
कौन ब्राह्मण होता है?
हिन्दी
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान इच्छानङ्गल में घने वन में विहार कर रहे थे।
उस समय बहुत से बड़े-बड़े प्रसिद्ध और विख्यात महासंपन्न ब्राह्मण इच्छानङ्गल में रहते थे, जैसे—चङ्की ब्राह्मण, तारुक्ख ब्राह्मण, पोक्खरसाति ब्राह्मण, जाणुसोणि ब्राह्मण, तोदेय्य ब्राह्मण, और अन्य दूसरे भी बड़े-बड़े प्रसिद्ध और विख्यात महासंपन्न ब्राह्मण।
तब युवा-ब्राह्मण वासेट्ठ और भारद्वाज 1 चहलकदमी करते हुए घूम रहे थे, टहल रहे थे, जब उनमें यह चर्चा छिड़ी—“कौन ब्राह्मण होता है?”
भारद्वाज युवा-ब्राह्मण ने कहा, “श्रीमान, जब कोई माता और पिता, दोनों के ही कुल से ऊँची जाति का हो, जाति से पितृवंश की सात पीढ़ियों से परिशुद्ध कुल का हो, जो अखंडित और निष्कलंक रही हो—वह ब्राह्मण होता है।”
वासेट्ठ युवा-ब्राह्मण ने कहा, “श्रीमान, जब कोई शीलवान हो, व्रत संपन्न हो—वह ब्राह्मण होता है।”
न वासेट्ठ युवा-ब्राह्मण भारद्वाज युवा-ब्राह्मण को समझा पा रहा था, और न ही भारद्वाज युवा-ब्राह्मण वासेट्ठ युवा-ब्राह्मण को समझा पा रहा था।
तब वासेट्ठ युवा-ब्राह्मण ने भारद्वाज युवा-ब्राह्मण को सुझाव दिया, “ऐसा है, भारद्वाज, कि शाक्यपुत्र श्रमण गौतम, जो शाक्य-कुल से प्रव्रज्यित है, वे इच्छानङ्गल के घने वन में विहार कर रहे हैं। उन श्रीमान गोतम के बारे में ऐसी यशकीर्ति फैली है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’ चलो, भारद्वाज जी, उस श्रमण गौतम के पास चलते हैं, और जाकर इस बारे में श्रमण गौतम को पुछते हैं। और जैसे श्रमण गौतम उत्तर देंगे, उसी तरह हम धारण करेंगे।”
“ठीक है!” भारद्वाज युवा-ब्राह्मण ने उत्तर दिया।
तब दोनों युवा ब्राह्मण वासेट्ठ और भारद्वाज भगवान के पास गए, और जाकर हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप करने पर वे एक ओर बैठ गए। एक ओर बैठकर वासेट्ठ युवा-ब्राह्मण ने भगवान से गाथाओं में कहा—
हम दोनों ही त्रैविद्य में,
अधिकृत और स्वीकृत हैं।
मैं हूँ पोक्खरसाति का,
ये तारुक्ख का शिष्य है।
अभ्यास है जो त्रैविद्य का,
उस सब में हम निपुण हैं।
पद व्यक्त हो या व्याकरण,
आचार्य-जैसे जाप करते हैं।
जातिवाद को लेकर अब,
गोतम, हमारा विवाद है।
जाति से ब्राह्मण होता है,
भारद्वाज ऐसा कहता है।
पर मैं बताता कर्मों से,
ये जान लो, ओ चक्षुमान!
समझा नहीं पाए हैं,
दोनों हम एक-दूजे को।
पूछने आए हम श्रीमान से,
सम्बुद्ध-से जो प्रसिद्ध हैं।
जैसे क्षय न होते चाँद को,
जनता हाथ जोड़ती है।
वैसे यह लोक गोतम को,
वंदन और नमन करती है।
इस लोक में उत्पन्न चक्षु जो,
उस गोतम से पूछते हैं—
जाति से ब्राह्मण होता है?
या होता है वह कर्मों से?
जानते नहीं, बताएँ हमें,
ताकि ब्राह्मण हम पहचान ले।
भगवान से वासेट्ठ से (गाथाओं में) कहा—
मैं बताऊँगा अब तुम्हें,
यथार्थ और अनुक्रम से,
जाति-विश्लेषण जीवों का,
जातियाँ भिन्न-भिन्न हैं।
जान लो—घास-वृक्षों को,
नहीं जानते वे स्वयं को।
विशेषता ("लिङ्ग") उनकी जाति से,
जातियाँ भिन्न-भिन्न हैं।
तब आते हैं—कीट-पतंग,
उनसे चींटी-दीमक तक।
विशेषता उनकी जाति से,
जातियाँ भिन्न-भिन्न हैं।
जान लो—चार पैर के प्राणी,
छोटे हो या बहुत बड़े।
विशेषता उनकी जाति से,
जातियाँ भिन्न-भिन्न हैं।
जान लो—साँप लंबी-पीठ के,
रेंगते हैं जो पेट पर।
विशेषता उनकी जाति से,
जातियाँ भिन्न-भिन्न हैं।
तब आती हैं—मछलियाँ,
जल में जिनका परिसर हैं।
विशेषता उनकी जाति से,
जातियाँ भिन्न-भिन्न हैं।
जान लो अब—पक्षियों को,
पंख-यान जो उड़ते हैं।
विशेषता उनकी जाति से,
जातियाँ भिन्न-भिन्न हैं।
जैसे है इन जातियों में,
विशेषता हो जाति से,
ऐसा नहीं मनुष्यों में,
विशेषता हो जाति से।
न केश से, न सिर से,
न कान से, न आँख से,
न मुख से, न नाक से,
न होठ से, न भौंह से।
न कंधे से, न गर्दन से,
न पेट से, न पीठ से,
न नितंब से, न वक्ष से
न गुप्तांग से, न संभोग से।
न हाथ से, न पैर से,
न उँगली से, न नाखून से,
न जांघ से, न घुटने से,
न वर्ण से, न स्वर से,
न विशेष हो जाति से,
जैसे अन्य जाति में।
शरीरों की उस निजता में,
विशेष न दिखे मनुष्यों में।
भिन्नता वह मनुष्यों की,
मान्यताओं से कही जाती है।
जो कोई मनुष्यों में,
यापन करे गोपालन से,
उसे, वासेट्ठ, जान लो,
किसान है, ब्राह्मण नहीं।
जो कोई मनुष्यों में,
यापन करे शिल्पकारी से,
उसे, वासेट्ठ, जान लो,
शिल्पकार है, ब्राह्मण नहीं।
जो कोई मनुष्यों में,
यापन करे लेन-देन से,
उसे, वासेट्ठ, जान लो,
व्यापारी है, ब्राह्मण नहीं।
जो कोई मनुष्यों में,
यापन करे पर-सेवा से,
उसे, वासेट्ठ, जान लो,
नौकर है, ब्राह्मण नहीं।
जो कोई मनुष्यों में,
यापन करे चोरी से,
उसे, वासेट्ठ, जान लो,
चोर है, ब्राह्मण नहीं।
जो कोई मनुष्यों में,
यापन करे तीरंदाजी से,
उसे, वासेट्ठ, जान लो,
योद्धा है, ब्राह्मण नहीं।
जो कोई मनुष्यों में,
यापन करे पुरोहित-गिरि से,
उसे, वासेट्ठ, जान लो,
यज्ञक है, ब्राह्मण नहीं।
जो कोई मनुष्यों में,
गाँव-देश पर यापन करे,
उसे, वासेट्ठ, जान लो,
राजा है, ब्राह्मण नहीं।
मैं न कहूँ ब्राह्मण उसे,
जन्म ले जो मातृयोनि से,
भले बात करे ब्राह्मणों जैसे,
यदि हो कोई लगाव उसे।
पर न लगाव, न आसक्त हो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
सभी बंधनों को तोड़ कर,
जो न कभी व्याकुल हो,
संगत से परे, बिना जुड़े जो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
काटकर हंटर (=क्रोध) व चाबुक (=तृष्णा) को,
साथ रस्सी (=दृष्टि) व लगाम (=अनुशय) को,
जो बंबू (=अविद्या) हटाकर बुद्ध हो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
आक्रोश, वध व कारावास को,
जो बिना द्वेष के सहन करे,
बल जिसकी सेना, शक्ति धैर्य हो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
कर्तव्यशील बिना क्रोध के,
शीलवान और विनम्र जो,
काबू हो चुका, अंतिम-शरीर का,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
कमल-पत्ते पर बूँद जैसे,
सुई की नोक पर सरसो जैसे,
कामुकता जिससे फिसलती हो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
दुःख को जो समझते हैं,
क्षय उसका यहीं करते हैं,
भार गिराकर, बिना बेड़ी के,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
गहरी प्रज्ञा, मेधावी हो,
मार्ग-अमार्ग में निपुण जो,
सर्वोच्च ध्येय पर जो पहुँचे,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
बिना मिलावट के गृहस्थों से,
और न ही संन्यासियों से,
बेघर यात्री, अल्पेच्छ जो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
दण्ड नीचे जो रख दे,
सबल-दुर्बल जीवों के लिए,
न प्राण हरें, न घात करें,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
विरोधियों में बिना विरोध के,
शस्त्रधारियों में निर्वृत्त,
आसक्तों में अनासक्त जो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
जो राग-द्वेष को रख नीचे,
अहंभाव और कंजूसी को भी,
सुई की नोक पर सरसो जैसे,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
बिना-कर्कश जानकारी दे,
सच्ची वाणी बोलते हुए,
बिना किसी को ठेस पहुँचाए,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
चाहे लंबा हो या छोटा हो,
अणु-स्थूल या सुंदर-कुरूप हो,
चुराएँ न कुछ इस लोक में,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
आशा न दिखती हो उनमें,
इस लोक या परलोक के लिए,
बिना आशा के, बिना जुड़े,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
उपादान न दिखती हो उनमें,
शंकारहित प्रत्यक्ष ज्ञान से,
अमृत-अवस्था प्राप्त जिसे,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
जो लांघ ले योद्धा,
पुण्य – पाप के संगम को,
अशोक, निर्मल, शुद्ध वह
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
विमल व शुद्ध चाँद जैसे,
बिना व्याकुल हो स्थिर हुए,
पुनर्जन्म का मजा क्षीण किए,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
इतने कठिन अवरोध जो,
संसरण व मोह को त्याग दिए,
लांघ कर ध्यानी पार हुए,
निश्चल, बिना उलझन के,
अनासक्त हो निर्वृत्त हुए,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
जो कामुकता को त्याग दिए,
बेघर होकर प्रव्रज्यित हुए,
काम-अस्तित्व क्षीण किए,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
जो तृष्णा को त्याग दिए,
बेघर होकर प्रव्रज्यित हुए,
तृष्णा-अस्तित्व क्षीण किए,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
मनुष्य-योग छोड़कर पीछे,
दिव्य-योग के परे गए,
सभी योग बेड़ियाँ तोड़ दिए,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
मजा-असंतुष्टि छोड़कर पीछे,
उपधि-रहित शीतल हुए,
पूरी दुनिया के अभिभू वीर,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
सभी सत्वों की च्युति हो,
या उत्पत्ति भी पता चले,
अनासक्त, सुगत, बुद्ध जो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
गति उसकी जानते नहीं,
देव, गंधब्ब और मनुष्य,
ऐसा क्षिणास्रव अरहंत हो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
न पहले, न पश्चात में,
न बीच में, कुछ भी नहीं,
कुछ न हो, न आसक्त हो,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
वृषभ, सर्वोत्तम वीरों में,
महर्षि, विजेता हो चुके,
अटल, बुद्ध, वे नहा चुके,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
जानकार अपने पूर्वजन्मों के,
स्वर्ग-नर्क देखने वाले,
जन्म-समाप्ति प्राप्त जिसे,
मैं कहता ब्राह्मण उसे।
मान्यता मात्र लोक में,
नाम-गोत्र ये रचे हुए,
सम्मति से उत्पन्न हुए,
जहाँ-जहाँ भी रचे गए।
सुप्त जो दीर्घकाल से,
गलत दृष्टि न जानते,
अनजान घोषित करे,
ब्राह्मण होते जन्म से।
न ब्राह्मण कोई जन्म से,
न अ-ब्राह्मण हो जन्म से,
ब्राह्मण होते हैं कर्म से,
अ-ब्राह्मण भी कर्म से।
किसान कोई कर्म से,
शिल्पकार भी कर्म से,
व्यापारी कोई कर्म से,
नौकर भी हो कर्म से।
चोर हो कोई कर्म से,
योद्धा भी हो कर्म से,
यज्ञक कोई कर्म से,
राजा भी हो कर्म से।
यथास्वरूप इस तरह से,
कर्म देखते पंडित हैं,
प्रतीत्य समुत्पाद देखकर,
निपुण वह कर्म-विपाक में।
दुनिया चलती हैं कर्म से,
जनता चलती हैं कर्म से,
सत्व बंधे हैं कर्म से,
दौड़ते रथ में धुरे की कील जैसे।
तपस्या और ब्रह्मचर्य से,
संयम और काबू से,
इस तरह ब्राह्मण होते हैं,
ब्राह्मण उत्तम हो ऐसे।
संपन्न हो तीन विद्या में,
सन्त, क्षीण कर पुनर्भव,
वासेट्ठ, जान लो ऐसे,
जानकार के लिए ब्रह्मा-इन्द्र जैसे।
जब ऐसा कहा गया, तब वासेट्ठ और भारद्वाज युवा-ब्राह्मण भगवान से कह पड़े:
“अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह भगवान ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।
हम बुद्ध की शरण जाते हैं! धम्म की और संघ की भी! भगवान हमें आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”
सुत्र समाप्त।
यही दो युवा-ब्राह्मण, वासेट्ठ और भारद्वाज, दीघनिकाय १३ में भी इसी प्रकार मार्ग और अमार्ग पर वाद-विवाद करते हुए अंतिम निर्णय के लिए भगवान के पास ही पहुँचते हैं। ↩︎
पालि
४५४. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा इच्छानङ्गले (इच्छानङ्कले (सी. पी.)) विहरति इच्छानङ्गलवनसण्डे. तेन खो पन समयेन सम्बहुला अभिञ्ञाता अभिञ्ञाता ब्राह्मणमहासाला इच्छानङ्गले पटिवसन्ति, सेय्यथिदं – चङ्की ब्राह्मणो, तारुक्खो ब्राह्मणो, पोक्खरसाति ब्राह्मणो, जाणुस्सोणि (जाणुस्सोणी (पी.), जाणुसोणी (क.)) ब्राह्मणो, तोदेय्यो ब्राह्मणो, अञ्ञे च अभिञ्ञाता अभिञ्ञाता ब्राह्मणमहासाला. अथ खो वासेट्ठभारद्वाजानं माणवानं जङ्घाविहारं अनुचङ्कमन्तानं अनुविचरन्तानं (अनुचङ्कममानानं अनुविचरमानानं (सी. पी.)) अयमन्तराकथा उदपादि – ‘‘कथं, भो, ब्राह्मणो होती’’ति? भारद्वाजो माणवो एवमाह – ‘‘यतो खो, भो, उभतो सुजातो मातितो च पितितो च संसुद्धगहणिको याव सत्तमा पितामहयुगा अक्खित्तो अनुपक्कुट्ठो जातिवादेन – एत्तावता खो, भो, ब्राह्मणो होती’’ति. वासेट्ठो माणवो एवमाह – ‘‘यतो खो, भो, सीलवा च होति वत्तसम्पन्नो (वतसम्पन्नो (पी.)) च – एत्तावता खो, भो, ब्राह्मणो होती’’ति. नेव खो असक्खि भारद्वाजो माणवो वासेट्ठं माणवं सञ्ञापेतुं, न पन असक्खि वासेट्ठो माणवो भारद्वाजं माणवं सञ्ञापेतुं. अथ खो वासेट्ठो माणवो भारद्वाजं माणवं आमन्तेसि – ‘‘अयं खो, भो भारद्वाज, समणो गोतमो सक्यपुत्तो सक्यकुला पब्बजितो इच्छानङ्गले विहरति इच्छानङ्गलवनसण्डे. तं खो पन भवन्तं गोतमं एवं कल्याणो कित्तिसद्दो अब्भुग्गतो – ‘इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा’ति. आयाम, भो भारद्वाज, येन समणो गोतमो तेनुपसङ्कमिस्साम; उपसङ्कमित्वा समणं गोतमं एतमत्थं पुच्छिस्साम. यथा नो समणो गोतमो ब्याकरिस्सति तथा नं धारेस्सामा’’ति. ‘‘एवं, भो’’ति खो भारद्वाजो माणवो वासेट्ठस्स माणवस्स पच्चस्सोसि.
४५५. अथ खो वासेट्ठभारद्वाजा माणवा येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदिंसु. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु. एकमन्तं निसिन्नो खो वासेट्ठो माणवो भगवन्तं गाथाहि अज्झभासि –
‘‘अनुञ्ञातपटिञ्ञाता, तेविज्जा मयमस्मुभो;
अहं पोक्खरसातिस्स, तारुक्खस्सायं माणवो.
‘‘तेविज्जानं यदक्खातं, तत्र केवलिनोस्मसे;
पदकस्मा वेय्याकरणा (नो ब्याकरणा (स्या. कं. क.)), जप्पे आचरियसादिसा;
तेसं नो जातिवादस्मिं, विवादो अत्थि गोतम.
‘‘जातिया ब्राह्मणो होति, भारद्वाजो इति भासति;
अहञ्च कम्मुना (कम्मना (सी. पी.)) ब्रूमि, एवं जानाहि चक्खुम.
‘‘ते न सक्कोम ञापेतुं (सञ्ञत्तुं (पी.), सञ्ञापेतुं (क.)), अञ्ञमञ्ञं मयं उभो;
भवन्तं पुट्ठुमागमा, सम्बुद्धं इति विस्सुतं.
‘‘चन्दं यथा खयातीतं, पेच्च पञ्जलिका जना;
वन्दमाना नमस्सन्ति, लोकस्मिं गोतमं.
‘‘चक्खुं लोके समुप्पन्नं, मयं पुच्छाम गोतमं;
जातिया ब्राह्मणो होति, उदाहु भवति कम्मुना (कम्मना (सी. पी.));
अजानतं नो पब्रूहि, यथा जानेमु ब्राह्मण’’न्ति.
४५६.
‘‘तेसं वो अहं ब्यक्खिस्सं, (वासेट्ठाति भगवा)
अनुपुब्बं यथातथं;
जातिविभङ्गं पाणानं, अञ्ञमञ्ञाहि जातियो.
‘‘तिणरुक्खेपि जानाथ, न चापि पटिजानरे;
लिङ्गं जातिमयं तेसं, अञ्ञमञ्ञा हि जातियो.
‘‘ततो कीटे पटङ्गे च, याव कुन्थकिपिल्लिके;
लिङ्गं जातिमयं तेसं, अञ्ञमञ्ञा हि जातियो.
‘‘चतुप्पदेपि जानाथ, खुद्दके च महल्लके;
लिङ्गं जातिमयं तेसं, अञ्ञमञ्ञा हि जातियो.
‘‘पादुदरेपि जानाथ, उरगे दीघपिट्ठिके;
लिङ्गं जातिमयं तेसं, अञ्ञमञ्ञा हि जातियो.
‘‘ततो मच्छेपि जानाथ, उदके वारिगोचरे;
लिङ्गं जातिमयं तेसं, अञ्ञमञ्ञा हि जातियो.
‘‘ततो पक्खीपि जानाथ, पत्तयाने विहङ्गमे;
लिङ्गं जातिमयं तेसं, अञ्ञमञ्ञा हि जातियो.
‘‘यथा एतासु जातीसु, लिङ्गं जातिमयं पुथु;
एवं नत्थि मनुस्सेसु, लिङ्गं जातिमयं पुथु.
‘‘न केसेहि न सीसेहि, न कण्णेहि न अक्खीहि;
न मुखेन न नासाय, न ओट्ठेहि भमूहि वा.
‘‘न गीवाय न अंसेहि, न उदरेन न पिट्ठिया;
न सोणिया न उरसा, न सम्बाधे न मेथुने (न सम्बाधा न मेथुना (क.)).
‘‘न हत्थेहि न पादेहि, नङ्गुलीहि नखेहि वा;
न जङ्घाहि न ऊरूहि, न वण्णेन सरेन वा;
लिङ्गं जातिमयं नेव, यथा अञ्ञासु जातिसु.
४५७.
‘‘पच्चत्तञ्च सरीरेसु (पच्चत्तं ससरीरेसु (सी. पी.)), मनुस्सेस्वेतं न विज्जति;
वोकारञ्च मनुस्सेसु, समञ्ञाय पवुच्चति.
‘‘यो हि कोचि मनुस्सेसु, गोरक्खं उपजीवति;
एवं वासेट्ठ जानाहि, कस्सको सो न ब्राह्मणो.
‘‘यो हि कोचि मनुस्सेसु, पुथुसिप्पेन जीवति;
एवं वासेट्ठ जानाहि, सिप्पिको सो न ब्राह्मणो.
‘‘यो हि कोचि मनुस्सेसु, वोहारं उपजीवति;
एवं वासेट्ठ जानाहि, वाणिजो सो न ब्राह्मणो.
‘‘यो हि कोचि मनुस्सेसु, परपेस्सेन जीवति;
एवं वासेट्ठ जानाहि, पेस्सको (पेस्सिको (सी. स्या. कं. पी.)) सो न ब्राह्मणो.
‘‘यो हि कोचि मनुस्सेसु, अदिन्नं उपजीवति;
एवं वासेट्ठ जानाहि, चोरो एसो न ब्राह्मणो.
‘‘यो हि कोचि मनुस्सेसु, इस्सत्थं उपजीवति;
एवं वासेट्ठ जानाहि, योधाजीवो न ब्राह्मणो.
‘‘यो हि कोचि मनुस्सेसु, पोरोहिच्चेन जीवति;
एवं वासेट्ठ जानाहि, याजको सो न ब्राह्मणो.
‘‘यो हि कोचि मनुस्सेसु, गामं रट्ठञ्च भुञ्जति;
एवं वासेट्ठ जानाहि, राजा एसो न ब्राह्मणो.
‘‘न चाहं ब्राह्मणं ब्रूमि, योनिजं मत्तिसम्भवं;
भोवादि (भोवादी (स्या. कं.)) नाम सो होति, सचे होति सकिञ्चनो;
अकिञ्चनं अनादानं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
४५८.
‘‘सब्बसंयोजनं छेत्वा, यो वे न परितस्सति;
सङ्गातिगं विसंयुत्तं (विसञ्ञुत्तं (क.)), तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘छेत्वा नद्धिं (नद्धिं (सी. पी.)) वरत्तञ्च, सन्दानं सहनुक्कमं;
उक्खित्तपलिघं बुद्धं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘अक्कोसं वधबन्धञ्च, अदुट्ठो यो तितिक्खति;
खन्तीबलं बलानीकं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘अक्कोधनं वतवन्तं, सीलवन्तं अनुस्सदं;
दन्तं अन्तिमसारीरं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘वारिपोक्खरपत्तेव, आरग्गेरिव सासपो;
यो न लिम्पति कामेसु, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘यो दुक्खस्स पजानाति, इधेव खयमत्तनो;
पन्नभारं विसंयुत्तं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘गम्भीरपञ्ञं मेधाविं, मग्गामग्गस्स कोविदं;
उत्तमत्थमनुप्पत्तं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘असंसट्ठं गहट्ठेहि, अनागारेहि चूभयं;
अनोकसारिमप्पिच्छं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘निधाय दण्डं भूतेसु, तसेसु थावरेसु च;
यो न हन्ति न घातेति, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘अविरुद्धं विरुद्धेसु, अत्तदण्डेसु निब्बुतं;
सादानेसु अनादानं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘यस्स रागो च दोसो च, मानो मक्खो च ओहितो;
सासपोरिव आरग्गा, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
४५९.
‘‘अकक्कसं विञ्ञापनिं, गिरं सच्चं उदीरये;
याय नाभिसज्जे किञ्चि, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘यो च दीघं व रस्सं वा, अणुं थूलं सुभासुभं;
लोके अदिन्नं नादेति (नादियति (सी. पी.)), तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘आसा यस्स न विज्जन्ति, अस्मिं लोके परम्हि च;
निरासासं (निरासयं (सी. पी.)) विसंयुत्तं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘यस्सालया न विज्जन्ति, अञ्ञाय अकथंकथिं;
अमतोगधं अनुप्पत्तं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘योधपुञ्ञञ्च पापञ्च, उभो सङ्गं उपच्चगा;
असोकं विरजं सुद्धं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘चन्दं व विमलं सुद्धं, विप्पसन्नं अनाविलं;
नन्दीभवपरिक्खीणं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘यो इमं पलिपथं दुग्गं, संसारं मोहमच्चगा;
तिण्णो पारङ्गतो झायी, अनेजो अकथंकथी;
अनुपादाय निब्बुतो, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘योधकामे पहन्त्वान (पहत्वान (सी.)), अनागारो परिब्बजे;
कामभवपरिक्खीणं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘योधतण्हं पहन्त्वान, अनागारो परिब्बजे;
तण्हाभवपरिक्खीणं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘हित्वा मानुसकं योगं, दिब्बं योगं उपच्चगा;
सब्बयोगविसंयुत्तं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘हित्वा रतिञ्च अरतिं, सीतीभूतं निरूपधिं;
सब्बलोकाभिभुं वीरं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘चुतिं यो वेदि सत्तानं, उपपत्तिञ्च सब्बसो;
असत्तं सुगतं बुद्धं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘यस्स गतिं न जानन्ति, देवा गन्धब्बमानुसा;
खीणासवं अरहन्तं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘यस्स पुरे च पच्छा च, मज्झे च नत्थि किञ्चनं;
अकिञ्चनं अनादानं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘उसभं पवरं वीरं, महेसिं विजिताविनं;
अनेजं न्हातकं (नहातकं (सी. पी.)) बुद्धं, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
‘‘पुब्बेनिवासं यो वेदि, सग्गापायञ्च पस्सति;
अथो जातिक्खयं पत्तो, तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं.
४६०.
‘‘समञ्ञा हेसा लोकस्मिं, नामगोत्तं पकप्पितं;
सम्मुच्चा समुदागतं, तत्थ तत्थ पकप्पितं.
‘‘दीघरत्तानुसयितं, दिट्ठिगतमजानतं;
अजानन्ता नो (अजानन्ता नोति अजानन्ता एव (टीका)) पब्रुन्ति (पब्रुवन्ति (सी. पी.)), जातिया होति ब्राह्मणो.
‘‘न जच्चा ब्राह्मणो (वसलो (स्या. कं. क.)) होति, न जच्चा होति अब्राह्मणो (ब्राह्मणो (स्या. कं. क.));
कम्मुना ब्राह्मणो (वसलो (स्या. कं. क.)) होति, कम्मुना होति अब्राह्मणो (ब्राह्मणो (स्या. कं. क.)).
‘‘कस्सको कम्मुना होति, सिप्पिको होति कम्मुना;
वाणिजो कम्मुना होति, पेस्सको होति कम्मुना.
‘‘चोरोपि कम्मुना होति, योधाजीवोपि कम्मुना;
याजको कम्मुना होति, राजापि होति कम्मुना.
‘‘एवमेतं यथाभूतं, कम्मं पस्सन्ति पण्डिता;
पटिच्चसमुप्पाददस्सा, कम्मविपाककोविदा.
‘‘कम्मुना वत्तति लोको, कम्मुना वत्तति पजा;
कम्मनिबन्धना सत्ता, रथस्साणीव यायतो.
‘‘तपेन ब्रह्मचरियेन, संयमेन दमेन च;
एतेन ब्राह्मणो होति, एतं ब्राह्मणमुत्तमं.
‘‘तीहि विज्जाहि सम्पन्नो, सन्तो खीणपुनब्भवो;
एवं वासेट्ठ जानाहि, ब्रह्मा सक्को विजानत’’न्ति.
४६१. एवं वुत्ते, वासेट्ठभारद्वाजा माणवा भगवन्तं एतदवोचुं – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम, अभिक्कन्तं, भो गोतम! सेय्यथापि, भो गोतम, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्तीति – एवमेवं भोता गोतमेन अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो. एते मयं भवन्तं गोतमं सरणं गच्छाम धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च. उपासके नो भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गते’’ति.
वासेट्ठसुत्तं निट्ठितं अट्ठमं.