कर्म
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

कर्म और हम
लेखकर्म दुनिया का सबसे चर्चित, लेकिन सबसे अधिक गलत समझा गया विषय बन गया है। आईये, सदियों पुरानी धूल हटाते हैं और कर्म को ठीक वैसे समझते हैं, जैसा बुद्ध ने अपने असीम ज्ञान के आधार पर समझाया।

इदप्पच्चयता - कारण कार्य सिद्धान्त
लेखयह ब्रह्मांड का 'ऑपरेटिंग सिस्टम' है। ये वह धम्म नियम है जिससे ब्रह्मांड के अणु-अणु से लेकर आकाशगंगाएँ और हमारे मन का हर एक विचार संचालित होता है। इसी में पूरी सृष्टि गुंथी हुई है।

प्रतीत्य समुत्पाद
लेखयह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है, और न ही यह किसी शाश्वत 'आत्मा' की यात्रा है। यह हेतु और फल का एक जटिल ताना-बाना है। हम एक बंद कमरे में नहीं हैं, बल्कि एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो निरंतर अपने आप को 'पका' रही है और 'खा' रही है।

कम्म - भाग तीन - कर्म के विरोधाभास और मुक्ति
लेखअक्सर लोग कर्म को बहुत ही सरल मान लेते हैं। ऐसा मानने की भूल न करें कि 'जैसा बोओगे, वैसा पाओगे', या 'सभी पुण्यशाली हमेशा १००% गारंटी के साथ स्वर्ग ही जाते हैं, जबकि सभी पापी नर्क ही।' याद रखें कि कर्म कोई सीधी रेखा में काम नहीं करता।

कम्म - भाग दो - कर्म की गहरी समझ
लेखबुद्ध ने कर्म के वास्तविक और उलझे हुए पैटर्न को अपनी गहरी प्रज्ञा से देखा, समझा और हॅक कर के उसे रोक दिया। रुकने के साथ ही मुक्ति घटित हुई। और उस मुक्ति के बाद, उन्होंने उस जटिल सत्य को हमारे लिए सरल बनाकर समझाने का प्रयास किया।

कर्म - भाग एक - कर्म की प्राथमिक समझ
लेखतमाम दार्शनिक शोर-शराबे के बीच, भगवान बुद्ध का आगमन एक सिंहनाद की तरह गूँजा। उन्होंने पुरानी लाचार मान्यताओं को सिरे से खारिज कर दिया और घोषणा की...


पुनर्जन्म और कर्म
ग्रन्थ / पुनर्जन्म की सच्चाईफिर भी सवाल उठता है कि बुद्ध को कर्म और पुनर्जन्म के विषय पर चर्चा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? हम जानते हैं कि उन्होंने कई अन्य दार्शनिक विषयों, जैसे कि ब्रह्मांड शाश्वत है या नहीं पर कोई स्पष्ट रुख अपनाने से इनकार कर दिया था। तो फिर इस मुद्दे पर उन्होंने अपना मत रखने की आवश्यकता क्यों महसूस की?


पुनर्जन्म की सच्चाई
ग्रन्थयह पुस्तक बुद्ध के मूल वचन और तर्कसंगत दृष्टिकोण से पुनर्जन्म की अवधारणा को स्पष्ट करती है। यह आधुनिक वैज्ञानिक सोच और बौद्ध परंपरा के बीच एक सेतु का कार्य करती है, यह दिखाते हुए कि पुनर्जन्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक सत्य है, जो नैतिकता और जीवन के अर्थ को गहराई से प्रभावित करता …

२. सामञ्ञफलसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायइस सूत्र में भगवान उजागर करते हैं कि धर्म वास्तव में क्या है। पुर्णिमा की रोमहर्षक रात में राजा अजातशत्रु भगवान के पास पहुँचकर मन की शान्ति पाता है।

४. भयभेरव सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायबोधिसत्व ने जंगल में अकेले रहकर डर और आतंक का सामना करते हुए संबोधि कैसे पायी?

४. सोणदण्डसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या जाति से कोई ब्राह्मण होता है या कर्म से? भरी ब्राह्मणी सभा में हुई इस ज्वलंत संवाद में भगवान ब्राह्मणों को ‘ब्राह्मणत्व’ की परिभाषा समझाकर हलचल मचा देते है।

८. महासीहनादसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक नंगे साधु को काया का कठोर तप करने में ही राग है। किन्तु भगवान उसे बताते हैं कि तब भी उसका मन दूषित रह सकता है।

१६. महापरिनिब्बान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

१७. महासुदस्सन सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान बुद्ध के एक पूर्वजन्म की प्रेरणादायी और रोमांचकारी कथा, जिसमें वे एक महान चक्रवर्ती सम्राट बने। सुदर्शन महाराज की महानता उनकी सहजता में घुल-मिलकर इस जातक कथा को अत्यंत रोचक और कभी न भूलनेवाली बनाती है।

२३. पायासि सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायराजा पायासि जिद्दी, भौतिकवादी और नास्तिक था। उसने ‘मरणोपरांत परलोक-वरलोक नहीं होता’ यह साबित करने के लिए बहुत अजीब प्रयोग किए थे। अंततः वह आकर अरहंत भिक्षु कुमार कश्यप से एक मनोरंजन-पूर्ण और यादगार बहस करता है।

३०. लक्खणसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायपहले ब्राह्मणों के वेदों में ‘बत्तीस महापुरुष लक्षण’ का लंबा विवरण दर्ज था, जो आज दिखाई नहीं देता। यह सूत्र बताता है कि बुद्ध के पूर्वजन्म में किस कर्म के परिणामस्वरूप आज कौन-सा लक्षण उपजा।

३१. सिङ्गालसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक युवा पुरुष अपने मृत पिता के आदेशानुसार व्यर्थ कर्मकांड करता है। किन्तु, बुद्ध उसे उसका गहरा महत्व समझाते हुए गृहस्थों के व्रत और जिम्मेदारियों पर प्रकाश डालते है।

४१. सालेय्यक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान साल गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

४२. वेरञ्जक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

४६. महाधम्मसमादान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान चार धम्ममार्गों का वर्णन करते हैं, प्रत्येक के लिए यादगार उपमाओं का प्रयोग करते हुए।

५६. उपालि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक निगण्ठ उपासक वादविवाद के लिए भगवान के पास जाता है, और भगवान के जादू से दीवाना होकर लौटता है।

५७. कुक्कुरवतिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायप्राचीन भारत के अनोखे संन्यासी, जो कुत्ते और गाय का व्रत रखते हैं, भगवान से उसका फल पूछते हैं।

६०. अपण्णक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।

६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान उपमाओं के माध्यम से अपने बालक पुत्र राहुल को कर्म सुधारने का पहला पाठ पढ़ाते हैं।

८४. मधुर सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायमथुरा का राजा ब्राह्मणों की स्व-घोषित श्रेष्ठता पर भन्ते की राय पूछते हैं, और भन्ते बेझिझक उत्तर देते हैं।

९५. चङ्की सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजम्बुद्वीप के प्रमुख ब्राह्मणों में गिने जाने वाले चङ्की के समक्ष भगवान ब्राह्मणों के सभी दावों को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।

९६. एसुकारी सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक ब्राह्मण भगवान से ब्राह्मण-व्यवस्था पर राय माँगता है, और भगवान खुलकर जवाब देते हैं।

९७. धनञ्जानि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसारिपुत्त भन्ते एक मदहोश ब्राह्मण को पापकर्म से धम्म में लाते हैं और मृत्यु-क्षण में उसकी सद्गति सुनिश्चित करते हैं।

१०१. देवदह सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस सूत्र में भगवान बुद्ध उन निगण्ठ (जैन) सिद्धांतों का खण्डन करते हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से आज कई लोग बौद्ध मत समझ बैठे हैं।

१०२. पञ्चत्तय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपाँच और तीन—यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।