✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१३४. लोमसकङ्गियभद्देकरत्त सुत्त मुख्य > सुत्तपिटक > मज्झिमनिकाय 2. मज्झिमनिकाय देवता के द्वाराबुद्ध के द्वाराभिक्षु के लिएगाथा देवता

लोमसकङ्गिय को भद्देकरत्त

अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ९ मिनट

हिन्दी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। उस समय आयुष्मान लोमसकङ्गिय शाक्यों के साथ कपिलवस्तु के वटवृक्ष विहार में विहार कर रहे थे।

देवता से भेंट

तब कोई देवता रात के अंधेरे में अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण वटवृक्ष विहार को रौशन करते हुए आयुष्मान लोमसकङ्गिय के पास गया, और एक ओर खड़ा हुआ। एक ओर खड़े होकर उस देवता ने आयुष्मान लोमसकङ्गिय से कहा:

“भिक्षु, क्या तुमने एक शुभ रात्री (उपदेश) को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, धारण किया है?”

“नहीं, मित्र। मैंने एक शुभ रात्री को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, धारण नहीं किया। किन्तु, मित्र, क्या तुमने एक शुभ रात्री (उपदेश) को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, धारण किया है?”

“नहीं, भिक्षु। मैंने भी एक शुभ रात्री को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, धारण नहीं किया। किन्तु, भिक्षु, क्या तुम्हें एक शुभ रात्री की केवल गाथाएँ भी याद है?”

“नहीं, मित्र। मैंने एक शुभ रात्री की गाथाएँ भी याद नहीं की। किन्तु, मित्र, क्या तुम्हें एक शुभ रात्री की गाथाएँ याद है?”

“हाँ, भिक्षु। मुझे एक शुभ रात्री की गाथाएँ याद हैं।”

“किन्तु, मित्र, तुम्हें एक शुभ रात्री की गाथाएँ किस प्रकार याद हैं?”

“भिक्षु, एक समय भगवान देवताओं के साथ तैतीस देवलोक के पारिजात (पारिच्छत्तक) वृक्ष के तले, लाल (रंग की) शीला (पत्थर से बने चबूतरे के आसन) पर विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने तैतीस देवताओं को एक शुभ रात्री (उपदेश) को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ बताया था: 1

न भागे ओर अतीत की,
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।

स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।

आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।

ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।

इस तरह, भिक्षु, मुझे एक शुभ रात्री (उपदेश) याद है। भिक्षु, इस एक शुभ रात्री गाथाओं को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, अच्छे से ग्रहण करो। भिक्षु, एक शुभ रात्री की गाथाओं को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, अच्छे से याद करो। भिक्षु, एक शुभ रात्री की गाथाओं को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, अच्छे से धारण करो। यह एक शुभ रात्री (उपदेश), उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, ब्रह्मचर्य के मूल और ध्येय के लिए लाभकारी है।”

देवता ने ऐसा कहा। ऐसा कहने पर वह विलुप्त हुआ।

भगवान से भेंट

तब, रात बीतकर भोर होने पर आयुष्मान लोमसकङ्गिय ने अपना आवास व्यवस्थित किया, और पात्र व चीवर लेकर श्रावस्ती की ओर चल पड़ें। तब अनुक्रम से भ्रमण करते हुए, वे श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में भगवान के पास गए, और जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर आयुष्मान लोमसकङ्गिय ने भगवान से (सब कुछ) कह दिया… (और फिर कहा)

“अच्छा होगा, भंते, जो भगवान मुझे एक शुभ रात्री (उपदेश) को, उसके उद्देश्य और विश्लेषण के साथ, बताए।”

“किन्तु, भिक्षु, क्या तुम उस देवपुत्र को जानते हो?”

“नहीं, भंते! मैं देवपुत्र को नहीं जानता।”

“उस देवपुत्र का नाम चन्दन है, भिक्षु। वह देवपुत्र चन्दन ध्यान देता है, चिंतन करता है, पूरे एकाग्र चित्त से कान देकर धम्म सुनता है। ठीक है, तब, भिक्षु, मैं तुम्हें एक शुभ रात्री को उद्देश्य और विश्लेषण के साथ बताता हूँ। ध्यान देकर गौर से सुनो। मैं बताता हूँ।”

“ठीक है, भंते!” भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया।

भगवान ने कहा: 2

न भागे ओर अतीत की,
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।

स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।

आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।

ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।

स्पष्टीकरण

अतीत की ओर भागना

और, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर कैसे भागता है?

कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने लगता है—

  • ‘अतीत में मेरा ऐसा रूप था’
  • ‘अतीत में मेरी ऐसी वेदना (अनुभूति) थी’
  • ‘अतीत में मेरी ऐसी संज्ञा थी’
  • ‘अतीत में मेरा ऐसा संस्कार था’
  • ‘अतीत में मेरा ऐसा विज्ञान था’

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर भागता है।


और, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर कैसे नहीं भागता है?

कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने नहीं लगता है कि—

  • ‘अतीत में मेरा ऐसा रूप था’
  • ‘अतीत में मेरी ऐसी वेदना थी’
  • ‘अतीत में मेरी ऐसी संज्ञा थी’
  • ‘अतीत में मेरा ऐसा संस्कार था’
  • ‘अतीत में मेरा ऐसा विज्ञान था’

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई अतीत की ओर नहीं भागता है।

भविष्य की ताक

और, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक कैसे लगाता है?

कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने लगता है—

  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा रूप होगा’
  • ‘भविष्य में मेरी ऐसी वेदना होगी’
  • ‘भविष्य में मेरी ऐसी संज्ञा होगी’
  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा संस्कार होगा’
  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा विज्ञान होगा’

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक लगाता है।


और, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक कैसे नहीं लगाता है?

कोई मजा लेकर (कहते हुए) बहकने नहीं लगता है कि—

  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा रूप होगा’
  • ‘भविष्य में मेरी ऐसी वेदना होगी’
  • ‘भविष्य में मेरी ऐसी संज्ञा होगी’
  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा संस्कार होगा’
  • ‘भविष्य में मेरा ऐसा विज्ञान होगा’

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई भविष्य की ताक नहीं लगाता है।

वर्तमान में डगमगाना

और, भिक्षुओं, वर्तमान में उत्पन्न धम्म (स्वभाव) से डगमगाना क्या होता है?

भिक्षुओं, कोई धम्म न सुना, आम आदमी हो, जो आर्यजनों के दर्शन से वंचित, आर्य-धम्म से अपरिचित, आर्य-धम्म में अनुशासित न हो; या सत्पुरुषों के दर्शन से वंचित, सत्पुरूष-धम्म से अपरिचित, सत्पुरूष-धम्म में अनुशासित न हो—

  • वह रूप को आत्मा मानता है, या आत्मा को रूपवान मानता है, या आत्मा में रूप देखता है, या रूप में आत्मा देखता है।
  • वह वेदना को आत्मा मानता है…
  • वह संज्ञा को आत्मा मानता है…
  • वह संस्कार को आत्मा मानता है…
  • वह विज्ञान को आत्मा मानता है, या आत्मा को विज्ञानवान मानता है, या आत्मा में विज्ञान देखता है, या विज्ञान में आत्मा देखता है। 3

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता है।


और, भिक्षुओं, वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाना क्या होता है?

भिक्षुओं, कोई धम्म सुना आर्यश्रावक हो, जो आर्यजनों के दर्शन से लाभान्वित, आर्य-धम्म से परिचित, आर्य-धम्म में अनुशासित हो; या सत्पुरुषों के दर्शन से लाभान्वित, सत्पुरूष-धम्म से परिचित, सत्पुरूष-धम्म में अनुशासित हो—

  • वह रूप को आत्मा नहीं मानता है, या आत्मा को रूपवान नहीं मानता है, या आत्मा में रूप नहीं देखता है, या रूप में आत्मा नहीं देखता है।
  • वह वेदना को आत्मा नहीं मानता है…
  • वह संज्ञा को आत्मा नहीं मानता है…
  • वह संस्कार को आत्मा नहीं मानता है…
  • वह विज्ञान को आत्मा नहीं मानता है, या आत्मा को विज्ञानवान नहीं मानता है, या आत्मा में विज्ञान नहीं देखता है, या विज्ञान में आत्मा नहीं देखता है।

—इस तरह, भिक्षुओं, कोई वर्तमान में उत्पन्न धम्म से डगमगाता नहीं है।

“न भागे ओर अतीत की,
न लागे ताक भविष्य की।
पीछे छूट अतीत गया,
न अब तक भविष्य आया।

स्वभाव जो अभी यहीं हो,
अंतर्बोध भी वहीं वहीं हो।
न डगमगाकर, न विचलित हो,
विद्वान उसे बढ़ाते हैं।

आज तत्पर, कर्तव्य हों,
कौन जानें, कल मौत हो?
बहस न कभी कोई होती,
महासेना सह जब मौत आती।

ऐसे जो रहे तत्पर,
दिन एवं रात अथक,
उसकी होती शुभ रात्रि,
बतलाते हैं यूं सन्त मुनि।”


भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।

सुत्र समाप्त।


  1. इससे पता चलता है कि यह चन्दन नामक देवता तैंतीस देवलोक का एक देवता रहा हो। हालाँकि, इस सूत्र के समानांतर सूत्र के अनुसार, वह चन्दन देवता कहता है कि उसने भगवान से यह गाथा राजगृह में सुना था। ↩︎

  2. भगवान इस सूत्र में मज्झिमनिकाय १३१ को ही दोहराते हुए विश्लेषण करते हैं। ↩︎

  3. यही परिभाषा सक्कायदिट्ठी या स्व-धारणा नामक संयोजन की है, जिसे मज्झिमनिकाय ४४ इत्यादि में भी बताया गया है। ↩︎

पालि

२८६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन आयस्मा लोमसकङ्गियो लोमसककङ्गियो (टीका) सक्‍केसु विहरति कपिलवत्थुस्मिं निग्रोधारामे। अथ खो चन्दनो देवपुत्तो अभिक्‍कन्ताय रत्तिया अभिक्‍कन्तवण्णो केवलकप्पं निग्रोधारामं ओभासेत्वा येनायस्मा लोमसकङ्गियो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा एकमन्तं अट्ठासि। एकमन्तं ठितो खो चन्दनो देवपुत्तो आयस्मन्तं लोमसकङ्गियं एतदवोच – ‘‘धारेसि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍चा’’ति? ‘‘न खो अहं, आवुसो, धारेमि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। त्वं पनावुसो, धारेसि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍चा’’ति? ‘‘अहम्पि खो, भिक्खु, न धारेमि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। धारेसि पन त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तियो गाथा’’ति? ‘‘न खो अहं, आवुसो, धारेमि भद्देकरत्तियो गाथा। त्वं पनावुसो, धारेसि भद्देकरत्तियो गाथा’’ति? ‘‘धारेमि खो अहं, भिक्खु, भद्देकरत्तियो गाथा’’ति। ‘‘यथा कथं पन त्वं, आवुसो, धारेसि भद्देकरत्तियो गाथा’’ति? ‘‘एकमिदं, भिक्खु, समयं भगवा देवेसु तावतिंसेसु विहरति पारिच्छत्तकमूले पण्डुकम्बलसिलायं। तत्र भगवा देवानं तावतिंसानं भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च अभासि –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।

यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्‍च अनागतं॥

‘‘पच्‍चुप्पन्‍नञ्‍च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।

असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥

‘‘अज्‍जेव किच्‍चमातप्पं, को जञ्‍ञा मरणं सुवे।

न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्‍चुना॥

‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘एवं खो अहं, भिक्खु, धारेमि भद्देकरत्तियो गाथा। उग्गण्हाहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च; परियापुणाहि त्वं , भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च; धारेहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। अत्थसंहितो, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसो च विभङ्गो च आदिब्रह्मचरियको’’ति। इदमवोच चन्दनो देवपुत्तो। इदं वत्वा तत्थेवन्तरधायि।

२८७. अथ खो आयस्मा लोमसकङ्गियो तस्सा रत्तिया अच्‍चयेन सेनासनं संसामेत्वा पत्तचीवरमादाय येन सावत्थि तेन चारिकं पक्‍कामि। अनुपुब्बेन चारिकं चरमानो येन सावत्थि जेतवनं अनाथपिण्डिकस्स आरामो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्‍नो खो आयस्मा लोमसकङ्गियो भगवन्तं एतदवोच –

‘‘एकमिदाहं, भन्ते, समयं सक्‍केसु विहरामि कपिलवत्थुस्मिं निग्रोधारामे। अथ खो, भन्ते, अञ्‍ञतरो देवपुत्तो अभिक्‍कन्ताय रत्तिया अभिक्‍कन्तवण्णो केवलकप्पं निग्रोधारामं ओभासेत्वा येनाहं तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा एकमन्तं अट्ठासि। एकमन्तं ठितो खो, भन्ते, सो देवपुत्तो मं एतदवोच – ‘धारेसि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍चा’ति? एवं वुत्ते अहं, भन्ते, तं देवपुत्तं एतदवोचं – ‘न खो अहं, आवुसो, धारेमि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। त्वं पनावुसो, धारेसि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍चा’ति? ‘अहम्पि खो, भिक्खु, न धारेमि भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। धारेसि पन त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तियो गाथा’ति? ‘न खो अहं, आवुसो, धारेमि भद्देकरत्तियो गाथा। त्वं पनावुसो, धारेसि भद्देकरत्तियो गाथा’ति? ‘धारेमि खो अहं, भिक्खु, भद्देकरत्तियो गाथा’ति। ‘यथा कथं पन त्वं, आवुसो, धारेसि भद्देकरत्तियो गाथा’ति? एकमिदं, भिक्खु, समयं भगवा देवेसु तावतिंसेसु विहरति पारिच्छत्तकमूले पण्डुकम्बलसिलायं । तत्र खो भगवा देवानं तावतिंसानं भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च अभासि –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य…पे॰…

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

‘‘एवं खो अहं, भिक्खु, धारेमि भद्देकरत्तियो गाथा। उग्गण्हाहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च; परियापुणाहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च; धारेहि त्वं, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च। अत्थसंहितो, भिक्खु, भद्देकरत्तस्स उद्देसो च विभङ्गो च आदिब्रह्मचरियको’ति। इदमवोच, भन्ते, सो देवपुत्तो; इदं वत्वा तत्थेवन्तरधायि। साधु मे, भन्ते, भगवा भद्देकरत्तस्स उद्देसञ्‍च विभङ्गञ्‍च देसेतू’’ति।

२८८. ‘‘जानासि पन त्वं, भिक्खु, तं देवपुत्त’’न्ति? ‘‘न खो अहं, भन्ते, जानामि तं देवपुत्त’’न्ति। ‘‘चन्दनो नाम सो, भिक्खु, देवपुत्तो। चन्दनो, भिक्खु, देवपुत्तो अट्ठिं कत्वा अट्ठिकत्वा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰) मनसिकत्वा सब्बचेतसा सब्बं चेतसो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰), सब्बं चेतसा (क॰) समन्‍नाहरित्वा ओहितसोतो धम्मं सुणाति। तेन हि, भिक्खु, सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भन्ते’’ति खो आयस्मा लोमसकङ्गियो भगवतो पच्‍चस्सोसि। भगवा एतदवोच –

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।

यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्‍च अनागतं॥

‘‘पच्‍चुप्पन्‍नञ्‍च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।

असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥

‘‘अज्‍जेव किच्‍चमातप्पं, को जञ्‍ञा मरणं सुवे।

न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्‍चुना।

‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनि’’॥

‘‘कथञ्‍च, भिक्खु, अतीतं अन्वागमेति…पे॰… एवं खो, भिक्खु, अतीतं अन्वागमेति। कथञ्‍च , भिक्खु, अतीतं नान्वागमेति…पे॰… एवं खो, भिक्खु, अतीतं नान्वागमेति। कथञ्‍च, भिक्खु, अनागतं पटिकङ्खति…पे॰… एवं खो, भिक्खु, अनागतं पटिकङ्खति। कथञ्‍च, भिक्खु, अनागतं नप्पटिकङ्खति…पे॰… एवं खो, भिक्खु, अनागतं नप्पटिकङ्खति। कथञ्‍च, भिक्खु, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति…पे॰… एवं खो, भिक्खु, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु संहीरति। कथञ्‍च, भिक्खु, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति…पे॰… एवं खो, भिक्खु, पच्‍चुप्पन्‍नेसु धम्मेसु न संहीरति।

‘‘अतीतं नान्वागमेय्य, नप्पटिकङ्खे अनागतं।

यदतीतं पहीनं तं, अप्पत्तञ्‍च अनागतं॥

‘‘पच्‍चुप्पन्‍नञ्‍च यो धम्मं, तत्थ तत्थ विपस्सति।

असंहीरं असंकुप्पं, तं विद्वा मनुब्रूहये॥

‘‘अज्‍जेव किच्‍चमातप्पं, को जञ्‍ञा मरणं सुवे।

न हि नो सङ्गरं तेन, महासेनेन मच्‍चुना॥

‘‘एवं विहारिं आतापिं, अहोरत्तमतन्दितं।

तं वे भद्देकरत्तोति, सन्तो आचिक्खते मुनी’’ति॥

इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा लोमसकङ्गियो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।

लोमसकङ्गियभद्देकरत्तसुत्तं निट्ठितं चतुत्थं।

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