अव्याकृत धम्म
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

प्रतीत्य समुत्पाद
लेखयह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है, और न ही यह किसी शाश्वत 'आत्मा' की यात्रा है। यह हेतु और फल का एक जटिल ताना-बाना है। हम एक बंद कमरे में नहीं हैं, बल्कि एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो निरंतर अपने आप को 'पका' रही है और 'खा' रही है।

९. पोट्ठपादसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।

२९. पासादिकसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायमहावीर जैन के निधन होने पर उनके संघ में ‘कत्लेआम’ मचा। उसे सुनकर, बुद्ध अपने संघ में स्थिरता और प्रौढ़ता का भाव व्यक्त करते है। और, भिक्षुओं को संगीति के लिए प्रेरित भी करते है।

६३. चूळमालुक्य सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु जाकर भगवान को धमकी देता है—दार्शनिक उत्तर न मिले तो संन्यास छोड़ देगा।

७२. अग्गिवच्छ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायवह संन्यासी अब भगवान से दुनिया की दस प्रमुख दार्शनिक मान्यताओं के बारे में प्रश्न करता है।