तर्क
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

तर्क बनाम विवेक
लेखतर्क आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन आधुनिक दुनिया में तर्क एक अतिरंजित और अनिवार्य गुण बन चुका है।

एकमात्र वास्तविक विज्ञान
लेखक्या संबोधि (अरहंत की अवस्था) प्राप्त करने के लिए पहले 'झान' का अनुभव होना ज़रूरी है? या फिर बिना 'झान' में गए भी सीधे उस परम लक्ष्य (निर्वाण) तक पहुँचा जा सकता है?

कालाम सुत्त पर एक नज़र
लेखइस उपदेश को 'स्वतंत्र जाँच का बुद्ध का घोषणापत्र' कहा गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुत्त उन सभी दावों का समर्थन कर सकता है जो इसके साथ जोड़ दिए गए हैं?...

धम्म के दो रूप
लेखपहली बार सामना होने पर, बौद्ध धर्म हमारे सामने एक विरोधाभास के रूप में आता है। हमें जल्द ही पता चलता है कि इसका एक दूसरा पहलू भी है, जो हमारी तर्कसंगत पूर्व-मान्यताओं के बिल्कुल विपरीत लगता है...

बोधि में श्रद्धा
लेखबुद्ध ने कभी किसी पर आँख मूँदकर विश्वास करने या श्रद्धा रखने का कोई अंधा दबाव नहीं बनाया। आज के दौर में, जहाँ संसार के बहुसंख्यक और प्रभुत्वशाली धर्म बिना किसी तर्क के पूर्ण आत्मसमर्पण और अंधश्रद्धा की मांग करते हैं, वहाँ बुद्ध का यह प्रगतिशील नज़रिया सबसे बड़ी खूबी बनकर उभरता है...

संसार बटा शून्य
लेखबौद्ध साधना का आखिरी लक्ष्य है—निर्वाण। और इसके बारे में कहा जाता है कि यह पूरी तरह से 'अहेतुक' है, यानी इसे किसी कारण से पैदा नहीं किया जा सकता। अब यहीं पर एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है...


प्राथमिक अंतर्ज्ञान
ग्रन्थ / पुण्यऐसा होता है कि दुःख से हारा, चित्त से बेकाबू, एक व्यक्ति—अफ़सोस करता है, ढ़ीला पड़ता है, विलाप करता है, छाती पीटता है, बावला हो जाता है। किंतु दुःख से हारा, चित्त से बेकाबू, दूसरा व्यक्ति—बाहर ख़ोज करने निकल पड़ता है। सोचते हुए, ‘कौन इस दुःख को ख़त्म करने के एक-दो उपाय जानता है?

१. ब्रह्मजालसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायसुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक ६२ मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।

१. ब्रह्मजालसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायसुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक ६२ मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।

१. ब्रह्मजालसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायसुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक ६२ मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।

२३. पायासि सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायराजा पायासि जिद्दी, भौतिकवादी और नास्तिक था। उसने ‘मरणोपरांत परलोक-वरलोक नहीं होता’ यह साबित करने के लिए बहुत अजीब प्रयोग किए थे। अंततः वह आकर अरहंत भिक्षु कुमार कश्यप से एक मनोरंजन-पूर्ण और यादगार बहस करता है।

६०. अपण्णक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।

७६. सन्दक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायआनन्द भन्ते परिव्राजक गुरु से चर्चा करते हैं, तो वह अपने सभी शिष्यों को भिक्षु बनने भेज देते हैं।

९५. चङ्की सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजम्बुद्वीप के प्रमुख ब्राह्मणों में गिने जाने वाले चङ्की के समक्ष भगवान ब्राह्मणों के सभी दावों को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।