दन्ते। तत्र, भिक्खवे, पण्डितस्स एवं होति – ‘यथारूपानं खो पापकानं कम्मानं हेतु राजानो चोरं आगुचारिं गहेत्वा विविधा कम्मकारणा कारेन्ति कसाहिपि ताळेन्ति, वेत्तेहिपि ताळेन्ति, अद्धदण्डकेहिपि ताळेन्ति, हत्थम्पि छिन्दन्ति , पादम्पि छिन्दन्ति, हत्थपादम्पि छिन्दन्ति, कण्णम्पि छिन्दन्ति, नासम्पि छिन्दन्ति, कण्णनासम्पि छिन्दन्ति, बिलङ्गथालिकम्पि करोन्ति, सङ्खमुण्डिकम्पि करोन्ति, राहुमुखम्पि करोन्ति, जोतिमालिकम्पि करोन्ति, हत्थपज्‍जोतिकम्पि करोन्ति, एरकवत्तिकम्पि करोन्ति, चीरकवासिकम्पि करोन्ति, एणेय्यकम्पि करोन्ति, बलिसमंसिकम्पि करोन्ति, कहापणिकम्पि करोन्ति, खारापतच्छिकम्पि करोन्ति, पलिघपरिवत्तिकम्पि करोन्ति, पलालपीठकम्पि करोन्ति, तत्तेनपि तेलेन ओसिञ्‍चन्ति, सुनखेहिपि खादापेन्ति, जीवन्तम्पि सूले उत्तासेन्ति, असिनापि सीसं छिन्दन्ति, न ते धम्मा मयि संविज्‍जन्ति, अहञ्‍च न तेसु धम्मेसु सन्दिस्सामी’ति। इदम्पि, भिक्खवे, पण्डितो दुतियं दिट्ठेव धम्मे सुखं सोमनस्सं पटिसंवेदेति।

२५५. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, पण्डितं पीठसमारूळ्हं वा मञ्‍चसमारूळ्हं वा छमायं वा सेमानं, यानिस्स पुब्बे कल्याणानि कम्मानि कतानि कायेन सुचरितानि वाचाय सुचरितानि मनसा सुचरितानि तानिस्स तम्हि समये ओलम्बन्ति…पे॰… सेय्यथापि, भिक्खवे, महतं पब्बतकूटानं छाया सायन्हसमयं पथविया ओलम्बन्ति अज्झोलम्बन्ति अभिप्पलम्बन्ति; एवमेव खो, भिक्खवे, पण्डितं पीठसमारूळ्हं वा मञ्‍चसमारूळ्हं वा छमायं वा सेमानं यानिस्स पुब्बे कल्याणानि कम्मानि कतानि कायेन सुचरितानि वाचाय सुचरितानि मनसा सुचरितानि तानिस्स तम्हि समये ओलम्बन्ति अज्झोलम्बन्ति अभिप्पलम्बन्ति। तत्र, भिक्खवे, पण्डितस्स एवं होति – ‘अकतं वत मे पापं, अकतं लुद्दं, अकतं किब्बिसं; कतं कल्याणं, कतं कुसलं, कतं भीरुत्ताणं। यावता, भो, अकतपापानं अकतलुद्दानं अकतकिब्बिसानं कतकल्याणानं कतकुसलानं कतभीरुत्ताणानं गति तं गतिं पेच्‍च गच्छामी’ति। सो न सोचति, न किलमति, न परिदेवति, न उरत्ताळिं कन्दति, न सम्मोहं आपज्‍जति। इदम्पि, भिक्खवे, पण्डितो ततियं दिट्ठेव धम्मे सुखं सोमनस्सं पटिसंवेदेति।

‘‘स खो सो, भिक्खवे, पण्डितो कायेन सुचरितं चरित्वा वाचाय सुचरितं चरित्वा मनसा सुचरितं चरित्वा कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्‍जति। यं खो तं, भिक्खवे, सम्मा वदमानो वदेय्य – ‘एकन्तं इट्ठं एकन्तं कन्तं एकन्तं मनाप’न्ति, सग्गमेव तं सम्मा वदमानो वदेय्य – ‘एकन्तं इट्ठं एकन्तं कन्तं एकन्तं मनाप’न्ति। यावञ्‍चिदं, भिक्खवे, उपमापि न सुकरा याव सुखा सग्गा’’ति।

२५६. एवं वुत्ते, अञ्‍ञतरो भिक्खु भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सक्‍का पन, भन्ते, उपमं कातु’’न्ति? ‘‘सक्‍का भिक्खू’’ति भगवा अवोच। ‘‘सेय्यथापि, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती सत्तहि रतनेहि समन्‍नागतो चतूहि च इद्धीहि ततोनिदानं सुखं सोमनस्सं पटिसंवेदेति। कतमेहि सत्तहि? इध, भिक्खवे, रञ्‍ञो खत्तियस्स मुद्धावसित्तस्स तदहुपोसथे पन्‍नरसे सीसंन्हातस्स उपोसथिकस्स उपरिपासादवरगतस्स दिब्बं चक्‍करतनं पातुभवति सहस्सारं सनेमिकं सनाभिकं सब्बाकारपरिपूरं। तं दिस्वान रञ्‍ञो खत्तियस्स मुद्धावसित्तस्स एवं होति एतदहोसि (स्या॰ कं॰ क॰) – ‘सुतं खो पन मेतं यस्स रञ्‍ञो खत्तियस्स मुद्धावसित्तस्स तदहुपोसथे पन्‍नरसे सीसंन्हातस्स उपोसथिकस्स उपरिपासादवरगतस्स दिब्बं चक्‍करतनं पातुभवति सहस्सारं सनेमिकं सनाभिकं सब्बाकारपरिपूरं, सो होति राजा चक्‍कवत्तीति। अस्सं नु खो अहं राजा चक्‍कवत्ती’’’ति?

‘‘अथ खो, भिक्खवे, राजा खत्तियो मुद्धावसित्तो वामेन हत्थेन भिङ्कारं गहेत्वा दक्खिणेन हत्थेन चक्‍करतनं अब्भुक्‍किरति – ‘पवत्ततु भवं चक्‍करतनं, अभिविजिनातु भवं चक्‍करतन’न्ति। अथ खो तं, भिक्खवे, चक्‍करतनं पुरत्थिमं दिसं पवत्तति। अन्वदेव राजा चक्‍कवत्ती सद्धिं चतुरङ्गिनिया सेनाय। यस्मिं खो पन, भिक्खवे, पदेसे चक्‍करतनं पतिट्ठाति तत्थ राजा चक्‍कवत्ती वासं उपेति सद्धिं चतुरङ्गिनिया सेनाय। ये खो पन, भिक्खवे , पुरत्थिमाय दिसाय पटिराजानो ते राजानं चक्‍कवत्तिं उपसङ्कमित्वा एवमाहंसु – ‘एहि खो, महाराज! स्वागतं ते, महाराज स्वागतं महाराज (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)! सकं ते, महाराज! अनुसास, महाराजा’ति । राजा चक्‍कवत्ती एवमाह – ‘पाणो न हन्तब्बो, अदिन्‍नं नादातब्बं, कामेसुमिच्छा न चरितब्बा, मुसा न भासितब्बा, मज्‍जं न पातब्बं, यथाभुत्तञ्‍च भुञ्‍जथा’ति। ये खो पन, भिक्खवे, पुरत्थिमाय दिसाय पटिराजानो ते रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स अनुयन्ता अनुयुत्ता (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) भवन्ति अहेसुं (स्या॰ कं॰ क॰)।

२५७. ‘‘अथ खो तं, भिक्खवे, चक्‍करतनं पुरत्थिमं समुद्दं अज्झोगाहेत्वा अज्झोगहेत्वा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) पच्‍चुत्तरित्वा दक्खिणं दिसं पवत्तति…पे॰… दक्खिणं समुद्दं अज्झोगाहेत्वा पच्‍चुत्तरित्वा पच्छिमं दिसं पवत्तति… पच्छिमं समुद्दं अज्झोगाहेत्वा पच्‍चुत्तरित्वा उत्तरं दिसं पवत्तति अन्वदेव राजा चक्‍कवत्ती सद्धिं चतुरङ्गिनिया सेनाय। यस्मिं खो पन, भिक्खवे, पदेसे चक्‍करतनं पतिट्ठाति तत्थ राजा चक्‍कवत्ती वासं उपेति सद्धिं चतुरङ्गिनिया सेनाय।

‘‘ये खो पन, भिक्खवे, उत्तराय दिसाय पटिराजानो ते राजानं चक्‍कवत्तिं उपसङ्कमित्वा एवमाहंसु – ‘एहि खो, महाराज! स्वागतं ते, महाराज! सकं ते, महाराज! अनुसास, महाराजा’ति। राजा चक्‍कवत्ती एवमाह – ‘पाणो न हन्तब्बो, अदिन्‍नं नादातब्बं, कामेसुमिच्छा न चरितब्बा, मुसा न भासितब्बा, मज्‍जं न पातब्बं; यथाभुत्तञ्‍च भुञ्‍जथा’ति। ये खो पन, भिक्खवे, उत्तराय दिसाय पटिराजानो ते रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स अनुयन्ता भवन्ति।

‘‘अथ खो तं, भिक्खवे, चक्‍करतनं समुद्दपरियन्तं पथविं अभिविजिनित्वा तमेव राजधानिं पच्‍चागन्त्वा रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स अन्तेपुरद्वारे अक्खाहतं मञ्‍ञे तिट्ठति रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स अन्तेपुरद्वारं उपसोभयमानं। रञ्‍ञो, भिक्खवे, चक्‍कवत्तिस्स एवरूपं चक्‍करतनं पातुभवति।

२५८. ‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स हत्थिरतनं पातुभवति – सब्बसेतो सत्तप्पतिट्ठो इद्धिमा वेहासङ्गमो उपोसथो नाम नागराजा। तं दिस्वान रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स चित्तं पसीदति – ‘भद्दकं वत, भो, हत्थियानं, सचे दमथं उपेय्या’ति। अथ खो तं, भिक्खवे, हत्थिरतनं सेय्यथापि नाम भद्दो हत्थाजानीयो दीघरत्तं सुपरिदन्तो एवमेव दमथं उपेति। भूतपुब्बं, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती तमेव हत्थिरतनं वीमंसमानो पुब्बण्हसमयं अभिरुहित्वा समुद्दपरियन्तं पथविं अनुसंयायित्वा तमेव राजधानिं पच्‍चागन्त्वा पातरासमकासि। रञ्‍ञो, भिक्खवे, चक्‍कवत्तिस्स एवरूपं हत्थिरतनं पातुभवति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स अस्सरतनं पातुभवति – सब्बसेतो काळसीसो मुञ्‍जकेसो इद्धिमा वेहासङ्गमो वलाहको नाम अस्सराजा। तं दिस्वान रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स चित्तं पसीदति – ‘भद्दकं वत, भो, अस्सयानं, सचे दमथं उपेय्या’ति। अथ खो तं, भिक्खवे, अस्सरतनं सेय्यथापि नाम भद्दो अस्साजानीयो दीघरत्तं सुपरिदन्तो एवमेव दमथं उपेति। भूतपुब्बं, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती तमेव अस्सरतनं वीमंसमानो पुब्बण्हसमयं अभिरुहित्वा समुद्दपरियन्तं पथविं अनुसंयायित्वा तमेव राजधानिं पच्‍चागन्त्वा पातरासमकासि। रञ्‍ञो, भिक्खवे, चक्‍कवत्तिस्स एवरूपं अस्सरतनं पातुभवति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स मणिरतनं पातुभवति। सो होति मणि वेळुरियो सुभो जातिमा अट्ठंसो सुपरिकम्मकतो । तस्स खो पन, भिक्खवे, मणिरतनस्स आभा समन्ता योजनं फुटा होति। भूतपुब्बं, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती तमेव मणिरतनं वीमंसमानो चतुरङ्गिनिं सेनं सन्‍नय्हित्वा मणिं धजग्गं आरोपेत्वा रत्तन्धकारतिमिसाय पायासि। ये खो पन, भिक्खवे, समन्ता गामा अहेसुं ते तेनोभासेन कम्मन्ते पयोजेसुं ‘दिवा’ति मञ्‍ञमाना। रञ्‍ञो, भिक्खवे, चक्‍कवत्तिस्स एवरूपं मणिरतनं पातुभवति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स इत्थिरतनं पातुभवति। सा अभिरूपा दस्सनीया पासादिका परमाय वण्णपोक्खरताय समन्‍नागता नातिदीघा नातिरस्सा नातिकिसा नातिथूला नातिकाळिका नातिकाळी (सी॰ पी॰) नाच्‍चोदाता, अतिक्‍कन्ता मानुसं वण्णं, अप्पत्ता दिब्बं वण्णं। तस्स खो पन, भिक्खवे, इत्थिरतनस्स एवरूपो कायसम्फस्सो होति सेय्यथापि नाम तूलपिचुनो वा कप्पासपिचुनो वा। तस्स खो पन, भिक्खवे, इत्थिरतनस्स सीते उण्हानि गत्तानि होन्ति, उण्हे सीतानि गत्तानि होन्ति। तस्स खो पन, भिक्खवे, इत्थिरतनस्स कायतो चन्दनगन्धो वायति, मुखतो उप्पलगन्धो वायति। तं खो पन, भिक्खवे, इत्थिरतनं रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स पुब्बुट्ठायिनी होति पच्छानिपातिनी किंकारपटिस्साविनी मनापचारिनी पियवादिनी। तं खो पन, भिक्खवे, इत्थिरतनं राजानं चक्‍कवत्तिं मनसापि नो अतिचरति, कुतो पन कायेन? रञ्‍ञो, भिक्खवे, चक्‍कवत्तिस्स एवरूपं इत्थिरतनं पातुभवति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स गहपतिरतनं पातुभवति। तस्स कम्मविपाकजं दिब्बचक्खु पातुभवति, येन निधिं पस्सति सस्सामिकम्पि अस्सामिकम्पि। सो राजानं चक्‍कवत्तिं उपसङ्कमित्वा एवमाह – ‘अप्पोस्सुक्‍को त्वं, देव, होहि। अहं ते धनेन धनकरणीयं धनेन करणीयं (क॰) करिस्सामी’ति। भूतपुब्बं, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती तमेव गहपतिरतनं वीमंसमानो नावं अभिरुहित्वा मज्झे गङ्गाय नदिया सोतं ओगाहित्वा ओगहेत्वा (सी॰ पी॰) गहपतिरतनं एतदवोच – ‘अत्थो मे, गहपति, हिरञ्‍ञसुवण्णेना’ति। ‘तेन हि, महाराज, एकं तीरं नावा उपेतू’ति। ‘इधेव मे, गहपति, अत्थो हिरञ्‍ञसुवण्णेना’ति। अथ खो तं, भिक्खवे, गहपतिरतनं उभोहि हत्थेहि उदके ओमसित्वा पूरं हिरञ्‍ञसुवण्णस्स कुम्भिं उद्धरित्वा राजानं चक्‍कवत्तिं एतदवोच – ‘अलमेत्तावता, महाराज! कतमेत्तावता, महाराज! पूजितमेत्तावता, महाराजा’ति। राजा चक्‍कवत्ती एवमाह – ‘अलमेत्तावता, गहपति! कतमेत्तावता, गहपति! पूजितमेत्तावता, गहपती’ति । रञ्‍ञो, भिक्खवे, चक्‍कवत्तिस्स एवरूपं गहपतिरतनं पातुभवति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, रञ्‍ञो चक्‍कवत्तिस्स परिणायकरतनं पातुभवति – पण्डितो ब्यत्तो मेधावी पटिबलो राजानं चक्‍कवत्तिं उपयापेतब्बं उपयापेतुं उपट्ठपेतब्बं उपट्ठपेतुं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) अपयापेतब्बं अपयापेतुं ठपेतब्बं ठपेतुं। सो राजानं चक्‍कवत्तिं उपसङ्कमित्वा एवमाह – ‘अप्पोस्सुक्‍को त्वं , देव, होहि। अहमनुसासिस्सामी’ति। रञ्‍ञो, भिक्खवे, चक्‍कवत्तिस्स एवरूपं परिणायकरतनं पातुभवति। राजा, भिक्खवे, चक्‍कवत्ती इमेहि सत्तहि रतनेहि समन्‍नागतो होति।

२५९. ‘‘कतमाहि चतूहि इद्धीहि? इध, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती अभिरूपो होति दस्सनीयो पासादिको परमाय वण्णपोक्खरताय समन्‍नागतो अतिविय अञ्‍ञेहि मनुस्सेहि। राजा, भिक्खवे, चक्‍कवत्ती इमाय पठमाय इद्धिया समन्‍नागतो होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती दीघायुको होति चिरट्ठितिको अतिविय अञ्‍ञेहि मनुस्सेहि। राजा, भिक्खवे, चक्‍कवत्ती इमाय दुतियाय इद्धिया समन्‍नागतो होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती अप्पाबाधो होति अप्पातङ्को समवेपाकिनिया गहणिया समन्‍नागतो नातिसीताय नाच्‍चुण्हाय अतिविय अञ्‍ञेहि मनुस्सेहि। राजा, भिक्खवे, चक्‍कवत्ती इमाय ततियाय इद्धिया समन्‍नागतो होति।

‘‘पुन चपरं, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती ब्राह्मणगहपतिकानं पियो होति मनापो। सेय्यथापि, भिक्खवे, पिता पुत्तानं पियो होति मनापो, एवमेव खो, भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती ब्राह्मणगहपतिकानं पियो होति मनापो। रञ्‍ञोपि, भिक्खवे, चक्‍कवत्तिस्स ब्राह्मणगहपतिका पिया होन्ति मनापा। सेय्यथापि, भिक्खवे, पितु पुत्ता पिया होन्ति मनापा, एवमेव खो, भिक्खवे, रञ्‍ञोपि चक्‍कवत्तिस्स ब्राह्मणगहपतिका पिया होन्ति मनापा।

‘‘भूतपुब्बं , भिक्खवे, राजा चक्‍कवत्ती चतुरङ्गिनिया सेनाय उय्यानभूमिं निय्यासि। अथ खो, भिक्खवे, ब्राह्मणगहपतिका राजानं चक्‍कवत्तिं उपसङ्कमित्वा एवमाहंसु – ‘अतरमानो, देव, याहि यथा तं मयं चिरतरं पस्सेय्यामा’ति। राजापि, भिक्खवे, चक्‍कवत्ती सारथिं आमन्तेसि – ‘अतरमानो , सारथि, पेसेहि यथा मं ब्राह्मणगहपतिका चिरतरं पस्सेय्यु’न्ति। राजा, भिक्खवे, चक्‍कवत्ती इमाय चतुत्थाय इद्धिया समन्‍नागतो होति। राजा, भिक्खवे, चक्‍कवत्ती इमाहि चतूहि इद्धीहि समन्‍नागतो होति।

‘‘तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, अपि नु खो राजा चक्‍कवत्ती इमेहि सत्तहि रतनेहि समन्‍नागतो इमाहि चतूहि च इद्धीहि ततोनिदानं सुखं सोमनस्सं पटिसंवेदियेथा’’ति? ‘‘एकमेकेनपि, भन्ते, रतनेन तेन रतनेन (सी॰) समन्‍नागतो राजा चक्‍कवत्ती ततोनिदानं सुखं सोमनस्सं पटिसंवेदियेथ, को पन वादो सत्तहि रतनेहि चतूहि च इद्धीही’’ति?

२६०. अथ खो भगवा परित्तं पाणिमत्तं पासाणं गहेत्वा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘तं किं मञ्‍ञथ, भिक्खवे, कतमो नु खो महन्ततरो – यो चायं मया परित्तो पाणिमत्तो पासाणो गहितो यो च हिमवा पब्बतराजा’’ति? ‘‘अप्पमत्तको अयं, भन्ते, भगवता परित्तो पाणिमत्तो पासाणो गहितो; हिमवन्तं पब्बतराजानं उपनिधाय सङ्खम्पि न उपेति; कलभागम्पि न उपेति; उपनिधम्पि न उपेती’’ति। ‘‘एवमेव खो, भिक्खवे, यं राजा चक्‍कवत्ती सत्तहि रतनेहि समन्‍नागतो चतूहि च इद्धीहि ततोनिदानं सुखं सोमनस्सं पटिसंवेदेति तं दिब्बस्स सुखस्स उपनिधाय सङ्खम्पि न उपेति; कलभागम्पि न उपेति; उपनिधम्पि न उपेति’’।

‘‘स खो सो, भिक्खवे, पण्डितो सचे कदाचि करहचि दीघस्स अद्धुनो अच्‍चयेन मनुस्सत्तं आगच्छति, यानि तानि उच्‍चाकुलानि – खत्तियमहासालकुलं वा ब्राह्मणमहासालकुलं वा गहपतिमहासालकुलं वा तथारूपे कुले पच्‍चाजायति अड्ढे महद्धने महाभोगे पहूतजातरूपरजते पहूतवित्तूपकरणे पहूतधनधञ्‍ञे। सो च होति अभिरूपो दस्सनीयो पासादिको परमाय वण्णपोक्खरताय समन्‍नागतो, लाभी अन्‍नस्स पानस्स वत्थस्स यानस्स मालागन्धविलेपनस्स सेय्यावसथपदीपेय्यस्स। सो कायेन सुचरितं चरति, वाचाय सुचरितं चरति, मनसा सुचरितं चरति। सो कायेन सुचरितं चरित्वा, वाचाय सुचरितं चरित्वा, मनसा सुचरितं चरित्वा, कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्‍जति। सेय्यथापि, भिक्खवे, अक्खधुत्तो पठमेनेव कटग्गहेन महन्तं भोगक्खन्धं अधिगच्छेय्य; अप्पमत्तको सो, भिक्खवे, कटग्गहो यं सो अक्खधुत्तो पठमेनेव कटग्गहेन महन्तं भोगक्खन्धं अधिगच्छेय्य। अथ खो अयमेव ततो महन्ततरो कटग्गहो यं सो पण्डितो कायेन सुचरितं चरित्वा, वाचाय सुचरितं चरित्वा, मनसा सुचरितं चरित्वा कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्‍जति। अयं, भिक्खवे, केवला परिपूरा पण्डितभूमी’’ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।

बालपण्डितसुत्तं निट्ठितं नवमं।

विषय: