प्रतीत्य समुत्पाद
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

सिद्धार्थ को मध्यम मार्ग मिलना
लेखशरीर के दमन का मार्ग व्यर्थ सिद्ध हो चुका था। अब सिद्धार्थ ने एक नई दिशा पकड़ी। यह दिशा थी—चित्त की साधना। अब उनका संघर्ष 'शरीर' से नहीं, बल्कि 'मन' की गहराइयों से था।

प्रतीत्य समुत्पाद
लेखयह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है, और न ही यह किसी शाश्वत 'आत्मा' की यात्रा है। यह हेतु और फल का एक जटिल ताना-बाना है। हम एक बंद कमरे में नहीं हैं, बल्कि एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो निरंतर अपने आप को 'पका' रही है और 'खा' रही है।

८. अरियसच्च वित्थार
ग्रन्थ / पटिपदाजब ‘चित्त की एकाग्रता’ सात-अंगों से परिपूर्ण हो, तब उसे ‘आर्य सम्यकसमाधि’ कहते है। वही सात-अंग उसका आधार बनते है, और वही उसकी पूर्व-आवश्यकता है...

१. ब्रह्मजालसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायसुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक ६२ मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।

९. सम्मादिट्ठि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसारिपुत्त भन्ते सम्यक-दृष्टि को अनोखे अंदाज में, गहरे प्रतीत्य समुत्पाद के आधार पर परिभाषित करते हैं।

११. चूळसीहनाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान प्रेरित करते हैं कि उनके शिष्य जाकर दूसरे संन्यासियों के सामने दहाड़े।

१४. महापदान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदुर्लभ ही होता है कि जब भगवान भिक्षुसंघ को बैठकर कोई कथा सुनाए। यह कथा पिछले सात सम्यक-सम्बुद्धों की महाकथा हैं। किन्तु, प्रश्न उठता है कि भगवान को यह महाकथा भला कैसे पता है?

१५. महानिदान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायआयुष्मान आनन्द को लगता है कि उन्होंने प्रतीत्य समुत्पाद को गहराई से जान लिया। भगवान उन्हें चेताते हैं कि इतना आत्मविश्वास मत पालो। और, तब दुःख के विविध कारण और निर्भर घटकों का गहराई से वर्णन करते है।

१६. महापरिनिब्बान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

२८. महाहत्थिपदोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसारिपुत्त भन्ते धम्म के तमाम प्रमुख सिद्धान्तों को चार आर्य सत्यों में पिरो देते हैं।

३८. महातण्हासङ्खय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।

कारण-कार्य में महारत - साधना सिरीज़
देसनाबुद्ध के पूर्ण जागरण का मूल बताया गया है — कारण-कार्य के सिद्धांत की खोज। कैसे कर्म का फल हमारे अनुभव को आकार देता है। सुनने में यह बात बहुत सूक्ष्म या जटिल लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह उसी अनुभव से जुड़ी है जो अभी तुम्हें हो रहा है।