✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१३३. महाकच्चानभद्देकरत्त सुत्त मुख्य > सुत्तपिटक > मज्झिमनिकाय 2. मज्झिमनिकाय महाकच्चान के द्वाराभिक्षु के लिएगंभीर विश्लेषण देवता सारकाष्ठ

महाकच्चान के द्वारा भद्देकरत्त

अनुवादक: भिक्खु कश्यप | १६ मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान राजगृह के उष्ण तालाब (तपोड़ा) उद्यान में विहार कर रहे थे।

तब रात बीतकर भोर होने पर, आयुष्मान समिद्धि उठकर उष्ण तालाब में नहाने गए। उष्ण तालाब में नहा लेने पर, वे एक चीवर (नीचे का अंतर्वास) पहन कर अपने अंगों को सुखाने के लिए खड़े हुए।

देवता से भेंट

तब कोई देवता रात के अंधेरे में अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण उष्ण तालाब को रौशन करते हुए आयुष्मान समिद्धि के पास गया, और एक ओर खड़ा हुआ। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने आयुष्मान समिद्धि से कहा:

“भिक्षु, क्या तुमने एक शुभ रात्री (उपदेश) को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, धारण किया है?”

“नहीं, मित्र। मैंने एक शुभ रात्री को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, धारण नहीं किया। किन्तु, मित्र, क्या तुमने एक शुभ रात्री (उपदेश) को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, धारण किया है?”

“नहीं, भिक्षु। मैंने भी एक शुभ रात्री को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, धारण नहीं किया। किन्तु, भिक्षु, क्या तुम्हें एक शुभ रात्री की केवल गाथाएँ भी याद है?”

“नहीं, मित्र। मैंने एक शुभ रात्री की गाथाएँ भी याद नहीं की। किन्तु, मित्र, क्या तुम्हें एक शुभ रात्री की गाथाएँ याद है?”

“नहीं, भिक्षु। मुझे भी एक शुभ रात्री की गाथाएँ याद नहीं। भिक्षु, एक शुभ रात्री की गाथाओं को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, अच्छे से ग्रहण करो। एक शुभ रात्री की गाथाओं को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, अच्छे से याद करो। एक शुभ रात्री की गाथाओं को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, अच्छे से धारण करो। यह एक शुभ रात्री (उपदेश), उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, ब्रह्मचर्य के मूल और ध्येय के लिए लाभकारी है।”

देवता ने ऐसा कहा। ऐसा कहने पर वह विलुप्त हुआ।

तब, रात बीतने पर आयुष्मान समिद्धि भगवान के पास गए, और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठ कर आयुष्मान समिद्धि ने भगवान से (सब कुछ) कह दिया… (और फिर कहा)

“अच्छा होगा, भंते, जो भगवान मुझे एक शुभ रात्री (उपदेश) को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, बताए।”

“ठीक है, भिक्षु, ध्यान देकर गौर से सुनो। मैं बताता हूँ।”

“ठीक है, भंते!” आयुष्मान समिद्धि ने भगवान को उत्तर दिया।

भगवान ने कहा:

न भागे ओर अतीत की,
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।

स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।

आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।

ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।

भगवान ने ऐसा कहा। और ऐसा कहने पर सुगत आसन से उठकर अपने निवास चले गए।

भगवान ने ऐसा कहा। ऐसा कहकर सुगत, आसन से उठ, अपने आवास चले गए।

कौन स्पष्ट करें?

भगवान जाने के कुछ समय पश्चात, भिक्षुओं को लगा, “मित्रों, भगवान ने संक्षिप्त सांकेतिक सार देकर, विस्तार से अर्थ को स्पष्ट न कर, उठकर आवास चले गए। कौन भगवान के इस संक्षिप्त सांकेतिक सार का अर्थ विस्तारपूर्वक स्पष्ट कर सकता है?”

तब भिक्षुओं को लगा, “ये आयुष्मान महाकच्चान 1 शास्ता के द्वारा प्रशंसित, और समझदार सब्रह्मचारियों के द्वारा (श्रेष्ठ) माने जाते हैं। आयुष्मान महाकच्चान भगवान के इस संक्षिप्त सांकेतिक सार का अर्थ विस्तारपूर्वक स्पष्ट कर सकते हैं। चलों, हम सब आयुष्मान महाकच्चान के पास जाए, और जाकर आयुष्मान महाकच्चान से इसका अर्थ पूछें।”

तब वे भिक्षुगण आयुष्मान महाकच्चान के पास गए, और जाकर आयुष्मान महाकच्चान से हालचाल पूछा, और मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर भिक्षुओं ने आयुष्मान महाकच्चान से (सब कुछ बताने पर) कहा, “… महाकच्चान इसका अर्थ विस्तार से बताएं।”

सारकाष्ठ की उपमा

“मित्रों, जैसे कोई पुरुष सारकाष्ठ चाहता हो, वह सारकाष्ठ को ढूँढते हुए, सारकाष्ठ की खोज में उसे एक विशाल वृक्ष खड़ा मिले। किन्तु वह उसके सार को छोड़, अंतःकाष्ठ को छोड़, टहनियों और पत्तियों में सारकाष्ठ को ढूँढना उचित माने। 2

उसी तरह, मित्रों, आप आयुष्मानों के साथ हुआ। आप शास्ता के सम्मुख होकर भी भगवान को छोड़, मुझ से पूछना उचित मान रहे हो।

मित्रों, वे भगवान हैं, जो जानते हैं, जो देखते हैं। वे चक्षु रूप, ज्ञान रूप, धम्म रूप, ब्रह्म रूप हैं! वे ही (धम्म के मूल) वक्ता (=व्यक्त करने वाले), प्रवक्ता (=दावा करने वाले), अर्थ को स्पष्ट करने वाले, अमृत के दाता, धम्म के स्वामी, तथागत हैं। वही समय उचित था, जब आप को भगवान के पास जाकर उसका अर्थ पूछना चाहिए था। जिस तरह भगवान व्याख्या करते, उसी तरह आप धारण करतें।”

“वाकई, कच्चान, वे भगवान हैं, जो जानते हैं, जो देखते हैं। वे चक्षु रूप, ज्ञान रूप, धम्म रूप, ब्रह्म रूप हैं! वे ही वक्ता, प्रवक्ता, अर्थ को स्पष्ट करने वाले, अमृत के दाता, धम्म के स्वामी, तथागत हैं। वही समय उचित था, जब हमें भगवान के पास जाकर उसका अर्थ पूछना चाहिए था। जिस तरह भगवान व्याख्या करते, उसी तरह हम धारण करतें।

तब भी आयुष्मान महाकच्चान शास्ता के द्वारा प्रशंसित, और समझदार सब्रह्मचारियों के द्वारा माने जाते हैं। आयुष्मान महाकच्चान भगवान के इस संक्षिप्त सांकेतिक सार का अर्थ विस्तारपूर्वक स्पष्ट कर सकते हैं। यदि कष्ट न हो, महाकच्चान, तो तुम हमें इसका अर्थ विस्तार से बताओं।”

विस्तार से व्याख्या

“तब ठीक है, मित्रों, ध्यान देकर गौर से सुनों, मैं बताता हूँ!”

“ठीक है, मित्र।” भिक्षुओं ने आयुष्मान महाकच्चान को उत्तर दिया। आयुष्मान महाकच्चान ने कहा—

“मित्रों, भगवान ने इस संक्षिप्त सांकेतिक सार को देकर, विस्तार से अर्थ को स्पष्ट न कर, उठकर आवास चले गए—

‘न भागे ओर अतीत की,
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।

स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।

आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।

ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।’

स्पष्टीकरण

मैं भगवान के इस संक्षिप्त सांकेतिक सार का, इस तरह विस्तार से अर्थ समझता हूँ—

अतीत की ओर भागना

और, मित्रों, कोई अतीत की ओर कैसे भागता है?

  • अतीत में मेरे ऐसे चक्षु थे, ऐसा रूप था (या ऐसा रूप देखता था) (सोचते हुए)—विज्ञान छन्द और राग में लिप्त होने लगता है। जब विज्ञान छन्द और राग में लिप्त होने लगे, तो उसे मजा आता है। तब, वह मजा लेते हुए अतीत की ओर भागता है।
  • अतीत में मेरे ऐसे कान थे, ऐसी आवाज थी (ऐसी आवाज सुनता था) (सोचते हुए…)
  • अतीत में मेरी ऐसी नाक थी, ऐसी गंध थी (ऐसी गंध सूँघता था) (सोचते हुए…)
  • अतीत में मेरी ऐसी जीभ थी, ऐसा स्वाद था (ऐसा स्वाद चखता था) (सोचते हुए…)
  • अतीत में मेरी ऐसी काया थी, ऐसा संस्पर्श था (ऐसा संस्पर्श महसूस करता था) (सोचते हुए…)
  • अतीत में मेरा ऐसा मन था, ऐसा धम्म (स्वभाव) था (सोचते हुए)—विज्ञान छन्द और राग में लिप्त होने लगता है। जब विज्ञान छन्द और राग में लिप्त होने लगे, तो उसे मजा आता है। तब, वह मजा लेते हुए अतीत की ओर भागता है।

—इस तरह, मित्रों, कोई अतीत की ओर भागता है।


और, मित्रों, कोई अतीत की ओर कैसे नहीं भागता है?

  • अतीत में मेरे ऐसे चक्षु थे, ऐसा रूप था (या ऐसा रूप देखता था) (सोचते हुए)—विज्ञान छन्द और राग में लिप्त नहीं होता है। जब विज्ञान छन्द और राग में लिप्त नहीं होता, तो उसे मजा नहीं आता है। मजा न आने से वह अतीत की ओर नहीं भागता है।
  • अतीत में मेरे ऐसे कान थे, ऐसी आवाज थी (ऐसी आवाज सुनता था) (सोचते हुए…)
  • अतीत में मेरी ऐसी नाक थी, ऐसी गंध थी (ऐसी गंध सूँघता था) (सोचते हुए…)
  • अतीत में मेरी ऐसी जीभ थी, ऐसा स्वाद था (ऐसा स्वाद चखता था) (सोचते हुए…)
  • अतीत में मेरी ऐसी काया थी, ऐसा संस्पर्श था (ऐसा संस्पर्श महसूस करता था) (सोचते हुए…)
  • अतीत में मेरा ऐसा मन था, ऐसा धम्म (स्वभाव) था (सोचते हुए)—विज्ञान छन्द और राग में लिप्त नहीं होता है। जब विज्ञान छन्द और राग में लिप्त नहीं होता, तो उसे मजा नहीं आता है। मजा न आने से वह अतीत की ओर नहीं भागता है।

—इस तरह, मित्रों, कोई अतीत की ओर नहीं भागता है।

भविष्य की ताक

और, मित्रों, कोई भविष्य की ताक कैसे लगाता है?

  • भविष्य में मेरे ऐसे चक्षु हो, ऐसा रूप हो (या देखूँ)—(इस प्रकार) जो नहीं मिला, उसके लिए चित्त लगाता (संकल्प करता) है। चित्त लगाने से उसे मजा आता है। तब, वह मजा लेते हुए भविष्य की ताक लगाता है।
  • भविष्य में मेरे ऐसे कान हो, ऐसी आवाज हो (या सुनूँ…)
  • भविष्य में मेरा ऐसा नाक हो, ऐसी गंध हो (या सूँघूँ…)
  • भविष्य में मेरी ऐसी जीभ हो, ऐसा स्वाद हो (या चखूँ…)
  • भविष्य में मेरी ऐसी काया हो, ऐसा संस्पर्श हो (या महसूस करूँ…)
  • भविष्य में मेरा ऐसा मन हो, ऐसा स्वभाव हो—(इस प्रकार) जो नहीं मिला, उसके लिए चित्त लगाता है। चित्त लगाने से उसे मजा आता है। तब, वह मजा लेते हुए भविष्य की ताक लगाता है।

—इस तरह, मित्रों, कोई भविष्य की ताक लगाता है।


और, मित्रों, कोई भविष्य की ताक कैसे नहीं लगाता है?

  • भविष्य में मेरे ऐसे चक्षु हो, ऐसा रूप हो (या देखूँ)—(इस प्रकार) जो नहीं मिला, उसके लिए चित्त नहीं लगाता है। चित्त न लगाने से उसे मजा नहीं आता। तब, मजा न आने से वह भविष्य की ताक नहीं लगाता है।
  • भविष्य में मेरे ऐसे कान हो, ऐसी आवाज हो (या सुनूँ…)
  • भविष्य में मेरा ऐसा नाक हो, ऐसी गंध हो (या सूँघूँ…)
  • भविष्य में मेरी ऐसी जीभ हो, ऐसा स्वाद हो (या चखूँ…)
  • भविष्य में मेरी ऐसी काया हो, ऐसा संस्पर्श हो (या महसूस करूँ…)
  • भविष्य में मेरा ऐसा मन हो, ऐसा स्वभाव हो—(इस प्रकार) जो नहीं मिला, उसके लिए चित्त नहीं लगाता है। चित्त न लगाने से उसे मजा नहीं आता। तब, मजा न आने से वह भविष्य की ताक नहीं लगाता है।

—इस तरह, मित्रों, कोई भविष्य की ताक नहीं लगाता है।

वर्तमान में डगमगाना

और, मित्रों, वर्तमान में उत्पन्न धम्म (स्वभाव) से डगमगाना क्या होता है?

  • चक्षु और रूप—दोनों ही वर्तमान में उत्पन्न होते हैं। उस वर्तमान में उत्पन्न (धम्म) के लिए विज्ञान छन्द और राग में लिप्त होने लगता है। जब विज्ञान छन्द और राग में लिप्त होने लगे, तो उसे मजा आता है। तब, वह मजा लेते हुए वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता है।
  • कान और आवाज…
  • नाक और गंध…
  • जीभ और स्वाद…
  • काया और संस्पर्श…
  • मन और स्वभाव—दोनों ही वर्तमान में उत्पन्न होते हैं। उस वर्तमान में उत्पन्न (धम्म) के लिए विज्ञान छन्द और राग में लिप्त होने लगता है। जब विज्ञान छन्द और राग में लिप्त होने लगे, तो उसे मजा आता है। तब, वह मजा लेते हुए वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता है।

—इस तरह, मित्रों, कोई वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता है।


और, मित्रों, वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाना क्या होता है?

  • चक्षु और रूप—दोनों ही वर्तमान में उत्पन्न होते हैं। उस वर्तमान में उत्पन्न (धम्म) के लिए विज्ञान छन्द और राग में लिप्त नहीं होता। जब विज्ञान छन्द और राग में लिप्त नहीं होने लगे, तो उसे मजा नहीं आता। तब, वह मजा न आने पर वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता नहीं है।
  • कान और आवाज…
  • नाक और गंध…
  • जीभ और स्वाद…
  • काया और संस्पर्श…
  • मन और स्वभाव—दोनों ही वर्तमान में उत्पन्न होते हैं। उस वर्तमान में उत्पन्न (धम्म) के लिए विज्ञान छन्द और राग में लिप्त नहीं होता। जब विज्ञान छन्द और राग में लिप्त नहीं होने लगे, तो उसे मजा नहीं आता। तब, वह मजा न आने पर वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता नहीं है।

—इस तरह, मित्रों, कोई वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता नहीं है।

मित्रों, मैं इसी तरह भगवान के संक्षिप्त सांकेतिक सार का विस्तार से अर्थ समझता हूँ… यदि आप आयुष्मानों की इच्छा हो, तो भगवान के पास जाकर इसका अर्थ पूछें। जिस तरह भगवान व्याख्या करें, उसी तरह आप धारण करें।”

तब हर्षित होकर भिक्षुओं ने आयुष्मान महाकच्चान के कथन का अभिनंदन किया।

परीक्षण

वे भिक्षु आसन से उठकर भगवान के पास गए। और भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर उन भिक्षुओं ने भगवान (को सब कुछ बता दिया, और) से कहा, “…इस तरह, भन्ते, आयुष्मान महाकच्चान ने इस शैली में, इन शब्दों में, इन वाक्यों में अर्थ का विश्लेषण किया।”

(भगवान ने कहा,) “महाकच्चान पंडित है, भिक्षुओं। महाकच्चान महाप्रज्ञावान है, भिक्षुओं। यदि तुम (पहले) मुझसे उसका अर्थ पूछते, तो मैं ठीक उसी तरह उत्तर देता, जिस तरह महाकच्चान ने उत्तर दिया है। यही उसका अर्थ है। इसे ठीक इसी तरह धारण करों।”

भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. आयुष्मान महाकच्चान (महाकच्चायन) भगवान बुद्ध के अग्र शिष्यों में एक थे, जिन्हें विशेष रूप से संक्षिप्त उपदेशों को विस्तारपूर्वक और गहन विश्लेषण के साथ समझाने में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। उनकी व्याख्याओं में गहराई के साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी होता था। वे बुद्ध के संक्षिप्त वचनों को जीवंत रूप देते थे, ताकि श्रोता मात्र सुनकर ही न रह जाए, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से उसे देख-समझ सकें। अंगुत्तरनिकाय १.१४ में भगवान उन्हें “संक्षेप को विस्तार से और विस्तार को संक्षेप में करने में सबसे अग्र” पुकारा है।

    बाद में महाकच्चान भन्ते अवंति देश (वर्तमान का मध्यप्रदेश) में जाकर स्थायी रूप से रहने लगे। विनयपिटक (महावग्ग, ८.१) में उल्लेख है कि जब बुद्ध ने वहाँ धम्म प्रचार के लिए भिक्षुओं को भेजने का विचार किया, तो महाकच्चान ने स्वयं उस क्षेत्र की यात्रा का संकल्प लिया। उस समय अवंति, उज्जयिनी (उज्जैन) और आस-पास का प्रदेश दूर-दराज़ माना जाता था, जहाँ संघ की उपस्थिति नहीं थी। महाकच्चान ने वहाँ दीर्घकाल तक रहकर स्थानीय लोगों को उपदेश दिया, भिक्षु-संघ की स्थापना की, और बुद्ध-वचन को उस प्रदेश में दृढ़ किया।

    कहा जाता हैं कि उनके ही प्रयास से अवंति महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्र बना, जहाँ से आगे चलकर धम्म का प्रसार पश्चिमी और दक्षिणी भारत में हुआ। इस प्रकार, वे केवल गहन उपदेशों के व्याख्याता ही नहीं, बल्कि दूरस्थ और कठिन क्षेत्रों में धम्म-संस्थापक के रूप में भी विख्यात हुए। ↩︎

  2. सारकाष्ठ—यह पेड़ के मुख्य स्कन्ध या तने का सबसे भीतरी, ठोस, मजबूत और गाढ़ा भाग होता है। यही पेड़ को मजबूती देता है। यह अक्सर गहरे रंग का होता है। इसे पेड़ का “सार” भी कहते हैं, “मज्जा” भी कहते हैं। अँग्रेजी में ‘हार्टवूड’। इसी से फ़र्निचर बनाया जाता है।

    अंतःकाष्ठ—यह सारकाष्ठ और छाल के बीच का अपेक्षाकृत मृदु हिस्सा होता है। इसमें जीवित कोशिकाएँ होती है, जिनसे जल और पोषण ऊपर पत्तियों तक पहुँचता है। यह रंग में अपेक्षाकृत हल्का होता है। इसे “अंतःकाष्ठ” भी कहते हैं। अँग्रेजी में ‘सैपवूड’। ↩︎

पालि

२७९. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा राजगहे विहरति तपोदारामे। अथ खो आयस्मा समिद्धि रत्तिया पच्‍चूससमयं पच्‍चुट्ठाय येन तपोदो तपोदा (सी॰) तेनुपसङ्कमि गत्तानि परिसिञ्‍चितुं। तपोदे गत्तानि परिसिञ्‍चित्वा पच्‍चुत्तरित्वा एकचीवरो अट्ठासि गत्तानि पुब्बापयमानो सुक्खापयमानो (क॰)। अथ खो अञ्‍ञतरा देवता अभिक्‍कन्ताय रत्तिया अभिक्‍कन्तवण्णा केवलकप्पं तपोदं ओभासेत्वा येनायस्मा समिद्धि तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा एकमन्तं अट्ठासि। एकमन्तं ठिता खो सा देवता आयस्मन्तं समिद्धिं एतदवोच – ‘‘धारेसि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍चा’’ति? ‘‘न खो अहं, आवुसो, धारेमि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। त्वं पनावुसो, धारेसि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍चा’’ति? ‘‘अहम्पि खो, भिक्खु, न धारेमि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। धारेसि पन त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तियो गाथा’’ति? ‘‘न खो अहं, आवुसो, धारेमि भद्देकरत्तियो गाथाति। त्वं पनावुसो, धारेसि भद्देकरत्तियो गाथा’’ति? ‘‘अहम्पि खो, भिक्खु न धारेमि भद्देकरत्तियो गाथाति। उग्गण्हाहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च; परियापुणाहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च; धारेहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। अत्थसंहितो, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसो च विभङ्गो च आदिब्रह्मचरियको’’ति। इदमवोच सा देवता; इदं वत्वा तत्थेवन्तरधायि।

२८०. अथ खो आयस्मा समिद्धि तस्सा रत्तिया अच्‍चयेन येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्‍नो खो आयस्मा समिद्धि भगवन्तं एतदवोच –

‘‘इधाहं, भन्ते, रत्तिया पच्‍चूससमयं पच्‍चुट्ठाय येन तपोदो तेनुपसङ्कमिं गत्तानि परिसिञ्‍चितुं। तपोदे गत्तानि परिसिञ्‍चित्वा पच्‍चुत्तरित्वा एकचीवरो अट्ठासिं गत्तानि पुब्बापयमानो। अथ खो भन्ते, अञ्‍ञतरा देवता अभिक्‍कन्ताय रत्तिया अभिक्‍कन्तवण्णा केवलकप्पं तपोदं ओभासेत्वा येनाहं तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा एकमन्तं अट्ठासि। एकमन्तं ठिता खो सा देवता मं एतदवोच – ‘धारेसि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍चा’’’ति?

‘‘एवं वुत्ते अहं, भन्ते, तं देवतं एतदवोचं – ‘न खो अहं, आवुसो, धारेमि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। त्वं पनावुसो, धारेसि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍चा’ति? ‘अहम्पि खो, भिक्खु, न धारेमि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। धारेसि पन त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तियो गाथा’ति? ‘न खो अहं, आवुसो, धारेमि भद्देकरत्तियो गाथाति। त्वं पनावुसो, धारेसि भद्देकरत्तियो गाथा’ति? ‘अहम्पि खो, भिक्खु, न धारेमि भद्देकरत्तियो गाथाति। उग्गण्हाहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च; परियापुणाहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च; धारेहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। अत्थसंहितो, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसो च विभङ्गो च आदिब्रह्मचरियको’ति। इदमवोच, भन्ते, सा देवता; इदं वत्वा तत्थेवन्तरधायि। साधु मे, भन्ते, भगवा भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च देसेतू’’ति। ‘‘तेन हि, भिक्खु, सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो आयस्मा समिद्धि भगवतो पच्‍चस्सोसि। भगवा एतदवोच –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।

यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्‍च अनागतं॥

‘‘पच्‍चुप्पन्‍नञ्‍च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।

असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥

‘‘अज्‍जेव किच्‍चमातप्पं, को जञ्‍ञा मरणं सुवे।

न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्‍चुना॥

‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

इदमवोच भगवा; इदं वत्वान सुगतो उट्ठायासना विहारं पाविसि। अथ खो तेसं भिक्खूनं , अचिरपक्‍कन्तस्स भगवतो, एतदहोसि – ‘‘इदं खो नो, आवुसो, भगवा संखित्तेन उद्देसं उद्दिसित्वा वित्थारेन अत्थं अविभजित्वा उट्ठायासना विहारं पविट्ठो –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।

यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्‍च अनागतं॥

‘‘पच्‍चुप्पन्‍नञ्‍च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।

असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥

‘‘अज्‍जेव किच्‍चमातप्पं, को जञ्‍ञा मरणं सुवे।

न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्‍चुना॥

‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘को नु खो इमस्स भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं विभजेय्या’’ति?

अथ खो तेसं भिक्खूनं एतदहोसि – ‘‘अयं खो आयस्मा महाकच्‍चानो सत्थु चेव संवण्णितो सम्भावितो च विञ्‍ञूनं सब्रह्मचारीनं; पहोति चायस्मा महाकच्‍चानो इमस्स भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं विभजितुं। यंनून मयं येनायस्मा महाकच्‍चानो तेनुपसङ्कमेय्याम; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं महाकच्‍चानं एतमत्थं पटिपुच्छेय्यामा’’ति।

२८१. अथ खो ते भिक्खू येनायस्मा महाकच्‍चानो तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा आयस्मता महाकच्‍चानेन सद्धिं सम्मोदिंसु। सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। एकमन्तं निसिन्‍ना खो ते भिक्खू आयस्मन्तं महाकच्‍चानं एतदवोचुं – ‘‘इदं खो नो, आवुसो कच्‍चान, भगवा संखित्तेन उद्देसं उद्दिसित्वा वित्थारेन अत्थं अविभजित्वा उट्ठायासना विहारं पविट्ठो –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य…पे॰…

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘तेसं नो, आवुसो कच्‍चान, अम्हाकं, अचिरपक्‍कन्तस्स भगवतो, एतदहोसि – इदं खो नो, आवुसो, भगवा संखित्तेन उद्देसं उद्दिसित्वा वित्थारेन अत्थं अविभजित्वा उट्ठायासना विहारं पविट्ठो –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य…पे॰…

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘को नु खो इमस्स भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं विभजेय्याति? तेसं नो , आवुसो कच्‍चान, अम्हाकं एतदहोसि – ‘अयं खो आयस्मा महाकच्‍चानो सत्थु चेव संवण्णितो सम्भावितो च विञ्‍ञूनं सब्रह्मचारीनं। पहोति चायस्मा महाकच्‍चानो इमस्स भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं विभजितुं। यंनून मयं येनायस्मा महाकच्‍चानो तेनुपसङ्कमेय्याम; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं महाकच्‍चानं एतमत्थं पटिपुच्छेय्यामा’ति। विभजतायस्मा महाकच्‍चानो’’ति।

‘‘सेय्यथापि, आवुसो, पुरिसो सारत्थिको सारगवेसी सारपरियेसनं चरमानो महतो रुक्खस्स तिट्ठतो सारवतो अतिक्‍कम्मेव मूलं अतिक्‍कम्म खन्धं साखापलासे सारं परियेसितब्बं मञ्‍ञेय्य; एवं सम्पदमिदं आयस्मन्तानं सत्थरि सम्मुखीभूते तं भगवन्तं अतिसित्वा अम्हे एतमत्थं पटिपुच्छितब्बं मञ्‍ञथ मञ्‍ञेथ (पी॰)। सो हावुसो, भगवा जानं जानाति, पस्सं पस्सति, चक्खुभूतो ञाणभूतो धम्मभूतो ब्रह्मभूतो वत्ता पवत्ता अत्थस्स निन्‍नेता अमतस्स दाता धम्मस्सामी तथागतो। सो चेव पनेतस्स कालो अहोसि यं भगवन्तंयेव एतमत्थं पटिपुच्छेय्याथ, यथा वो भगवा ब्याकरेय्य तथा नं धारेय्याथा’’ति।

‘‘अद्धावुसो कच्‍चान, भगवा जानं जानाति, पस्सं पस्सति, चक्खुभूतो ञाणभूतो धम्मभूतो ब्रह्मभूतो वत्ता पवत्ता अत्थस्स निन्‍नेता अमतस्स दाता धम्मस्सामी तथागतो। सो चेव पनेतस्स कालो अहोसि यं भगवन्तंयेव एतमत्थं पटिपुच्छेय्याम; यथा नो भगवा ब्याकरेय्य तथा नं धारेय्याम। अपि चायस्मा महाकच्‍चानो सत्थुचेव संवण्णितो सम्भावितो च विञ्‍ञूनं सब्रह्मचारीनं; पहोति चायस्मा महाकच्‍चानो इमस्स भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं विभजितुं। विभजतायस्मा महाकच्‍चानो अगरुं करित्वा’’ति अगरुकरित्वा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)।

‘‘तेन हावुसो, सुणाथ, साधुकं मनसि करोथ; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवमावुसो’’ति खो ते भिक्खू आयस्मतो महाकच्‍चानस्स पच्‍चस्सोसुं। आयस्मा महाकच्‍चानो एतदवोच –

‘‘यं खो नो, आवुसो, भगवा संखित्तेन उद्देसं उद्दिसित्वा वित्थारेन अत्थं अविभजित्वा उट्ठायासना विहारं पविट्ठो –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य…पे॰…

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

इमस्स खो अहं, आवुसो, भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स एवं वित्थारेन अत्थं आजानामि –

२८२. ‘‘कथञ्‍च, आवुसो, अतीतं अन्वागमेति? इति मे चक्खु अहोसि अतीतमद्धानं इति रूपाति – तत्थ छन्दरागप्पटिबद्धं छन्दरागप्पटिबन्धं (क॰) होति विञ्‍ञाणं, छन्दरागप्पटिबद्धत्ता विञ्‍ञाणस्स तदभिनन्दति, तदभिनन्दन्तो अतीतं अन्वागमेति। इति मे सोतं अहोसि अतीतमद्धानं इति सद्दाति…पे॰… इति मे घानं अहोसि अतीतमद्धानं इति गन्धाति… इति मे जिव्हा अहोसि अतीतमद्धानं इति रसाति… इति मे कायो अहोसि अतीतमद्धानं इति फोट्ठब्बाति… इति मे मनो अहोसि अतीतमद्धानं इति धम्माति – तत्थ छन्दरागप्पटिबद्धं होति विञ्‍ञाणं, छन्दरागप्पटिबद्धत्ता विञ्‍ञाणस्स तदभिनन्दति, तदभिनन्दन्तो अतीतं अन्वागमेति – एवं खो, आवुसो, अतीतं अन्वागमेति।

‘‘कथञ्‍च , आवुसो, अतीतं नान्वागमेति? इति मे चक्खु अहोसि अतीतमद्धानं इति रूपाति – तत्थ न छन्दरागप्पटिबद्धं होति विञ्‍ञाणं, न छन्दरागप्पटिबद्धत्ता विञ्‍ञाणस्स न तदभिनन्दति, न तदभिनन्दन्तो अतीतं नान्वागमेति। इति मे सोतं अहोसि अतीतमद्धानं इति सद्दाति…पे॰… इति मे घानं अहोसि अतीतमद्धानं इति गन्धाति… इति मे जिव्हा अहोसि अतीतमद्धानं इति रसाति… इति मे कायो अहोसि अतीतमद्धानं इति फोट्ठब्बाति… इति मे मनो अहोसि अतीतमद्धानं इति धम्माति – तत्थ न छन्दरागप्पटिबद्धं होति विञ्‍ञाणं, न छन्दरागप्पटिबद्धत्ता विञ्‍ञाणस्स, न तदभिनन्दति, न तदभिनन्दन्तो अतीतं नान्वागमेति – एवं खो, आवुसो, अतीतं नान्वागमेति।

२८३. ‘‘कथञ्‍च , आवुसो, अनागतं पटिकङ्खति? इति मे चक्खु सिया अनागतमद्धानं इति रूपाति – अप्पटिलद्धस्स पटिलाभाय चित्तं पणिदहति, चेतसो पणिधानपच्‍चया तदभिनन्दति, तदभिनन्दन्तो अनागतं पटिकङ्खति। इति मे सोतं सिया अनागतमद्धानं इति सद्दाति…पे॰… इति मे घानं सिया अनागतमद्धानं इति गन्धाति… इति मे जिव्हा सिया अनागतमद्धानं इति रसाति… इति मे कायो सिया अनागतमद्धानं इति फोट्ठब्बाति… इति मे मनो सिया अनागतमद्धानं इति धम्माति – अप्पटिलद्धस्स पटिलाभाय चित्तं पणिदहति, चेतसो पणिधानपच्‍चया तदभिनन्दति, तदभिनन्दन्तो अनागतं पटिकङ्खति – एवं खो, आवुसो, अनागतं पटिकङ्खति।

‘‘कथञ्‍च, आवुसो, अनागतं नप्पटिकङ्खति? इति मे चक्खु सिया अनागतमद्धानं इति रूपाति – अप्पटिलद्धस्स पटिलाभाय चित्तं नप्पणिदहति , चेतसो अप्पणिधानपच्‍चया न तदभिनन्दति, न तदभिनन्दन्तो अनागतं नप्पटिकङ्खति। इति मे सोतं सिया अनागतमद्धानं इति सद्दाति…पे॰… इति मे घानं सिया अनागतमद्धानं इति गन्धाति… इति मे जिव्हा सिया अनागतमद्धानं इति रसाति… इति मे कायो सिया अनागतमद्धानं इति फोट्ठब्बाति… इति मे मनो सिया अनागतमद्धानं इति धम्माति – अप्पटिलद्धस्स पटिलाभाय चित्तं नप्पणिदहति, चेतसो अप्पणिधानपच्‍चया न तदभिनन्दति, न तदभिनन्दन्तो अनागतं नप्पटिकङ्खति – एवं खो, आवुसो, अनागतं नप्पटिकङ्खति।

२८४. ‘‘कथञ्‍च, आवुसो, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति? यञ्‍चावुसो, चक्खु ये च रूपा – उभयमेतं पच्‍चुप्पन्‍नं। तस्मिं चे पच्‍चुप्पन्‍ने छन्दरागप्पटिबद्धं होति विञ्‍ञाणं, छन्दरागप्पटिबद्धत्ता विञ्‍ञाणस्स तदभिनन्दति, तदभिनन्दन्तो पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति। यञ्‍चावुसो, सोतं ये च सद्दा…पे॰… यञ्‍चावुसो, घानं ये च गन्धा… या चावुसो, जिव्हा ये च रसा… यो चावुसो, कायो ये च फोट्ठब्बा… यो चावुसो, मनो ये च धम्मा – उभयमेतं पच्‍चुप्पन्‍नं। तस्मिं चे पच्‍चुप्पन्‍ने छन्दरागप्पटिबद्धं होति विञ्‍ञाणं, छन्दरागप्पटिबद्धत्ता विञ्‍ञाणस्स तदभिनन्दति, तदभिनन्दन्तो पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति – एवं खो, आवुसो, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति।

‘‘कथञ्‍च , आवुसो, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति? यञ्‍चावुसो, चक्खु ये च रूपा – उभयमेतं पच्‍चुप्पन्‍नं। तस्मिं चे पच्‍चुप्पन्‍ने न छन्दरागप्पटिबद्धं होति विञ्‍ञाणं, न छन्दरागप्पटिबद्धत्ता विञ्‍ञाणस्स न तदभिनन्दति, न तदभिनन्दन्तो पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति। यञ्‍चावुसो, सोतं ये च सद्दा…पे॰… यञ्‍चावुसो, घानं ये च गन्धा… या चावुसो, जिव्हा ये च रसा… यो चावुसो, कायो ये च फोट्ठब्बा… यो चावुसो, मनो ये च धम्मा – उभयमेतं पच्‍चुप्पन्‍नं। तस्मिं चे पच्‍चुप्पन्‍ने न छन्दरागप्पटिबद्धं होति विञ्‍ञाणं, न छन्दरागप्पटिबद्धत्ता विञ्‍ञाणस्स न तदभिनन्दति, न तदभिनन्दन्तो पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति – एवं खो, आवुसो, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति।

२८५. ‘‘यं खो नो, आवुसो, भगवा संखित्तेन उद्देसं उद्दिसित्वा वित्थारेन अत्थं अविभजित्वा उट्ठायासना विहारं पविट्ठो –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य…पे॰…

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘इमस्स खो अहं, आवुसो, भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स एवं वित्थारेन अत्थं आजानामि। आकङ्खमाना च पन तुम्हे आयस्मन्तो भगवन्तंयेव उपसङ्कमित्वा एतमत्थं पटिपुच्छेय्याथ, यथा वो भगवा ब्याकरोति तथा नं धारेय्याथा’’ति।

अथ खो ते भिक्खू आयस्मतो महाकच्‍चानस्स भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उट्ठायासना येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। एकमन्तं निसिन्‍ना खो ते भिक्खू भगवन्तं एतदवोचुं – ‘‘यं खो नो, भन्ते, भगवा संखित्तेन उद्देसं उद्दिसित्वा वित्थारेन अत्थं अविभजित्वा उट्ठायासना विहारं पविट्ठो –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य…पे॰…

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

तेसं नो, भन्ते, अम्हाकं, अचिरपक्‍कन्तस्स भगवतो, एतदहोसि – ‘‘इदं खो नो, आवुसो, भगवा संखित्तेन उद्देसं उद्दिसित्वा वित्थारेन अत्थं अविभजित्वा उट्ठायासना विहारं पविट्ठो –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।

यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्‍च अनागतं॥

‘‘पच्‍चुप्पन्‍नञ्‍च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।

असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥

‘‘अज्‍जेव किच्‍चमातप्पं, को जञ्‍ञा मरणं सुवे।

न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्‍चुना॥

‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘‘को नु खो इमस्स भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं विभजेय्या’ति? तेसं नो, भन्ते, अम्हाकं एतदहोसि – ‘अयं खो आयस्मा महाकच्‍चानो सत्थु चेव संवण्णितो सम्भावितो च विञ्‍ञूनं सब्रह्मचारीनं। पहोति चायस्मा महाकच्‍चानो इमस्स भगवता संखित्तेन उद्देसस्स उद्दिट्ठस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं विभजितुं। यंनून मयं येनायस्मा महाकच्‍चानो तेनुपसङ्कमेय्याम; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं महाकच्‍चानं एतमत्थं पटिपुच्छेय्यामा’ति। अथ खो मयं, भन्ते, येनायस्मा महाकच्‍चानो तेनुपसङ्कमिम्ह; उपसङ्कमित्वा आयस्मन्तं महाकच्‍चानं एतमत्थं पटिपुच्छिम्ह। तेसं नो, भन्ते, आयस्मता महाकच्‍चानेन इमेहि आकारेहि इमेहि पदेहि इमेहि ब्यञ्‍जनेहि अत्थो विभत्तो’’ति।

‘‘पण्डितो, भिक्खवे, महाकच्‍चानो; महापञ्‍ञो, भिक्खवे महाकच्‍चानो। मं चेपि तुम्हे, भिक्खवे, एतमत्थं पटिपुच्छेय्याथ, अहम्पि तं एवमेवं ब्याकरेय्यं यथा तं महाकच्‍चानेन ब्याकतं। एसो, चेवेतस्स अत्थो। एवञ्‍च नं धारेथा’’ति।

इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।

महाकच्‍चानभद्देकरत्तसुत्तं निट्ठितं ततियं।

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