कामुकता
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

५. कामच्छन्दप्पहान
ग्रन्थ / पटिपदाकल्पना करो कि एक गीली, रसदार लकड़ी, जल में पड़ी हो, और एक पुरुष माचिस की तीली लेकर आए (सोचते हुए) ‘मैं अग्नि जलाऊंगा। मैं गर्मी प्रकट करूँगा’...

१३. महादुक्खक्खन्ध सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपरधम्मी परिव्राजकों को लगता हैं कि उनका और बुद्ध का धम्म एक जैसा ही है। तब, भगवान ऐसा धम्म बताते हैं, जो उनके लिए ‘आउट ऑफ सिलेबस’ हो।

१४. चूळदुक्खक्खन्ध सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान अपने चचेरे भाई महानाम को कामुकता के बारे में बताते हैं। साथ ही, जैन साधकों से हुए वार्तालाप का उल्लेख भी करते हैं।

२२. अलगद्दूपम सुत
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताया हैं।

२६. पासरासि/अरियपरियेसना सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायदुनिया के सभी लोग, दरअसल, दो तरह की खोज में जुटे हैं। भगवान विस्तार से स्वयं की खोज भी बताते हैं।

४५. चूळधम्मसमादान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान चार प्रकार के धम्ममार्ग बताते हैं, जिनसे वर्तमान का अनुभव और भविष्य के फल भिन्न होते हैं।

५४. पोतलिय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक गृहस्थ जब स्वयं को दुनियादारी से अलग समझता है, तब भगवान उसे सच्चे अर्थ में दुनियादारी से कटने का मार्ग बताते हैं।

५९. बहुवेदनीय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायदो लोग वेदना की गिनती में उलझे रहते हैं, वहीं भगवान उनसे आगे बढ़कर सुखों के विविध प्रकार गिनाते हैं।

६६. लटुकिकोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान का उपकार अनुभव करने वाले भिक्षु को भगवान बंधन तोड़ने और उपाधियों से परे जाने का धम्म सिखाते हैं।

६७. चातुम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायविहार में शोर मचाने वाले भिक्षुओं को भगवान निष्कासित कर देते हैं, लेकिन उन्हें वापस स्वीकारने पर वे चार संभावित खतरों से सावधान करते हैं।

७५. मागण्डिय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान को ‘भ्रूण हत्यारा’ कहने वाला परिव्राजक, भगवान से मिलकर भिक्षुत्व स्वीकार कर अरहंत बनता है।

८०. वेखनस सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपिछले सूत्र के परिव्राजक सकुलुदायी के आचार्य इस बार अपनी बात की रक्षा करने आते हैं, लेकिन भगवान का शिष्य बन जाते हैं।

८५. बोधिराजकुमार सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायराजकुमार मानता है कि परमसुख कठिन तप से मिलता है, सुखद मार्ग से नहीं! इसी पर भगवान का उत्तर।

१०५. सुनक्खत्त सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजो भिक्षु स्वयं को ऊँचा आँक कर, अरहंत मानकर, साधना छोड़ देता है, उस पर भगवान का धम्मोपदेश।