
आखिर बुद्ध ने वास्तव में क्या सिखाया… और क्या नहीं? बस यही जानने के लिए हम भिक्षुओं ने अपने जीवन के कई साल लगा दिए।
विडंबना देखिए! हमें अपने स्वदेशी शास्ता के मूल शब्दों को ठीक से समझने के लिए विदेशों में भटकना पड़ा और विदेशी भाषाओं का सहारा लेना पड़ा। लेकिन वहाँ भी ज्ञान मिलावट-रहित नहीं मिला। जिस माटी पर तथागत ४५ वर्षों तक नंगे पाँव चले, जहाँ से धम्मदीप का प्रकाश पूरी दुनिया में फैला, वही माटी सदियों तक अज्ञान के घोर अंधकार में डूबी रही।
हमें एक बड़ी टीस यह रही कि अपनी भारत की माटी में, अपनी सहज हिंदी भाषा में, कोई प्रामाणिक और परिशुद्ध धर्मग्रंथ उपलब्ध नहीं था। इसी टीस ने एक गहरे संकल्प को जन्म दिया—भगवान बुद्ध के उसी विशुद्ध धम्मदीप को अपनी माटी में फिर से प्रज्वलित करना।
इसी संकल्प का साकार रूप है: dhammadeep.com
पाली साहित्य एक अथाह सागर जैसा है। सदियों के इस सफर में इसमें कई बाहरी मान्यताएं और मिलावटें घुल-मिल गई हैं। लेकिन आज, आधुनिक तुलनात्मक अध्ययन के जरिए इस सागर से बुद्ध के मूल धर्मरत्नों को खोजना संभव हो पाया है। धम्मदीप का मंच इन्हीं प्रामाणिक और परिशुद्ध वचनों की मजबूत नींव पर खड़ा है।
आज इंटरनेट पर प्रवचनों की बाढ़ है, लेकिन इस शोरगुल के बीच धम्मदीप का उद्देश्य कुछ अलग है। यहाँ आपको जीवन के उन गहरे, अनसुलझे सवालों के सटीक उत्तर मिलते हैं, जो मन में उठते तो हैं पर अक्सर पूछे नहीं जाते। धम्मदीप पर धर्म के तमाम गहरे और जटिल सिद्धांतों को इतनी सहजता से पिरोया गया है कि हर लेख के साथ आपकी दृष्टि सीधी और सम्यक होती जाए। और साथ ही उन शिक्षाओं को दैनिक जीवन में उतारने का व्यावहारिक मार्ग भी प्रशस्त किया गया है।
इस कालातीत सद्धर्म को स्वयं पढ़ें और परखें। इस अनमोल अवसर को ना गवाएं। इंटरनेट की भीड़ और कोलाहल से दूर, इस शांत और स्थिर ‘धम्मदीप’ की शरण लें, और उसके सौम्य प्रकाश में बैठकर दुःख-मुक्ति का मार्ग जानें।
अत्तदीप विहरथ
अत्तसरणा अनञ्ञसरणा।
स्वयं अपना द्वीप (या दीपक) बनो!
स्वयं अपनी शरण बनो!
कोई अन्य शरण न हो!
धम्मदीप विहरथ
धम्मसरणा अनञ्ञसरणा।
धम्म को अपना द्वीप (या दीपक) बनाओं!
धम्म को अपनी शरण बनाओ!
कोई अन्य शरण न हो!
धम्मदीप पर पधारें
