
एक शुभरात्री
सूत्र परिचय
ध्यान करने वाले साधकों का यह एक पसंदीदा सूत्र है। इसमें प्रसिद्ध भद्देकरत्त गाथाओं का आधार लेकर विपश्यना के बारे में सिखाया गया है। विपश्यना को आमतौर पर ‘अंतर्दृष्टि’ या ‘अंतर्बोध’ कहा जाता है, जो तब उत्पन्न होता है, जब कोई अपने भीतर के किसी स्वभाव को किसी ऐसे विशेष संज्ञा से देखता है कि उसका चित्त उस स्वभाव से मुक्त होने लगता है।
हिन्दी
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं से कहा, “भिक्षुओं!"
“भदंत”, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया। भगवान ने कहा —
“भिक्षुओं, मैं तुम्हें एक शुभ रात्री को उद्देश्य और विश्लेषण के साथ बताता हूँ। ध्यान देकर गौर से सुनो। मैं बताता हूँ।”
“ठीक है, भंते!” भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया।
भगवान ने कहा:
न भागे ओर अतीत की,
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।
स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।
आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।
ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।
स्पष्टीकरण
अतीत की ओर भागना
और, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर कैसे भागता है?
कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने लगता है—
- ‘अतीत में मेरा ऐसा रूप था’
- ‘अतीत में मेरी ऐसी वेदना (अनुभूति) थी’
- ‘अतीत में मेरी ऐसी संज्ञा थी’
- ‘अतीत में मेरा ऐसा संस्कार था’
- ‘अतीत में मेरा ऐसा विज्ञान था’
—इस तरह, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर भागता है।
और, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर कैसे नहीं भागता है?
कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने नहीं लगता है कि—
- ‘अतीत में मेरा ऐसा रूप था’
- ‘अतीत में मेरी ऐसी वेदना थी’
- ‘अतीत में मेरी ऐसी संज्ञा थी’
- ‘अतीत में मेरा ऐसा संस्कार था’
- ‘अतीत में मेरा ऐसा विज्ञान था’
—इस तरह, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर नहीं भागता है।
भविष्य की ताक
और, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक कैसे लगाता है?
कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने लगता है—
- ‘भविष्य में मेरा ऐसा रूप होगा’
- ‘भविष्य में मेरी ऐसी वेदना होगी’
- ‘भविष्य में मेरी ऐसी संज्ञा होगी’
- ‘भविष्य में मेरा ऐसा संस्कार होगा’
- ‘भविष्य में मेरा ऐसा विज्ञान होगा’
—इस तरह, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक लगाता है।
और, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक कैसे नहीं लगाता है?
कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने नहीं लगता है कि—
- ‘भविष्य में मेरा ऐसा रूप होगा’
- ‘भविष्य में मेरी ऐसी वेदना होगी’
- ‘भविष्य में मेरी ऐसी संज्ञा होगी’
- ‘भविष्य में मेरा ऐसा संस्कार होगा’
- ‘भविष्य में मेरा ऐसा विज्ञान होगा’
—इस तरह, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक नहीं लगाता है।
वर्तमान में डगमगाना
और, भिक्षुओं, वर्तमान में उत्पन्न धम्म (स्वभाव) से डगमगाना क्या होता है?
भिक्षुओं, कोई धम्म न सुना, आम आदमी हो, जो आर्यजनों के दर्शन से वंचित, आर्य-धम्म से अपरिचित, आर्य-धम्म में अनुशासित न हो; या सत्पुरुषों के दर्शन से वंचित, सत्पुरूष-धम्म से अपरिचित, सत्पुरूष-धम्म में अनुशासित न हो—
- वह रूप को आत्मा मानता है, या आत्मा को रूपवान मानता है, या आत्मा में रूप देखता है, या रूप में आत्मा देखता है।
- वह वेदना को आत्मा मानता है…
- वह संज्ञा को आत्मा मानता है…
- वह संस्कार को आत्मा मानता है…
- वह विज्ञान को आत्मा मानता है, या आत्मा को विज्ञानवान मानता है, या आत्मा में विज्ञान देखता है, या विज्ञान में आत्मा देखता है। 1
—इस तरह, भिक्षुओं, कोई वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता है।
और, भिक्षुओं, वर्तमान में उत्पन्न धम्म से न डगमगाना क्या होता है?
भिक्षुओं, कोई धम्म सुना आर्यश्रावक हो, जो आर्यजनों के दर्शन से लाभान्वित, आर्य-धम्म से परिचित, आर्य-धम्म में अनुशासित हो; या सत्पुरुषों के दर्शन से लाभान्वित, सत्पुरूष-धम्म से परिचित, सत्पुरूष-धम्म में अनुशासित हो—
- वह रूप को आत्मा नहीं मानता है, या आत्मा को रूपवान नहीं मानता है, या आत्मा में रूप नहीं देखता है, या रूप में आत्मा नहीं देखता है।
- वह वेदना को आत्मा नहीं मानता है…
- वह संज्ञा को आत्मा नहीं मानता है…
- वह संस्कार को आत्मा नहीं मानता है…
- वह विज्ञान को आत्मा नहीं मानता है, या आत्मा को विज्ञानवान नहीं मानता है, या आत्मा में विज्ञान नहीं देखता है, या विज्ञान में आत्मा नहीं देखता है।
—इस तरह, भिक्षुओं, कोई वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता नहीं है।
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।
स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।
आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।
ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।
जो मैंने कहा था, भिक्षुओं, ‘मैं तुम्हें एक शुभ रात्री को उद्देश्य और विश्लेषण के साथ बताता हूँ’, इसी के बारे में कहा था।"
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
सुत्र समाप्त।
यही परिभाषा सक्कायदिट्ठी या स्व-धारणा नामक संयोजन की है, जिसे मज्झिमनिकाय ४४ इत्यादि में भी बताया गया है। ↩︎
पालि
२७२. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तत्र खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘भिक्खवो’’ति। ‘‘भदन्ते’’ति ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच – ‘‘भद्देकरत्तस्स वो, भिक्खवे, उद्देसञ्च विभङ्गञ्च देसेस्सामि। तं सुणाथ, साधुकं मनसि करोथ; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो ते भिक्खू भगवतो पच्चस्सोसुं। भगवा एतदवोच –
‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।
यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्च अनागतं॥
‘‘पच्चुप्पन्नञ्च यो यं (नेत्तिपाळि) धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।
असंहीरं असंहिरं (स्या॰ कं॰ क॰) असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥
‘‘अज्जेव किच्चमातप्पं किच्चं आतप्पं (सी॰ क॰), को जञ्ञा मरणं सुवे।
न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्चुना॥
‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।
तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनि’’ मुनीति (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)॥
२७३. ‘‘कथञ्च , भिक्खवे, अतीतं अन्वागमेति? ‘एवंरूपो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, ‘एवंवेदनो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, ‘एवंसञ्ञो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, ‘एवंसङ्खारो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, ‘एवंविञ्ञाणो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति – एवं खो, भिक्खवे, अतीतं अन्वागमेति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, अतीतं नान्वागमेति? ‘एवंरूपो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, ‘एवंवेदनो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, ‘एवंसञ्ञो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, ‘एवंसङ्खारो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, ‘एवंविञ्ञाणो अहोसिं अतीतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति – एवं खो, भिक्खवे, अतीतं नान्वागमेति।
२७४. ‘‘कथञ्च, भिक्खवे, अनागतं पटिकङ्खति? ‘एवंरूपो सियं अनागतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, एवंवेदनो सियं…पे॰… एवंसञ्ञो सियं… एवंसङ्खारो सियं… एवंविञ्ञाणो सियं अनागतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति – एवं खो, भिक्खवे, अनागतं पटिकङ्खति।
‘‘कथञ्च, भिक्खवे, अनागतं नप्पटिकङ्खति? ‘एवंरूपो सियं अनागतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, एवंवेदनो सियं … एवंसञ्ञो सियं… एवंसङ्खारो सियं… ‘एवंविञ्ञाणो सियं अनागतमद्धान’न्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति – एवं खो, भिक्खवे, अनागतं नप्पटिकङ्खति।
२७५. ‘‘कथञ्च, भिक्खवे, पच्चुप्पन्नेसु धम्मेसु संहीरति? इध, भिक्खवे, अस्सुतवा पुथुज्जनो अरियानं अदस्सावी अरियधम्मस्स अकोविदो अरियधम्मे अविनीतो सप्पुरिसानं अदस्सावी सप्पुरिसधम्मस्स अकोविदो सप्पुरिसधम्मे अविनीतो रूपं अत्ततो समनुपस्सति, रूपवन्तं वा अत्तानं, अत्तनि वा रूपं, रूपस्मिं वा अत्तानं; वेदनं…पे॰… सञ्ञं… सङ्खारे… विञ्ञाणं अत्ततो समनुपस्सति, विञ्ञाणवन्तं वा अत्तानं अत्तनि वा विञ्ञाणं, विञ्ञाणस्मिं वा अत्तानं – एवं खो, भिक्खवे, पच्चुप्पन्नेसु धम्मेसु संहीरति।
‘‘कथञ्च , भिक्खवे, पच्चुप्पन्नेसु धम्मेसु न संहीरति? इध, भिक्खवे, सुतवा अरियसावको अरियानं दस्सावी अरियधम्मस्स कोविदो अरियधम्मे सुविनीतो सप्पुरिसानं दस्सावी सप्पुरिसधम्मस्स कोविदो सप्पुरिसधम्मे सुविनीतो न रूपं अत्ततो समनुपस्सति, न रूपवन्तं वा अत्तानं, न अत्तनि वा रूपं, न रूपस्मिं वा अत्तानं; न वेदनं… न सञ्ञं… न सङ्खारे… न विञ्ञाणं अत्ततो समनुपस्सति, न विञ्ञाणवन्तं वा अत्तानं, न अत्तनि वा विञ्ञाणं, न विञ्ञाणस्मिं वा अत्तानं – एवं खो, भिक्खवे, पच्चुप्पन्नेसु धम्मेसु न संहीरति।
‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।
यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्च अनागतं॥
‘‘पच्चुप्पन्नञ्च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।
असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥
‘‘अज्जेव किच्चमातप्पं, को जञ्ञा मरणं सुवे।
न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्चुना॥
‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।
तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥
‘‘‘भद्देकरत्तस्स वो, भिक्खवे, उद्देसञ्च विभङ्गञ्च देसेस्सामी’ति – इति यं तं वुत्तं इदमेतं पटिच्च वुत्त’’न्ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
भद्देकरत्तसुत्तं निट्ठितं पठमं।