✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१३२. आनन्दभद्देकरत्त सुत्त मुख्य > सुत्तपिटक > मज्झिमनिकाय 2. मज्झिमनिकाय आनन्द के द्वाराभिक्षु के लिएगाथा

आनन्द के द्वारा भद्देकरत्त

अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ७ मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे।

उस समय आयुष्मान आनन्द सभागृह में भिक्षुओं को धम्म-चर्चा से निर्देशित कर रहे थे, उत्प्रेरित कर रहे थे, उत्साहित कर रहे थे, हर्षित कर रहे थे—‘एक शुभ रात्री’ का उद्देश्य और विश्लेषण बता रहे थे।

तब सायंकाल होने पर, भगवान एकांतवास से निकले और सभागृह गए, और जाकर बिछे आसन पर बैठ गए। बैठकर, भगवान ने भिक्षुओं को आमंत्रित किया:

“भिक्षुओं, कौन तुम्हें सभागृह में धम्म-चर्चा से निर्देशित कर रहा था, उत्प्रेरित कर रहा था, उत्साहित कर रहा था, हर्षित कर रहा था—‘एक शुभ रात्री’ का उद्देश्य और विश्लेषण बता रहा था?”

“भंते, आयुष्मान आनन्द हमें सभागृह में धम्म-चर्चा से निर्देशित कर रहे थे, उत्प्रेरित कर रहे थे, उत्साहित कर रहे थे, हर्षित कर रहे थे—‘एक शुभ रात्री’ का उद्देश्य और विश्लेषण बता रहे थे।”

तब भगवान ने आयुष्मान आनन्द को आमंत्रित किया:

“किन्तु, आनन्द, तुम किस तरह भिक्षुओं को धम्म-चर्चा से निर्देशित कर रहे थे, उत्प्रेरित कर रहे थे, उत्साहित कर रहे थे, हर्षित कर रहे थे—‘एक शुभ रात्री’ का उद्देश्य और विश्लेषण बता रहे थे?”

“भंते, मैं इस तरह भिक्षुओं को धम्म-चर्चा से निर्देशित कर रहा था, उत्प्रेरित कर रहा था, उत्साहित कर रहा था, हर्षित कर रहा था—‘एक शुभ रात्री’ का उद्देश्य और विश्लेषण बता रहा था—

न भागे ओर अतीत की,
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।

स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।

आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।

ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।

स्पष्टीकरण

अतीत की ओर भागना

और, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर कैसे भागता है?

कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने लगता है—

  • ‘अतीत में मेरा ऐसा रूप था’
  • ‘अतीत में मेरी ऐसी वेदना (अनुभूति) थी’
  • ‘अतीत में मेरी ऐसी संज्ञा थी’
  • ‘अतीत में मेरा ऐसा संस्कार था’
  • ‘अतीत में मेरा ऐसा विज्ञान था’

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर भागता है।


और, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर कैसे नहीं भागता है?

कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने नहीं लगता है कि—

  • ‘अतीत में मेरा ऐसा रूप था’
  • ‘अतीत में मेरी ऐसी वेदना थी’
  • ‘अतीत में मेरी ऐसी संज्ञा थी’
  • ‘अतीत में मेरा ऐसा संस्कार था’
  • ‘अतीत में मेरा ऐसा विज्ञान था’

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर नहीं भागता है।

भविष्य की ताक

और, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक कैसे लगाता है?

कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने लगता है—

  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा रूप होगा’
  • ‘भविष्य में मेरी ऐसी वेदना होगी’
  • ‘भविष्य में मेरी ऐसी संज्ञा होगी’
  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा संस्कार होगा’
  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा विज्ञान होगा’

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक लगाता है।


और, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक कैसे नहीं लगाता है?

कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने नहीं लगता है कि—

  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा रूप होगा’
  • ‘भविष्य में मेरी ऐसी वेदना होगी’
  • ‘भविष्य में मेरी ऐसी संज्ञा होगी’
  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा संस्कार होगा’
  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा विज्ञान होगा’

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक नहीं लगाता है।

वर्तमान में डगमगाना

और, भिक्षुओं, वर्तमान में उत्पन्न धम्म (स्वभाव) से डगमगाना क्या होता है?

भिक्षुओं, कोई धम्म न सुना, आम आदमी हो, जो आर्यजनों के दर्शन से वंचित, आर्य-धम्म से अपरिचित, आर्य-धम्म में अनुशासित न हो; या सत्पुरुषों के दर्शन से वंचित, सत्पुरूष-धम्म से अपरिचित, सत्पुरूष-धम्म में अनुशासित न हो—

  • वह रूप को आत्मा मानता है, या आत्मा को रूपवान मानता है, या आत्मा में रूप देखता है, या रूप में आत्मा देखता है।
  • वह वेदना को आत्मा मानता है…
  • वह संज्ञा को आत्मा मानता है…
  • वह संस्कार को आत्मा मानता है…
  • वह विज्ञान को आत्मा मानता है, या आत्मा को विज्ञानवान मानता है, या आत्मा में विज्ञान देखता है, या विज्ञान में आत्मा देखता है। 1

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता है।


और, भिक्षुओं, वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाना क्या होता है?

भिक्षुओं, कोई धम्म सुना आर्यश्रावक हो, जो आर्यजनों के दर्शन से लाभान्वित, आर्य-धम्म से परिचित, आर्य-धम्म में अनुशासित हो; या सत्पुरुषों के दर्शन से लाभान्वित, सत्पुरूष-धम्म से परिचित, सत्पुरूष-धम्म में अनुशासित हो—

  • वह रूप को आत्मा नहीं मानता है, या आत्मा को रूपवान नहीं मानता है, या आत्मा में रूप नहीं देखता है, या रूप में आत्मा नहीं देखता है।
  • वह वेदना को आत्मा नहीं मानता है…
  • वह संज्ञा को आत्मा नहीं मानता है…
  • वह संस्कार को आत्मा नहीं मानता है…
  • वह विज्ञान को आत्मा नहीं मानता है, या आत्मा को विज्ञानवान नहीं मानता है, या आत्मा में विज्ञान नहीं देखता है, या विज्ञान में आत्मा नहीं देखता है।

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता नहीं है।

न भागे ओर अतीत की,
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।

स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।

आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।

ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।


इस तरह, भंते, मैं भिक्षुओं को धम्म-चर्चा से निर्देशित कर रहा था, उत्प्रेरित कर रहा था, उत्साहित कर रहा था, हर्षित कर रहा था—‘एक शुभ रात्री’ का उद्देश्य और विश्लेषण बता रहा था।”

भगवान का अनुमोदन

“साधु, साधु, आनन्द! तुम बहुत अच्छी तरह से भिक्षुओं को धम्म-चर्चा से निर्देशित कर रहे थे, उत्प्रेरित कर रहे थे, उत्साहित कर रहे थे, हर्षित कर रहे थे—‘एक शुभ रात्री’ का उद्देश्य और विश्लेषण बता रहे थे… "

… (और भगवान इस पूरे स्पष्टीकरण को पुनः दोहराते हुए अनुमोदन करते हैं…

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर आयुष्मान आनन्द ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. यही परिभाषा सक्कायदिट्ठी या स्व-धारणा नामक संयोजन की है, जिसे मज्झिमनिकाय ४४ इत्यादि में भी बताया गया है। ↩︎

पालि

२७६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन आयस्मा आनन्दो उपट्ठानसालायं भिक्खूनं धम्मिया कथाय सन्दस्सेति समादपेति समुत्तेजेति सम्पहंसेति, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च भासति।

अथ खो भगवा सायन्हसमयं पटिसल्‍लाना वुट्ठितो येनुपट्ठानसाला तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा पञ्‍ञत्ते आसने निसीदि। निसज्‍ज खो भगवा भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘को नु खो, भिक्खवे, उपट्ठानसालायं भिक्खूनं धम्मिया कथाय सन्दस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि सम्पहंसेसि, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च अभासी’’ति? ‘‘आयस्मा, भन्ते, आनन्दो उपट्ठानसालायं भिक्खूनं धम्मिया कथाय सन्दस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि सम्पहंसेसि, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च अभासी’’ति।

अथ खो भगवा आयस्मन्तं आनन्दं आमन्तेसि – ‘‘यथा कथं पन त्वं, आनन्द, भिक्खूनं धम्मिया कथाय सन्दस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि सम्पहंसेसि , भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च अभासी’’ति? ‘‘एवं खो अहं, भन्ते, भिक्खूनं धम्मिया कथाय सन्दस्सेसिं समादपेसिं समुत्तेजेसिं सम्पहंसेसिं, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च अभासिं –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।

यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्‍च अनागतं॥

‘‘पच्‍चुप्पन्‍नञ्‍च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।

असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥

‘‘अज्‍जेव किच्‍चमातप्पं, को जञ्‍ञा मरणं सुवे।

न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्‍चुना॥

‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनि’’॥

२७७. ‘‘कथञ्‍च, आवुसो, अतीतं अन्वागमेति? एवंरूपो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, एवंवेदनो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, एवंसञ्‍ञो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, एवंसङ्खारो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, एवंविञ्‍ञाणो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति – एवं खो, आवुसो, अतीतं अन्वागमेति।

‘‘कथञ्‍च, आवुसो, अतीतं नान्वागमेति? एवंरूपो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, एवंवेदनो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, एवंसञ्‍ञो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, एवंसङ्खारो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, एवंविञ्‍ञाणो अहोसिं अतीतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति – एवं खो, आवुसो, अतीतं नान्वागमेति।

‘‘कथञ्‍च, आवुसो, अनागतं पटिकङ्खति? एवंरूपो सियं अनागतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति, एवंवेदनो सियं…पे॰… एवंसञ्‍ञो सियं… एवंसङ्खारो सियं… एवंविञ्‍ञाणो सियं अनागतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं समन्वानेति – एवं खो, आवुसो, अनागतं पटिकङ्खति।

‘‘कथञ्‍च, आवुसो, अनागतं नप्पटिकङ्खति? एवंरूपो सियं अनागतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति, एवंवेदनो सियं…पे॰… एवंसञ्‍ञो सियं… एवंसङ्खारो सियं… एवंविञ्‍ञाणो सियं अनागतमद्धानन्ति तत्थ नन्दिं न समन्वानेति – एवं खो, आवुसो, अनागतं नप्पटिकङ्खति।

‘‘कथञ्‍च, आवुसो, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति? इध, आवुसो, अस्सुतवा पुथुज्‍जनो अरियानं अदस्सावी अरियधम्मस्स अकोविदो अरियधम्मे अविनीतो सप्पुरिसानं अदस्सावी सप्पुरिसधम्मस्स अकोविदो सप्पुरिसधम्मे अविनीतो रूपं अत्ततो समनुपस्सति, रूपवन्तं वा अत्तानं, अत्तनि वा रूपं, रूपस्मिं वा अत्तानं; वेदनं… सञ्‍ञं… सङ्खारे… विञ्‍ञाणं अत्ततो समनुपस्सति, विञ्‍ञाणवन्तं वा अत्तानं, अत्तनि वा विञ्‍ञाणं, विञ्‍ञाणस्मिं वा अत्तानं – एवं खो, आवुसो, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति।

‘‘कथञ्‍च , आवुसो, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति? इध, आवुसो, सुतवा अरियसावको अरियानं दस्सावी अरियधम्मस्स कोविदो अरियधम्मे सुविनीतो सप्पुरिसानं दस्सावी सप्पुरिसधम्मस्स कोविदो सप्पुरिसधम्मे सुविनीतो न रूपं अत्ततो समनुपस्सति, न रूपवन्तं वा अत्तानं, न अत्तनि वा रूपं, न रूपस्मिं वा अत्तानं; न वेदनं… न सञ्‍ञं… न सङ्खारे… न विञ्‍ञाणं अत्ततो समनुपस्सति, न विञ्‍ञाणवन्तं वा अत्तानं, न अत्तनि वा विञ्‍ञाणं, न विञ्‍ञाणस्मिं वा अत्तानं – एवं खो, आवुसो, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति।

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।

यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्‍च अनागतं॥

‘‘पच्‍चुप्पन्‍नञ्‍च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।

असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥

‘‘अज्‍जेव किच्‍चमातप्पं, को जञ्‍ञा मरणं सुवे।

न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्‍चुना॥

‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘एवं खो अहं, भन्ते, भिक्खूनं धम्मिया कथाय सन्दस्सेसिं समादपेसिं समुत्तेजेसिं सम्पहंसेसिं, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च अभासि’’न्ति।

२७८. ‘‘साधु , साधु, आनन्द! साधु खो त्वं, आनन्द, भिक्खूनं धम्मिया कथाय सन्दस्सेसि समादपेसि समुत्तेजेसि सम्पहंसेसि, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च अभासि –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य…पे॰…

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘कथञ्‍च, आनन्द, अतीतं अन्वागमेति…पे॰… एवं खो, आनन्द, अतीतं अन्वागमेति। कथञ्‍च, आनन्द, अतीतं नान्वागमेति…पे॰… एवं खो, आनन्द, अतीतं नान्वागमेति। कथञ्‍च, आनन्द, अनागतं पटिकङ्खति…पे॰… एवं खो, आनन्द, अनागतं पटिकङ्खति। कथञ्‍च, आनन्द, अनागतं नप्पटिकङ्खति…पे॰… एवं खो, आनन्द, अनागतं नप्पटिकङ्खति। कथञ्‍च, आनन्द, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति…पे॰… एवं खो, आनन्द, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति। कथञ्‍च, आनन्द, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति…पे॰… एवं खो, आनन्द, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति।

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य…पे॰…

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा आनन्दो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।

आनन्दभद्देकरत्तसुत्तं निट्ठितं दुतियं।