✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
विषय दर्शन

संज्ञा

— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • आहार प्रतिकूल संज्ञा

    आहार प्रतिकूल संज्ञा

    लेख

    भगवान कहते हैं—आहार-प्रतिकूल नज़रिए की साधना करना, उसे विकसित करना — महाफ़लदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है। कैसे साधक आहार-प्रतिकूल नज़रिए की साधना करता है?

  • १३. अतिरित्त भावना

    १३. अतिरित्त भावना

    ग्रन्थ / पटिपदा

    अच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनौनी स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनरहित पक्ष देखते हुए रहे। अच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनरहित स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनौना पक्ष देखते हुए रहे...

  • ९. पोट्ठपादसुत्तं

    ९. पोट्ठपादसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    एक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।

  • १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

  • १८. मधुपिण्डिक सुत्त

    १८. मधुपिण्डिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान के मुख से निकला 'प्रपंच' पर एक अत्यंत सारगर्भित और संक्षिप्त धम्म। लेकिन उसका अर्थ कौन बताए?

  • ४३. महावेदल्ल सुत्त

    ४३. महावेदल्ल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ दो भिक्षुओं के सवाल-जवाब से धम्म के गहरे पहलू एक खिलते हुए फूल की तरह खुलते हैं।

  • १०२. पञ्चत्तय सुत्त

    १०२. पञ्चत्तय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    पाँच और तीन—यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।