दान
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

बुद्ध का क्रमिक उपदेश
लेखबुद्ध ने कभी धर्म को एक ही साँचे में नहीं ढाला। वे श्रोता की क्षमता, उसकी जिज्ञासा और उसके मन की स्थिति को ध्यान में रखकर ही, क्रमबद्ध रूप से, धर्म को प्रकट करते—इसी को 'अनुपुब्बिकथा' कहा गया है।

शुरुवात कैसे करें - दूसरा कदम - दानी जीवन
लेखजीवन में अपनी कमाई हुई वस्तु का उपभोग करने का एक सुख है, लेकिन उसे स्वेच्छा से त्याग देने का सुख, भोगने से कहीं गहरा होता है।


भावना
ग्रन्थ / पुण्यजो पुण्यक्रिया के तमाम आधार आपोआप (स्वर्ग में) उत्पन्न कराते हैं, वे ‘मेत्ता चेतोविमुक्ति’ के सोलहवें हिस्से के बराबर भी नहीं हैं। मेत्ता तमाम पुण्यों से आगे बढ़कर अधिक चमकती है, उजाला करती है, चकाचौंध करती है।

२३. पायासि सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायराजा पायासि जिद्दी, भौतिकवादी और नास्तिक था। उसने ‘मरणोपरांत परलोक-वरलोक नहीं होता’ यह साबित करने के लिए बहुत अजीब प्रयोग किए थे। अंततः वह आकर अरहंत भिक्षु कुमार कश्यप से एक मनोरंजन-पूर्ण और यादगार बहस करता है।

पहले दान - साधना सिरीज़
देसनाअगर आप कमरे में नजर डालते, तो सबके चेहरे तने हुए, आँखें कसकर बंद, जैसे उनके माथे पर लिखा हो – निर्वाण चाहिए, वरना खत्म।