आर्य सत्य
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

बुद्ध का क्रमिक उपदेश
लेखबुद्ध ने कभी धर्म को एक ही साँचे में नहीं ढाला। वे श्रोता की क्षमता, उसकी जिज्ञासा और उसके मन की स्थिति को ध्यान में रखकर ही, क्रमबद्ध रूप से, धर्म को प्रकट करते—इसी को 'अनुपुब्बिकथा' कहा गया है।

चार आर्य सत्य में ऐसा क्या है जो 'आर्य' है?
लेखजब लोग मुझसे यह सवाल पूछते हैं, तो वे अक्सर थोड़े झेंप जाते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा पूछना कहीं अपमानजनक न हो, या यह सवाल इतना सीधा है कि इसका जवाब तो सबको पता ही होना चाहिए। लेकिन सच कहूँ तो, यह सवाल पूछने लायक है।

पुनर्जन्म का आर्यसत्य
ग्रन्थ / पुनर्जन्म की सच्चाईअपने श्रोताओं को सांसारिक सही दृष्टिकोण से पारलौकिक सही दृष्टिकोण की ओर ले जाने के लिए, बुद्ध ने पुनर्जन्म पर शिक्षा का उपयोग न केवल अपने श्रोताओं में सावधानी की भावना को प्रेरित करने के लिए किया, बल्कि संवेग की भावना भी पैदा की: पुनर्जन्म से मुक्ति न मिलने की संभावना पर निराशा और भय।

७. अरियसच्च
ग्रन्थ / पटिपदाएक समय भगवान कौशाम्बी के समीप शीशमवन में रहते थे। उन्होंने शीशम के कुछ पत्ते हाथ में लेकर भिक्षुओं से पूछा—क्या लगता है भिक्षुओं, क्या अधिक है...

८. अरियसच्च वित्थार
ग्रन्थ / पटिपदाजब ‘चित्त की एकाग्रता’ सात-अंगों से परिपूर्ण हो, तब उसे ‘आर्य सम्यकसमाधि’ कहते है। वही सात-अंग उसका आधार बनते है, और वही उसकी पूर्व-आवश्यकता है...

१६. महापरिनिब्बान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

२८. महाहत्थिपदोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसारिपुत्त भन्ते धम्म के तमाम प्रमुख सिद्धान्तों को चार आर्य सत्यों में पिरो देते हैं।

१४१. सच्चविभङ्ग सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायचार आर्य सत्यों को यदि गहराई और विस्तार से समझना हो, तो धम्मसेनापति सारिपुत्त भन्ते का यह उपदेश अचूक है।