मनोविज्ञान
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

सिद्धार्थ को मध्यम मार्ग मिलना
लेखशरीर के दमन का मार्ग व्यर्थ सिद्ध हो चुका था। अब सिद्धार्थ ने एक नई दिशा पकड़ी। यह दिशा थी—चित्त की साधना। अब उनका संघर्ष 'शरीर' से नहीं, बल्कि 'मन' की गहराइयों से था।


अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रमाण
लेखपिछले तीन दशकों में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान (न्यूरोसाइंस) और मनोविज्ञान ने एक यू-टर्न लिया है। अब हज़ारों शोध इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि जिसे हम 'अध्यात्म' कहते हैं, वह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि मस्तिष्क और शरीर को स्वस्थ रखने की सबसे उन्नत तकनीक है।

आत्म-रूपांतरण
लेखयह शायद सामान्य मानवीय स्थिति की कमज़ोर प्रकृति का ही लक्षण है कि हममें से बहुत कम लोग अपने स्वाभाविक स्वरूप के साथ तालमेल बिठाकर आराम से अपना पूरा जीवन गुज़ार पाते हैं...

इद्धिपाद - ऋद्धिपद की भावना
लेखयह सच है कि ध्यान में कुछ लोग इन शक्तियों को प्राप्त करते हैं। उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है कि इन शक्तियों का उपयोग कैसे करें ताकि ये मार्ग में बाधा नहीं, बल्कि सहायक बनें।

उद्धच्चकुकुच्च - बेचैनी-पश्चाताप और उसका त्याग
लेखबेचैनी और पश्चाताप चित्त में उठा एक ऐसा तूफान है, जो हमारी अतिरिक्त और असंतुलित ऊर्जा का परिणाम है। जैसे उच्च रक्तचाप शरीर को थका देता है, वैसे ही चंचलता और अतीत का पछतावा चित्त को रोगी बना देते हैं।

कामछन्द - कामेच्छा और उसका त्याग
लेखजो व्यक्ति जितना कामुकता में डूबता है, उसकी संवेदनाएँ उतनी ही मरती जाती हैं। उसका चित्त सूक्ष्म से गिरकर इतना स्थूल हो जाता है कि एक समय बाद उसे साधारण जीवन नीरस और बेजान लगने लगता है। तब और मज़ा निचोड़ने के लिए वह घिनौने कर्मों और नशे की दलदल में उतर जाता है।

जलेबी के बदले सोना
लेखहम सभी सुख की तलाश में हैं। राजा हो या भिखारी, चोर हो या संत—हर कोई दुख से छुटकारा पाना चाहता है और सुख पाना चाहता है। इस सार्वभौमिक सच्चाई को समझते हुए, बौद्ध दर्शन सुख की इस खोज पर दो शर्तें रखता है...

थिनमिद्ध - सुस्ती-तंद्रा और उसका त्याग
लेखसुस्ती कोई साधारण नींद नहीं है; यह यथार्थ से भागने का चित्त का एक रक्षातंत्र है। जब चित्त वर्तमान क्षण की चुनौतियों या नीरसता का सामना नहीं कर पाता, तो वह खुद को 'शट डाउन' करने लगता है। व्यक्ति को लगता है कि उसे शारीरिक विश्राम चाहिए, लेकिन असल में उसका चित्त सत्य से आँखें चुरा रहा होता है।

नैतिक जीवन की नींव
लेखनैतिक जीवन ही अध्यात्म की रीढ़ है। नैतिक मूल्यों के बिना धर्म की शुरुआत भी नहीं हो सकती, और धर्म के बिना नैतिकता की जड़ें गहरी नहीं होतीं। अध्यात्म हमें जीवन के लिए एक ऐसा 'नैतिक कम्पास' देता है, जिससे हम भीड़ के प्रभाव में आए बिना, स्वयं सही और गलत का निर्णय ले पाते हैं।

बोधि में श्रद्धा
लेखबुद्ध ने कभी किसी पर आँख मूँदकर विश्वास करने या श्रद्धा रखने का कोई अंधा दबाव नहीं बनाया। आज के दौर में, जहाँ संसार के बहुसंख्यक और प्रभुत्वशाली धर्म बिना किसी तर्क के पूर्ण आत्मसमर्पण और अंधश्रद्धा की मांग करते हैं, वहाँ बुद्ध का यह प्रगतिशील नज़रिया सबसे बड़ी खूबी बनकर उभरता है...

ब्यापाद - दुर्भावना और उसका त्याग
लेखदुर्भावना, दरअसल, आत्मरक्षा की एक अंधी प्रतिक्रिया है। जब हम किसी मामूली बात को भी अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान बैठते हैं, तो यह तुच्छ-सी बात भीतर धधकती आग बन जाती है। जो ऊर्जा दूसरों को जलाने उठती है, वह सबसे पहले स्वयं को ही राख कर देती है।

मन के गहरे घाव और उपचार
लेखमानसिक आघात ऐसे अनुभव हैं जो समय के साथ धुंधले तो पड़ जाते हैं, लेकिन मिटते नहीं। वे हमारे अवचेतन मन में जाकर बैठ जाते हैं और वहीं से हमारे आज के व्यवहार, डर और क्रोध को संचालित करते हैं।

विचिकिच्छा - उलझन और उसका त्याग
लेखउलझन या शंका बाहरी जानकारी की कमी से नहीं, बल्कि भीतर की अस्पष्टता से जन्म लेती है। जब चित्त का अपना कोई ठोस आधार नहीं होता, तो वह मानसिक गुलामी, अंधविश्वास और अनिश्चितता के रेगिस्तान में भटकने लगता है।

शील की औषधि
लेखभगवान बुद्ध एक वैद्य की तरह थे, जो मानव जाति की आध्यात्मिक बीमारियों का इलाज करते थे। दुखों से तड़पते लोगों के लिए उनकी शिक्षाएं किसी अचूक औषधि से कम नहीं थीं...

संकटों से सामना
लेखये संकट ही वह कसौटी हैं, जिस पर इंसान के असली व्यक्तित्व की परीक्षा होती है। जब सब कुछ ठीक चल रहा हो, तब तो हर कोई मुस्कुरा सकता है। लेकिन जब जीवन की नींव हिलने लगे, तब कौन खड़ा रहता है और कौन बिखर जाता है?

सीमाओं को धकेलना
लेखबुद्ध ने एक बार कहा था: 'सब्बे धम्मा छन्दमूलका!' अर्थात, संसार के समस्त धम्म 'छन्द' (चाहत या इच्छा) की जड़ से ही उपजे हैं। हम जो कुछ भी सोचते हैं, बोलते हैं या करते हैं—यहाँ तक कि हमारा हर अनुभव—चाहत या इच्छा से ही उत्पन्न होता है...

सुरक्षा की तलाश
लेखमनोविज्ञान का यह एक सर्वमान्य सच हो सकता है कि खुशी पाने की इच्छा इंसान की सबसे बुनियादी प्रेरणा है। लेकिन यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह इच्छा आम तौर पर एक अन्य प्रेरणा द्वारा तय की गई सीमाओं के भीतर ही काम करती है, जो उतनी ही गहरी और व्यापक है...