
सुभ से बहस
हिन्दी
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे।
उस समय युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त 1 श्रावस्ती में किसी कार्य से किसी गृहस्थ के घर निवास कर रहा था। तब युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त जिस गृहस्थ के घर निवास कर रहा था, उस गृहस्थ से कहा:
“गृहस्थ, मैंने सुना है कि ‘श्रावस्ती में अरहंतों की कमी नहीं है।’ आज हम किस श्रमण या ब्राह्मण से सत्संग करे?”
“गुरुजी, भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे हैं। आप भगवान से सत्संग कर सकते हैं।”
गृहस्थ बनाम संन्यासी
तब युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त उस गृहस्थ से सुनकर भगवान के पास गया, और जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त ने भगवान से कहा—
“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण कहते हैं कि ‘गृहस्थ न्यायपूर्ण कुशल धम्म में यशस्वी होते हैं, किन्तु प्रव्रज्यित न्यायपूर्ण कुशल धम्म में यशस्वी नहीं होते।’ इस पर श्रीमान गोतम का क्या कहना हैं?”
“युवा-ब्राह्मण, इस पर मैं विभाजित कर (अलग-अलग तरह से) बोलने वाला (“विभज्जवादी”) हूँ, एक तरह से बोलने वाला (“एकंसवादी”) नहीं हूँ 2।
युवा-ब्राह्मण, मैं गृहस्थ या प्रव्रज्यित के लिए मिथ्या साधनापथ की प्रशंसा नहीं करता। क्योंकि, मिथ्या साधनापथ के कारण से न गृहस्थ, और न ही प्रव्रज्यित न्यायसंगत कुशल धम्म में यशस्वी होते हैं। बल्कि मैं गृहस्थ या प्रव्रज्यित के लिए सम्यक साधनापथ की प्रशंसा करता हूँ। क्योंकि, सम्यक साधनापथ के कारण से ही गृहस्थ और प्रव्रज्यित दोनों न्यायसंगत कुशल धम्म में यशस्वी होते हैं।”
“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण कहते हैं कि ‘घर रहते गृहस्थ की जीविका (“कम्मट्ठान”) 3 बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने के कारण महा-फलदायी होती है। जबकि प्रव्रज्यित की जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने के कारण अल्प-फलदायी होती है। इस पर श्रीमान गोतम का क्या कहना हैं?”
“युवा-ब्राह्मण, इस पर भी मैं विभाजित कर (अलग-अलग तरह से) बोलने वाला हूँ, एक तरह से बोलने वाला नहीं हूँ।
- कुछ जीविका बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर भी अल्प-फलदायी होती है।
- कुछ जीविका बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर महा-फलदायी होती है।
- कुछ जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर अल्प-फलदायी होती है।
- कुछ जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर भी महा-फलदायी होती है।
और, युवा-ब्राह्मण, किस प्रकार की जीविका बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर भी अल्प-फलदायी होती है? कृषि की जीविका, युवा-ब्राह्मण, बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर भी अल्प-फलदायी होती है।
और, युवा-ब्राह्मण, किस प्रकार की जीविका बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर महा-फलदायी होती है? (पुनः) कृषि की ही जीविका, युवा-ब्राह्मण, बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर महा-फलदायी होती है।
और, युवा-ब्राह्मण, किस प्रकार की जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर अल्प-फलदायी होती है? वाणिज्य (=व्यापार) की जीविका, युवा-ब्राह्मण, अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर अल्प-फलदायी होती है।
और, युवा-ब्राह्मण, किस प्रकार की जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर भी महा-फलदायी होती है? (पुनः) वाणिज्य की ही जीविका, युवा-ब्राह्मण, अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर भी महा-फलदायी होती है।
जिस तरह, युवा-ब्राह्मण, कृषि की जीविका बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर भी असफल होने पर अल्प-फलदायी होती है। उसी तरह, घर रहते गृहस्थ की जीविका बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर भी असफल होने पर अल्प-फलदायी होती है।
और जिस तरह, युवा-ब्राह्मण, कृषि की जीविका बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर सफल होने पर महा-फलदायी होती है। उसी तरह, घर रहते गृहस्थ की जीविका बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होने पर सफल होने पर महा-फलदायी होती है।
आगे, युवा-ब्राह्मण, जिस तरह वाणिज्य की जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर, असफल होने पर अल्प-फलदायी होती है। उसी तरह, प्रव्रज्यित की जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर, असफल होने पर अल्प-फलदायी होती है।
और, युवा-ब्राह्मण, जिस तरह वाणिज्य की जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर भी सफल होने पर महा-फलदायी होती है। उसी तरह, प्रव्रज्यित की जीविका अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होने पर भी सफल होने पर महा-फलदायी होती है।”
पुण्यक्रिया और कुशलता
“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण पाँच धम्म बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं।”
“युवा-ब्राह्मण, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं—यदि तुम्हें कोई आपत्ति न हो, तो अच्छा होगा जो इस परिषद को वे पाँच धम्म बताएं।”
“मुझे कोई आपत्ति नहीं है, श्रीमान गोतम, जब आपके जैसे श्रीमान बैठे हो।”
“ठीक है, युवा-ब्राह्मण, तब बताओं।”
- “सत्य—यह पहला धम्म ब्राह्मण बताते हैं, श्रीमान गोतम, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं।
- तप—यह दूसरा धम्म…
- ब्रह्मचर्य—यह तीसरा धम्म…
- अध्ययन—यह चौथा धम्म
- त्याग—यह पाँचवा धम्म ब्राह्मण बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं।
इस पर श्रीमान गोतम का क्या कहना हैं?”
“किन्तु, युवा-ब्राह्मण, क्या ब्राह्मणों में कोई एक भी ब्राह्मण है, जो कहता हो, ‘मैं इन पाँच धम्मों को स्वयं प्रत्यक्ष-ज्ञान से साक्षात्कार कर फल-परिणाम बताता हूँ!’?”
“नहीं, श्रीमान गोतम।”
“और, भारद्वाज, क्या ब्राह्मणों के आचार्य-गुरुओं की सात पीढ़ियों में कोई एक भी आचार्य-गुरु हुआ, जिसने कहा हो, ‘मैं इन पाँच धम्मों को स्वयं प्रत्यक्ष-ज्ञान से साक्षात्कार कर फल-परिणाम बताता हूँ!’?”
“नहीं, श्रीमान गोतम।”
“और, भारद्वाज, ब्राह्मणों के जिन पूर्वज ऋषियों ने मंत्र रचे थे, जो मंत्र-प्रवक्ता थे—जैसे अष्टक, व्यमक, व्यामदेव, विश्वामित्र, यमदर्गी, अङगीरस, भारद्वाज, वासेष्ठ, कश्यप और भगू—जिनके पौराणिक मंत्रपद, गीत और भाष्य को इकट्ठा कर, आजकल के ब्राह्मण पाठ करते हैं और जाप करते हैं, बोले जाने वाले को रटकर बोलते हैं, पाठ किए जाने वाले रटकर पाठ करते हैं, क्या उन्होंने कहा था, ‘हम इन पाँच धम्मों को स्वयं प्रत्यक्ष-ज्ञान से साक्षात्कार कर फल-परिणाम बताते हैं!’?”
“नहीं, श्रीमान गोतम।”
“तो लगता है, युवा-ब्राह्मण, कि ब्राह्मणों में कोई एक भी ब्राह्मण नहीं है, जो कहता हो… ब्राह्मणों के आचार्य-गुरुओं की सात पीढ़ियों में कोई एक भी आचार्य-गुरु नहीं हुआ, जिसने कहा हो… ब्राह्मणों के जिन पूर्वज ऋषियों ने मंत्र रचे थे, जो मंत्र-प्रवक्ता थे—जैसे अष्टक, व्यमक… उन्होंने तक नहीं कहा, ‘हम इन पाँच धम्मों को स्वयं प्रत्यक्ष-ज्ञान से साक्षात्कार कर फल-परिणाम बताते हैं!’
अंधों की कतार
जैसे, भारद्वाज, एक-दूसरे को परस्पर पकड़ी हुई अन्धों की कतार हो, जिनमें न आरंभ के अन्धे कुछ देखते हैं, न मध्य के अन्धे कुछ देखते हैं, और न ही अन्त के अन्धे कुछ देखते हैं। उसी अन्धों की कतार की तरह, भारद्वाज, ब्राह्मण लगते हैं, जिनमें न आरंभ के ब्राह्मण कुछ देखते हैं, न मध्य के ब्राह्मण कुछ देखते हैं, और न ही अन्त के ब्राह्मण कुछ देखते हैं।”
जब ऐसा कहा गया, तब युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त ने भगवान के ‘अन्धों की कतार की उपमा’ से कुपित होकर, क्षुब्ध होकर भगवान को गाली-गलौच की, भगवान को कोसा, भगवान को अपशब्द कहा और आगे कहा, “श्रमण गोतम का बहुत बुरा होगा!”
उसने आगे कहा, “श्रीमान गोतम, सुभग-वन के पोक्खरसाति ब्राह्मण 4 ओपमञ्ञ (कुल) ऐसा कहते हैं—‘ऐसा ही उन श्रमण-ब्राह्मणों के साथ होता हैं, जो मनुष्यों के परे अलौकिक धम्म और कोई विशेष आर्य ज्ञान-दर्शन होने का दावा करते हैं। किन्तु उनका कहना हास्यास्पद लगता है, खोखला लगता है, तुच्छ लगता है, फालतू लगता है। क्योंकि भला यह कैसे हो सकता है कि कोई मनुष्यों के परे अलौकिक धम्म, कोई विशेष आर्य ज्ञान-दर्शन को जाने, देखे, साक्षात्कार करे—यह संभव नहीं है!’”
भोगी पोक्खरसाति ब्राह्मण
“किन्तु, युवा-ब्राह्मण, क्या सुभग-वन के पोक्खरसाति ब्राह्मण ओपमञ्ञ ने स्वयं अपना मानस फैलाकर सभी श्रमण-ब्राह्मणों के चित्त को समझ लिया है?”
“श्रीमान गोतम, सुभग-वन के पोक्खरसाति ब्राह्मण ओपमञ्ञ ने अपना मानस फैलाकर उनकी स्वयं की दासी ‘पुण्णिका’ के चित्त तक को नहीं समझा, तो भला वे अपना मानस फैलाकर सभी श्रमण-ब्राह्मणों के चित्त को कैसे समझ लेंगे?”
जन्मांध की उपमा
“युवा-ब्राह्मण, जैसे कोई जन्म से अंधा पुरुष हो—जो न काला रूप देखता है, न उजला रूप देखता है, न नीला रूप देखता है, न पीला रूप देखता है, न लाल रूप देखता है, न गुलाबी देखता है, न सम-विषम देखता है, न तारें देखता है, न चाँद-सूरज देखता है।
वह कहता है, ‘न काले-उजले रूप होते हैं, और न ही कोई काले-उजले रूप देख सकता है। न नीले-पीले रूप होते हैं, और न ही कोई नीले-पीले रूप देख सकता है। न लाल-गुलाबी रूप होते हैं, और न ही कोई लाल-गुलाबी रूप देख सकता है। न सम-विषम होता हैं, न ही कोई सम-विषम देख सकता है। न तारे होते हैं, और न ही कोई तारे देख सकता है। न चाँद-सूरज होता है, और न ही कोई चाँद-सूरज देख सकता है। क्योंकि उन्हें मैं नहीं जानता, नहीं देखता, इसलिए वे होते ही नहीं हैं।’ युवा-ब्राह्मण, क्या उसका ऐसा कहना सही हैं?”
“नहीं, श्रीमान कश्यप। काले-उजले रूप होते हैं, और काले-उजले रूप देखे जाते हैं। नीले-पीले रूप होते हैं, और नीले-पीले रूप देखे जाते हैं। लाल-गुलाबी रूप होते हैं, और लाल-गुलाबी रूप देखे जाते हैं। सम-विषम होते हैं, और सम-विषम देखे जाते हैं। तारे होते हैं, और तारे देखे जाते हैं। और, चाँद-सूरज होते हैं, और चाँद-सूरज देखे भी जाते हैं। क्योंकि उन्हें मैं नहीं जानता, नहीं देखता, इसलिए वे होते ही नहीं हैं।” उसका ऐसा कहना सही नहीं हैं।”
“उसी जन्म से अंधे की तरह, युवा-ब्राह्मण, सुभग-वन के पोक्खरसाति ब्राह्मण ओपमञ्ञ हैं। उनके लिए मनुष्यों के परे अलौकिक धम्म, कोई विशेष आर्य ज्ञान-दर्शन को जानना, देखना, साक्षात्कार करना—यह संभव नहीं है!
क्या लगता है, युवा-ब्राह्मण? कोसल देश के महा-प्रभावशाली ब्राह्मण, जैसे चङ्की ब्राह्मण, तारुक्ख ब्राह्मण, पोक्खरसाति ब्राह्मण, जाणुस्सोणि ब्राह्मण, तुम्हारे पिता तोदेय्य के लिए क्या बेहतर होगा—सहमत होने योग्य बात कहना, अथवा असहमत होने योग्य?"
“सहमत होने योग्य, श्रीमान गोतम।”
“और, उनके लिए क्या बेहतर होगा—विचारपूर्वक बात कहना, अथवा विचारशून्य?”
“विचारपूर्वक, श्रीमान गोतम।”
“और, उनके लिए क्या बेहतर होगा—चिंतन-मनन कर बात कहना, अथवा बिना चिंतन-मनन के?”
“चिंतन-मनन कर, श्रीमान गोतम।”
“और, उनके लिए क्या बेहतर होगा—अर्थपूर्ण बात कहना, अथवा अनर्थकारी?”
“अर्थपूर्ण, श्रीमान गोतम।”
“तुम्हें क्या लगता है, युवा-ब्राह्मण? यदि ऐसा हो, तो क्या सुभग-वन के पोक्खरसाति ब्राह्मण ओपमञ्ञ की कही बात सहमत होने योग्य है, अथवा असहमत होने योग्य।”
“असहमत होने योग्य, श्रीमान गोतम।”
“विचारपूर्वक बात कही है, अथवा विचारशून्य?”
“विचारशून्य, श्रीमान गोतम।”
“चिंतन-मनन कर बात कही है, अथवा बिना चिंतन-मनन के?”
“बिना चिंतन-मनन के, श्रीमान गोतम।”
“अर्थपूर्ण बात कही है, अथवा अनर्थकारी?”
“अनर्थकारी, श्रीमान गोतम।”
“युवा-ब्राह्मण, पाँच अवरोध होते हैं। कौन से पाँच?
- कामेच्छा अवरोध,
- दुर्भावना अवरोध,
- सुस्ती व तंद्रा अवरोध,
- बेचैनी व पश्चाताप अवरोध,
- उलझन अवरोध।
युवा-ब्राह्मण, ये पाँच अवरोध होते हैं। इन पाँचों अवरोध में सुभग-वन का पोक्खरसाति ब्राह्मण ओपमञ्ञ ढका हुआ है, घिरा हुआ है, डूबा हुआ है, निगला गया है। उसके लिए मनुष्यों के परे अलौकिक धम्म, कोई विशेष आर्य ज्ञान-दर्शन को जानना, देखना, साक्षात्कार करना—यह संभव नहीं है!
“युवा-ब्राह्मण, पाँच कामगुण होते हैं। कौन से पाँच?
- आँख से दिखायी देते रूप, जो अच्छे, सुंदर, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
- कान से सुनायी देती आवाज़े, जो अच्छी, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाती हो।
- नाक से सुँघाई देती गन्ध, जो अच्छी, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाती हो।
- जीभ से पता चलते स्वाद, जो अच्छे, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
- काया से पता चलते संस्पर्श, जो अच्छे, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
ये पाँच, युवा-ब्राह्मण, कामगुण हैं। इन पाँच कामगुणों का भोग करते हुए सुभग-वन का पोक्खरसाति ब्राह्मण ओपमञ्ञ बंधा है, मदहोश है, इनमें ही पड़ा है, बिना खामी देखते हुए, बिना निकलने के मार्ग को समझते हुए। उसके लिए मनुष्यों के परे अलौकिक धम्म, कोई विशेष आर्य ज्ञान-दर्शन को जानना, देखना, साक्षात्कार करना—यह संभव नहीं है!
प्रीति का आधार
क्या लगता है, युवा-ब्राह्मण? कौन से अग्नि की आँच, रंग और प्रकाश बेहतर होगा—जो अग्नि घास और काष्ठ के आधार पर जल रही हो, अथवा जो अग्नि बिना घास या काष्ठ के आधार पर जल रही हो?”
“श्रीमान गोतम, यदि अग्नि का बिना घास या काष्ठ के आधार पर जलना संभव हो, तो उस अग्नि की आँच, रंग और प्रकाश बेहतर होगा।”
“युवा-ब्राह्मण, अग्नि का बिना घास या काष्ठ के आधार पर जलना असंभव है, बजाय ऋद्धि के।
जैसे, युवा-ब्राह्मण, अग्नि घास और काष्ठ के आधार पर जलती है, उसी तरह, मैं उस प्रीति को बताता हूँ, जो प्रीति पाँच कामगुण के आधार पर होती है।
और जैसे, अग्नि बिना घास या काष्ठ के आधार पर जलती है, उसी तरह, मैं उस प्रीति को बताता हूँ, जो प्रीति कामुकता के अलावा, अकुशल स्वभाव के अलावा होती है। और, युवा-ब्राह्मण, कौन सी प्रीति कामुकता के अलावा, अकुशल स्वभाव के अलावा होती है?
- कोई भिक्षु कामुकता से विलग, अकुशल-स्वभाव से विलग होकर—वितर्क और विचार सहित, विलगता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है। यह प्रीति, युवा-ब्राह्मण, कामुकता के अलावा, अकुशल स्वभाव के अलावा होती है।
- आगे, युवा-ब्राह्मण, वह भिक्षु वितर्क और विचार के थमने पर, भीतर से आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर—बिना-वितर्क बिना-विचार के, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है। यह प्रीति, युवा-ब्राह्मण, कामुकता के अलावा, अकुशल स्वभाव के अलावा होती है।
अधिकतम फलदायी
युवा-ब्राह्मण, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं—उनमें से कौन से धम्म को ब्राह्मण पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए सबसे अधिकतम महाफलदायी बताते हैं?”
“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं—उनमें से ‘त्याग’ को… सबसे अधिकतम महाफलदायी बताते हैं।”
“क्या लगता है, युवा-ब्राह्मण? कोई ब्राह्मण महायज्ञ का आयोजन करे। तब दो ब्राह्मण आए, कहते हुए, ‘हम इस नाम के ब्राह्मण के महायज्ञ में शामिल होंगे।’ तब उनमें से एक ब्राह्मण सोचता है, ‘अरे काश मुझे ही भोजनशाला में अग्र (=प्रमुख) आसन, अग्र जलपान, अग्र भिक्षान्न का लाभ मिले, किसी दूसरे ब्राह्मण को नहीं!’ किन्तु, संभव है, युवा-ब्राह्मण, कि भोजनशाला में अग्र आसन, अग्र जलपान, अग्र भिक्षान्न का लाभ किसी दूसरे ब्राह्मण को मिलता है, उसे नहीं।
तब, (सोचते हुए कि) “भोजनशाला में अग्र आसन, अग्र जलपान, अग्र भिक्षान्न का लाभ किसी दूसरे भिक्षु को मिला, मुझे नहीं”—वह कुपित होता है, और कड़वाहट लाता है। तब, युवा-ब्राह्मण, ब्राह्मण इसका क्या फल-परिणाम बताते हैं?”
“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण इसलिए दान नहीं करते हैं कि ‘कोई पराया कुपित होगा, और कड़वाहट लाएगा।’ बल्कि, ब्राह्मण मात्र अनुकंपा होने पर दान देते हैं।”
“यदि ऐसा हो, युवा-ब्राह्मण, तो ब्राह्मणों का यह छठा पुण्यक्रिया का आधार हुआ—यह अनुकंपा होना।”
“वाकई, श्रीमान गोतम, यदि ऐसा हो तो ब्राह्मणों का यह छठा पुण्यक्रिया का आधार हुआ—यह अनुकंपा होना।”
“युवा-ब्राह्मण, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं—वे पाँच धम्म तुम किस में अधिकता से देखते हो—गृहस्थों में, अथवा प्रव्रज्यितों में?”
“श्रीमान गोतम, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं… मैं उन्हें प्रव्रज्यितों में अधिकता से देखता हूँ, गृहस्थों में कम। क्योंकि, श्रीमान गोतम, गृहस्थ के बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होते हैं, और वे हमेशा निरंतरता से सत्यवादी बने नहीं रहते। जबकि प्रव्रज्यित के अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होते हैं, और वे हमेशा निरंतरता से सत्यवादी बने रहते हैं।
और, श्रीमान गोतम, गृहस्थ के बहुत दायित्व, बहुत कर्तव्य, बहुत मुद्दे, बहुत उपक्रम होते हैं, और वे हमेशा निरंतरता से तपस्वी बने नहीं रहते… ब्रह्मचारी बने नहीं रहते…. बहुत अध्ययन नहीं करते… बहुत त्याग नहीं करते। जबकि प्रव्रज्यित के अल्प दायित्व, अल्प कर्तव्य, अल्प मुद्दे, अल्प उपक्रम होते हैं, और वे हमेशा निरंतरता से तपस्वी… ब्रह्मचारी… बहुत अध्ययन… बहुत त्याग करते हैं।
इस तरह, श्रीमान गोतम, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं… मैं उन्हें प्रव्रज्यितों में अधिकता से देखता हूँ, गृहस्थों में कम।”
“युवा-ब्राह्मण, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं—मैं उन्हें चित्त की आवश्यकताएँ बताता हूँ, यही, चित्त को निर्बैर और निर्द्वेष विकसित करना।
युवा-ब्राह्मण, कोई भिक्षु सत्यवादी होता है। वह ‘मैं सत्यवादी हूँ’ कहते हुए, उसे ध्येय की प्रेरणा मिलती है, धम्म की प्रेरणा मिलती है, धम्म से जुड़ी प्रसन्नता मिलती है। उस कुशलता से जुड़ी प्रसन्नता को मैं चित्त की आवश्यकता बताता हूँ, यही, चित्त को निर्बैर और निर्द्वेष विकसित करना।
युवा-ब्राह्मण, कोई भिक्षु सत्यवादी होता है… तपस्वी होता है… ब्रह्मचारी होता है… बहुत अध्ययन करता है… बहुत त्याग करता है। वह ‘मैं बहुत त्याग करता हूँ’ कहते हुए, उसे ध्येय की प्रेरणा मिलती है, धम्म की प्रेरणा मिलती है, धम्म से जुड़ी प्रसन्नता मिलती है। उस कुशलता से जुड़ी प्रसन्नता को मैं चित्त की आवश्यकता बताता हूँ, यही, चित्त को निर्बैर और निर्द्वेष विकसित करना।
इस तरह, युवा-ब्राह्मण, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं—मैं उन्हें चित्त की आवश्यकताएँ बताता हूँ, यही, चित्त को निर्बैर और निर्द्वेष विकसित करना।”
ब्रह्मलोक जाने का मार्ग
जब ऐसा कहा गया, तब युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त ने भगवान से कहा, “श्रीमान गोतम, मैं सुना है कि ‘श्रमण गोतम ब्रह्मा के साथ ब्रह्मा के साथ उत्पन्न होने का मार्ग जानते है।”
“क्या लगता है, युवा-ब्राह्मण? यहाँ से मनसाकट गाँव पास ही है, दूर तो नहीं?”
“हाँ, श्रीमान गोतम! यहाँ से मनसाकट गाँव पास ही है, दूर नहीं!”
“क्या लगता है, युवा-ब्राह्मण? जैसे मनसाकट में जन्मा और पला-बढ़ा कोई पुरुष हो। जो (टहलते हुए) मनसाकट के थोड़ा दूर ही आता है, तो कुछ यात्री उससे मनसाकट का मार्ग पुछते हैं। तो क्या वह मनसाकट में जन्मा और पला-बढ़ा पुरुष उत्तर देने में सुस्ती करेगा या हिचकिचाएगा?”
“नहीं, श्रीमान गोतम!”
“ऐसा क्यों?”
“क्योंकि यदि कोई पुरुष मनसाकट में ही जन्मा और पला-बढ़ा होगा, तो वह मनसाकट के सभी रास्ते अच्छे से ही जानता होगा।”
“हो सकता है, युवा-ब्राह्मण, कि मनसाकट में जन्मा और पला-बढ़ा पुरुष, तब भी उत्तर देने में सुस्ती करे या हिचकिचाए, किन्तु तथागत को ब्रह्मलोक पूछे जाने पर, या ब्रह्मलोक जाने वाला मार्ग पूछे जाने पर, तथागत न सुस्ती करते हैं, न हिचकिचाते ही हैं! मैं ब्रह्मा और ब्रह्मलोक को भली-भाँति जानता हूँ, और ब्रह्मलोक जाने वाले उस मार्ग को भी भली-भाँति जानता हूँ, जिस पर चलकर (=साधना कर) कोई ब्रह्मलोक में उत्पन्न होता है।”
जब ऐसा कहा गया, तो युवा-ब्राह्मण युवा-ब्राह्मण ने भगवान से कहा, “मैंने सुना है, श्रीमान गोतम, कि श्रमण गौतम ब्रह्मा के साथ उत्पन्न होने का मार्ग जानते है। अच्छा होगा, यदि श्रीमान गोतम मुझे ब्रह्मा के साथ उत्पन्न होने का मार्ग बताएँ।”
“ठीक है, युवा-ब्राह्मण! तब ध्यान देकर गौर से सुनो। मैं बताता हूँ।”
“ठीक है, श्रीमान गोतम।” युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त ने भगवान को उत्तर दिया।
भगवान ने कहा—
“क्या मार्ग है, युवा-ब्राह्मण, ब्रह्मा के साथ उत्पन्न होने का?
कोई भिक्षु मेत्ता (=सद्भावपूर्ण) चित्त को एक दिशा में फैलाकर व्याप्त करता है। उसी तरह दूसरी दिशा में… तीसरी दिशा में… चौथी दिशा में। उसी तरह, वह ऊपर… नीचे… तत्र सर्वत्र… सभी ओर… संपूर्ण ब्रह्मांड में निर्बैर, निर्द्वेष, विस्तृत, विराट और असीम मेत्ता चित्त को फैलाकर परिपूर्णतः व्याप्त करता है।
इस तरह, युवा-ब्राह्मण, मेत्ता-चेतोविमुक्ति को विकसित करने पर, जो कर्म सीमित (=भारी नहीं) होते हैं, वे बने नहीं रहते हैं, वे टिके नहीं रहते हैं। जैसे, युवा-ब्राह्मण, कोई शंख बजाने वाला बलवान हो, जो बिना कठिनाई के चारों दिशाओं को सुनाता है। उसी तरह, युवा-ब्राह्मण, मेत्ता-चेतोविमुक्ति को विकसित करने पर, जो कर्म सीमित होते हैं, वे बने नहीं रहते हैं, वे टिके नहीं रहते हैं। युवा-ब्राह्मण, यह ब्रह्मा के साथ उत्पन्न होने का मार्ग है।
आगे, युवा-ब्राह्मण—
वह करुणा चित्त…
मुदिता (प्रसन्न) चित्त…
उपेक्षा (तटस्थ) चित्त को एक दिशा में फैलाकर व्याप्त करता है। उसी तरह दूसरी दिशा में… तीसरी दिशा में… चौथी दिशा में। उसी तरह, वह ऊपर… नीचे… तत्र सर्वत्र… सभी ओर… संपूर्ण ब्रह्मांड में निर्बैर, निर्द्वेष, विस्तृत, विराट और असीम करुण… प्रसन्न… उपेक्षा चित्त को फैलाकर परिपूर्णतः व्याप्त करता है।
इस तरह, युवा-ब्राह्मण, उपेक्षा-चेतोविमुक्ति को विकसित करने पर, जो कर्म सीमित होते हैं, वे बने नहीं रहते हैं, वे टिके नहीं रहते हैं। जैसे, युवा-ब्राह्मण, कोई शंख बजाने वाला बलवान हो, जो बिना कठिनाई के चारों दिशाओं को सुनाता है। उसी तरह, युवा-ब्राह्मण, उपेक्षा-चेतोविमुक्ति को विकसित करने पर, जो कर्म सीमित होते हैं, वे बने नहीं रहते हैं, वे टिके नहीं रहते हैं। युवा-ब्राह्मण, यह ब्रह्मा के साथ उत्पन्न होने का मार्ग है।”
अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! अतिउत्तम, श्रीमान गोतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह श्रीमान गोतम ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया। मैं श्रीमान गोतम की शरण जाता हूँ! धम्म की और संघ की भी! श्रीमान गोतम मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें! 5
ठीक है, श्रीमान गोतम! तब अनुमति चाहता हूँ। बहुत कर्तव्य हैं मेरे। बहुत जिम्मेदारियाँ हैं।”
“ठीक है, युवा-ब्राह्मण, तब जिसका समय उचित समझो!”
तब युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त ने भगवान की बातों का अभिनन्दन करते हुए, अनुमोदन करते हुए, आसन से उठकर भगवान को अभिवादन करते हुए, प्रदक्षिणा करते हुए चला गया।
उस समय जाणुस्सोणि ब्राह्मण, 6 पूर्ण श्वेत (=सफेद) घोड़ियों के रथ पर सवार होकर, दिन के बीच श्रावस्ती से निकला। तब जाणुस्सोणि ब्राह्मण ने युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त को दूर से आते देखा। और देखकर युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त से कहा, “दिन के बीच में श्रीमान, कहाँ से आ रहे हैं?”
“श्रीमान, अभी मैं श्रमण गौतम के पास के आ रहा हूँ।”
“क्या लगता है, श्रीमान? क्या श्रमण गौतम की प्रज्ञा में धार है? क्या पंडित लगते हैं?”
“भला मैं कौन होता हूँ, श्रीमान, श्रमण गौतम की प्रज्ञा में धार जानने वाला? उसे जानने के लिए तो हमें भी उस स्तर का होना पड़ेगा।”
“श्रीमान तो श्रमण गौतम की भव्य प्रशंसा करते हैं।”
“भला मैं कौन होता हूँ, श्रीमान, श्रमण गौतम की भव्य प्रशंसा करने वाला? श्रमण गौतम तो प्रशंसितों के द्वारा प्रशंसित होते हैं, (कहते हुए,) ‘देव-मनुष्यों में श्रेष्ठ!’ और, श्रीमान, ब्राह्मण जो पाँच धम्म बताते हैं, जो पुण्यक्रिया के लिए और कुशलता में यशस्वी होने के लिए हैं—श्रीमान गोतम उन्हें चित्त की आवश्यकताएँ बताते हैं, यही, चित्त को निर्बैर और निर्द्वेष विकसित करना।”
जब ऐसा कहा गया, तब जाणुस्सोणि ब्राह्मण अपने पूर्ण श्वेत घोड़ियों के रथ से उतर गया। उसने अपने बाहरी वस्त्र को एक कंधे पर रखा, और भगवान की दिशा में हाथ जोड़कर, प्रणाम करते हुए सहज उद्गार किया—
“भाग्यशाली है राजा प्रसेनजित कोसल! सौभाग्यशाली है राजा प्रसेनजित कोसल, जो उसके राज में तथागत अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध विहार करते हैं।”
सुत्र समाप्त।
सुभ का उल्लेख आगे मज्झिमनिकाय १३५ में मिलता है, जहाँ वह भगवान से कर्म के विषय में विस्तारपूर्वक प्रश्न करता है; और भगवान के परिनिर्वाण के बाद वह दीघनिकाय १० में पुनः प्रकट होता है, इस बार आयुष्मान आनंद भन्ते से मिलते हुए। तथापि, संकेत यही मिलता है कि वर्तमान सूत्र ही सुभ की भगवान से पहली भेंट है।
सुभ के पिता तोदेय्य एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण थे, जिनका नाम प्रायः पोक्खरसाति ब्राह्मण के साथ लिया जाता है। अट्ठकथा के अनुसार, तोदेय्य का नाम उनके गाँव तुदि (सावत्थी के बाहरी प्रांत) से संबंधित है, जिससे संकेत मिलता है कि दोनों ब्राह्मण एक-दूसरे के निकट ही निवास करते थे। ↩︎
विभज्जवाद का संदर्भ जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎
कम्मट्ठान या “कर्मष्ठान” का शाब्दिक अर्थ है ‘कर्म-आधार’। इस शब्द का अर्थ आज विकृत हो चुका है, और मैं उसे “जीविका” के तौर पर परिभाषित करता हूँ। पुराने संदर्भ के अनुसार जानने के लिए हमारी शब्दावली पढ़ें। ↩︎
पोक्खरसाति ब्राह्मण की शरण-गमन की कथा अत्यंत रोचक है। इसमें भगवान उसके सबसे प्रतिभाशाली किंतु घमंडी शिष्य अम्बट्ठ का अहंकार चूर-चूर कर देते हैं; और जब यह बात पोक्खरसाति को ज्ञात होती है, तो वह पहले अम्बट्ठ को लताड़ता है और तत्पश्चात स्वयं भगवान की शरण जाता है। दीघनिकाय ३ पढ़ें।
पोक्खरसाति ब्राह्मण अपने समय के सबसे प्रभावशाली एवं प्रतिष्ठित ब्राह्मण आचार्यों में उनकी गणना होती थी। उनका भगवान की शरण जाना उस काल के ब्राह्मणिक जगत को लगभग हिला देने जैसा था। इसके पश्चात आने वाले कई सूत्र इस एक शरण के प्रभाव से भरे प्रतीत होते हैं। हालाँकि, इस सूत्र में भगवान उसका भोगलोलुप स्वभाव स्पष्ट रूप से धिक्कारते हैं। इससे संकेत मिलता है कि यह प्रसंग उसके शरण-ग्रहण से पहले का ही होना चाहिए।
ब्राह्मण ग्रंथों में भी उनका उल्लेख ठीक इसी गरिमा के साथ मिलता है। संस्कृत में उनका नाम “पौष्करसादि” दिया गया है। व्याकरण-परंपरा में उनका उल्लेख कात्यायन और पतञ्जलि करते हैं; तैत्तिरीय-प्रातिशाख्य में भी उनका संदर्भ मिलता है। आहारेय–अनाहारेय तथा चोरी के प्रसंग में उनका उद्धरण आपस्तम्ब-धम्मसूत्र में है, और वैदिक अनुष्ठान-संबंधी चर्चाओं में शाङ्खायन-आरण्यक भी उनका नाम दर्ज करता है। ↩︎
युवा-ब्राह्मण सुभ तोदेय्यपुत्त इस सूत्र के अतिरिक्त मज्झिमनिकाय १३५ और दीघनिकाय १० में भी प्रकट होता है, और वहाँ भी पुनः भगवान की शरण ग्रहण करता है। ↩︎
जाणुस्सोणि ब्राह्मण भी कई लोगों से भगवान की प्रशंसा सुनकर अंततः स्वयं भगवान से (मज्झिमनिकाय २७ में) मिलने आता है, और धम्म सुनकर उपासक बनता है। ↩︎
पालि
४६२. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. तेन खो पन समयेन सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो सावत्थियं पटिवसति अञ्ञतरस्स गहपतिस्स निवेसने केनचिदेव करणीयेन. अथ खो सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो यस्स गहपतिस्स निवेसने पटिवसति तं गहपतिं एतदवोच – ‘‘सुतं मेतं, गहपति – ‘अविवित्ता सावत्थी अरहन्तेही’ति. कं नु ख्वज्ज समणं वा ब्राह्मणं वा पयिरुपासेय्यामा’’ति? ‘‘अयं, भन्ते, भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे. तं, भन्ते, भगवन्तं पयिरुपासस्सू’’ति. अथ खो सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो तस्स गहपतिस्स पटिस्सुत्वा येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि. सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि. एकमन्तं निसिन्नो खो सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘ब्राह्मणा, भो गोतम, एवमाहंसु – ‘गहट्ठो आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं, न पब्बजितो आराधको होति ञायं धम्मं कुसल’न्ति. इध भवं गोतमो किमाहा’’ति?
४६३. ‘‘विभज्जवादो खो अहमेत्थ, माणव; नाहमेत्थ एकंसवादो. गिहिस्स वाहं, माणव, पब्बजितस्स वा मिच्छापटिपत्तिं न वण्णेमि. गिही वा हि , माणव, पब्बजितो वा मिच्छापटिपन्नो मिच्छापटिपत्ताधिकरणहेतु न आराधको होति ञायं धम्मं कुसलं. गिहिस्स वाहं, माणव, पब्बजितस्स वा सम्मापटिपत्तिं वण्णेमि. गिही वा हि, माणव, पब्बजितो वा सम्मापटिपन्नो सम्मापटिपत्ताधिकरणहेतु आराधको होति ञायं धम्मं कुसल’’न्ति.
‘‘ब्राह्मणा, भो गोतम, एवमाहंसु – ‘महट्ठमिदं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं घरावासकम्मट्ठानं महप्फलं होति; अप्पट्ठमिदं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं पब्बज्जा कम्मट्ठानं अप्पफलं होती’ति. इध भवं गोतमो किमाहा’’ति.
‘‘एत्थापि खो अहं, माणव, विभज्जवादो; नाहमेत्थ एकंसवादो. अत्थि, माणव, कम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति; अत्थि, माणव, कम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति; अत्थि, माणव, कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति; अत्थि, माणव, कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति. कतमञ्च, माणव , कम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति? कसि खो, माणव, कम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति. कतमञ्च, माणव, कम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति? कसियेव खो, माणव, कम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति. कतमञ्च, माणव, कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति? वणिज्जा खो, माणव, कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति. कतमञ्च माणव, कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति? वणिज्जायेव खो, माणव, कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति.
४६४. ‘‘सेय्यथापि, माणव, कसि कम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति; एवमेव खो, माणव, घरावासकम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति. सेय्यथापि, माणव, कसियेव कम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति; एवमेव खो, माणव, घरावासकम्मट्ठानं महट्ठं महाकिच्चं महाधिकरणं महासमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति. सेय्यथापि, माणव, वणिज्जा कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति; एवमेव खो, माणव, पब्बज्जा कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं विपज्जमानं अप्पफलं होति. सेय्यथापि, माणव, वणिज्जायेव कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होति; एवमेव खो , माणव, पब्बज्जा कम्मट्ठानं अप्पट्ठं अप्पकिच्चं अप्पाधिकरणं अप्पसमारम्भं सम्पज्जमानं महप्फलं होती’’ति.
‘‘ब्राह्मणा , भो गोतम, पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय, कुसलस्स आराधनाया’’ति. ‘‘ये ते, माणव, ब्राह्मणा पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय, कुसलस्स आराधनाय – सचे ते अगरु – साधु ते पञ्च धम्मे इमस्मिं परिसति भासस्सू’’ति. ‘‘न खो मे, भो गोतम, गरु यत्थस्सु भवन्तो वा निसिन्नो भवन्तरूपो वा’’ति (निसिन्ना भवन्तरूपा वाति (सी. स्या. कं. पी.)). ‘‘तेन हि, माणव, भासस्सू’’ति. ‘‘सच्चं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा पठमं धम्मं पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय, कुसलस्स आराधनाय. तपं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा दुतियं धम्मं पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय, कुसलस्स आराधनाय. ब्रह्मचरियं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा ततियं धम्मं पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय, कुसलस्स आराधनाय. अज्झेनं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा चतुत्थं धम्मं पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय, कुसलस्स आराधनाय. चागं खो, भो गोतम, ब्राह्मणा पञ्चमं धम्मं पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय, कुसलस्स आराधनाय. ब्राह्मणा, भो गोतम, इमे पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय, कुसलस्स आराधनायाति. इध भवं गोतमो किमाहा’’ति?
४६५. ‘‘किं पन, माणव, अत्थि कोचि ब्राह्मणानं एकब्राह्मणोपि यो एवमाह – ‘अहं इमेसं पञ्चन्नं धम्मानं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा विपाकं पवेदेमी’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम’’. ‘‘किं पन, माणव, अत्थि कोचि ब्राह्मणानं एकाचरियोपि एकाचरियपाचरियोपि याव सत्तमा आचरियमहयुगापि यो एवमाह – ‘अहं इमेसं पञ्चन्नं धम्मानं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा विपाकं पवेदेमी’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम’’. ‘‘किं पन, माणव, येपि ते ब्राह्मणानं पुब्बका इसयो मन्तानं कत्तारो मन्तानं पवत्तारो येसमिदं एतरहि ब्राह्मणा पोराणं मन्तपदं गीतं पवुत्तं समिहितं तदनुगायन्ति तदनुभासन्ति भासितमनुभासन्ति वाचितमनुवाचेन्ति, सेय्यथिदं – अट्ठको वामको वामदेवो वेस्सामित्तो यमतग्गि अङ्गीरसो भारद्वाजो वासेट्ठो कस्सपो भगु, तेपि एवमाहंसु – ‘मयं इमेसं पञ्चन्नं धम्मानं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा विपाकं पवेदेमा’’’ति? ‘‘नो हिदं, भो गोतम’’.
‘‘इति किर, माणव, नत्थि कोचि ब्राह्मणानं एकब्राह्मणोपि यो एवमाह – ‘अहं इमेसं पञ्चन्नं धम्मानं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा विपाकं पवेदेमी’ति; नत्थि कोचि ब्राह्मणानं एकाचरियोपि एकाचरियपाचरियोपि याव सत्तमा आचरियमहयुगापि यो एवमाह – ‘अहं इमेसं पञ्चन्नं धम्मानं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा विपाकं पवेदेमी’ति; येपि ते ब्राह्मणानं पुब्बका इसयो मन्तानं कत्तारो मन्तानं पवत्तारो, येसमिदं एतरहि ब्राह्मणा पोराणं मन्तपदं गीतं पवुत्तं समिहितं, तदनुगायन्ति तदनुभासन्ति भासितमनुभासन्ति वाचितमनुवाचेन्ति, सेय्यथिदं – अट्ठको वामको वामदेवो वेस्सामित्तो यमतग्गि अङ्गीरसो भारद्वाजो वासेट्ठो कस्सपो भगु. तेपि न एवमाहंसु – ‘मयं इमेसं पञ्चन्नं धम्मानं सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा विपाकं पवेदेमा’ति.
‘‘सेय्यथापि, माणव, अन्धवेणि परम्परासंसत्ता पुरिमोपि न पस्सति मज्झिमोपि न पस्सति पच्छिमोपि न पस्सति; एवमेव खो, माणव, अन्धवेणूपमं मञ्ञे ब्राह्मणानं भासितं सम्पज्जति – पुरिमोपि न पस्सति मज्झिमोपि न पस्सति पच्छिमोपि न पस्सती’’ति.
४६६. एवं वुत्ते, सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवता अन्धवेणूपमेन वुच्चमानो कुपितो अनत्तमनो भगवन्तंयेव खुंसेन्तो भगवन्तंयेव वम्भेन्तो भगवन्तंयेव वदमानो – ‘समणो गोतमो पापितो भविस्सती’ति भगवन्तं एतदवोच – ‘‘ब्राह्मणो, भो गोतम, पोक्खरसाति ओपमञ्ञो सुभगवनिको एवमाह – ‘एवमेव पनिधेकच्चे (पनिमेके (सब्बत्थ)) समणब्राह्मणा उत्तरिमनुस्सधम्मा अलमरियञाणदस्सनविसेसं पटिजानन्ति. तेसमिदं भासितं हस्सकंयेव सम्पज्जति, नामकंयेव सम्पज्जति, रित्तकंयेव सम्पज्जति, तुच्छकंयेव सम्पज्जति. कथञ्हि नाम मनुस्सभूतो उत्तरिमनुस्सधम्मा अलमरियञाणदस्सनविसेसं ञस्सति वा दक्खति वा सच्छि वा करिस्सतीति – नेतं ठानं विज्जती’’’ति?
‘‘किं पन, माणव, ब्राह्मणो पोक्खरसाति ओपमञ्ञो सुभगवनिको सब्बेसंयेव समणब्राह्मणानं चेतसा चेतो परिच्च पजानाती’’ति? ‘‘सकायपि हि, भो गोतम, पुण्णिकाय दासिया ब्राह्मणो पोक्खरसाति ओपमञ्ञो सुभगवनिको चेतसा चेतो परिच्च न पजानाति, कुतो पन सब्बेसंयेव समणब्राह्मणानं चेतसा चेतो परिच्च पजानिस्सती’’ति?
‘‘सेय्यथापि, माणव, जच्चन्धो पुरिसो न पस्सेय्य कण्हसुक्कानि रूपानि, न पस्सेय्य नीलकानि रूपानि, न पस्सेय्य पीतकानि रूपानि, न पस्सेय्य लोहितकानि रूपानि, न पस्सेय्य मञ्जिट्ठकानि रूपानि, न पस्सेय्य समविसमं, न पस्सेय्य तारकरूपानि, न पस्सेय्य चन्दिमसूरिये. सो एवं वदेय्य – ‘नत्थि कण्हसुक्कानि रूपानि, नत्थि कण्हसुक्कानं रूपानं दस्सावी; नत्थि नीलकानि रूपानि, नत्थि नीलकानं रूपानं दस्सावी; नत्थि पीतकानि रूपानि, नत्थि पीतकानं रूपानं दस्सावी; नत्थि लोहितकानि रूपानि, नत्थि लोहितकानं रूपानं दस्सावी; नत्थि मञ्जिट्ठकानि रूपानि, नत्थि मञ्जिट्ठकानं रूपानं दस्सावी; नत्थि समविसमं, नत्थि समविसमस्स दस्सावी; नत्थि तारकरूपानि, नत्थि तारकरूपानं दस्सावी; नत्थि चन्दिमसूरिया, नत्थि चन्दिमसूरियानं दस्सावी. अहमेतं न जानामि, अहमेतं न पस्सामि; तस्मा तं नत्थी’ति. सम्मा नु खो सो, माणव, वदमानो वदेय्या’’ति?
‘‘नो हिदं, भो गोतम. अत्थि कण्हसुक्कानि रूपानि, अत्थि कण्हसुक्कानं रूपानं दस्सावी; अत्थि नीलकानि रूपानि, अत्थि नीलकानं रूपानं दस्सावी; अत्थि पीतकानि रूपानि, अत्थि पीतकानं रूपानं दस्सावी; अत्थि लोहितकानि रूपानि, अत्थि लोहितकानं रूपानं दस्सावी; अत्थि मञ्जिट्ठकानि रूपानि, अत्थि मञ्जिट्ठकानं रूपानं दस्सावी; अत्थि समविसमं, अत्थि समविसमस्स दस्सावी; अत्थि तारकरूपानि, अत्थि तारकरूपानं दस्सावी ; अत्थि चन्दिमसूरिया, अत्थि चन्दिमसूरियानं दस्सावी. ‘अहमेतं न जानामि, अहमेतं न पस्सामि; तस्मा तं नत्थी’ति; न हि सो, भो गोतम, सम्मा वदमानो वदेय्या’’ति.
‘‘एवमेव खो, माणव, ब्राह्मणो पोक्खरसाति ओपमञ्ञो सुभगवनिको अन्धो अचक्खुको. सो वत उत्तरिमनुस्सधम्मा अलमरियञाणदस्सनविसेसं ञस्सति वा दक्खति वा सच्छि वा करिस्सतीति – नेतं ठानं विज्जति’’.
४६७. ‘‘तं किं मञ्ञसि, माणव, ये ते कोसलका ब्राह्मणमहासाला, सेय्यथिदं – चङ्की ब्राह्मणो तारुक्खो ब्राह्मणो पोक्खरसाति ब्राह्मणो जाणुस्सोणि ब्राह्मणो पिता च (वा (सी. स्या. कं. पी.)) ते तोदेय्यो, कतमा नेसं सेय्यो (सेय्या (स्या. कं.)), यं वा ते सम्मुच्चा (सम्मुसा (सी. पी.)) वाचं भासेय्युं यं वा असम्मुच्चा’’ति? ‘‘सम्मुच्चा, भो गोतम’’.
‘‘कतमा नेसं सेय्यो, यं वा ते मन्ता वाचं भासेय्युं यं वा अमन्ता’’ति? ‘‘मन्ता, भो गोतम’’.
‘‘कतमा नेसं सेय्यो, यं वा ते पटिसङ्खाय वाचं भासेय्युं यं वा अप्पटिसङ्खाया’’ति? ‘‘पटिसङ्खाय, भो गोतम’’.
‘‘कतमा नेसं सेय्यो, यं वा ते अत्थसंहितं वाचं भासेय्युं यं वा अनत्थसंहित’’न्ति? ‘‘अत्थसंहितं, भो गोतम’’.
‘‘तं किं मञ्ञसि, माणव, यदि एवं सन्ते, ब्राह्मणेन पोक्खरसातिना ओपमञ्ञेन सुभगवनिकेन सम्मुच्चा वाचा भासिता असम्मुच्चा’’ति (असम्मुसा वाति (पी.) एवमितरपञ्हत्तयेपि वासद्देन सह दिस्सति)? ‘‘असम्मुच्चा, भो गोतम’’.
‘‘मन्ता वाचा भासिता अमन्ता वा’’ति? ‘‘अमन्ता, भो गोतम’’.
‘‘पटिसङ्खाय वाचा भासिता अप्पटिसङ्खाया’’ति? ‘‘अप्पटिसङ्खाय, भो गोतम’’.
‘‘अत्थसंहिता वाचा भासिता अनत्थसंहिता’’ति? ‘‘अनत्थसंहिता, भो गोतम’’.
‘‘पञ्च खो इमे, माणव, नीवरणा. कतमे पञ्च? कामच्छन्दनीवरणं, ब्यापादनीवरणं, थीनमिद्धनीवरणं उद्धच्चकुक्कुच्चनीवरणं, विचिकिच्छानीवरणं – इमे खो, माणव, पञ्च नीवरणा. इमेहि खो माणव, पञ्चहि नीवरणेहि ब्राह्मणो पोक्खरसाति ओपमञ्ञो सुभगवनिको आवुतो निवुतो ओफुटो (ओवुतो (सी.), ओफुतो (स्या. कं. पी.)) परियोनद्धो. सो वत उत्तरिमनुस्सधम्मा अलमरियञाणदस्सनविसेसं ञस्सति वा दक्खति वा सच्छि वा करिस्सतीति – नेतं ठानं विज्जति.
४६८. ‘‘पञ्च खो इमे, माणव, कामगुणा. कतमे पञ्च? चक्खुविञ्ञेय्या रूपा इट्ठा कन्ता मनापा पियरूपा कामूपसंहिता रजनीया, सोतविञ्ञेय्या सद्दा…पे… घानविञ्ञेय्या गन्धा… जिव्हा विञ्ञेय्या रसा… कायविञ्ञेय्या फोट्ठब्बा इट्ठा कन्ता मनापा पियरूपा कामूपसंहिता रजनीया – इमे खो, माणव, पञ्च कामगुणा. इमेहि खो, माणव, पञ्चहि कामगुणेहि ब्राह्मणो पोक्खरसाति ओपमञ्ञो सुभगवनिको गथितो मुच्छितो अज्झोपन्नो अनादीनवदस्सावी अनिस्सरणपञ्ञो परिभुञ्जति. सो वत उत्तरिमनुस्सधम्मा अलमरियञाणदस्सनविसेसं ञस्सति वा दक्खति वा सच्छि वा करिस्सतीति – नेतं ठानं विज्जति.
‘‘तं किं मञ्ञसि, माणव, यं वा तिणकट्ठुपादानं पटिच्च अग्गिं जालेय्य यं वा निस्सट्ठतिणकट्ठुपादानं अग्गिं जालेय्य, कतमो नु ख्वास्स अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो चा’’ति? ‘‘सचे तं, भो गोतम, ठानं निस्सट्ठतिणकट्ठुपादानं अग्गिं जालेतुं, स्वास्स अग्गि अच्चिमा चेव वण्णवा च पभस्सरो चा’’ति. ‘‘अट्ठानं खो एतं, माणव, अनवकासो यं निस्सट्ठतिणकट्ठुपादानं अग्गिं जालेय्य अञ्ञत्र इद्धिमता. सेय्यथापि, माणव, तिणकट्ठुपादानं पटिच्च अग्गि जलति तथूपमाहं, माणव, इमं पीतिं वदामि यायं पीति पञ्च कामगुणे पटिच्च. सेय्यथापि, माणव, निस्सट्ठतिणकट्ठुपादानो (निस्सट्ठतिणकट्ठुपादानं पटिच्च (सी. पी. क.)) अग्गि जलति तथूपमाहं, माणव , इमं पीतिं वदामि यायं पीति अञ्ञत्रेव कामेहि अञ्ञत्र अकुसलेहि धम्मेहि.
‘‘कतमा च, माणव, पीति अञ्ञत्रेव कामेहि अञ्ञत्र अकुसलेहि धम्मेहि? इध, माणव, भिक्खु विविच्चेव कामेहि…पे… पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति. अयम्पि खो, माणव, पीति अञ्ञत्रेव कामेहि अञ्ञत्र अकुसलेहि धम्मेहि. पुन चपरं, माणव, भिक्खु वितक्कविचारानं वूपसमा…पे… दुतियं झानं उपसम्पज्ज विहरति. अयम्पि खो, माणव, पीति अञ्ञत्रेव कामेहि अञ्ञत्र अकुसलेहि धम्मेहि.
४६९. ‘‘ये ते, माणव, ब्राह्मणा पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाय, कतमेत्थ (कमेत्थ (क. सी. स्या. कं. पी.)) ब्राह्मणा धम्मं महप्फलतरं पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाया’’ति? ‘‘येमे, भो गोतम, ब्राह्मणा पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाय, चागमेत्थ ब्राह्मणा धम्मं महप्फलतरं पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाया’’ति.
‘‘तं कि मञ्ञसि, माणव, इध अञ्ञतरस्स ब्राह्मणस्स महायञ्ञो पच्चुपट्ठितो अस्स. अथ द्वे ब्राह्मणा आगच्छेय्युं – ‘इत्थन्नामस्स ब्राह्मणस्स महायञ्ञं अनुभविस्सामा’ति. तत्रेकस्स (तत्थेकस्स (पी.)) ब्राह्मणस्स एवमस्स – ‘अहो वत! अहमेव लभेय्यं भत्तग्गे अग्गासनं अग्गोदकं अग्गपिण्डं, न अञ्ञो ब्राह्मणो लभेय्य भत्तग्गे अग्गासनं अग्गोदकं अग्गपिण्ड’न्ति. ठानं खो पनेतं, माणव , विज्जति यं अञ्ञो ब्राह्मणो लभेय्य भत्तग्गे अग्गासनं अग्गोदकं अग्गपिण्डं, न सो ब्राह्मणो लभेय्य भत्तग्गे अग्गासनं अग्गोदकं अग्गपिण्डं. ‘अञ्ञो ब्राह्मणो लभति भत्तग्गे अग्गासनं अग्गोदकं अग्गपिण्डं, नाहं लभामि भत्तग्गे अग्गासनं अग्गोदकं अग्गपिण्ड’न्ति – इति सो कुपितो होति अनत्तमनो. इमस्स पन, माणव, ब्राह्मणा किं विपाकं पञ्ञपेन्ती’’ति? ‘‘न ख्वेत्थ, भो गोतम, ब्राह्मणा एवं दानं देन्ति – ‘इमिना परो कुपितो होतु अनत्तमनो’ति. अथ ख्वेत्थ ब्राह्मणा अनुकम्पाजातिकंयेव (अनुकम्पजातिकंयेव (स्या. कं. क.)) दानं देन्ती’’ति. ‘‘एवं सन्ते, खो, माणव, ब्राह्मणानं इदं छट्ठं पुञ्ञकिरियवत्थु होति – यदिदं अनुकम्पाजातिक’’न्ति. ‘‘एवं सन्ते, भो गोतम, ब्राह्मणानं इदं छट्ठं पुञ्ञकिरियवत्थु होति – यदिदं अनुकम्पाजातिक’’न्ति.
‘‘ये ते, माणव, ब्राह्मणा पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाय, इमे त्वं पञ्च धम्मे कत्थ बहुलं समनुपस्ससि – गहट्ठेसु वा पब्बजितेसु वा’’ति? ‘‘येमे, भो गोतम, ब्राह्मणा पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाय, इमाहं पञ्च धम्मे पब्बजितेसु बहुलं समनुपस्सामि अप्पं गहट्ठेसु. गहट्ठो हि, भो गोतम, महट्ठो महाकिच्चो महाधिकरणो महासमारम्भो, न सततं समितं सच्चवादी होति; पब्बजितो खो पन, भो गोतम, अप्पट्ठो अप्पकिच्चो अप्पाधिकरणो अप्पसमारम्भो, सततं समितं सच्चवादी होति. गहट्ठो हि, भो गोतम, महट्ठो महाकिच्चो महाधिकरणो महासमारम्भो न सततं समितं तपस्सी होति… ब्रह्मचारी होति… सज्झायबहुलो होति… चागबहुलो होति; पब्बजितो खो पन, भो गोतम, अप्पट्ठो अप्पकिच्चो अप्पाधिकरणो अप्पसमारम्भो सततं समितं तपस्सी होति… ब्रह्मचारी होति… सज्झायबहुलो होति… चागबहुलो होति. येमे, भो गोतम, ब्राह्मणा पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाय, इमाहं पञ्च धम्मे पब्बजितेसु बहुलं समनुपस्सामि अप्पं गहट्ठेसू’’ति.
‘‘ये ते, माणव, ब्राह्मणा पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाय चित्तस्साहं एते परिक्खारे वदामि – यदिदं चित्तं अवेरं अब्याबज्झं तस्स भावनाय. इध, माणव, भिक्खु सच्चवादी होति. सो ‘सच्चवादीम्ही’ति लभति अत्थवेदं, लभति धम्मवेदं, लभति धम्मूपसंहितं पामोज्जं. यं तं कुसलूपसंहितं पामोज्जं, चित्तस्साहं एतं परिक्खारं वदामि – यदिदं चित्तं अवेरं अब्याबज्झं तस्स भावनाय. इध, माणव, भिक्खु तपस्सी होति…पे… ब्रह्मचारी होति…पे… सज्झायबहुलो होति…पे… चागबहुलो होति. सो ‘चागबहुलोम्ही’ति लभति अत्थवेदं, लभति धम्मवेदं, लभति धम्मूपसंहितं पामोज्जं. यं तं कुसलूपसंहितं पामोज्जं, चित्तस्साहं एतं परिक्खारं वदामि – यदिदं चित्तं अवेरं अब्याबज्झं तस्स भावनाय. ये ते माणव, ब्राह्मणा, पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाय, चित्तस्साहं एते परिक्खारे वदामि – यदिदं चित्तं अवेरं अब्याबज्झं तस्स भावनाया’’ति.
४७०. एवं वुत्ते, सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सुतं मेतं, भो गोतम – ‘समणो गोतमो ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गं जानाती’’’ति.
‘‘तं किं मञ्ञसि, माणव, आसन्ने इतो नळकारगामो, न यितो दूरे नळकारगामो’’ति?
‘‘एवं, भो, आसन्ने इतो नळकारगामो , न यितो दूरे नळकारगामो’’ति.
‘‘तं, किं मञ्ञसि माणव, इधस्स पुरिसो नळकारगामे जातवद्धो (जातवड्ढो (स्या. कं. क.)); तमेनं नळकारगामतो तावदेव अवसटं (अपसक्कं (स्या. कं. क.)) नळकारगामस्स मग्गं पुच्छेय्युं; सिया नु खो, माणव, तस्स पुरिसस्स नळकारगामे जातवद्धस्स नळकारगामस्स मग्गं पुट्ठस्स दन्धायितत्तं वा वित्थायितत्तं वा’’ति?
‘‘नो हिदं, भो गोतम’’.
‘‘तं किस्स हेतु’’?
‘‘अमु हि, भो गोतम, पुरिसो नळकारगामे जातवद्धो. तस्स सब्बानेव नळकारगामस्स मग्गानि सुविदितानी’’ति. ‘‘सिया नु खो, माणव, तस्स पुरिसस्स नळकारगामे जातवद्धस्स नळकारगामस्स मग्गं पुट्ठस्स दन्धायितत्तं वा वित्थायितत्तं वाति, न त्वेव तथागतस्स ब्रह्मलोकं वा ब्रह्मलोकगामिनिं वा पटिपदं पुट्ठस्स दन्धायितत्तं वा वित्थायितत्तं वा. ब्रह्मानञ्चाहं, माणव, पजानामि ब्रह्मलोकञ्च ब्रह्मलोकगामिनिञ्च पटिपदं; यथापटिपन्नो च ब्रह्मलोकं उपपन्नो तञ्च पजानामी’’ति .
‘‘सुतं मेतं, भो गोतम – ‘समणो गोतमो ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गं देसेती’ति. साधु मे भवं गोतमो ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गं देसेतू’’ति.
‘‘तेन हि, माणव, सुणाहि, साधुकं मनसि करोहि, भासिस्सामी’’ति. ‘‘एवं भो’’ति खो सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवतो पच्चस्सोसि. भगवा एतदवोच –
४७१. ‘‘कतमो च, माणव, ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गो? इध, माणव, भिक्खु मेत्तासहगतेन चेतसा एकं दिसं फरित्वा विहरति, तथा दुतियं, तथा ततियं, तथा चतुत्थं; इति उद्धमधो तिरियं सब्बधि सब्बत्तताय सब्बावन्तं लोकं मेत्तासहगतेन चेतसा विपुलेन महग्गतेन अप्पमाणेन अवेरेन अब्याबज्झेन फरित्वा विहरति. एवं भाविताय खो, माणव, मेत्ताय चेतोविमुत्तिया यं पमाणकतं कम्मं न तं तत्रावसिस्सति, न तं तत्रावतिट्ठति. सेय्यथापि, माणव, बलवा सङ्खधमो अप्पकसिरेनेव चातुद्दिसा विञ्ञापेय्य (एवमेव खो माणव एवं भाविताय मेत्ताय (सी. स्या. कं. पी. दी. नि. १.५५६) तथापि इध पाठोयेव उपमाय संसन्दियमानो परिपुण्णो विय दिस्सति); एवमेव खो, माणव…पे… एवं भाविताय खो, माणव, मेत्ताय (एवमेव खो माणव एवं भाविताय मेत्ताय (सी. स्या. कं. पी. दी. नि. १.५५६) तथापि इध पाठोयेव उपमाय संसन्दियमानो परिपुण्णो विय दिस्सति) चेतोविमुत्तिया यं पमाणकतं कम्मं न तं तत्रावसिस्सति, न तं तत्रावतिट्ठति. अयम्पि खो, माणव, ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गो. ‘‘पुन चपरं, माणव, भिक्खु करुणासहगतेन चेतसा…पे… मुदितासहगतेन चेतसा…पे… उपेक्खासहगतेन चेतसा एकं दिसं फरित्वा विहरति, तथा दुतियं, तथा ततियं, तथा चतुत्थं; इति उद्धमधो तिरियं सब्बधि सब्बत्तताय सब्बावन्तं लोकं उपेक्खासहगतेन चेतसा विपुलेन महग्गतेन अप्पमाणेन अवेरेन अब्याबज्झेन फरित्वा विहरति. एवं भाविताय खो, माणव, उपेक्खाय चेतोविमुत्तिया यं पमाणकतं कम्मं न तं तत्रावसिस्सति, न तं तत्रावतिट्ठति. सेय्यथापि, माणव, बलवा सङ्खधमो अप्पकसिरेनेव चातुद्दिसा विञ्ञापेय्य; एवमेव खो, माणव…पे… एवं भाविताय खो, माणव, उपेक्खाय चेतोविमुत्तिया यं पमाणकतं कम्मं न तं तत्रावसिस्सति, न तं तत्रावतिट्ठति. अयम्पि खो, माणव, ब्रह्मानं सहब्यताय मग्गो’’ति.
४७२. एवं वुत्ते, सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भो गोतम, अभिक्कन्तं, भो गोतम! सेय्यथापि, भो गोतम, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्तीति – एवमेवं भोता गोतमेन अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो. एसाहं भवन्तं गोतमं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च. उपासकं मं भवं गोतमो धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गतं. हन्द, च दानि मयं, भो गोतम, गच्छाम; बहुकिच्चा मयं बहुकरणीया’’ति. ‘‘यस्सदानि त्वं, माणव, कालं मञ्ञसी’’ति. अथ खो सुभो माणवो तोदेय्यपुत्तो भगवतो भासितं अभिनन्दित्वा अनुमोदित्वा उट्ठायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा पक्कामि.
तेन खो पन समयेन जाणुस्सोणि ब्राह्मणो सब्बसेतेन वळवाभिरथेन (वळभीरथेन (सी.)) सावत्थिया निय्याति दिवा दिवस्स. अद्दसा खो जाणुस्सोणि ब्राह्मणो सुभं माणवं तोदेय्यपुत्तं दूरतोव आगच्छन्तं. दिस्वान सुभं माणवं तोदेय्यपुत्तं एतदवोच – ‘‘हन्द, कुतो नु भवं भारद्वाजो आगच्छति दिवा दिवस्सा’’ति? ‘‘इतो हि खो अहं, भो , आगच्छामि समणस्स गोतमस्स सन्तिका’’ति. ‘‘तं किं मञ्ञसि, भवं भारद्वाजो, समणस्स गोतमस्स पञ्ञावेय्यत्तियं पण्डितो मञ्ञेति’’? ‘‘को चाहं, भो, को च समणस्स गोतमस्स पञ्ञावेय्यत्तियं जानिस्सामि? सोपि नूनस्स तादिसोव यो समणस्स गोतमस्स पञ्ञावेय्यत्तियं जानेय्या’’ति. ‘‘उळाराय खलु, भवं भारद्वाजो, समणं गोतमं पसंसाय पसंसती’’ति. ‘‘को चाहं, भो, को च समणं गोतमं पसंसिस्सामि? पसत्थपसत्थोव सो भवं गोतमो सेट्ठो देवमनुस्सानं. ये चिमे, भो, ब्राह्मणा पञ्च धम्मे पञ्ञपेन्ति पुञ्ञस्स किरियाय कुसलस्स आराधनाय; चित्तस्सेते समणो गोतमो परिक्खारे वदेति – यदिदं चित्तं अवेरं अब्याबज्झं तस्स भावनाया’’ति.
एवं वुत्ते, जाणुस्सोणि ब्राह्मणो सब्बसेता वळवाभिरथा ओरोहित्वा एकंसं उत्तरासङ्गं करित्वा येन भगवा तेनञ्जलिं पणामेत्वा उदानं उदानेसि – ‘‘लाभा रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स, सुलद्धलाभा रञ्ञो पसेनदिस्स कोसलस्स यस्स विजिते तथागतो विहरति अरहं सम्मासम्बुद्धो’’ति.
सुभसुत्तं निट्ठितं नवमं.