
कर्म का लघु विश्लेषण
हिन्दी
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे।
तब तोदेय्यपुत्र कुमार सुभ भगवान के पास गया और अभिवादन कर एक-ओर बैठ गया। एक-ओर बैठकर उसने भगवान से कहा:
“हे गोतम! क्या कारण एवं परिस्थिति से मनुष्यावस्था में आकर मानवों में हीनता या उत्कृष्टता प्रकट होती हैं? मानवों में अल्पायुता दिखती है या दीर्घायुता दिखती है, बहुरोगीता दिखती है या अल्परोगीता दिखती है, कुरूपता दिखती है या सौंदर्यता दिखती है, प्रभावहीनता दिखती है या प्रभावशीलता दिखती है, दरिद्रता दिखती है या ऐश्वर्यता दिखती है, नीचकुलीनता दिखती है या उच्चकुलीनता दिखती है, दुष्प्रज्ञता दिखती है या महाप्रज्ञता दिखती है? क्या कारण एवं परिस्थिति से मनुष्यावस्था में आकर मानवों में हीनता या उत्कृष्टता प्रकट होती हैं?”
“कुमार! सत्व स्वयं कर्म के कर्ता, कर्म के वारिस, कर्म से पैदा, कर्म से बंधे, कर्म के शरणागत हैं। वे जो भी कर्म करते हैं, कल्याणकारी अथवा पापपूर्ण, उसी के उत्तराधिकारी होते हैं।”
“मैं गुरु गोतम द्वारा बताई संक्षिप्त बात का अर्थ नहीं समझता हूँ, जिसका उन्होंने विश्लेषण नहीं किया। अच्छा होगा जो गुरु गोतम मुझे धर्म सिखाएँ, जिससे मैं उनकी संक्षिप्त बात का विस्तृत अर्थ समझ पाऊँ।”
“तब कुमार, ध्यान देकर गौर से सुनों। मैं बताता हूँ।”
“जैसे आप कहें, गुरुजी!”
“ऐसा होता है कुमार! कोई स्त्री या पुरुष जीवहत्या करते हैं — निर्दयी, रक्त से सने हाथ वाले, हत्या एवं हिंसा में जुटे, जीवों के प्रति निष्ठुर। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, अल्पायु होते हैं। यही अल्पायुता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष जीवों को प्रताड़ित करते हैं — हाथ से, पत्थर से, डंडे से या शस्त्र से। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, बहुरोगी होते हैं। यही बहुरोगीता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष क्रोधी, बड़े व्याकुल होते हैं — छोटी-सी बात पर भी क्रोधित होते, कुपित होते, विद्रोह करते, विरोध करते हैं, तथा गुस्सा, द्वेष एवं खीज प्रकट करते हैं। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, कुरूप होते हैं। यही कुरूपता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष ईर्ष्यालु होते हैं — पराए को मिलता लाभ सत्कार, आदर सम्मान, वंदन पूजन से जलते हैं, कुढ़ते हैं, ईर्ष्या करते हैं। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, प्रभावहीन होते हैं। यही प्रभावहीनता (अल्पसक्षमता) की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष दाता नहीं होते हैं — श्रमण एवं ब्राह्मणों को भोजन पान, वस्त्र वाहन, माला गन्ध लेप, बिस्तर निवास दीपक आदि दान नहीं देते हैं। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, दरिद्र होते हैं। यही दरिद्रता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष अहंकारी होते हैं — वंदनीय लोगों को वंदन नहीं करते, खड़े होने योग्य के लिए खड़े नहीं होते, आसन देने योग्य को आसन नहीं देते, रास्ता छोड़ने योग्य के लिए रास्ता नहीं छोड़ते हैं। तथा सत्कारयोग्य आदरणीय सम्माननीय या पूजनीय लोगों का सत्कार आदर सम्मान या पूजा नहीं करते हैं। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, नीचकुलीन होते हैं। यही नीचकुलीनता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष जाकर श्रमण या ब्राह्मण को पूछते नहीं हैं — ‘भन्ते! क्या कुशल होता है? क्या अकुशल होता है? क्या दोषपूर्ण होता है? क्या निर्दोष होता है? क्या (स्वभाव) विकसित करना चाहिए? क्या विकसित नहीं करना चाहिए? किस तरह के कर्म मुझे दीर्घकालीन अहित एवं दुःख की ओर ले जाएँगे? और किस तरह के कर्म मुझे दीर्घकालीन हित एवं सुख की ओर ले जाएँगे?’ वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, दुष्प्रज्ञ (दुर्बुद्धि प्राप्त) होते हैं। यही दुष्प्रज्ञता की ओर बढ़ता रास्ता है।
इस तरह कुमार, अल्पायुता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को अल्पायु बनाता है। बहुरोगीता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को बहुरोगी बनाता है। कुरूपता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को कुरूप बनाता है। प्रभावहीनता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को प्रभावहीन बनाता है। दरिद्रता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को दरिद्र बनाता है। नीचकुलीनता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को नीचकुलीन बनाता है। दुष्प्रज्ञता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को दुष्प्रज्ञ बनाता है।
सत्व स्वयं कर्म के कर्ता, कर्म के वारिस, कर्म से पैदा, कर्म से बंधे, कर्म के शरणागत हैं। और कर्म से ही मानवों में हीनता या उत्कृष्टता [^10] का भेद होता है।”
“• कुमार! ऐसा होता है कि कोई स्त्री या पुरुष जीवहत्या से विरत रहते हैं — डंडा एवं शस्त्र फेंक चुके, शर्मिले एवं दयावान, समस्त जीवहित के प्रति करुणामयी! वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, दीर्घायु होते हैं। यही दीर्घायुता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष जीवों को प्रताड़ित नहीं करते हैं — न हाथ से, न पत्थर से, न डंडे से, न ही शस्त्र से। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, अल्परोगी होते हैं। यही अल्परोगीता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष न क्रोधी, न ही व्याकुल होते हैं — बड़ी बात पर भी न क्रोधित होते, न कुपित होते, न विद्रोह करते, न ही विरोध करते हैं। न गुस्सा, न द्वेष, न ही खीज प्रकट करते हैं। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, सुंदर होते हैं। यही सौंदर्यता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष ईर्ष्यालु नहीं होते हैं — पराए को मिलता लाभ सत्कार, आदर सम्मान, वंदन पूजन से न जलते हैं, न कुढ़ते हैं, न ही ईर्ष्या करते हैं। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, प्रभावशाली होते हैं। यही प्रभावशीलता (बहुसक्षमता) की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष दाता होते हैं — श्रमण एवं ब्राह्मणों को भोजन पान, वस्त्र वाहन, माला गन्ध लेप, बिस्तर निवास दीपक आदि दान देते हैं। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, ऐश्वर्यशाली होते हैं। यही ऐश्वर्यता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष अहंकारी नहीं होते हैं — बल्कि वंदनीय लोगों को वंदन करते, खड़े होने योग्य के लिए खड़े होते, आसन देने योग्य को आसन देते, रास्ता छोड़ने योग्य के लिए रास्ता छोड़ते हैं। तथा सत्कारयोग्य आदरणीय सम्माननीय या पूजनीय लोगों का सत्कार आदर सम्मान या पूजा करते हैं। वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, उच्चकुलीन होते हैं। यही उच्चकुलीनता की ओर बढ़ता रास्ता है।
• और कोई स्त्री या पुरुष जाकर श्रमण या ब्राह्मण को पूछते हैं — ‘भन्ते! क्या कुशल होता है? क्या अकुशल होता है? क्या दोषपूर्ण होता है? क्या निर्दोष होता है? क्या (स्वभाव) विकसित करना चाहिए? क्या विकसित नहीं करना चाहिए? किस तरह के कर्म मुझे दीर्घकालीन अहित एवं दुःख की ओर ले जाएँगे? और किस तरह के कर्म मुझे दीर्घकालीन हित एवं सुख की ओर ले जाएँगे?’ वे ऐसा कर्म कर, उपक्रम कर मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजते हैं। मनुष्यता में लौटने पर जहाँ कही जन्म हो, महाप्रज्ञावान (बड़ी सद्बुद्धि प्राप्त) होते हैं। यही महाप्रज्ञता की ओर बढ़ता रास्ता है।
इस तरह कुमार, दीर्घायुता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को दीर्घायु बनाता है। अल्परोगीता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को अल्परोगी बनाता है। सौंदर्यता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को सुंदर बनाता है। प्रभावशीलता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को प्रभावशाली बनाता है। ऐश्वर्यता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को ऐश्वर्यशाली बनाता है। उच्चकुलीनता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को उच्चकुलीन बनाता है। महाप्रज्ञता की ओर बढ़ता रास्ता मानवों को महाप्रज्ञावान बनाता है।
और इस तरह सत्व स्वयं कर्म के कर्ता, कर्म के वारिस, कर्म से पैदा, कर्म से बंधे, कर्म के शरणागत हैं। और कर्म से ही सत्वों में हीनता या उत्कृष्टता का भेद होता है।”
यह सुनकर तोदेय्यपुत्र कुमार सुभ कह पड़ा, “अतिउत्तम, हे गोतम! अतिउत्तम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि अच्छी आँखोंवाला स्पष्ट देख पाए — उसी तरह गुरु गोतम ने धर्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया। मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ! धर्म एवं संघ की! गुरु गोतम मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
सुत्र समाप्त।
पालि
२८९. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने, अनाथपिण्डिकस्स आरामे। अथ खो सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि। सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवन्तं एतदवोच –
‘‘को नु खो, भो गोतम, हेतु को पच्चयो येन मनुस्सानंयेव सतं मनुस्सभूतानं दिस्सन्ति हीनप्पणीतता? दिस्सन्ति हि, भो गोतम, मनुस्सा अप्पायुका, दिस्सन्ति दीघायुका; दिस्सन्ति बव्हाबाधा बह्वाबाधा (स्या॰ कं॰ क॰), दिस्सन्ति अप्पाबाधा; दिस्सन्ति दुब्बण्णा, दिस्सन्ति वण्णवन्तो; दिस्सन्ति अप्पेसक्खा, दिस्सन्ति महेसक्खा; दिस्सन्ति अप्पभोगा, दिस्सन्ति महाभोगा; दिस्सन्ति नीचकुलीना, दिस्सन्ति उच्चाकुलीना; दिस्सन्ति दुप्पञ्ञा, दिस्सन्ति पञ्ञवन्तो पञ्ञावन्तो (सी॰ पी॰) । को नु खो, भो गोतम, हेतु को पच्चयो येन मनुस्सानंयेव सतं मनुस्सभूतानं दिस्सन्ति हीनप्पणीतता’’ति?
‘‘कम्मस्सका , माणव, सत्ता कम्मदायादा कम्मयोनी कम्मबन्धू कम्मयोनि कम्मबन्धु (सी॰) कम्मप्पटिसरणा। कम्मं सत्ते विभजति यदिदं – हीनप्पणीततायाति। न खो अहं इमस्स भोतो गोतमस्स संखित्तेन भासितस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं आजानामि। साधु मे भवं गोतमो तथा धम्मं देसेतु यथा अहं इमस्स भोतो गोतमस्स संखित्तेन भासितस्स वित्थारेन अत्थं अविभत्तस्स वित्थारेन अत्थं आजानेय्य’’न्ति।
२९०. ‘‘तेन हि, माणव, सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि; भासिस्सामी’’ति। ‘‘एवं, भो’’ति खो सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवतो पच्चस्सोसि। भगवा एतदवोच –
‘‘इध, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा पाणातिपाती होति लुद्दो लोहितपाणि हतपहते निविट्ठो अदयापन्नो पाणभूतेसु सब्बपाणभूतेसु (सी॰ क॰)। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन समादिण्णेन (पी॰ क॰) कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति अप्पायुको होति। अप्पायुकसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – पाणातिपाती होति लुद्दो लोहितपाणि हतपहते निविट्ठो अदयापन्नो पाणभूतेसु।
‘‘इध पन, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा पाणातिपातं पहाय पाणातिपाता पटिविरतो होति निहितदण्डो निहितसत्थो, लज्जी दयापन्नो सब्बपाणभूतहितानुकम्पी विहरति। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति दीघायुको होति। दीघायुकसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – पाणातिपातं पहाय पाणातिपाता पटिविरतो होति निहितदण्डो निहितसत्थो, लज्जी दयापन्नो सब्बपाणभूतहितानुकम्पी विहरति।
२९१. ‘‘इध , माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा सत्तानं विहेठकजातिको होति, पाणिना वा लेड्डुना वा दण्डेन वा सत्थेन वा। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति बव्हाबाधो होति। बव्हाबाधसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – सत्तानं विहेठकजातिको होति पाणिना वा लेड्डुना वा दण्डेन वा सत्थेन वा।
‘‘इध पन, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा सत्तानं अविहेठकजातिको होति पाणिना वा लेड्डुना वा दण्डेन वा सत्थेन वा। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति अप्पाबाधो होति। अप्पाबाधसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – सत्तानं अविहेठकजातिको होति पाणिना वा लेड्डुना वा दण्डेन वा सत्थेन वा।
२९२. ‘‘इध, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा कोधनो होति उपायासबहुलो। अप्पम्पि वुत्तो समानो अभिसज्जति कुप्पति ब्यापज्जति पतिट्ठीयति कोपञ्च दोसञ्च अप्पच्चयञ्च पातुकरोति। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति दुब्बण्णो होति। दुब्बण्णसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – कोधनो होति उपायासबहुलो; अप्पम्पि वुत्तो समानो अभिसज्जति कुप्पति ब्यापज्जति पतिट्ठीयति कोपञ्च दोसञ्च अप्पच्चयञ्च पातुकरोति।
‘‘इध पन, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा अक्कोधनो होति अनुपायासबहुलो; बहुम्पि वुत्तो समानो नाभिसज्जति न कुप्पति न ब्यापज्जति न पतिट्ठीयति न कोपञ्च दोसञ्च अप्पच्चयञ्च पातुकरोति। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति पासादिको होति। पासादिकसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – अक्कोधनो होति अनुपायासबहुलो; बहुम्पि वुत्तो समानो नाभिसज्जति न कुप्पति न ब्यापज्जति न पतिट्ठीयति न कोपञ्च दोसञ्च अप्पच्चयञ्च पातुकरोति।
२९३. ‘‘इध, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा इस्सामनको होति; परलाभसक्कारगरुकारमाननवन्दनपूजनासु इस्सति उपदुस्सति इस्सं बन्धति। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति अप्पेसक्खो होति। अप्पेसक्खसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – इस्सामनको होति; परलाभसक्कारगरुकारमाननवन्दनपूजनासु इस्सति उपदुस्सति इस्सं बन्धति।
‘‘इध पन, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा अनिस्सामनको होति; परलाभसक्कारगरुकारमाननवन्दनपूजनासु न इस्सति न उपदुस्सति न इस्सं बन्धति। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति महेसक्खो होति। महेसक्खसंवत्तनिका एसा, माणव , पटिपदा यदिदं – अनिस्सामनको होति; परलाभसक्कारगरुकारमाननवन्दनपूजनासु न इस्सति न उपदुस्सति न इस्सं बन्धति।
२९४. ‘‘इध, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा न दाता होति समणस्स वा ब्राह्मणस्स वा अन्नं पानं वत्थं यानं मालागन्धविलेपनं सेय्यावसथपदीपेय्यं। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति अप्पभोगो होति। अप्पभोगसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – न दाता होति समणस्स वा ब्राह्मणस्स वा अन्नं पानं वत्थं यानं मालागन्धविलेपनं सेय्यावसथपदीपेय्यं।
‘‘इध पन, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा दाता होति समणस्स वा ब्राह्मणस्स वा अन्नं पानं वत्थं यानं मालागन्धविलेपनं सेय्यावसथपदीपेय्यं। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति महाभोगो होति। महाभोगसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – दाता होति समणस्स वा ब्राह्मणस्स वा अन्नं पानं वत्थं यानं मालागन्धविलेपनं सेय्यावसथपदीपेय्यं।
२९५. ‘‘इध, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा थद्धो होति अतिमानी – अभिवादेतब्बं न अभिवादेति, पच्चुट्ठातब्बं न पच्चुट्ठेति, आसनारहस्स न आसनं देति, मग्गारहस्स न मग्गं देति, सक्कातब्बं न सक्करोति, गरुकातब्बं न गरुकरोति, मानेतब्बं न मानेति, पूजेतब्बं न पूजेति। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति नीचकुलीनो होति। नीचकुलीनसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – थद्धो होति अतिमानी; अभिवादेतब्बं न अभिवादेति, पच्चुट्ठातब्बं न पच्चुट्ठेति, आसनारहस्स न आसनं देति, मग्गारहस्स न मग्गं देति, सक्कातब्बं न सक्करोति, गरुकातब्बं न गरुकरोति, मानेतब्बं न मानेति, पूजेतब्बं न पूजेति।
‘‘इध पन, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा अत्थद्धो होति अनतिमानी; अभिवादेतब्बं अभिवादेति, पच्चुट्ठातब्बं पच्चुट्ठेति, आसनारहस्स आसनं देति, मग्गारहस्स मग्गं देति, सक्कातब्बं सक्करोति, गरुकातब्बं गरुकरोति, मानेतब्बं मानेति, पूजेतब्बं पूजेति। सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति उच्चाकुलीनो होति। उच्चाकुलीनसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – अत्थद्धो होति अनतिमानी; अभिवादेतब्बं अभिवादेति, पच्चुट्ठातब्बं पच्चुट्ठेति, आसनारहस्स आसनं देति, मग्गारहस्स मग्गं देति, सक्कातब्बं सक्करोति, गरुकातब्बं गरुकरोति, मानेतब्बं मानेति, पूजेतब्बं पूजेति।
२९६. ‘‘इध, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा समणं वा ब्राह्मणं वा उपसङ्कमित्वा न परिपुच्छिता होति – ‘किं, भन्ते, कुसलं, किं अकुसलं; किं सावज्जं, किं अनवज्जं; किं सेवितब्बं, किं न सेवितब्बं; किं मे करीयमानं दीघरत्तं अहिताय दुक्खाय होति, किं वा पन मे करीयमानं दीघरत्तं हिताय सुखाय होती’ति? सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा अपायं दुग्गतिं विनिपातं निरयं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति दुप्पञ्ञो होति। दुप्पञ्ञसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – समणं वा ब्राह्मणं वा उपसङ्कमित्वा न परिपुच्छिता होति – ‘किं, भन्ते, कुसलं, किं अकुसलं; किं सावज्जं, किं अनवज्जं; किं सेवितब्बं, किं न सेवितब्बं ; किं मे करीयमानं दीघरत्तं अहिताय दुक्खाय होति, किं वा पन मे करीयमानं दीघरत्तं हिताय सुखाय होती’’’ति?
‘‘इध पन, माणव, एकच्चो इत्थी वा पुरिसो वा समणं वा ब्राह्मणं वा उपसङ्कमित्वा परिपुच्छिता होति – ‘किं, भन्ते, कुसलं, किं अकुसलं; किं सावज्जं, किं अनवज्जं; किं सेवितब्बं, किं न सेवितब्बं; किं मे करीयमानं दीघरत्तं अहिताय दुक्खाय होति, किं वा पन मे करीयमानं दीघरत्तं हिताय सुखाय होती’ति? सो तेन कम्मेन एवं समत्तेन एवं समादिन्नेन कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति। नो चे कायस्स भेदा परं मरणा सुगतिं सग्गं लोकं उपपज्जति, सचे मनुस्सत्तं आगच्छति यत्थ यत्थ पच्चाजायति महापञ्ञो होति। महापञ्ञसंवत्तनिका एसा, माणव, पटिपदा यदिदं – समणं वा ब्राह्मणं वा उपसङ्कमित्वा परिपुच्छिता होति – ‘किं, भन्ते, कुसलं, किं अकुसलं; किं सावज्जं, किं अनवज्जं; किं सेवितब्बं , किं न सेवितब्बं; किं मे करीयमानं दीघरत्तं अहिताय दुक्खाय होति, किं वा पन मे करीयमानं दीघरत्तं हिताय सुखाय होती’’’ति?
२९७. ‘‘इति खो, माणव, अप्पायुकसंवत्तनिका पटिपदा अप्पायुकत्तं उपनेति, दीघायुकसंवत्तनिका पटिपदा दीघायुकत्तं उपनेति; बव्हाबाधसंवत्तनिका पटिपदा बव्हाबाधत्तं उपनेति, अप्पाबाधसंवत्तनिका पटिपदा अप्पाबाधत्तं उपनेति; दुब्बण्णसंवत्तनिका पटिपदा दुब्बण्णत्तं उपनेति, पासादिकसंवत्तनिका पटिपदा पासादिकत्तं उपनेति; अप्पेसक्खसंवत्तनिका पटिपदा अप्पेसक्खत्तं उपनेति, महेसक्खसंवत्तनिका पटिपदा महेसक्खत्तं उपनेति; अप्पभोगसंवत्तनिका पटिपदा अप्पभोगत्तं उपनेति, महाभोगसंवत्तनिका पटिपदा महाभोगत्तं उपनेति; नीचकुलीनसंवत्तनिका पटिपदा नीचकुलीनत्तं उपनेति, उच्चाकुलीनसंवत्तनिका पटिपदा उच्चाकुलीनत्तं उपनेति; दुप्पञ्ञसंवत्तनिका पटिपदा दुप्पञ्ञत्तं उपनेति, महापञ्ञसंवत्तनिका पटिपदा महापञ्ञत्तं उपनेति। कम्मस्सका, माणव, सत्ता कम्मदायादा कम्मयोनी कम्मबन्धू कम्मप्पटिसरणा। कम्मं सत्ते विभजति यदिदं – हीनप्पणीतताया’’ति।
एवं वुत्ते, सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम, अभिक्कन्तं, भो गोतम! सेय्यथापि, भो गोतम, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – ‘चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्ती’ति; एवमेवं भोता गोतमेन अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो। एसाहं भवन्तं गोतमं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च। उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति।
चूळकम्मविभङ्गसुत्तं निट्ठितं पञ्चमं।