संज्ञा
— इस विषय से संबंधित संपूर्ण संकलन —

दुक्खा पटिपदा - संज्ञा का खेल!
लेखक्या किसी कौए को कोई मानवीय स्त्री खूबसूरत लग सकती है? या क्या किसी कुत्ते के भीतर किसी गाय को देखकर काम-वासना जाग सकती है?

अनत्त सञ्ञा - अनात्म संज्ञा!
लेखरूप आत्म नहीं होता है! यदि रूप आत्म होता, तो वह हमें पीड़ा में न डालता। और, हम उसे कह पाते कि—‘मेरा रूप ऐसा हो, वैसा न हो!

अशुभ भावना - काया सुंदर नहीं है!
लेखअशुभ भावना शरीर से नफरत करना नहीं है, बल्कि उस 'सम्मोहन' को तोड़कर यथार्थ को देखना है जो कामराग को जन्म देता है। यह सम्मोहन तोड़ने वाली अचूक औषधि है।

आदीनव सञ्ञा - अवगुण देखना!
लेखअवगुण देखना क्या है? कोई भिक्षु जंगल में, पेड़ के तले, या ख़ालीगृह में जाता है, और चिंतन करता है—‘बड़ी पीड़ाएँ है इस शरीर की! बहुत अवगुण है! इस शरीर में विविध बीमारियां उपजती है, जैसे, आँख का रोग, कान का रोग...

आहार प्रतिकूल संज्ञा - आहार के प्रति विपरीत संज्ञा!
लेखभगवान कहते हैं—आहार-प्रतिकूल संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।

नवसिवथिक - नौ प्रकार के श्मशान
लेखकोई भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—एक दिन पुरानी, दो दिन पुरानी, तीन दिन पुरानी—फूल चुकी, नीली पड़ चुकी, पीब रिसती हुई।

पटिकुल मनसिकार - प्रतिकूल चिंतन!
लेखअच्छा होगा, यदि साधक ‘घिनौनी परिस्थिति’ में रहकर भी, सही समय पर 'घिनरहित पक्ष' को देखते हुए विहार करें।

मरणसञ्ञा - मौत का नजरिया
लेखमौत के स्मरण की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।

सब्बलोके अनभिरति - सभी लोक के प्रति नीरस!
लेखसभी लोक-विश्व के प्रति निरस नज़रिया क्या है? यदि साधक को किसी लोक (=कामलोक, ब्रह्मलोक) के प्रति आसक्ति हो, या उसके चित्त का स्थिराव, टिकाव, या झुकाव होता हो—तब उसे त्यागकर, वह अनासक्त रहता है।

सब्बसङ्खारेसु अनिच्चानुसञ्ञा - अनित्य नजरिया!
लेखअनित्य संज्ञा क्या है? साधक पाँच उपादान-स्कंध को अनित्य देखते हुए विहार करता है।

१३. अतिरित्त भावना
ग्रन्थ / पटिपदाअच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनौनी स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनरहित पक्ष देखते हुए रहे। अच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनरहित स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनौना पक्ष देखते हुए रहे...

९. पोट्ठपादसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।

१६. महापरिनिब्बान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

१८. मधुपिण्डिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान के मुख से निकला 'प्रपंच' पर एक अत्यंत सारगर्भित और संक्षिप्त धम्म। लेकिन उसका अर्थ कौन बताए?

४३. महावेदल्ल सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ दो भिक्षुओं के सवाल-जवाब से धम्म के गहरे पहलू एक खिलते हुए फूल की तरह खुलते हैं।

१०२. पञ्चत्तय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपाँच और तीन—यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।

१०६. आनेञ्जसप्पाय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान कामुकता से परे जाने के ठोस साधना-मार्ग बताते हैं, और अंततः उन्हें भी लाँघने की प्रेरणा देते हैं।

११४. सेवितब्बासेवितब्ब सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान यहाँ धम्म की जटिलता को हटाकर एक सीधा मापदंड सामने रखते हैं—कि कौन-सी बात अपनाने योग्य है और कौन-सी नहीं।

१२१. चूळसुञ्ञत सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान यहाँ आयुष्मान आनन्द को शून्यता की सुखद ध्यान-अवस्था में प्रवेश करने का एक अत्यंत सरल मार्ग बताते हैं।