✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
विषय दर्शन

कर्म

— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • कर्म और हम

    कर्म और हम

    लेख

    कर्म दुनिया का सबसे चर्चित, लेकिन सबसे अधिक गलत समझा गया विषय बन गया है। आईये, सदियों पुरानी धूल हटाते हैं और कर्म को ठीक वैसे समझते हैं, जैसा बुद्ध ने अपने असीम ज्ञान के आधार पर समझाया।

  • इदप्पच्चयता - कारण कार्य सिद्धान्त

    इदप्पच्चयता - कारण कार्य सिद्धान्त

    लेख

    यह ब्रह्मांड का 'ऑपरेटिंग सिस्टम' है। ये वह धम्म नियम है जिससे ब्रह्मांड के अणु-अणु से लेकर आकाशगंगाएँ और हमारे मन का हर एक विचार संचालित होता है। इसी में पूरी सृष्टि गुंथी हुई है।

  • प्रतीत्य समुत्पाद

    प्रतीत्य समुत्पाद

    लेख

    यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है, और न ही यह किसी शाश्वत 'आत्मा' की यात्रा है। यह हेतु और फल का एक जटिल ताना-बाना है। हम एक बंद कमरे में नहीं हैं, बल्कि एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो निरंतर अपने आप को 'पका' रही है और 'खा' रही है।

  • कम्म - भाग तीन - कर्म के विरोधाभास और मुक्ति

    कम्म - भाग तीन - कर्म के विरोधाभास और मुक्ति

    लेख

    अक्सर लोग कर्म को बहुत ही सरल मान लेते हैं। ऐसा मानने की भूल न करें कि 'जैसा बोओगे, वैसा पाओगे', या 'सभी पुण्यशाली हमेशा १००% गारंटी के साथ स्वर्ग ही जाते हैं, जबकि सभी पापी नर्क ही।' याद रखें कि कर्म कोई सीधी रेखा में काम नहीं करता।

  • कम्म - भाग दो - कर्म की गहरी समझ

    कम्म - भाग दो - कर्म की गहरी समझ

    लेख

    बुद्ध ने कर्म के वास्तविक और उलझे हुए पैटर्न को अपनी गहरी प्रज्ञा से देखा, समझा और हॅक कर के उसे रोक दिया। रुकने के साथ ही मुक्ति घटित हुई। और उस मुक्ति के बाद, उन्होंने उस जटिल सत्य को हमारे लिए सरल बनाकर समझाने का प्रयास किया।

  • कर्म - भाग एक - कर्म की प्राथमिक समझ

    कर्म - भाग एक - कर्म की प्राथमिक समझ

    लेख

    तमाम दार्शनिक शोर-शराबे के बीच, भगवान बुद्ध का आगमन एक सिंहनाद की तरह गूँजा। उन्होंने पुरानी लाचार मान्यताओं को सिरे से खारिज कर दिया और घोषणा की...

  • २. कम्म

    २. कम्म

    ग्रन्थ / पटिपदा

    सभी सत्व अपने कर्मों के कर्ता हैं। अपने कर्मों के वारिस हैं। अपने कर्मों से योनि पाते हैं। अपने कर्मों द्वारा संबंधी हैं...

  • पुनर्जन्म और कर्म

    पुनर्जन्म और कर्म

    ग्रन्थ / पुनर्जन्म की सच्चाई

    फिर भी सवाल उठता है कि बुद्ध को कर्म और पुनर्जन्म के विषय पर चर्चा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? हम जानते हैं कि उन्होंने कई अन्य दार्शनिक विषयों, जैसे कि ब्रह्मांड शाश्वत है या नहीं पर कोई स्पष्ट रुख अपनाने से इनकार कर दिया था। तो फिर इस मुद्दे पर उन्होंने अपना मत रखने की आवश्यकता क्यों महसूस की?

  • पुण्य

    पुण्य

    ग्रन्थ

    पुण्य ‘धर्म की नींव’ है। पुण्य ‘सुख की इमारत’ है। पुण्य ‘मुक्ति की सीढ़ी’ है। इस पुस्तक में आप जानेंगे कि धर्म की उस नींव को वर्तमान जीवन में कैसे रखा जाता है। सुख की उस इमारत को भविष्य के लिए कैसे खड़ा किया जाता है। और त्रिकाल दुःखमुक्ति की उस सीढ़ी पर कैसे चढ़ा जाता है।

  • पुनर्जन्म की सच्चाई

    पुनर्जन्म की सच्चाई

    ग्रन्थ

    यह पुस्तक बुद्ध के मूल वचन और तर्कसंगत दृष्टिकोण से पुनर्जन्म की अवधारणा को स्पष्ट करती है। यह आधुनिक वैज्ञानिक सोच और बौद्ध परंपरा के बीच एक सेतु का कार्य करती है, यह दिखाते हुए कि पुनर्जन्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक सत्य है, जो नैतिकता और जीवन के अर्थ को गहराई से प्रभावित करता …

  • २. सामञ्ञफलसुत्तं

    २. सामञ्ञफलसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    इस सूत्र में भगवान उजागर करते हैं कि धर्म वास्तव में क्या है। पुर्णिमा की रोमहर्षक रात में राजा अजातशत्रु भगवान के पास पहुँचकर मन की शान्ति पाता है।

  • ४. भयभेरव सुत्त

    ४. भयभेरव सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    बोधिसत्व ने जंगल में अकेले रहकर डर और आतंक का सामना करते हुए संबोधि कैसे पायी?

  • ४. सोणदण्डसुत्तं

    ४. सोणदण्डसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या जाति से कोई ब्राह्मण होता है या कर्म से? भरी ब्राह्मणी सभा में हुई इस ज्वलंत संवाद में भगवान ब्राह्मणों को ‘ब्राह्मणत्व’ की परिभाषा समझाकर हलचल मचा देते है।

  • ८. महासीहनादसुत्तं

    ८. महासीहनादसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    एक नंगे साधु को काया का कठोर तप करने में ही राग है। किन्तु भगवान उसे बताते हैं कि तब भी उसका मन दूषित रह सकता है।

  • १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

  • १७. महासुदस्सन सुत्त

    १७. महासुदस्सन सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    भगवान बुद्ध के एक पूर्वजन्म की प्रेरणादायी और रोमांचकारी कथा, जिसमें वे एक महान चक्रवर्ती सम्राट बने। सुदर्शन महाराज की महानता उनकी सहजता में घुल-मिलकर इस जातक कथा को अत्यंत रोचक और कभी न भूलनेवाली बनाती है।

  • २३. पायासि सुत्त

    २३. पायासि सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    राजा पायासि जिद्दी, भौतिकवादी और नास्तिक था। उसने ‘मरणोपरांत परलोक-वरलोक नहीं होता’ यह साबित करने के लिए बहुत अजीब प्रयोग किए थे। अंततः वह आकर अरहंत भिक्षु कुमार कश्यप से एक मनोरंजन-पूर्ण और यादगार बहस करता है।

  • ३०. लक्खणसुत्त

    ३०. लक्खणसुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    पहले ब्राह्मणों के वेदों में ‘बत्तीस महापुरुष लक्षण’ का लंबा विवरण दर्ज था, जो आज दिखाई नहीं देता। यह सूत्र बताता है कि बुद्ध के पूर्वजन्म में किस कर्म के परिणामस्वरूप आज कौन-सा लक्षण उपजा।

  • ३१. सिङ्गालसुत्त

    ३१. सिङ्गालसुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    एक युवा पुरुष अपने मृत पिता के आदेशानुसार व्यर्थ कर्मकांड करता है। किन्तु, बुद्ध उसे उसका गहरा महत्व समझाते हुए गृहस्थों के व्रत और जिम्मेदारियों पर प्रकाश डालते है।

  • ४१. सालेय्यक सुत्त

    ४१. सालेय्यक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान साल गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

  • ४२. वेरञ्जक सुत्त

    ४२. वेरञ्जक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

  • ४६. महाधम्मसमादान सुत्त

    ४६. महाधम्मसमादान सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान चार धम्ममार्गों का वर्णन करते हैं, प्रत्येक के लिए यादगार उपमाओं का प्रयोग करते हुए।

  • ५६. उपालि सुत्त

    ५६. उपालि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक निगण्ठ उपासक वादविवाद के लिए भगवान के पास जाता है, और भगवान के जादू से दीवाना होकर लौटता है।

  • ५७. कुक्कुरवतिक सुत्त

    ५७. कुक्कुरवतिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    प्राचीन भारत के अनोखे संन्यासी, जो कुत्ते और गाय का व्रत रखते हैं, भगवान से उसका फल पूछते हैं।

  • ६०. अपण्णक सुत्त

    ६०. अपण्णक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।

  • ६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त

    ६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान उपमाओं के माध्यम से अपने बालक पुत्र राहुल को कर्म सुधारने का पहला पाठ पढ़ाते हैं।

  • ८४. मधुर सुत्त

    ८४. मधुर सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    मथुरा का राजा ब्राह्मणों की स्व-घोषित श्रेष्ठता पर भन्ते की राय पूछते हैं, और भन्ते बेझिझक उत्तर देते हैं।

  • ९५. चङ्की सुत्त

    ९५. चङ्की सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    जम्बुद्वीप के प्रमुख ब्राह्मणों में गिने जाने वाले चङ्की के समक्ष भगवान ब्राह्मणों के सभी दावों को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।

  • ९६. एसुकारी सुत्त

    ९६. एसुकारी सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक ब्राह्मण भगवान से ब्राह्मण-व्यवस्था पर राय माँगता है, और भगवान खुलकर जवाब देते हैं।

  • ९७. धनञ्जानि सुत्त

    ९७. धनञ्जानि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    सारिपुत्त भन्ते एक मदहोश ब्राह्मण को पापकर्म से धम्म में लाते हैं और मृत्यु-क्षण में उसकी सद्गति सुनिश्चित करते हैं।

  • १०१. देवदह सुत्त

    १०१. देवदह सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस सूत्र में भगवान बुद्ध उन निगण्ठ (जैन) सिद्धांतों का खण्डन करते हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से आज कई लोग बौद्ध मत समझ बैठे हैं।

  • १०२. पञ्चत्तय सुत्त

    १०२. पञ्चत्तय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    पाँच और तीन—यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।